24/12/2015
लगातार कमजोर हो रहा प्राथमिक शिक्षा का स्तर
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* राज्य व केन्द्र सरकारें नहीं दे पा रही ध्यान।
* उच्चस्तरीय पढ़ाई पर जहां ब्यूरोकेसी हावी वहीं प्राथमिक शिक्षा देश में सबसे निचले स्तर पर।
प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा के ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है लेकिन स्वार्थ और वोट बैंक के नफे और नुकसान की जोड़-तोड़ और राजनीतिक लाभ में लगी राज्य और केंद्र सरकारें इस पर ध्यान नहीं दे रही हैं। शिक्षा राज्य का विषय है लेकिन पुरे देश लिए उपयुक्त शिक्षा नीति बनाना केन्द्र सरकार की अहम जि़म्मेदारी है, वर्तमान समय में राज्य की प्राथमिक शिक्षा राजनीति का अड्डा बन गयी है। देश में अन्य राज्यों की सरकारें अपने मन मुताबिक इसके ढांचे में बदलाव कर रही हैं। बिना ये सोचे की यदि इस स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया तो देश की भावी पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय होने से कोई रोक नहीं सकता, देश के सभी बड़े राज्यों में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार पर नजर दौड़ाये तो पायेंगे कि इनकी राज्यों की सरकारें बड़ी धनराशि प्राथमिक शिक्षा पर खर्च कर रही हैं लेकिन अगर गुणवत्ता की और ध्यान दिया जाए तो मिलेगा कि इन राज्यों की प्राथमिक कक्षाओं में पढने वाले विद्यार्थी १० तक का पहाड़ा भी नहीं सुना सकते और तो और वे सामान्य गुणा-भाग के सवाल भी नहीं हल कर सकते। ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों का ध्यान शिक्षा की ओर कम है। वे केवल अपने लिए रुपये कमाने की चिंता में ही लगे हैं। आप के जेहन में सवाल उठता होगा कि ऐसा क्यों होता है? क्यों नहीं इस क्षेत्र में कार्यरत लोग गुणवत्ता को सुधार पा रहे हैं’ फिर आखिर इस समस्या का हल क्या है? इन सवालों के कारणों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इसके पीछे कंही न कंही सरकार की उदासीनता और वोटों की राजनीति ही जिम्मेदार है। उससे भी ज्यादा जि़म्मेदार है स्थितियों को यथावत बनाये रहने की अफसरों की मानसिकता। वे फर्जी आंकड़ों के बल पर प्राथिमक शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं की अनदेखी कर रहे हैं।
प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था कंही ऐसी नहीं कि हम उसे सराह सकें। इसे अतिश्योक्ति नहीं मानना चाहिए, हम बताते हैं कि जमीनी स्तर पर क्या हालात हैं प्राथमिक शिक्षा के? हम प्रदेश के प्रमुख क्षेत्र के प्राथमिक स्कूल को देखें, इसकी भौतिक दशा देखकर ही विद्यार्थियों कीं संख्या के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है. हालाँकि ये प्राथमिक स्कूल शहर के बीचोंबीच है लेकिन १०० विद्यार्थी भी नही पढ़ते हैं यंहा। कारण कि गरीब कहे जाने वाले लोग भी जिनकी कुछ नियमित आमदनी है वे प्राथमिक स्कूल की बजाय कान्वेंट स्कूल में अपने होनहार को दाखिला दिला देते हैं। अफसरों को सब कुछ पता है लेकिन वे गलत छात्र पंजीकरण के आधार पर इस स्कूल को कागजाों में बनाये हुए हैं। गलत छात्र संख्या के आधार पर ही शिक्षकों की तैनाती भी की जाती हैं। मकसद ये की अधिक से अधिक लोगों को शहरी क्षेत्र में ही तैनात रहने का मौका मिले। प्रदेश के लगभग सभी शहरों में ऐसे स्कूल हैं। ऐसी ही स्थिति बस्ती, फैजाबाद, कानपुर, मेरठ, आगरा और गोरखपुर समेत प्रदेश के सभी मण्डलों और लगभग सभी जिलों की है। हम आपको बता दें कि यह सब कुछ होता क्यों है? दरअसल प्राथिमक शिक्षा विभाग के स्कूलों में पंजीकृत बच्चों की फीस वसूली नहीं जाती है इसलिए इनके नामांकन की प्रक्रिया में भी जमकर धांधली होती है। मैंने एक बार नहीं कई बार ये देखा है की एक ही छात्र का नाम कई स्कूलों में दर्ज है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में दर्ज बच्चों के नाम से ही केवल विभाग को वास्ता होता है, गैर सरकारी स्कूल में पंजीकृत छात्रों का नाम विभाग कभी मांगता नहीं है। वे नाम तो केवल रजिस्टरों में ही दर्ज होते हैं। ऐसे में सरकारी प्राइमरी स्कूलों के शिक्षक अपने यह पंजीकरण ज्यादा दिखाने की खातिर निजी यानी प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के नाम भी अपने रजिस्टर में चढ़ा लेते हैं। फीस तो लगनी नहीं होती इसलिए उनसे इस बारे में पूछताछ भी नहीं होती है। प्राइवेट स्कूलों को फायदा ये होता है कि जरुरत पड़ने पर किसी विद्यार्थी को प्राइमरी स्कूलों से पास का प्रमाण पात्र दिल देते हैं। प्राइवेट स्कूल में ये सब हो नहीं सकता क्योंकि वंहा तो फीस पर प्रबंधन की नजर रहती हैं।
देश में प्राथमिक शिक्षा के लगातर गिरते स्तर की समस्या का समाधान यही हो सकता की प्राथमिक शिक्षा विभाग अब सभी विद्यार्थियों का डाटा अपने पास मंगवाए और उसकी जांच करे। साथ ही फर्जी नामांकन को रोकने के लिए वो हर कक्षा के विद्यार्थी फीस निर्धारित करे। और निर्धारित शुल्क की वसूली भी पूरी ईमानदारी से हो। ऐसे में ३०० या अधिक छात्र संख्या दिखाने वाले शिक्षकों की पोल खुल जाएगी। वास्तव में यदि ईमानदारी से जांच की जाए तो उत्तर प्रदेश ही नहीं सभी राज्यों के प्राइमरी शिक्षा विभाग के छात्र पंजीकरण के आंकड़ों में हो रहे खेल की पोल आसानी से खोली जा सकती है।
मैं ये बात पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि सभी सरकारी स्कूलों के बच्चो की संख्या का जोड़ एक साथ कर दिया जाए तो ये साफ हो जाएगा की वास्तव में उतने बच्चे जिले में हैं ही और न ही उस आयु और वर्ग के। जितने गिनाये जा रहे हैं। कान्वेंट स्कूलों के बच्चों का रिकॉर्ड रखने की जरुरत प्राइमरी शिक्षा विभाग महसूस ही नहीं करता है। सी0 बी0 एस0 ई0 और आई0 सी0 एस0 सी0 से मान्यता प्राप्त स्कूलों के विद्यार्थियों का रिकॉर्ड भी ये विभाग नहीं रखता है। अगर ये सभी छात्र स्ंख्या का डाटा बेस एक साथ जोड़ दिया जाए तो गोरख धंधे का खुलासा हो जाएगा। शायद इसलिए सरकारी कर्मचारी इन आंकडों को जुटाने की जरुरत भी महसूस नहीं करते हैं। और वे सिर्फ अपने हितों का पालन-पोषण करने में लगे हुए हैं। वास्तव में गुणवत्ता के लिए एक नहीं कई मोर्चों पर प्रयास करने की जरुरत है।
ये आंकड़े यूँ ही फर्जी नहीं भरे जाते। इसके पीछे सरकारी रकम हड़पने की मंशा काम करती है। ज्यादा संख्या होने पर मिड डे मील योजना के तहत राशन ज्यादा मिलता है। इसकी अधिकारी-कर्मचारी, विद्यालय के प्रधानाचार्य और षिक्षक, प्रधानों और जनप्रतिनिधि के बीच बंदर-बांट की जाती है। हर महीने सभी अपना निश्चित हिस्सा पा जाते हैं इसलिए वे असलियत को सामने नहीं आने देते।
इस फर्जीवाड़े को रोकने का एक और उपाय कर सकती है सरकार कि वो हर क्षेत्र के मानक तय करे की वँहा के बच्चे किस स्कूल में प्रवेश ले सकते हैं। हर शिक्षक को यह अनिवार्य कर दिया जाये कि वह अपने पास के सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ायेगा, लेकिन कदाचित ऐसा हो नही रहा क्योंकि ज्यादातर शिक्षकों के राजनितिक रिश्ते हैं वो कानून की खुली मुखालफत करते नजर आते हैं। क्षेत्रीय और निकाय चुनाव में सरकारी स्कूल के शिक्षकों की महती भूमिका होती है इसलिए कोई भी दल इन्हे नाराज नहीं करना चाहता है। इनके विधायक भी विधान सभाओं और विधान परिषद में हैं वे भी इस समस्या की चर्चा नहीं करते हैं। एक और बात ये शिक्षक उठाते है की फीस न होने पर भी जब बच्चे स्कूल नहीं आते तो फीस लगाने पर वे क्यों आएंगे? ये भी हकीकत से कोषों दूर हैं। ज्यादातर लोगों में शिक्षा को लेकर जागरूकता पैदा हुई है। अब हर अभिभावक अपने बच्चे को पढाना चाहता है। उसकी हसरत होती है की बच्चा अच्छे से अच्छे स्कूल में पढे और यही वजह है की प्राइवेट स्कूल अब कदम कदम पर खुल गए हैं। उनकी फीस कम या ज्यादा हो सकती है लेकिन उनमें बच्चों की संख्या सरकारी स्कूलों से ज्यादा ही होती है जबकि उनके पास कम प्रशिक्षित स्टाफ होता है। जब प्राइवेट स्कूल बच्चे जुटा सकते हैं तो सरकारी स्कूल ऐसा क्यों नहीं कर सकते? इस दिशा में सरकारों को ईमानदारी से सोचना होगा। यदि केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसा नहीं करती तो वे देश को धोखे में रखने का काम कर हैं। ये ध्यान रखना होगा कि सिर्फ मिड डे मील और ड्रेस बांटने से ही भावी पीढी को मजबूत नहीं बनाया जा सकता, सरकार का धन सही दिशा में खर्च हो और उसके सही नतीजे प्रदेश और देश को मिलें ये सोचना अब हम सबकी भी जिम्मेदारी है। हाल ही में आये सुप्रीम कोर्ट के आदेष को भी अपने आस-पास रहने वाले सरकारी अधिकारी और कर्मचारी को समझाने की जरुरत होगी कि वे भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलोें में पढ़ाये, ताकि अधिकारी/कर्मचारी भी सरकारी विद्यालयों पर नजर रख सके और कुछ गलत हो रहे शिक्षकों, अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों पर लगाम लगा सकें।