19/08/2017
#आखरी_किस्त
वो जब पेहली मर्तबा सादिया के घर गये थे जब
रिश्ते के लिए हां हुई थी - दोस्तो का शादी कि
खबर पर छेड छाड़ हसी मजाक.... उमर कि
आंखो में नमी उतर आयी...
एक दाडी कि बात नहीं है-मेरी पूरी आख़िरत कि
बात है.. पलको पर कुछ कतरे बिखर गये
अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर... करीबी
मस्जिद से अजान कि आवाज गूंजने लगी
अल्लाहु अकबर.. अल्लाह सबसे बड़ा है बेशक
अल्लाह सबसे बड़ा है सबसे पहले भी और सब
ख्वाशियात से ऊपर भी है-उमर दिल ही दिल में
बे इख्तियार कह उठा
आज मुझे भी एक बदर लड़नी है एक उहद पर
कुर्बान होना है फिर मेरी दफा मैदान मेरा दिल
बना है.. हर ख्वाहिश कुर्बान है तुझ पर मेरे
अल्लाह
इस दिल पर आज मे ख़ुद छुरी चला दूँगा--दुख
से आवाज रंद गयी
तुम क्या जानो के अदाए इब्राहिमी क्या है रब
कि रजा कि खातिर ख़ुद का दिल दुखा देना
***************
(एक साल बाद)
आइये ना प्लीज़ खाना खाले प्लीज जारा
मुहब्बत से अपने शोहर से कह रही थी - अभी
नहीं एक घंटे तक कुछ नहीं कर सकता जारा,
आज वाक़ई बहुत काम है "उमर ने लेपटॉप थोड़ा
और करीब करते हुये जवाब दिया - *मैंने भी
अभी तक कुछ नहीं खाया कि आपके साथ ही
खउंगी --जारा ने कुछ देर खामोशी से बेठने के
बाद धीमी सी आवाज कहा - क्या ??? जी
जनाब, मलिकाए आला भूखी हो और हम ख्याल
न करे ऐसा मुमकिन है भला ? उमर शरारतन
उससे बोला
लेपटॉप अब वंद कर चुका था और चार्जर उतार
कर वापिस रख रहा था -
जारा शर्माती आँखो से हँसती हुई किचन कि
जानिब चल दि ***,, सादिया के ठुकरा देने के
मामले को एक साल बीत चुका था - उमर ने
अपनी मंगेतर और सुन्नत कि दाड़ी मे से सुन्नत
को चुना था - इस फैसले पर वो दुनियादार लोगो
कि नज़र में बेवकूफ़ तरीन अपनो और वालीदेन
तक के ताने और गालिया सुनी थी और खानदान
वालों कि बाते अलग-
खानदान वाले कितनी बाते बनाये गये दाड़ी जब
तक हे कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा - तुमने
तो जलील कर दिया है बुड़े माँ बाप को अपनी
जिद के खातिर - वगेरह वगेरह जैसी बाते पूरा
एक साल अकेला ही सुनता रहा - जिस का जो
दिल में आया कहता रहा - लेकिन उमर का
फैसला एक दिन के लिये भी न बदला हां
तकलीफ तो बहुत हुई थी ऐसे बातो से लेकिन
अल्लाह का कुरान और जिक्र ऐसी चीजे थी
जो उसकी हिम्मत बनी रही - सच है नमाज़ और
जिक्र न हो तो इन्सान पागल ही हो जाये -
अल्लाह ने ऐसा सब्र पर इसतिकामत भी फिर
कमाल कि अता कि - हकीकी बात है कि वो रब
अपनी खातिर अड़े इन्सान को कभी मरने के
लिये अकेला नहीं छोड़ देता - लेकिन इस मुकाम
तक आने के लिये पहला कदम ख़ुद को उठाना
पड़ता है - सबूत देना पड़ता है कि वाक़ई आप के
लिये अल्लाह ही सबसे ज्यादा कीमती हैं -
उसके बाद डरपोक से डरपोक तरीन इन्सान का
दिल भी पहाड़ कि तरह मजबूत अता करदी
जाती है जो उसके कदमो को अल्लाह के रास्ते
पर जमादे इस तरह कि फिर दुनिया कि कितनी
भी सख्त हवाए चले उसे गिरा नहीं सकती, उस
रास्ते से हटा नहीं सकती - लेकिन इस राह पर
सिर्फ दुख तकलीफ और मेहरूमियां ही नहीं
मिलती बल्कि इन्सान वक्ता फोक्ता ईनाम से
भी नवाजा जाता है - जैसे आज उमर को नवाजा
गया था - अर्से से खौफ अंधेरो और तूफानों के
बाद उसकी कश्ती को भी किनारा लगा दिया
गया था - उसे सारा जैसी ईमान वाली, मुहब्बत
करने वाली, शर्म व हया वाली एक पर्दादार
खूबसूरत बीवी अता कर दी गयी थी - सादिया
को अल्लाह के लिये खो देने पर उसको दुनिया
में ही जन्नत सी दे दी गयी थी - उमर को कभी
कभी लगता था जैसे अल्लाह ने उसकी सारी
फिलिंगज को समेटकर एक इन्सान का रूप दे
दिया हो - जारा के नाम से जैसे वो हकीकन कोई
इन्सान नहीं थी बल्कि उमर कि जरुरत का
जवाबी अक्स उसकी आँखों कि ठंडक, उसकी
रूह का सुकून जबकि दूसरी जानिब सादिया उसे
ठुकरा पर आज भी कुँवारी बेठी थी वो शायद
भूल गयी थी कि जिसे एक दाड़ी समझ कर
ठुकरा रही थी वो महज एक दाड़ी नहीं थी बल्कि
सून्नत ए रसूल थी सल्लल्लाहु अलैहि
वसल्लम थी - असल में तौहीन उसने उमर कि
नहीं कि थी बल्कि अल्लाह और उसके नबी
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कि की थी - और
ये कोई छोटा गुनाह नहीं था - सादिया कि तरह
आज कितनी ही नाम निहाद मुसलमान दाड़ी
पर्दा और दीन कि दूसरी कई बातो के लिए
कितनी आराम से नफरत का इजहार करते रेहते
हैं इन पर अमल करने वालों का मजाक उड़ाते
रेहते हैं -सोचे बिना कि इनका ये सब करना
इनको तबाही के किस किस घड़े में फेंकता जा
रहा है - इनहे तबाह व बर्बाद करता जा रहा है -
जिन्दगी से सुकून ऎसे ही नहीं छीन गया ऎसे
लोगो के !!
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#पहली_किस्त_कमेंट_बॉक्स_में