श्री नाग कल्लाजीं गोगाजीं आध्यात्मिक केंद्र आसोंड़ा

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श्री नाग कल्लाजीं गोगाजीं आध्यात्मिक केंद्र आसोंड़ा ( श्री धाम )
श्री नाग कल्लाजीं गोगाजीं धाम आसोड़ा ,
तहसील गढ़ी ,बांसवाड़ा

हे मां...
06/01/2026

हे मां...

🔱  ।। श्री यन्त्रम् महिमा ।।  🔱              🔱 चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चक्रे पंचाभिः🔱                      नवचक्रे संसिद...
15/12/2025

🔱 ।। श्री यन्त्रम् महिमा ।। 🔱

🔱 चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चक्रे पंचाभिः🔱
नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः

🔱। श्रीयंत्र नौ आवरणों से बना है प्रत्येक आवरण एक विशेष चक्र या शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सबसे बाहरी आवरण 'त्रैलोक्यमोहन चक्र' कहलाता है और केंद्र में सर्वानंदमय चक्र स्थित होता है, जो परम बिंदु का प्रतिनिधित्व करता है

🔱 श्री यंत्र के नव आवरण 🔱
श्री यंत्र के नौ आवरण, जिन्हें 'आवरण' भी कहा जाता है, निम्न प्रकार से वर्णित हैं:

🔱 १ त्रैलोक्यमोहन चक्र ( नवम आवरण):
यह सबसे बाहरी भूपुर है, जो तीन रेखाओं से बना है और तीनों लोकों को मोहने वाली शक्ति का प्रतीक है

🔱 २ सर्वाशापरिपूरक चक्र (आठवा आवरण):
इसमें 16 दलों का कमल होता है, जो 16 नित्य कलाओं का प्रतिनिधित्व करता है

🔱 ३ सर्वसंक्षोभण चक्र (सातवां आवरण):
इसमें 8 दलों का कमल होता है, जिसमें आठ देवियों का निवास होता है।

🔱 ४ . सर्व सौभाग्यदायक चक्र (छठवां आवरण):
यह 14 कोणों वाला चक्र है, जिसमें 14 शक्तियों का निवास होता है

🔱 ५ सर्वार्थसाधक चक्र (पांचवां आवरण):
यह 10 कोणों का बाह्य समूह है, जो सभी इच्छाओं को सिद्ध करने की शक्ति रखता है

🔱 ६ सर्वरोगहर चक्र ( चौथा आवरण):
इसमें 8 त्रिकोणों का समूह है, जो सभी रोगों को हरने वाली शक्ति का प्रतीक है

🔱 ७ सर्वरक्षाकारी चक्र (तीसरा आवरण):
यह 8 त्रिकोणों का समूह है, जो सभी प्रकार की रक्षा करता है

🔱 ८ सर्वसिद्धिप्रद चक्र ( दूसरा आवरण):
यह पीले रंग का त्रिकोण है, जो सभी सिद्धियाँ प्रदान करता है

🔱 ९. सर्वानंदमय चक्र (पहला आवरण):
यह श्री यंत्र का केंद्र बिंदु है, जो 'बिंदु' कहलाता है और परमसत्य का प्रतीक है

🔱।
इन नौ आवरणों का पूजन श्री विद्या साधना के अंतर्गत किया जाता है, जो अत्यंत विस्तृत और शक्तिशाली प्रक्रिया है
श्रीविद्या की उपासना भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित रही है आदि शंकराचार्य के गुरु स्वामी गौरपाद श्रीविद्या के उपासक थे
उन्होंने शंकराचार्य को श्रीविद्या की उपासना में दीक्षित किया और शंकराचार्य ने इस विषय पर एक अत्यंत ज्ञानवर्धक ग्रंथ लिखा श्रीयंत्र की उपासना शाक्तों, वेदान्ताचार्यों, वैष्णवों और शैवों में अत्यंत लोकप्रिय रही है

🔱 दस महाविद्याओं में से तीसरी महाविद्या, जिन्हें षोडशी के नाम से जाना जाता है, श्री विद्या हैं।

🔱 इन्हें अनेक नामों से जाना जाता है - सुंदरी , ललिता , त्रिपुरसुंदरी , षोडशी और बाला

🔱 श्री विद्या या श्री यंत्र की पूजा करने के लिए उसके यंत्र को समझना होगा, जो सबसे आकर्षक है और श्री यंत्र के रूप में जाना जाता है। श्री चक्र या ललिता चक्र

🔱 श्रीयंत्र की पूजा, निर्माण विधि और उसका संपूर्ण विवरण सौंदर्य लहरी में दिया गया है। श्रीयंत्र अत्यंत आकर्षक और शक्तिशाली है।

🔱 यह नौ त्रिभुजों के प्रतिच्छेदन से निर्मित है। इनमें से चार त्रिभुज ऊपर की ओर और पाँच नीचे की ओर हैं।
ऊपर की ओर इंगित करने वाले चार त्रिभुज शिव त्रिभुज हैं और नीचे की ओर इंगित करने वाले पाँच त्रिभुज शक्ति त्रिभुज हैं।

🔱 इन नौ त्रिकोणों का संयोजन श्री यंत्र को सभी यंत्रों में सबसे अधिक गतिशील बनाता है। पूजा के उद्देश्य से, श्री यंत्र को तांबे, चांदी और सोने की प्लेटों पर सपाट रेखाचित्र के रूप में उकेरा जाता है, या पत्थर और बहुमूल्य रत्नों (क्वार्ट्ज, क्रिस्टल आदि) से गढ़ा जाता है

🔱 श्री यंत्र का यह रूप पिरामिड जैसा दिखता है और प्राचीन काल से ऐसे कई यंत्र उपलब्ध हैं उसे मेरु यंत्र कहते है

🔱 श्री यंत्र की नौ आकृतियाँ🔱

श्री यंत्र आमतौर पर देवी त्रिपुरसुंदरी के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है, हालांकि कुछ शास्त्र इसे दिव्य मां की नाभि के रूप में संदर्भित करते हैं

दिव्य माँ का एक मूर्त रूप उपलब्ध है जिसकी नाभि में श्री यंत्र अंकित है। श्री यंत्र को ब्रह्मांड का यंत्र भी कहा जाता है।

कमला विलास में कहा गया है कि श्री यंत्र का निर्माण उन्हीं सिद्धांतों पर किया गया है जिन पर मानव जीव का निर्माण हुआ है।
जिस प्रकार शरीर में नौ चक्र होते हैं, उसी प्रकार श्री यंत्र में भी नौ चक्र होते हैं:

1 बिंदु (2) त्रिकोण – मध्य त्रिकोण, जिसमें बिंदु होता है
(3) अष्टार – त्रिकोण के बाहर आठ त्रिकोणों का समूह
(4) अंतर दशर – दस आंतरिक त्रिकोणों का समूह
(5) बहिर् दशर – दस बाहरी त्रिकोणों का समूह
(6) चतुर दशर – चौदह त्रिकोणों का समूह
(7) अष्ट दल – आठ कमल पंखुड़ियों का एक छल्ला
(8) षोडश दल – सोलह कमल पंखुड़ियों का एक छल्ला
(9) भूपुर – चार द्वारों वाला चौकोर आकार

🔱श्री यंत्र में चक्र शब्द का अर्थ एक समूह है, कुंडलिनी योग के मानसिक केंद्र नहीं, लेकिन श्री यंत्र की नौ आकृतियों और नौ मानसिक केंद्रों के बीच एक निश्चित संबंध है

🔱। श्री यंत्र ब्रह्मांडीय रूप है (ब्रह्मांड के विकास और विकास का आरेख)
🔱 मानव जीव का स्वरूप (शरीर के आंतरिक परिपथों का आरेख)

🔱 मानव जीव का स्वरूप (शरीर के आंतरिक परिपथों का आरेख)
🔱 देवी त्रिपुर सुंदरी का रूप (क्योंकि देवी ऊर्जा हैं, जो संपूर्ण भौतिक जगत में व्याप्त हैं)

🔱 पांच नीचे की ओर इंगित करने वाले त्रिकोण यानी शक्ति त्रिकोण पांच तन्मात्राओं (ध्वनि, स्पर्श, दृष्टि, स्वाद और गंध) पांच महाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी), पांच ज्ञानेंद्रियों (कान, त्वचा, आंख, जीभ और नाक) के रूप में प्रकट होते हैं। मानव शरीर में ये पांच तत्व त्वचा, तंत्रिकाएं, मांस, वसा और हड्डियां हैं।

🔱 चार ऊपर की ओर इंगित करने वाले त्रिकोण, जो शिव त्रिकोण हैं, पुरुष ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं और चित्त, बुद्धि, अहंकार (आत्म-चेतना या मैं की भावना) और मनस (मन) के रूप में विद्यमान हैं।

🔱 बिन्दु 🔱
बिन्दु, केंद्रीय त्रिभुज के अंदर का बिंदु और यंत्र का केंद्र, सर्व आनंदमयी चक्र के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है पूर्ण आनंद का चक्र। और पूरे ब्रह्मांड का बीज, और यह समय और स्थान से परे है।

🔱 इस बिंदु में कामेश्वर (काम या इच्छा के स्वामी) और कामेश्वरी (परम मिलन की इच्छा की शक्ति) सदैव एकाकार रहते हैं। कामेश्वर और कामेश्वरी मानव शरीर में सोम चक्र से ऊपर सहस्रार चक्र में स्थित हैं।

🔱 श्रीयंत्र के ध्यान के दौरान, बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके शिव और शक्ति के शाश्वत मिलन की आराधना की जाती है। इष्ट देवता और गुरु की आराधना भी बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके की जाती है

🔱 बिंदु यंत्र का अंतिम बिंदु है, लेकिन यह यंत्र का केंद्र है, यह आरंभ है। इस बिंदु को जाने बिना यंत्र का निर्माण असंभव है।

🔱 यह बिंदु को यंत्र का मूल कारण, बीज बनाता है। श्री यंत्र की पूजा का कार्य बिंदु के ध्यान के साथ समाप्त होता है। त्रिकोण, जिसे सर्व सिद्धिप्रद चक्र भी कहा जाता है, वह मुख्य त्रिभुज है जिसमें बिंदु स्थित होता है

यह सृष्टि के वृक्ष का बीज है और सूक्ष्म रूप में इसके अंदर रहता है।

🔱

त्रिकोण की तीन भुजाएँ तीन देवियों -
कामेश्वरी, बृजेश्वरी और आगमलिनि द्वारा निर्मित हैं, जो तीन गुणों (सत्व, रज और तम) से युक्त हैं।

🔱अष्टार 🔱

अष्टार, आठ त्रिकोणों के समूह को सर्व रोग हर चक्र भी कहा जाता है, यह चक्र सभी रोगों का नाश करता है।
ये आठ त्रिकोण वास्तव में आठ योनियाँ हैं, जो अस्तित्व के सप्तक का निर्माण करती हैं।
ये आठ त्रिकोण आठ देवियों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
(1) वशिनी (2) कामेश्वरी (3) मोदिनी (4) विमला (5) अरुणा (6) जयायिनी (7) सर्वेश्वरी (8) कौलिनी।
अष्टक को ही वास्तविक श्रीयंत्र माना जाता है। अष्टक के आठ त्रिकोण और एक त्रिकोण - इन नौ को नवद्वार चक्र कहते हैं, जो चराचर जगत का आधार है।
अष्टार, त्रिकोण और बिन्दु की पूजा से सुरक्षा, शक्ति और आनंद मिलता है तथा सभी प्रकार की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक व्याधियां दूर हो जाती हैं

🔱 अंतर्दशार🔱

अष्टार को घेरने वाले दस त्रिकोणों के समूह अंतर्दशार को सर्व रक्षक चक्र के नाम से भी जाना जाता है - एक ऐसा चक्र जो सभी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है।
इस चक्र में रक्षा करने की शक्ति निहित है क्योंकि सुरक्षा बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक अनुशासन से प्राप्त होती है।
इस चक्र में रक्षा करने की शक्ति निहित है क्योंकि यह चक्र पांचों कर्मेन्द्रियों और पांचों ज्ञानेन्द्रियों का नियंत्रण कक्ष है।

🔱 बहिरदशार 🔱

बहिर्दशार, अंतरदशार को घेरे हुए दस बाहरी त्रिकोणों के समूह को सर्व अर्थ साधक चक्र के नाम से भी जाना जाता है - एक ऐसा चक्र जो सभी प्रकार की अनुभूतियों को संभव बनाता है।
यह चक्र व्यक्ति को यह महसूस करने की शक्ति देता है कि वह क्या चाहता है, जो कुछ भी उसके जीवन को अर्थ देता है।

🔱 दस त्रिकोणों में दस योनियाँ या शक्तियाँ हैं। (1) सर्व संपदा प्रदा (2) सर्व प्रियंकरी (3) सर्व मंगल कारिणी (4) सर्व काम प्रदा (5) सर्व दुख स्वविमोचिनी (6) सर्व मृत्यु प्रशमनी (7) सर्व विघ्न निवारणी (8) सर्वांग सुंदरी (9) सर्व सौभाग्यदायिनी (10) सर्व सिद्धि प्रदा

🔱 इस चक्र पर ध्यान करने से प्राण पर नियंत्रण प्राप्त होता है और प्राण पर नियंत्रण से मन पर नियंत्रण प्राप्त होता है।
चतुर्दशी चतुर्दशार, चौदह बाह्यतम त्रिभुजों या योनियों का एक समूह है, जिसे सर्व सौभाग्य दायक चक्र के रूप में जाना जाता है।


🔱 योनियों में चौदह शक्तियाँ निवास करती हैं और ये देवियाँ चौदह नाड़ियों (1) मन (2) बुद्धि (3) चित्त (4) अहंकार और दस इंद्रियों को नियंत्रित करती हैं

🔱 इस प्रकार ये देवियाँ यंत्र और शरीर का बाह्य रूप हैं। यह सर्व सौभाग्य दायक चक्र नाम से स्पष्ट है - एक ऐसा चक्र जो समस्त सौभाग्य प्रदान करता है

🔱 अष्टदल 🔱

🔱 अष्टदल, आठ कमल पंखुड़ियों वाला वलय, सर्वसंक्षोभन चक्र भी कहलाता है।
ये पंखुड़ियाँ आठ देवियों का आसन हैं और आठ पंखुड़ियाँ (1) रूप (2) रस (3) गंध (4) स्पर्श (5) शब्द (6) नाद (7) प्रकृति (8) पुरुष (स्वयं) की प्रतीक हैं।


🔱 शोडशदल 🔱

🔱 शोडशदल , सोलह कमल पंखुड़ियों वाला चक्र, सर्व आशापूरक चक्र के नाम से भी जाना जाता है, जो सभी आशाओं को पूरा करने वाला, सभी प्रकार की अपेक्षाओं को साकार करने वाला चक्र है।
ये शक्तियां पांच तत्वों, दस इंद्रियों और एक मन अर्थात् सोलह साधनों के माध्यम से कार्य करती हैं

🔱 भूपुर 🔱

🔱 भूपुर, चार द्वारों वाला वर्ग, त्रैलोक मोहन चक्र के नाम से भी जाना जाता है, यह वह चक्र है जो तीनों लोकों को आकर्षित करता है

🔱 भौतिक (भूलोक), सूक्ष्म (भुवर्लोक), और आकाशीय (स्वर्गलोक)। आमतौर पर, भूपुर यंत्र का स्थान होता है - शक्ति का निवास स्थान, जो स्थूल भौतिक घटना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह तब तक निवास करती है जब तक सृष्टि और संरक्षण का चक्र चलता रहता है

इस भूपुर में आठों दिशाओं के सभी दिक्पाल विद्यमान हैं। इस भूपुर में दस सिद्धियाँ और आठ माताएँ विद्यमान हैं

🔱 यह चक्र तीन धाराओं गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन स्थल है, जिसका प्रतीकात्मक अर्थ है स्थूल और सूक्ष्म ऊर्जाओं का मिलन स्थल।

🔱 श्री यंत्र के लाभ 🔱

🔱 श्री यंत्र धन की देवी लक्ष्मी का प्रतीक है। यह आर्थिक और मानसिक समस्याओं को दूर कर भक्त के जीवन में स्थिरता और सफलता लाता है

🔱 श्री यंत्र परम ऊर्जा का जनक है, और कुछ नहीं, बल्कि तरंगों और किरणों के रूप में तत्व का ही एक रूप है। इसमें अत्यंत उच्च और महान चुंबकीय शक्ति होती है। ये ऊर्जाएँ वातावरण में परिवर्तित होकर वायुमंडल की सभी विनाशकारी शक्तियों को नष्ट कर देती हैं

🔱 श्री यंत्र को दिव्य गुप्त ऊर्जाओं से युक्त माना जाता है जो शीघ्र ही प्रकट हो सकती हैं। श्री यंत्र एक पवित्र यंत्र है जिसका पौराणिक संबंध देवी लक्ष्मी से है, जो सौभाग्य, समृद्धि, लाभ और धन की हिंदू देवी हैं।
सनातन धर्म अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसने दुनिया भर के कई दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की जिज्ञासा को आकर्षित किया है। श्री यंत्र एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है पूजा में ध्यान के साधन के रूप में प्रयुक्त कोई भी वस्तु या ज्यामितीय आरेख।

, 🔱 मंत्र 🔱

II ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये
प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः II

जयति ब्रह्मास्त्रविद्या 🚩

दसमहाविद्या नवार्ण मंत्र साधना.:-दस महाविद्या जिसकी उपासना से चतुर्मुख सृष्टि रचने में समर्थ होते हैं, विष्णु जिसके कृपा...
11/12/2025

दसमहाविद्या नवार्ण मंत्र साधना.:-

दस महाविद्या जिसकी उपासना से चतुर्मुख सृष्टि रचने में समर्थ होते हैं, विष्णु जिसके कृपा कटाक्ष से विश्व का पालन करने में समर्थ होते हैं, रुद्र जिसके बल से विश्व का संहार करने में समर्थ होते हैं, उसी सर्वेश्वरी जगन्माता महामाया के दस स्वरूपों का संक्षिप्त चरित्र प्रस्तुत है।

देवी के 10 रूपों - काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला- का वर्णन तोडल तंत्र में किया गया है। शक्ति के यह रूप संसार के सृजन का सार है। इन शक्तियों की उपासना मनोकामनाओं की पूर्ति। सिद्धि प्राप्त करने के लिए की जाती है। देवताओं के मंत्रों को मंत्र तथा देवियों के मंत्रों को विद्या कहा जाता है। इन मंत्रों का सटीक उच्चारण अति आवश्यक है। ये दश महाविद्याएं भक्तों का भय निवारण करती हैं। जो साधक इन विद्याओं की उपासना करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सबकी प्राप्ति हो जाती है।

1. #काली : दस महाविद्याओं में काली प्रथम है। महा भागवत के अनुसार महाकाली ही मुखय हैं। उन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दश महाविद्याएं हैं। कलियुग में कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायी एवं साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने में सहायक हैं। शक्ति साधना के दो पीठों में काली की उपासना श्यामापीठ पर करने योग्य है। वैसे तो किसी भी रूप में उन महामाया की उपासना फल देने वाली है परंतु सिद्धि के लिए उनकी उपासना वीरभाव से की जाती है।

2. #तारा : भगवती काली को नीलरूपा और सर्वदा मोक्ष देने वाली और तारने वाली होने के कारण तारा कहा जाता है। भारत में सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। इसलिए तारा को वशिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। आर्थिक उन्नति एवं अन्य बाधाओं के निवारण हेतु तारा महाविद्या का स्थान महत्वपूर्ण है। इस साधना की सिद्धी होने पर साधक की आय के नित नये साधन खुलने लगते हैं और वह पूर्ण ऐश्वर्यशाली जीवन व्यतीत कर जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेता है। इनका बीज मंत्र 'ह्रूं' है। इन्हें नीलसरस्वती के नाम से भी जाना जाता है। अनायास ही विपत्ति नाश, शत्रुनाश, वाक्-शक्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए तारा की उपासना की जाती है।

3. #षोडशी : षोडशी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली सिद्ध देवी हैं। इनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। ये शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं। जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता। षोडशी को श्री विद्या भी माना गया है। इनके ललिता, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बालापञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं, वास्तव में षोडशी साधना को राज-राजेश्वरी इसलिए भी कहा गया है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं। चारों दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पंचवक्रा कहा जाता है। इनमें षोडश कलाएं पूर्ण रूप से विकसित हैं। इसलिए ये षोडशी कहलाती है। इन्हें श्री विद्या भी माना गया है और इनकी उपासना श्री यंत्र या नव योनी चक्र के रूप में की जाती है। ये अपने उपासक को भक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती हैं। षोडशी उपासना में दीक्षा आवश्यक है।

4. #भुवनेश्वरी : महाविद्याओं में भुवनेश्वरी महाविद्या को आद्या शक्ति अर्थात मूल प्रकृति कहा गया है। इसलिए भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दशमहाविद्याओं में ये पांचवें स्थान पर परिगणित है। भगवती भुवनेश्वरी की उपासना पुत्र-प्राप्ति के लिए विशेष फलप्रदा है। अपने हाथ में लिए गये शाकों और फल-मूल से प्राणियों का पोषण करने के कारण भगवती भुवनेश्वरी ही 'शताक्षी' तथा 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात हुई।

5. #छिन्नमस्ता : परिवर्तनशील जगत का अधिपति कबंध है और उसकी शक्ति छिन्नमस्ता है। छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत ही गोपनीय है। इनका सर कटा हुआ है और इनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं प्रवाहित हो रही हैं जिसमें से दो धाराएं उनकी सहचरियां और एक धारा देवी स्वयं पान कर रही हैं इनकी तीन आंखें हैं और ये मदन और रति पर आसीन हैं। इनका स्वरूप ब्रह्मांड में सृजन और मृत्यु के सत्य को दर्शाता है। ऐसा विधान है कि चतुर्थ संध्याकाल में छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार की साधना के लिए दृढ़ संकल्प शक्ति की आवश्यकता होती है और जो साधक जीवन में निश्चय कर लेते हैं कि उन्हें साधनाओं में सफलता प्राप्त करनी है वे अपने गुरु के मार्गदर्शन से ही इन्हें संपन्न करते हैं।

7. #धूमावती : धूमावती देवी महाविद्याओं में सातवें स्थान पर विराजमान हैं। धूमावती महाशक्ति अकेली है तथा स्वयं नियंत्रिका है। इसका कोई स्वामी नहीं है। इसलिए इन्हें विधवा कहा गया है। धूमावती उपासना विपत्ति नाश, रोग निवारण, युद्ध जय आदि के लिए की जाती है। यह लक्ष्मी की ज्येष्ठा हैं, अतः ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्ति जीवन भर दुख भोगता है। जो साधक अपने जीवन में निश्चिंत और निर्भीक रहना चाहते हैं उन्हें धूमावती साधना करनी चाहिए।

8. #बगलामुखी : यह साधना शत्रु बाधा को समाप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। ये सुधा समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय मण्डप में रत्नमय सिंहासन पर विराजमान है। इस विद्या के द्वारा दैवी प्रकोप की शांति, धन-धान्य के लिए और इनकी उपासना भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि के लिए की जाती है। इनकी उपासना में हरिद्र माला, पीत पुष्प एवं पीत वस्त्र का विधान हैं इनके हाथ में शत्रु की जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्रा है।

9. #मातंगी : मातंग शिव का नाम और इनकी शक्ति मातंगी है। इनका श्याम वर्ण है और चंद्रमा को मस्तक पर धारण किए हुए हैं। इन्होंने अपनी चार भुजाओं में पाश, अंकुश, खेटक और खडग धारण किया है। उनके त्रिनेत्र सूर्य, सोम और अग्नि हैं। ये असुरों को मोहित करने वाली और भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली हैं। गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने के लिए मातंगी की साधना श्रेयस्कर है।

10. #कमला : जिसके घर में दरिद्रता ने कब्जा कर लिया हो और घर में सुख-शांति न हो, आय का स्रोत न हो उनके लिए यह साधना सौभाग्य के द्वार खोलती है। कमला को लक्ष्मी और षोडशी भी कहा जाता है। वैसे तो शास्त्रों में हजारों प्रकार की साधनाएं दी गई हैं लेकिन उनमें से दस महत्वपूर्ण विद्याओं की साधनाओं को जीवन की पूर्णता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। जो व्यक्ति दश महाविद्याओं की साधना को पूर्णता के साथ संपन्न कर लेता है। वह निश्चय ही जीवन में ऊंचा उठता है परंतु ध्यान रहे विधिवत् उपासना के लिए गुरु दीक्षा नितांत आवश्यक है। निष्काम भाव से भक्ति करने के लिए दश शक्तियों के नाम का उच्चारण करके भी इनका अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। शक्ति पीठों में शक्ति उपासना के अंतर्गत नवदुर्गा व दसमहाविद्या साधना करने से शीघ्र सिद्धि होती है।

साधक स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएँ। माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें।

शापोद्धार मंत्र का एक माला जाप करे-

।। ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा ।।

अब उत्कीलन मंत्र का एक माला जाप करे-

।। ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं मंत्र चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ।।

ध्यान मंत्र:-

खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।

नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

दसमहाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दसगुणात्मिकायै चामुंडायै प्रसीद प्रसीद दुर्गादेव्यै नमः॥

जब ध्यान हो जाये तब दस महाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र का नित्य 11 माला जाप 21 दिन रात्रिकालीन समय मे उत्तर मुखी बैठकर करे,आसन वस्त्र लाल रंग के हो।फोटो मे दुर्गा सप्तशती मंत्र दे रहा हु उसका कॉपी बनवाकर यंत्र को स्थापित करे और मंत्र जाप रुद्राक्ष माला से कर सकते हैं।इससे साधना के बाद नवार्ण मंत्र और दस महाविद्या मंत्रो मे पुर्ण सफलता प्राप्त होता है।

साथ मे काली तंत्र का एक विधान दे रहा हु जिसे आप इस साधना को करने के बाद करे तो महाकाली जी का आशिर्वाद विषेश रुप से प्राप्त होता है।

बाईस अक्षर का श्री दक्षिण काली मंत्र -

।। ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं स्वाहा ।।

विनियोग-

अस्य श्री दक्षिण मंत्रस्य भैरव ऋषी: |उस्णिक छंद : |
दक्षिण कलिका देवता |क्रीं बीजं |ह्रुं शक्ति : |क्रीं कीलकम |ममाभिस्ट सिध्यथर्ये जपे विनियोग : |

ऋषयादी न्यास -

ॐ भैरव ऋषये नमः शिरसी ||१ ||

उष्णिक छंद्से नमः मुखे ||२||

दक्षिण कलिका देवताये नमः ह्रदि ||३||

क्रीं बीजाय नमः गृहे ||४||

ह्रूं शक्तये नमः पादयो ||५||

क्रीं किलकाय नमः नाभौ ||६||

विनियोगाय नमः सर्वांगे ||७||

करन्यास -

ॐ क्राम आन्गुष्ठाभ्याम नमः ||१||

ॐ क्रीं तर्जनिभ्याम नमः ||२||

ॐ क्रूं मध्यमाभ्याम नमः ||३||

ॐ क्रें अनामिकभ्याम नमः ||४||

ॐ क्रों कनिष्ठकाभ्याम नमः ||५||

ॐ क्र: करतल कर्पुश्थाभ्याम नमः ||६||

ह्रद्यादी षडंग न्यास -

ॐ क्राम ह्रदयाय नमः ||१||

ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ||२||

ॐ क्रुम शिखाये वष्ट ||३||

ॐ क्रेह कवचाय ह्रुं ||४||

ॐ क्रों नेत्रत्रयाय वौष्ट ||५||

ॐ क्र: अस्त्राय फट ||६||

वर्णमाला न्यास -

ॐ अं अँ ईं ऊं ऊं त्र लृम लृम नामोह्रदी ||१||

ॐ अं अई ओ औ अं अ: कं खं गे धं दक्षभुजे ||२||

ॐ दं चं छं जं झं गं थं ठं ड ढ नमो वामभूजे ||३||

ॐ ण तं थं दं धं नं पं फं लं भं नमो दक्ष पादे ||४||

ॐ मं यं रं लं वं शं षम सं हं क्षम नमो वामपादे ||५||

इस न्यास के बाद निचे दिए गए न्यास करे-

ॐ क्रीं नमः भ्रमरन्ध्रे ||१||

ॐ क्रीं नमः भ्रूमध्ये ||२||

ॐ क्रीं नमः ललाटे ||३||

ॐ ह्रीं नमः नाभो ||४||

ॐ ह्रीं नमः गृह्ये ||५||

ॐ ह्रुं नमः वक्ते ||६||

ॐ ह्रुं नमः गुवर्गे ||७||

ध्यान मंत्र -

।। ॐ स्धशीचछन्नसिर: कृपणंभयं हस्तेवरम बिभ्रती धोरास्याम सिर्शाम स्त्रजा सुरुचिरामुन्मुक्त केशावलिम || स्रुकास्रुक प्रव्हाम स्मशान निल्याम श्रुतयो: रावालंकृति श्रुतयो: सवालंकृतिम श्यामांगी कृतमेख्लाम शवकरेदेवीभजे कालिकाम ।।

इस तरह से ध्यान करके मंत्र सिद्धि के लिए जाप करे।

महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् ॥यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानंसं सं संहारमूर्तिं शिर...
29/11/2025

महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् ॥

यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानं
सं सं संहारमूर्तिं शिरमुकुटजटा शेखरंचन्द्रबिम्बम् ।
दं दं दं दीर्घकायं विक्रितनख मुखं चोर्ध्वरोमं करालं
पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ १॥

रं रं रं रक्तवर्णं, कटिकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं
घं घं घं घोष घोषं घ घ घ घ घटितं घर्झरं घोरनादम् ।
कं कं कं कालपाशं द्रुक् द्रुक् दृढितं ज्वालितं कामदाहं
तं तं तं दिव्यदेहं, प्रणामत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ २॥

लं लं लं लं वदन्तं ल ल ल ल ललितं दीर्घ जिह्वा करालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्णं स्फुट विकटमुखं भास्करं भीमरूपम् ।
रुं रुं रुं रूण्डमालं, रवितमनियतं ताम्रनेत्रं करालम्
नं नं नं नग्नभूषं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ३॥

वं वं वायुवेगं नतजनसदयं ब्रह्मसारं परन्तं
खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवनविलयं भास्करं भीमरूपम् ।
चं चं चलित्वाऽचल चल चलिता चालितं भूमिचक्रं
मं मं मायि रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ४॥

शं शं शं शङ्खहस्तं, शशिकरधवलं, मोक्ष सम्पूर्ण तेजं
मं मं मं मं महान्तं, कुलमकुलकुलं मन्त्रगुप्तं सुनित्यम् ।
यं यं यं भूतनाथं, किलिकिलिकिलितं बालकेलिप्रदहानं
आं आं आं आन्तरिक्षं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ५॥

खं खं खं खड्गभेदं, विषममृतमयं कालकालं करालं
क्षं क्षं क्षं क्षिप्रवेगं, दहदहदहनं, तप्तसन्दीप्यमानम् ।
हौं हौं हौंकारनादं, प्रकटितगहनं गर्जितैर्भूमिकम्पं
बं बं बं बाललीलं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ६॥

वं वं वं वं वाललीलं
सं सं सं सिद्धियोगं, सकलगुणमखं, देवदेवं प्रसन्नं
पं पं पं पद्मनाभं, हरिहरमयनं चन्द्रसूर्याग्नि नेत्रम् ।
ऐं ऐं ऐं ऐश्वर्यनाथं, सततभयहरं, पूर्वदेवस्वरूपं
रौं रौं रौं रौद्ररूपं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ७॥

हं हं हं हंसयानं, हसितकलहकं, मुक्तयोगाट्टहासं, ?
धं धं धं नेत्ररूपं, शिरमुकुटजटाबन्ध बन्धाग्रहस्तम् ।
तं तं तंकानादं, त्रिदशलटलटं, कामगर्वापहारं,
भ्रुं भ्रुं भ्रुं भूतनाथं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ८॥

इति महाकालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ।

नमो भूतनाथं नमो प्रेतनाथं
नमः कालकालं नमः रुद्रमालम् ।
नमः कालिकाप्रेमलोलं करालं
नमो भैरवं काशिकाक्षेत्रपालम् ॥

अघोरास्त्र मंत्र एवं प्रयोग  अघोरास्त्र मंत्र भगवान शिव के उग्ररूप अघोर से संबंधित एक शक्तिशाली मंत्र है। इसका उपयोग नका...
28/11/2025

अघोरास्त्र मंत्र एवं प्रयोग
अघोरास्त्र मंत्र भगवान शिव के उग्ररूप अघोर से संबंधित एक शक्तिशाली मंत्र है। इसका उपयोग नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर, और अन्य बाधाओं से सुरक्षा के लिए किया जाता है। यह मंत्र, अघोर साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे जप कर, साधक आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।

अघोरास्त्र मंत्र:
ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः।
सर्वेभ्यस् सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्धय बन्धय खादय खादय हुं फट् स्वाहा।

अघोरास्त्र मंत्र का उपयोग:
१- नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर, और जादू-टोने से सुरक्षा.
२- भय, चिंता, और नकारात्मक विचारों को दूर करना.
३- आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार.
रोगों और कष्टों से मुक्ति.
४- मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त करना.

अघोरास्त्र मंत्र का जाप:
इस मंत्र का जाप शुद्ध और शांत वातावरण में करना चाहिए। माला का उपयोग करके मंत्र का जाप करना चाहिए। नियमित रूप से मंत्र का जाप करने से इसके लाभों का अनुभव होता है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, अघोरास्त्र मंत्र का जाप करते समय पानी का एक तांबे का बर्तन पास रखना चाहिए।

अघोरास्त्र मंत्र का महत्व:
अघोरास्त्र मंत्र भगवान शिव के उग्र रूप का आह्वान करता है, जो सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह मंत्र साधक को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है और उसे अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर करने में मदद करता है।

सावधानी:
अघोरास्त्र मंत्र का जाप करते समय, साधक को पवित्रता और एकाग्रता बनाए रखनी चाहिए। यह मंत्र शक्तिशाली है, इसलिए इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

विशेष:- कुछ स्रोतों में, अघोरास्त्र मंत्र के साथ नीलकंठ अघोरास्त्र स्तोत्र का भी उल्लेख किया गया है, जो भगवान शिव के नीलकंठ रूप को समर्पित है।

 #श्रीगुरुपादुका_स्तोत्रम्।    पादुका पूजन करके स्तोत्र पाठ करें।आपको पादुका मंत्र दिया है तो वो मंत्र की स्फटिक या रुद्...
25/11/2025

#श्रीगुरुपादुका_स्तोत्रम्।
पादुका पूजन करके स्तोत्र पाठ करें।
आपको पादुका मंत्र दिया है तो वो मंत्र की स्फटिक या रुद्राक्ष माला से 5 माला कर सकते हैं।
"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौ हंस: शिव सोहम् हंस: शिव स्वरुपणहेतवे श्री गुरुवे नम:!"
ॐ नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो
नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः!
आचार्य सिद्धेश्वरपादुकाभ्यो
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्यो!!1!!

ऐंकार ह्रींकाररहस्ययुक्त
श्रींकारगूढार्थ महाविभूत्या !
ओंकारमर्म प्रतिपादिनीभ्याम
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!2!!

होत्राग्नि होत्राग्नि हविश्यहोतृ –
होमादिसर्वाकृतिभासमानं !
यद् ब्रह्म तद्वोधवितारिणीभ्याम
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!3!!

कामादिसर्प वज्रगारूडाभ्याम
विवेक वैराग्यनिधिप्रदाभ्याम.
बोधप्रदाभ्याम द्रुतमोक्षदाभ्याम
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!4!!

अनंतसंसार समुद्रतार
नौकायिताभ्यां स्थिरभक्तिदाभ्यां!जाड्याब्धिसंशोषणवाड्वाभ्यां
नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम!!5!!

मैं पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ, मेरी उच्चतम भक्ति गुरु चरणों और उनकी पादुका के प्रति हैं, क्योंकि गंगा-यमुना आदि समस्त नदियाँ और संसार के समस्त तीर्थ उनके चरणों में समाहित हैं, यह पादुकाएं ऐसे चरणों से आप्लावित रहती हैं, इसलिए मैं इस पादुकाओं को प्रणाम करता हु, यह मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, यह पूर्णता देने में सहायक हैं, ये पादुकाएं आचार्य और सिद्ध योगी केचरणों में सुशोभित रहती हैं, और ज्ञान के पुंज को अपने ऊपर उठाया हैं, इसीलिए ये पादुकाएं ही सही अर्थों में सिद्धेश्वर बन गई हैं, इसीलिए मैं इस गुरु पादुकाओं कोभक्ति भावः से प्रणाम करता हूँ!!1!!

गुरुदेव “ऐंकार” रूप युक्त हैं, जो कि साक्षात् सरसवती के पुंज हैं, गुरुदेव”ह्रींकार” युक्त हैं, एक प्रकार से देखा जाये तो वे पूर्णरूपेण लक्ष्मी युक्त हैं, मेरे गुरुदेव”श्रींकार” युक्त हैं, जो संसार के समस्त वैभव, सम्पदा और सुख से युक्त हैं, जो सही अर्थों में महान विभूति हैं, मेरे गुरुदेव “ॐ” शब्द के मर्म को समझाने में सक्षम हैं, वे अपने शिष्यों को भी उच्च कोटि कि साधना सिद्ध कराने में सहायक हैं, ऐसे गुरुदेव के चरणों में लिपटी रहने वाली ये पादुकाएं साक्षात् गुरुदेव का ही विग्रह हैं, इसीलिए मैं इन पादुकाओं को श्रद्धा भक्ति युक्त प्रणाम करता हूँ!!2!!

ये पादुकाएं अग्नि स्वरूप हैं, जो मेरे समस्त पापो को समाप्त करने में समर्थ हैं, ये पादुकाएं मेरे नित्य प्रति के पाप, असत्य, अविचार, और अचिन्तन से युक्त दोषों को दूर करनेमें समर्थ हैं, ये अग्नि कि तरह हैं, जिनका पूजन करने से मेरे समस्त पाप एक क्षण में ही नष्ट हो जाते हैं, इनके पूजन से मुझे करोडो यज्ञो का फल प्राप्त होता हैं, जिसकीवजह से मैं स्वयं ब्रह्मस्वरुप होकर ब्रह्म को पहिचानने कि क्षमता प्राप्त कर सका हूँ, जब गुरुदेव मेरे पास नहीं होते, तब ये पादुकाएं ही उनकी उपस्थिति का आभास प्रदान कराती रहती हैं, जो मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं पूर्णता के साथ प्रणाम करता हूँ!!3!!

मेरे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार के सर्प विचरते ही रहते हैं, जिसकी वजह से मैं दुखी हूँ, और साधनाओं में मैं पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में गुरु पादुकाएं गरुड़ के समान हैं, जो एक क्षण में ही ऐसे कामादि सर्पों को भस्म कर देती हैं, और मेरे ह्रदय में विवेक, वैराग्य, ज्ञान, चिंतनसाधना और सिद्धियों का बोध प्रदान करती हैं, जो मुझे उन्नति की ओर ले जाने में समर्थ हैं, जो मुझे मोक्ष प्रदान करने में सहायक हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं प्रणाम करता हूँ!!4!!

यह संसार विस्तृत हैं, इस भवसागर पार करने में ये पादुकाएं नौका की तरह हैं, जिसके सहारे मैं इस अनंत संसार सागर को पार कर सकता हूँ, जो मुझे स्थिर भक्ति देने में समर्थ हैं, मेरे अन्दर अज्ञान की घनी झाडियाँ हैं, उसे अग्नि की तरह जला कर समाप्त करने में सहायक हैं, ऐसी पादुकाओंको मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ!!5!!

बटुक भैरव शाबर मंत्र - यह वैदिक शाबर मंत्र भैरवजी की प्रतिदिन पूजा करके सात दिन तक प्रतिदिन 51 बार जपे। बटुक भैरव प्रसन्...
24/11/2025

बटुक भैरव शाबर मंत्र - यह वैदिक शाबर मंत्र भैरवजी की प्रतिदिन पूजा करके सात दिन तक प्रतिदिन 51 बार जपे। बटुक भैरव प्रसन्न होकर साधक की बाधाओं का नाश करके सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये बहुत ही चमत्कारी उपाय है

श्री बटुक भैरव प्रयोग
विनियोग:
ॐ अस्य श्री बटुक भैरव स्तोत्रस्य सप्त ऋषयः ऋषयः; मातृका छन्दः; श्री बटुक भैरवो देवता, ममेप्सित-सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
स्तोत्रम्:
ॐ काल-भैरौ, बटुक-भैरौ, भूत भैरौ। महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता सर्व सिद्धिर्भवेत।
शोक-दुःख क्षय करं निरञ्जनं, निराकारं नारायणं, भक्ति-पूर्ण त्वं महेशं। सर्व काम सिद्धिर्भवेत।
काल-भैरव, भूषण-वाहनं काल-हन्ता रूपं च, भैरव गुणी महात्मनः योगिनों महा-देव स्वरूपं। सर्व सिद्धिर्भवेत।
ॐ काल-भैरौ, बटुक-भैरौ, भूत-भैरौ। महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता। सर्व सिद्धिर्भवेत।
ॐ त्वं ज्ञानं, त्वं ध्यानं, त्वं योगं, त्वं तत्त्वं, त्वं बीजं, महात्मानं त्वं शक्तिः। शक्ति-धारणं त्वं महा-देव-स्वरूपं। सर्व-सिद्धिर्भवेत।
ॐ काल-भैरौ, बटुक-भैरौ, भूत-भैरौ। महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता। सर्व-सिद्धिर्भवेत।
ॐ काल-भैरव। त्वं नागेश्वरं, नाग-हारं च त्वं। वन्दे परमेश्वरं।
ब्रह्म-ज्ञानं ब्रह्म-ध्यानं, ब्रह्म-योगं, ब्रह्म-तत्त्वं, ब्रह्म-बीजं महात्मनः।
ॐ काल-भैरौ, बटुक-भैरौ, भूत-भैरौ। महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता। सर्व-सिद्धिर्भवेत।
त्रिशूल चक्र गदा पाणि शूल-पाणि पिनाक-धृक्।
ॐ काल-भैरौ, बटुक-भैरौ, भूत-भैरौ। महा-भैरव महा-भय विनाशनं देवता। सर्व सिद्धिर्भवेत।

श्रीभैरवसर्वफलप्रदस्तोत्रम् ॐ भ्रं भैरवाय अनिष्टनिवारणाय स्वाहा  ।मम सर्वे ग्रहाः अनिष्टनिवारणाय स्वाहा  ।ज्ञानं देहि धन...
21/11/2025

श्रीभैरवसर्वफलप्रदस्तोत्रम्

ॐ भ्रं भैरवाय अनिष्टनिवारणाय स्वाहा ।
मम सर्वे ग्रहाः अनिष्टनिवारणाय स्वाहा ।
ज्ञानं देहि धनं देहि मम द्रारिद्रयदुःखनिवारणाय स्वाहा ।
सुतं देहि यशो देहि मम गृहक्लेशनिवारणाय स्वाहा ।
स्वास्थ्य देहि बलं देहि मम शत्रुनिवारणाय स्वाहा ।
सिद्धिं देहि जयं देहि मम सर्वॠणनिवारणाय स्वाहा ।
ॐ भ्रं भैरवाय अनिष्टनिवारणाय स्वाहा ।

।। इति श्रीभैरवसर्वफलप्रदस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

Amit baba 🪷

ॐ कालभैरवाय नमः ।हे भैरव, काल के भी स्वामी,मेरे मार्ग के रक्षक बनें।अज्ञान का अन्धकार दूर करें,और मेरी बुद्धि को प्रकाश ...
20/11/2025

ॐ कालभैरवाय नमः ।

हे भैरव, काल के भी स्वामी,
मेरे मार्ग के रक्षक बनें।
अज्ञान का अन्धकार दूर करें,
और मेरी बुद्धि को प्रकाश दें।

जहाँ भय हो, वहाँ साहस दें।
जहाँ बाधा हो, वहाँ समाधान दें।
जहाँ अशांति हो, वहाँ शांति दें।
जहाँ दुर्बलता हो, वहाँ शक्ति दें।

हे भैरव,
मेरे भीतर की नकारात्मकता को नष्ट करें,
और सत्य, धैर्य और स्थिरता प्रदान करें।

मेरे कर्मों को शुभ दिशा दें,
और जीवन में सदबुद्धि , सुरक्षा और सामर्थ्य भरें।

ॐ भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं वटुकभैरवाय नमः ।

🚩देवी कृत भैरव स्तुति 🚩देवीकृत भैरव स्तुति का पाठ करने से  शत्रुओं से सुरक्षा, रोग, शोक और दरिद्रता से मुक्ति, व्यापार म...
20/11/2025

🚩देवी कृत भैरव स्तुति 🚩
देवीकृत भैरव स्तुति का पाठ करने से शत्रुओं से सुरक्षा, रोग, शोक और दरिद्रता से मुक्ति, व्यापार में सफलता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार शामिल है। यह स्तुति जीवन की सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करती है और कुंडली में ग्रहों के दोषों को शांत करने में मदद करती है, विशेष रूप से शनि, राहु और मंगल के अशुभ प्रभावों से राहत दिलाती है।

🚩नित्यानन्दं परं शान्तं निष्कलं च निरामयम् ।
व्योमातीतं परं शून्यं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १॥

परात्परतरं शान्तं शुद्धमत्यन्तनिर्मलम् ।
भूतं येन जगत्सर्वं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २॥

इडापिङ्गलयोर्मध्ये निश्वाशोच्छ्वासचारिणम् ।
द्वादशान्ते लयं यस्य भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ३॥

कुण्डल्यां तु लयं यस्य परान्ते विलयं पुनः ।
हरत्यमृतरूपेण भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ४॥

अकुलाकुलसम्भूतं कुलोत्पत्तिविवर्जितम् ।
विश्वरूपं परं नित्यं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ५॥

कलाकलङ्करहितं निर्विकारं निरञ्जनम् ।
शून्याच्छून्यतरं शून्यं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ६॥

आपातालमूर्ध्निस्थं कन्दनालसमास्तृतम् ।
हंसरूपं निराभासं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ७॥

आकाशज्योतिमारूढं व्योमातीतं निरामयम् ।
व्योमव्यापि परंव्योम भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ८॥

चन्द्रार्कवह्निमध्यस्थं दृष्टादृष्टैकगोचरम् ।
रूपारूपविनिर्मुक्तं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ९॥ अनाख्यं च निराभासं

नाडिकार्णवसम्भूतं मन्त्रजालप्रकाशस्थ ।
अतीतगोचरं शम्भुं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १०॥

हकारार्द्धं परं सूक्ष्मं परानन्दं परात्परम् ।
परस्यान्ते परे लीनं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ ११॥

घण्टिकान्ते परं शान्तं ब्रह्मरन्ध्रविनिर्गतम् ।
आकाशं निर्मलं सूक्ष्मं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १२॥

अखण्डनिर्मलं शुद्धं कला कल्पविवर्जितम् । कल्पा कल्प
नित्यं प्रमेयरहितं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १३॥

यथा भानुगता रश्मिमर्व्यापयेन्निखिलं जगत् । भानुगतो
तथा सर्वगतं देवं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १४॥

नादान्तबिन्दुसंलीनं शक्त्यातीतमगोचरम् ।
मालिन्यङ्गसमुद्भूतं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १५॥

अनिलानलसंयुक्तं व्यापकं परमेश्वरम् ।
भुवनत्रयसंलीनं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १६॥

अकारादिक्षकारान्तं कुलपिण्डसमुद्भवम् ।
कारात्रिशस्वरूपस्थं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १७॥

यथा जलगता सूर्यश्चन्द्रश्चाप्सु व्यवस्थितः ।
तथा सर्वगतं देवं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १८॥

यथा चाग्निगतं तेजो यथा वायुः स्वरूपतः ।
तथा सर्वगतं देवं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ १९॥

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च ।
पञ्चभूतगतं देवं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २०॥

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्रपञ्चकम् ।
एतद्व्याप्य स्थितं देवं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २१॥

वाक्पाणिपादपायूपस्थपञ्चकसंस्थितम् ।
पञ्चकर्मेन्द्रियैः संस्थं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २२॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम् ।
पञ्चेन्द्रियसुसम्भूतं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २३॥

कामः क्रोधस्तथा लोभो मोहश्चैव चतुष्टयम् ।
अन्तःकरणसम्भूतं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २४॥

पक्षिकीटैस्तथा वृक्षैर्लतागुल्मसरीसृपैः ।
सवं व्याप्य स्थितं शम्भुं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २५॥

विकल्पकल्परहितं कल्पनातीतगोचरम् ।
विकल्परहितं शान्तं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २६॥

युगान्तं युगरूपेण अक्षयं चाव्यवस्थितम् ।
सर्वव्यापि परं ब्रह्म भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २७॥

सर्वतत्त्वगतं सूक्ष्मं ज्ञानध्यानपरायाणम् ।
निर्लक्षं परमं शुद्धं भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २८॥

सिद्धमातरर्योगिन्यैर्गुह्यकैः पालकैस्तथा ।
पूजितं पादपद्मं च भैरवं तं नमाम्यहम् ॥ २९॥

एवं देव्या स्तुतः शम्भुः परानन्दाकुलेक्षणम् ।
भैरवो हृष्टमनसा प्रोत्फुल्लकमलानन्ः ॥ ३०॥

प्रसन्नो वरदो देवो वाक्यं चेदमुवाच ह ।
साधु साधु महाभागे तुष्टोऽहं भक्तवत्सले ॥ ३१॥

🚩॥ इति गोरक्षसंहितायां प्रथमः पटलान्तर्गते भैरवस्तुतिः समाप्ता ॥🚩

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At Post Asoda, Tahsil Garhi
Banswara
327022

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