24/08/2025
देखिये हर स्त्री या लड़की दुर्गा या लक्ष्मी या पार्वती नहीं होती ।
आपके मानने या न मानने से सार्वभौमिक सत्यता या मूल सिद्धांत की सत्यता में तनिक भी अंतर नहीं आएगा ।
आप क्या मानते हैं और क्या नहीं , इससे तथ्य का कोई लेना देना नहीं है ।
आप चंद्रमा को सूर्य मानते रहे तो मानते रहे । इससे चंद्रमा पर कोई असर नहीं पड़ेगा । चंद्रमा शीतल चाँदनी ही देगा और रात्रि में ही निकलेगा । और न ही इससे सूर्य की किरणों पर या सूर्य की ऊर्जा में कोई अंतर आएगा ।
अंतर बस आप पर आएगा क्योंकि तब आप सूर्य और चंद्रमा का लाभ न लेकर अपनी हानि ही करेंगे ।
हर लड़की औरत या स्त्री या महिला दुर्गा नहीं होती । इसको घोंट घोंट कर पी लीजिए ।
अगर आप कहते हैं कि ऐसा शास्त्र कहते हैं तो शास्त्र की अन्य सभी बातों को मानिये । शास्त्र ने दस लक्षण बतायें हैं तो दसों को मानना पड़ेगा , यह नहीं कि एक ही लक्षण लेकर कूदने लगे ।
देखिये शास्त्र ने "कन्या" को दुर्गा और लक्ष्मी बोला है । ध्यान दीजिए कन्या को । उसी कन्या का पूजन करने को कहा है और पाँव छूने को कहा है ।
अब शास्त्रों के अनुसार कन्या का लक्षण सुन लीजिए :-
* कन्या वह है जो कुमारी अवस्था की हो ।
* कन्या वह है जिसका अभी मासिक धर्म शुरू न हुआ हो ।
* कन्या मात्र 12 वर्ष की बालिका को बोला गया है ।
* कन्या को दुर्गा लक्ष्मी इसीलिए कहा गया है , जब तक उसमें काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , डाह , जलन या कोई भी ऐसी दुर्मति का प्रादुर्भाव न हुआ हो ।
एकमात्र यही कन्या पूजने योग्य हैं और यही चरण छुवाने की अधिकारी हैं ।
दुर्गा और लक्ष्मी को खेत की मूली नहीं है कि सभी हो जायेंगी ।
उसके लिए वह स्तर चाहिए , शुचिता चाहिए , वह पात्र चाहिए ।
ये जो घोर मूर्खतावश और अज्ञानतावश आप सबको दुर्गा और लक्ष्मी या सरस्वती बोलते रहते हैं , यह मात्र उस आदिशक्ति का अपमान है , यह घोर अपराध की श्रेणी में आता है ।
विवाह में कन्या और दामाद का पाँव इसलिए छुवा जाता है क्योंकि तब वह उसकी लड़की नहीं , "कन्या" होती है और उस दुर्गा रूपी कन्या का वरण कोई साधारण पुरुष नहीं , स्वयं विष्णु या शिव रूप पुरुष ही करेगा ।
शक्ति और शिव के रूप में या इनका पद देने के कारण ही कन्या और दामाद को पूजा जाता है ।
पहले के समय में कन्या की आयु में ही विवाह कर दिया जाता था ।
तो वर भी विष्णु तुल्य होता था ।
तो इसीलिए पैर पूजने का विधान था । पहले की कन्या विशुद्ध होती थी , इसलिए उनमें भगवती का रूप निरूपित किया जाता था ।
आजकल की तरह नहीं कि 35 वर्ष तक विवाह न हो ।
हमेशा कन्यादान होता है , लड़कीदान या स्त्री दान या पुत्री दान , या बहन दान , या औरत दान नहीं होता ।
और सिर्फ कन्या ही नहीं ,बालक में भी शिव और विष्णु की अवधारणा बताई गई है ।
लेकिन कब तक ??? जब तक वह काम , क्रोध , लोभ , या मायिक विकार से अनभिज्ञ है तब तक । मतलब 12 वर्ष तक की अवस्था के बालक को ।
इसीलिए कहा गया है कि :- बाला बाला देवी भेदा , वत्सो वत्स: श्रीरामः ।
शास्त्र की बात मानते हैं तो पूरी मानिये ।
यह नहीं कि छोटा सी पंक्ति उठा लाये , न कोई आगे पीछे का संदर्भ या न प्रसंग देखा ।
तो अपनी ही हानि करेंगे ।
फिर धर्मों रक्षति धर्म: वाली स्थिति आ जायेगी ।
शास्त्र कोई बात कहते हैं तो उसके पीछे कई अहर्ताएँ रखते हैं । एक शब्द के पीछे कई सारे terms and conditions लागू होते हैं । बिना इसके शास्त्र की कोई पंक्ति validate नहीं होगी ।
फिर वही होगा कि आप शास्त्र जलायेंगे ।
अगर सरकार कहती है कि सरकार सबको 15 लाख रुपये खाते में देगी तो इसके पीछे कई terms and conditions understood होती हैं ।
पहली शर्त होती है कि
* वह मनुष्य हो ।
* वह वयस्क मनुष्य हो ।
* वह भारत का नागरिक हो ।
* वह मानसिक विक्षिप्त न हो ।
* वह किसी आपराधिक मामले में संलिप्त न हो ।
* उसका किसी सरकारी बैंक में एकाउंट हो ।
* वह आयकर दाता हो ।
* उसके 3 बच्चों से अधिक न हो ।
ऐसे तमाम तरह की अहर्ताएँ होती हैं ।
अब आपने सुना और अपने कुत्ते Tommy को भेज दिया कि जाओ सरकार सबको 15 लाख दे रही है तो लोग आपको मूर्ख कहेंगे ।
तो इसी तरह शास्त्र की बात मानें तो पूरी मानें ।
ऐसे ही कुछ लोग जन्मना ब्राह्मण और कर्मणा ब्राह्मण पर लेकर झोंटा झोंटी और तलवार बाजी करते हैं। ये दोनों घोर मूर्ख हैं , जी हाँ ! दुबारा पढ़ लीजिए "घोर मूर्ख"
न जाति जन्मना होती है न कर्मणा ।
जब इन दोनों के सिद्धान्तवादियों को टकराते हुए देखता हूँ तो बहुत हँसी आती है और दुःख भी होता है ।
खैर इस पर चर्चा नहीं करूँगा , जब मेरी पुस्तक आएगी तो उसमें पढ़ लीजिएगा ।
तो सार यह है कि सभी लक्ष्मी दुर्गा नहीं होती ।
सबको लक्ष्मी दुर्गा कहना , मात्र पापाचार को बढ़ावा है ।
या तो आप उस अद्वितीय शक्ति से अनभिज्ञ हैं , या तो जान बूझ कर आप उस शक्ति का अपमान कर रहे हैं ।
फिर तो ऐसे सभी दुर्गा हुई । एक छोटी दुर्गा और दूसरी बड़ी दुर्गा । फिर बड़ी दुर्गा कैसे छोटी दुर्गा का पैर छू सकती है । बड़ी दुर्गा और छोटी दुर्गा आपस में लड़ रही हैं ।
यह पूरा संसार दुर्गामय बन जायेगा तो यह पृथ्वी स्वतः रुक जाएगी ।
अरे ! वह कोई मामूली शक्ति नहीं है जिसका आह्वाहन आप कामी , क्रोधी , लोभी , मोही , पापा चारिणी सभी में कर दे ।
अच्छा अगर आप सबको दुर्गा और लक्ष्मी मानते हैं तो आपकी हैसियत है उस दुर्गा और लक्ष्मी के साथ सोने की ????
छि छि छि छि । कैसे राक्षस प्रवृत्ति के हो तुम लोग !!!
अरे अद्वितीय शक्ति का वरण कोई अद्वितीय शक्ति ही कर सकता है ।
आपको शर्म नहीं आती कि जिसे आप दुर्गा लक्ष्मी बोल रहे हैं , उसका विवाह आप साधारण पुरुष से कर रहे हैं ???
धिक्कार है ।
ये तो रिश्तों की मर्यादा को भी कलंकित किया जा रहा है ।
आप अगर हर स्त्री या लड़की को दुर्गा बोलते हैं तो प्रियदर्शिनी ने जब थप्पड़ मारा तब तो आपको जय जय करना चाहिए कि उसका बहुत बड़ा सौभाग्य कि साक्षात दुर्गा माँ ने थप्पड़ रसीद किये ।
किसी दुष्चरित्र स्त्री को आप दुर्गा की संज्ञा नहीं दे सकते ।
और आप अंतर्यामी हैं नहीं कि आपको पता लग जाये कि अमुक स्त्री क्या है ।
इसीलिए शास्त्रों ने इसके लिए एक रेखा खींच दी कि मात्र 12 वर्ष तक की बालिका को कन्या या 12 वर्ष तक के बच्चों को विष्णु या शिव रूप में पूजित कर सकते हैं।
इसीलिए 12 वर्ष तक की अवस्था तक बालक या बालिका के किसी भी ग़लत कर्म को नोट नहीं किया जाता या पाप की श्रेणी में नहीं डाला जाता या उसके कर्मफल नहीं दिया जाता ।
ध्यान रखिये सिर्फ ग़लत कार्यों को ।
अच्छे कार्यों का notification होता है।
तो फिर प्रत्येक स्त्री अगर दुर्गा और लक्ष्मी है तो फिर इस संसार में कोई भी स्त्री गलत कार्य नहीं कर रही है । वेश्या और दुष्चरित्र कलंकित स्त्रियों को भी आपको कुछ नहीं कहना चाहिए क्योंकि वह दुर्गा और लक्ष्मी है ।
लोग कहते हैं कि हम अपनी बेटी का पाँव छूते हैं या हमारे यहाँ लड़कियाँ पाँव नहीं छूती ।
तो यह आप उस लड़की को पाप का भागीदार बना रहे हैं ।
ध्यान दीजिए पुत्री का पैर नहीं छुवा जाता , कन्या का छुवा जाता है ।
आप उसका पैर छूकर उसका पुण्य ले रहे हैं और उस पर अपना भार चढ़ा रहे हैं ।
आप उसे अपने आशीर्वाद से वंचित रखकर और उस पर अपना पाप चढ़ाकर उसके जीवन को संघर्षों से भर रहे हैं और जीवन कठिन बना रहे हैं । भोगना उसे पड़ेगा , और उसके दुःख के कारण आप भी दुखी रहेंगे ।
ऐसे ही होगा जैसे Nobita doraemon की बिना पूरी बात सुने उसका gadget use करने लगता है और फिर बड़ी परेशानी में फंस जाता है ।
इसीलिए शास्त्रों की सभी बातों पर ध्यान दीजिए ।
पैर एकमात्र और एकमात्र ज्ञान , पद और आयु में बड़े व्यक्ति या व्यक्तित्व का ही छुवा जाता है ।
अगर आप उसे कन्या देखते हैं तो उसे पुत्री , भगिनी या अन्य रूप में नहीं देख पाएंगे ।
बाकी का पाँव क्यों छुवा जाता है , उसका उद्देश्य क्या है , यह जिस दिन समझ जायेंगे तो उस दिन यह पैर छूने छुलाने वाली बीमारी स्वतः ही समाप्त हो जाएगी ।
आपने जिसका पाँव छुवा है , अगर वह आशीर्वाद या मंगल संदेश न दे तो पैर छुवाने वाले का नाश होता है ।
अगर आपने किसी अनाधिकारी का पैर छुवा है तो उसका तो नाश होगा ही , साथ ही साथ आपका भी नाश होगा या हानि होगी ।
उचित समय मात्र पर वह कन्या के पद पर होती है । अगर हर वक्त आप उसे कन्या के पद पर रखेंगे तो यह संसार चलेगा ही नहीं ।
इसीलिए कन्या की परिभाषा , अंतर , विभाव को समझ कर कार्य करें वरना अपने साथ साथ आप अपनी पुत्री के जीवन को भी कष्टमय बना रहे हैं ।
इसीलिए पुत्री को पुत्री रूप में देखें । कन्या का रूप तब देखें जब कोई विशेष अवसर हो या सच में वह कन्या हो ।
अन्यथा उसे पुत्री रूप में ही देखें और उसे बड़ों का सम्मान करना सिखायें । वरना जब वही दुर्गा घर से नाक कटा कर भागेगी तो वही दुर्गा आपको ताड़का लगेगी ।
और यह जो दिमाग़ में फितूर है न आपके कि "शक्ति" नारी का रूप या स्त्रीलिंग होती है , इसको निकाल बाहर फेंकिये ।
शक्ति का कोई Gender नहीं होता । शक्ति का कोई लिंग, आकार , रूप , जाति , सम्प्रदाय नहीं होता ।
अरे वह तो शुम्भ निशुम्भ या महिषासुर इत्यादि को स्त्री से मरने का वरदान था इसलिए उस शक्ति को स्त्री रूप में आना पड़ा ।
वरना यही शक्ति त्रेता में राम बनकर आयी और द्वापर में कृष्ण बनकर आयी ।
जब इसको जिसकी आवश्यकता होती है वह उसी रूप को धारण करके आती है ।
ये भगवान या भगवती कोई स्त्री पुरुष नहीं है । उसकी कोई जाति नहीं , उसका कोई लिंगभेद नहीं ।
यह तो हम दुर्मतियों को समझाने के उद्देश्य से बताया गया है क्योंकि हमारी बुद्धि की पहुँच नहीं है वहाँ पर ।
इसीलिए ऋषि मुनि या महापुरुष हमारी बुद्धि के स्तर पर आकर उस परम तत्व को समझाने का प्रयास करते हैं ताकि इसकी बुद्धि में कुछ तो घुसे । बाद में जब साधना का स्तर जब आएगा तब यह स्वतः समझ जाएगा ।
तो इसीलिए शास्त्रों की बात मानकर मात्र कन्या को ही दुर्गा और लक्ष्मी निरूपित करें ।
आपके क्षेत्र में क्या होता आया है , या क्या परंपरा रही है , उससे सिद्धांत और शास्त्र का कोई लेना देना नहीं है । जब फल भोगने का समय आएगा तो यह तर्क या advocacy नहीं चलेगी कि हमारे यहाँ ऐसा होता है , न न , कर्म का फल शास्त्रों के और सिद्धांतों के अनुरूप मिलेगा ।
आप जो मानते आए हैं या जो आप मानते हैं , उससे शास्त्रों के मूल सिद्धांत का बाल बांका भी नहीं होगा ।
और परम्परा के नाम पर संसार में बहुत कुछ हो रहा है । परम्परा का अर्थ सत्य नहीं होता ।
सूर्य पूर्व से उगता है । भले आप यह मानते रहे कि नहीं पश्चिम में उगता है या उधर ही मुँह किये खड़े होकर सूर्य को ढूँढते रहें या ये कहें कि हमारे यहाँ यही माना जाता है या सभी यही मानते हैं ।
सूर्य पूर्व से ही उगेगा और अस्त पश्चिम में ही होगा ।
इसलिए निवेदन है कि अपने शास्त्रों की बातों को पूरा मानें । यह न कहें कि "मेरे अनुसार" या "मेरा मानना है कि" या "लोग कहते हैं कि"
क्योंकि आपके अनुसार या लोगों के अनुसार भोग दंड नहीं मिलेगा ,हर कर्म अपने सिद्धांत या कानून के अनुसार दंडफल देता है ।
धन्यवाद ।
- Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )