07/10/2026
RLP नेता थानसिंह डोली को भूल तो नहीं गए...?
यह सिर्फ एक नाम नहीं है...
यह उन लोगों की आवाज है, जिनकी आवाज दबाने की कोशिश हुई।
जोजरी नदी में जहर घोलने वालों के खिलाफ आवाज उठी तो थानसिंह डोली सबसे आगे खड़े रहे। किसानों और आमजन के हक के लिए संघर्ष किया, जेल गए, लेकिन अपने कदम पीछे नहीं खींचे।
बजरी माफियाओं के खिलाफ 65 दिनों तक धरने पर बैठे, लेकिन समझौता अपने स्वाभिमान से नहीं किया।
विशनाराम मेघवाल हत्याकांड में न्याय की आवाज के साथ खड़े रहे।
अनीता चौधरी हत्याकांड में न्याय की मांग को लेकर पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहे।
भंवरी देवी लोहावट हत्याकांड में भी न्याय की आवाज के साथ आगे रहे।
संतोष पूरी कलाऊ की मृत्यु के मामले में परिवार के साथ खड़े रहे।
पटौदी में चार सगे मेघवाल भाइयों की सड़क दुर्घटना में मौत हुई, तब भी पीड़ित परिवार की आवाज बनने के लिए आगे खड़े रहे।
इंदरसिंह राजपुरोहित, पाली को न्याय दिलाने की लड़ाई में भी साथ खड़े रहे।
गीता राजपुरोहित के न्याय के लिए अहमदाबाद तक धरने में साथ रहे।
दादाल में गोचर भूमि और तालाब के मुद्दे पर भी संघर्ष किया।
गुड़ामालानी विधानसभा क्षेत्र के धोलानाडा और आसपास के गांवों में तेल-गैस कंपनियों, विशेषकर वेलपैड केयर एवं वेदांता कामेश्वरी से जुड़े मुद्दों को लेकर किसानों के साथ आंदोलन में खड़े रहे।
गुड़ामालानी के हजारों किसानों की जायज मांगों को लेकर भी उनकी आवाज सबसे आगे रही।
एम्स जोधपुर के हॉर्टिकल्चर विभाग में निजी कंपनी के माध्यम से कार्यरत सेवालीयों की ढाणी, पालासनी निवासी स्व. मांगीलाल बिश्नोई जी के बागवानी कार्य के दौरान क्रेन से गिरकर गंभीर रूप से घायल होने और उपचार के दौरान निधन के मामले में भी पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहे।
जैसलमेर के लखा गांव के बीरमसिंह जी राजपुरोहित, जो खेत जाते समय AB इंफ्रा सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा बिछाई जा रही हाईटेंशन लाइन की चपेट में आए—उनके मामले में भी न्याय की आवाज के साथ खड़े रहे।
बालोतरा के सिटी लाइट अस्पताल में बायतु विधानसभा क्षेत्र के अकदड़ा निवासी मालाराम गोदारा जी की इलाज के दौरान मृत्यु के मामले में भी पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहे।
और ऐसे न जाने कितने किसान, मजदूर, गरीब और पीड़ित परिवार हैं, जिनके दुख में थानसिंह डोली उनके साथ खड़े नजर आए।
लेकिन इस संघर्ष की कीमत भी चुकानी पड़ी...
16 मुकदमे झेले, जेल गए, दबाव आए—
लेकिन स्वाभिमान से समझौता नहीं किया।
क्योंकि कुछ लोग राजनीति में पद के लिए आते हैं,
और कुछ लोग लोगों के दर्द को अपना दर्द समझकर संघर्ष करने के लिए।
आज सवाल सिर्फ इतना है—
जब किसी गरीब के घर का चिराग बुझा,
जब किसी किसान की जमीन पर संकट आया,
जब किसी परिवार ने न्याय के लिए आवाज लगाई...
तब कौन उनके साथ खड़ा था?
नाम याद रखिए —
थानसिंह डोली।
संघर्ष की राह आसान नहीं होती,
लेकिन जिसने लोगों के हक के लिए लड़ना सीख लिया हो,
वह मुश्किलों से डरता नहीं।
मुकदमे आए तो मुकदमे झेले,
जेल आई तो जेल गए,
लेकिन अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया।
थानसिंह डोली —
संघर्ष जारी है।
स्वाभिमान कायम है। Thansingh Doli