Bhrigu balliya

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हमारा देश ऋषियों-मुनियों व संत महात्माओं का देश है, जिन्होंने तपस्या से पवित्र हुए ज्ञान से न केवल आध्यात्मिक शक्ति की ज्योति जलाई अपितु अपने श्रेष्ठ मर्यादित शील, आचरण, अहिंसा, सत्य, परोपकार, त्याग, ईश्वरभक्ति आदि के द्वारा समस्त मानव जाति के समक्ष जीवन जीने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.
इन्हीं के बताए मार्ग पर चलकर, उसका आचरण करके भारत किसी समय ज्ञान- विज्ञान, भक्ति और समृद्धि के चरम शिखर

तक पहुंचा था. इस देश में इतने ऋषि-मुनि और संत-महात्मा हुए हैं कि उनका नाम गिनना संभव नहीं है. कौन कितना बड़ा और श्रेष्ठ था, इसका मूल्यांकन करना भी संभव नहीं है (if u agree please like this page)

14/05/2026

🛕📚 भारतस्य १०० प्रसिद्धानि मन्दिर-गुरुकुल-संस्थानानि 🛕📚

भारतस्य प्राचीन-शिक्षा-व्यवस्थायां मन्दिराणि केवलं पूजास्थलानि नासन्, अपितु—
✅ विद्याकेन्द्राणि
✅ वेदविद्यालयाः
✅ संस्कारपीठानि
✅ योग-धर्म-शास्त्र-अध्ययन-केन्द्राणि
✅ गुरु-शिष्य-परम्परायाः महानि आधारस्थानानि च आसन्।

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१. शृङ्गेरी शारदा पीठम् — शृङ्गेरी — 📞 +९१-८२६५-२५२५२५
२. काञ्ची कामकोटि पीठम् — काञ्चीपुरम् — 📞 +९१-४४-२७२२२११५
३. तिरुमल वेङ्कटेश्वर मन्दिरम् — तिरुपतिः — 📞 +९१-८७७-२२७७७७७
४. उडुपी श्रीकृष्ण मठः — उडुपी — 📞 +९१-८२०-२५२०५९८
५. जगन्नाथ मन्दिरम् — पुरी — 📞 +९१-६७५२-२२२००२
६. मायापुर-वैष्णव-गुरुकुलम् — मायापुरम् — 📞 +९१-३४७२-२४५६२०
७. श्री-स्वामिनारायण-गुरुकुलम् — राजकोटः — 📞 +९१-२८१-२५८५३१६
८. गुरुकुल-काङ्गड़ी-विश्वविद्यालयः — हरिद्वारः — 📞 +९१-१३३४-२४६५१२
९. परमार्थ-निकेतनम् — ऋषिकेशः — 📞 +९१-१३५-२४४००७०
१०. पतञ्जलि-योगपीठम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-१३३४-२४०००८

११. महावीर-मन्दिरम् — पाटलिपुत्रम् — 📞 +९१-६१२-२३२६२५३
१२. गायत्री-तीर्थ-शान्तिकुञ्जम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-९२५८३६८६३४
१३. अवधूत-दत्त-पीठम् — मैसूरुः — 📞 +९१-८२१-२४१७४४४
१४. अर्षविद्या-गुरुकुलम् — कोयम्बत्तूरम् — 📞 +९१-४२२-२६१३३००
१५. चिन्मय-अन्तर्राष्ट्रीय-संस्थानम् — एरणाकुलम् — 📞 +९१-४८४-२७४९६७६
१६. रामकृष्ण-मिशनम् — बेलूरः — 📞 +९१-३३-२६५४-५७००
१७. आचार्यकुलम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-७०५५००७७८८
१८. ओंकारानन्द-आश्रमः — ऋषिकेशः — 📞 +९१-१३५-२४३०७६९
१९. शिवानन्द-आश्रमः — ऋषिकेशः — 📞 +९१-१३५-२४३००४०
२०. चिन्मय-गुरुकुलम् — कोयम्बत्तूरम् — 📞 +९१-४२२-२६१३३००

२१. तिरुपति-वेद-पाठशाला — तिरुपतिः — 📞 +९१-८७७-२२६४५८३
२२. गोवर्धन-मठः — पुरी — 📞 +९१-६७५२-२२३१५१
२३. ज्योतिर्मठः — ज्योतिर्मठः — 📞 +९१-१३३८९-२२२०४
२४. द्वारका-शारदा-पीठम् — द्वारका — 📞 +९१-२८९२-२३४०८०
२५. अहोबिल-मठः — चेन्नै — 📞 ०४४-२२७९०८१४
२६. परकाल-मठः — मैसूरुः — 📞 +९१-९७४१११२४०२
२७. मेल्कोटे-संस्कृत-अकादमी — मेल्कोटे — 📞 +९१-८२३६-२८२२००
२८. मन्त्रालय-राघवेन्द्र-मठः — मन्त्रालयम् — 📞 +९१-८५०१२-८७९७९
२९. चतुर्वेद-वेदाश्रमः — तिरुवन्नामलै — 📞 +९१-४१७५-२३६९९९
३०. गुरुवायूर-देवस्वम् — गुरुवायूरः — 📞 +९१-४८७-२५५६३३५

३१. वृन्दावन-वैष्णव-गुरुकुलम् — वृन्दावनम् — 📞 +९१-५६५-२५४७९४६
३२. बेंगलूरु-वैष्णव-गुरुकुलम् — बेंगलूरुः — 📞 +९१-८०-२३४७१९५६
३३. गोवर्धन-पर्यावरण-ग्रामः — पालघरः — 📞 +९१-२५२६-६५४९९९
३४. चैतन्य-सारस्वत-मठः — नवद्वीपः — 📞 +९१-३४७२-२४०४३३
३५. हैदराबाद-स्वामिनारायण-गुरुकुलम् — हैदराबादः — 📞 +९१-८४१३-२००९९९
३६. बेंगलूरु-स्वामिनारायण-गुरुकुलम् — बेंगलूरुः — 📞 +९१-९९०००६३४५६
३७. अहमदाबाद-स्वामिनारायण-गुरुकुलम् — अहमदाबादः — 📞 +९१-७९-२७४७५०००
३८. नवी-मुम्बई-स्वामिनारायण-गुरुकुलम् — नवी-मुम्बई — 📞 +९१-९३२४८२०१००
३९. नीलकण्ठधाम-स्वामिनारायणम् — पोइचा — 📞 +९१-९०९९९-७५३२१
४०. आर्य-कन्या-गुरुकुलम् — पोरबन्दरः — 📞 +९१-२८६-२२४४७५५

४१. गुरुकुल-महाविद्यालयः — ज्वालापुरम् — 📞 +९१-१३३४-२५०४८२
४२. आर्य-गुरुकुलम् — आग्रा — 📞 +९१-५६२-२९६५२७८
४३. अभयदेव-वेदविद्या-गुरुकुलम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-१३३४-२४६३००
४४. गायत्री-विद्या-पीठम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-९२५८३६८६३१
४५. गायत्री-वेद-विद्यालयः — ऋषिकेशः — 📞 +९१-१३५-२४३०७६९
४६. भारतमाता-गुरुकुलम् — हरिद्वारः — 📞 +९१-१३३४-२२७१३६
४७. ऋषिकुल-आयुर्वेद-महाविद्यालयः — हरिद्वारः — 📞 +९१-१३३४-२७२५४७
४८. मिथिला-संस्कृत-गुरुकुलम् — दरभङ्गा — 📞 +९१-६२७२-२२२६८४
४९. याज्ञवल्क्य-आश्रमः — मधुबनी — 📞 +९१-६२७६-२३३२२६
५०. नालन्दा-संस्कृत-गुरुकुलम् — नालन्दा — 📞 +९१-६११२-२५५३३०

५१. तारापीठ-संस्कृत-गुरुकुलम् — तारापीठम् — 📞 +९१-३४६१-२५३४३०
५२. देवघर-संस्कृत-विद्यालयः — देवघरः — 📞 +९१-६४३२-२३२५७८
५३. आनन्दधाम-वेदव्यास-गुरुकुलम् — काङ्गडाः — 📞 +९१-१८९२-२३३१०८
५४. वसिष्ठ-गुरुकुलम् — कुल्लू — 📞 +९१-१९०२-२४०३४४
५५. तपोवन-संस्कृत-गुरुकुलम् — उत्तरकाशी — 📞 +९१-१३७४-२२२८७६
५६. कैलाश-आश्रमः — ऋषिकेशः — 📞 +९१-१३५-२४३५२३५
५७. बद्रिकाश्रम-वेदविद्यालयः — बद्रीनाथः — 📞 +९१-१३६५-२२२२१३
५८. उत्तरकाशी-वेद-पाठशाला — उत्तरकाशी — 📞 +९१-१३७४-२२२२५४
५९. विश्वशान्ति-गुरुकुलम् — पुणे — 📞 +९१-२०-३९२१००००
६०. करियर-पॉइण्ट-गुरुकुलम् — कोटा — 📞 +९१-७४४-३०४००००

६१. गुरुकुल-तक्षशिला — कुरुक्षेत्रम् — 📞 +९१-९९९६००३३०१
६२. श्रीश्री-रविशंकर-गुरुकुलम् — बेंगलूरुः — 📞 +९१-८०-६७२६२६२६
६३. विवेकानन्द-गुरुकुलम् — कोयम्बत्तूरम् — 📞 +९१-४२२-२६९२६७६
६४. सान्दीपनि-साधनालयः — मुम्बई — 📞 +९१-२२-२५७०५५११
६५. महर्षि-विद्या-मन्दिर-गुरुकुलम् — नोएडा — 📞 +९१-१२०-४२७८४००
६६. शारदा-पीठम् — कुपवाडा — 📞 +९१-१९५५-२३०००१
६७. तक्षशिला-परम्परा-केन्द्रम् — पंजाबः — 📞 +९१-१७२-२७४९९००
६८. विक्रमशिला-अध्ययन-केन्द्रम् — भागलपुरम् — 📞 +९१-६४१-२४०१०४०
६९. ओदन्तपुरी-धरोहर-केन्द्रम् — बिहारशरीफः — 📞 +९१-६११२-२३००१२
७०. पुष्पगिरि-धरोहर-गुरुकुलम् — जाजपुरम् — 📞 +९१-६७२८-२२२१४५

७१. रामकृष्ण-मिशन-विद्यापीठम् — देवघरः — 📞 +९१-६४३२-२२२४१३
७२. भारतीय-विद्या-भवन-गुरुकुलम् — कोच्चिः — 📞 +९१-४८४-२४२३४९३
७३. वेद-निकेतन-धामः — मथुरा — 📞 +९१-५६५-२४००६७८
७४. सरस्वती-विद्या-गुरुकुलम् — तृश्शूरः — 📞 +९१-४८७-२४४४५७५
७५. वेद-भवन-गुरुकुलम् — नासिक्यम् — 📞 +९१-२५३-२५७४२९१
७६. ऋषि-उद्धव-गुरुकुलम् — वृन्दावनम् — 📞 +९१-५६५-२४५६७८९
७७. वेद-विज्ञान-गुरुकुलम् — बेंगलूरुः — 📞 +९१-८०-२६७९००४५
७८. श्री-वेङ्कटेश्वर-वैदिक-विश्वविद्यालयः — तिरुपतिः — 📞 +९१-८७७-२२८७६४९
७९. नासिक-वेद-पाठशाला — नासिक्यम् — 📞 +९१-२५३-२४६५४२१
८०. श्री-राघवेन्द्र-गुरुकुलम् — बेंगलूरुः — 📞 +९१-८०-२८४७८५५५

८१. गोकर्ण-वेदाध्ययन-केन्द्रम् — गोकर्णम् — 📞 +९१-८३८६-२५६५५५
८२. श्रीरङ्गम्-वेद-पाठशाला — श्रीरङ्गम् — 📞 +९१-४३१-२४३१७८८
८३. मदुरै-अधीनेम्-गुरुकुलम् — मदुरै — 📞 +९१-४५२-२३४४३६०
८४. धर्मस्थल-गुरुकुलम् — धर्मस्थलम् — 📞 +९१-८२५६-२६६६६६
८५. केरल-तन्त्र-विद्या-पीठम् — तृश्शूरः — 📞 +९१-४८७-२३३३३८०
८६. नैमिषारण्य-गुरुकुलम् — नैमिषारण्यम् — 📞 +९१-५८६५-२५१२१९
८७. अयोध्या-रामायणी-गुरुकुलम् — अयोध्या — 📞 +९१-५२७८-२३२७०३
८८. चित्रकूट-गुरुकुलम् — चित्रकूटः — 📞 +९१-७६७०-२६५४१३
८९. गीता-गुरुकुलम् — कुरुक्षेत्रम् — 📞 +९१-१७४४-२९०५००
९०. संस्कृत-गुरुकुलम् — जयपुरम् — 📞 +९१-१४१-२७०७८५६

९१. वेदान्त-अकादमी — मालवली — 📞 +९१-२११४-२२२४७५
९२. ब्रह्मचर्य-आश्रम-गुरुकुलम् — वाराणसी — 📞 +९१-५४२-२४५०२३६
९३. काशी-विद्वत्-गुरुकुलम् — वाराणसी — 📞 +९१-५४२-२४५११८८
९४. वृन्दावन-चन्द्रोदय-गुरुकुलम् — वृन्दावनम् — 📞 +९१-५६५-२५४७९४६
९५. मूकाम्बिका-वेद-गुरुकुलम् — कोल्लूरः — 📞 +९१-८२५४-२५८२२१
९६. केदारनाथ-वेद-पाठशाला — केदारनाथः — 📞 +९१-१३६४-२३३७२७
९७. सोमनाथ-संस्कृत-विश्वविद्यालयः — सोमनाथः — 📞 +९१-२८७६-२४३५३२
९८. द्वारकाधीश-संस्कृत-अकादमी — द्वारका — 📞 +९१-२८९२-२३४०९०
९९. कामाख्या-गुरुकुलम् — गुवाहाटी — 📞 +९१-३६१-२७३४६५४
१००. कालडी-संस्कृत-गुरुकुलम् — कालडी — 📞 +९१-४८४-२४६२३५०

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🙏 “सा विद्या या विमुक्तये” 🙏

या विद्या मनुष्यं मोचयति, संस्कारयति, उन्नतिं च नयति — सा एव श्रेष्ठा विद्या।

12/05/2026
11/05/2026

काशी की वह रहस्यमयी कथा जिसने बदल दिया काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

1. काशी, जो मरती नहीं

काशी को अविमुक्त कहा गया, जिसे शिव ने कभी छोड़ा नहीं। कहते हैं, प्रलय में भी काशी त्रिशूल पर टिकी रहती है। इसलिए हर आक्रांता ने उसे तोड़ा, पर वह हर बार उठ खड़ी हुई।

12वीं सदी में कुतुबुद्दीन, 15वीं में जौनपुर के शर्की, फिर सिकंदर लोदी। हर बार विश्वनाथ का लिंग तोड़ा गया, हर बार पंडितों ने उसे गंगा में छिपाया, फिर निकाला, फिर स्थापित किया।

औरंगजेब के समय तक मंदिर अपने सातवें रूप में था, महाराजा मानसिंह ने बनवाया था, ऊँचा शिखर, सोने का कलश। पुजारी थे पंडित विश्वंभर मिश्र, उम्र सत्तर, आँखों से कम दिखता, पर मंत्र कंठस्थ। उनकी पोती थी गंगा, बारह साल की, जो हर शाम दीया जलाती।

2. फरमान

1669, अप्रैल। काशी में खबर फैली, बादशाह औरंगजेब ने फरमान भेजा है, काशी विश्वनाथ मंदिर गिराया जाए। कारण कई बताए जाते हैं, इतिहासकार लिखते हैं। काशी के लोग जानते थे, कारण कुछ भी हो, परिणाम एक है।

कोतवाल ने पंडितों को बुलाया, कहा, तीन दिन हैं। मूर्तियाँ हटा लो।

पंडितों की सभा हुई। कुछ बोले, लिंग को गंगा में प्रवाहित कर दो। कुछ बोले, गाँव ले जाओ। विश्वंभर चुप रहे। रात को उन्होंने पोती से कहा, गंगा, तूने कभी कुआँ देखा है।

गंगा बोली, ज्ञानवापी वाला।

विश्वंभर बोले, वही।

3. ज्ञानवापी का रहस्य

ज्ञानवापी, ज्ञान का कुआँ। कहते हैं, आदि शंकराचार्य ने यहाँ बैठकर शास्त्रार्थ किया था। शिव ने स्वयं यहाँ जल पिया था। कुआँ मंदिर के ठीक उत्तर में, गहरा, अंधेरा, सीढ़ियाँ पत्थर की।

विश्वंभर ने बचपन में अपने गुरु से सुना था, काशी पर जब भी संकट आए, विश्वनाथ ज्ञान में छिप जाते हैं। ज्ञानवापी सिर्फ पानी नहीं, वह गर्भ है।

उस रात विश्वंभर, उनके दो शिष्य, और डोम राजा कल्लू ने योजना बनाई। डोम, जो मणिकर्णिका पर चिता जलाता है, जिसे लोग अछूत कहते हैं, पर शिव जिसे अपना मित्र कहते हैं। कल्लू बोला, पंडित जी, मेरा काम जलाना है, आज बचाऊँगा।

4. वह रात

18 अप्रैल की रात, अमावस्या। मंदिर के कपाट बंद। शहर सोया नहीं, जाग रहा था। मुगल सिपाही बाहर पहरा दे रहे थे, सुबह तोड़फोड़ शुरू होनी थी।

भीतर गर्भ गृह में विश्वंभर ने महामृत्युंजय जपा। चार लोगों ने मिलकर स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को उसके योनिपीठ से अलग किया। लिंग छोटा नहीं था, लगभग ढाई फीट, काला कसौटी पत्थर, स्पर्श करते ही हाथ ठंडे।

उन्होंने उसे रेशम में लपेटा, फिर कंबल में। कल्लू ने डोमों की टोकरी में रखा, ऊपर फूल और राख।

चुपचाप पिछले द्वार से निकले, जो सीधे ज्ञानवापी की ओर जाता था। सिपाही ने रोका, कल्लू ने कहा, मणिकर्णिका से राख लाए हैं, मंदिर शुद्ध करना है। सिपाही ने जाने दिया।

कुएँ पर पहुँचे। सीढ़ियाँ फिसलन भरी। विश्वंभर ने लिंग को छाती से लगाया, बोले, हे अविमुक्त, आज तुम्हें छिपा रहा हूँ, कल तुम हमें उबारना।

धीरे धीरे रस्सियों से लिंग को नीचे उतारा। कुएँ में पानी कम था, नीचे एक ताखा था, पुराने पुजारियों ने बनाया था। वहीं लिंग को स्थापित किया, ऊपर से पत्थर ढका। विश्वंभर ने अपनी पोती गंगा के हाथ से एक छोटा नंदी, जो वह मिट्टी से बनाती थी, वहीं रखवा दिया। बोला, जब तक नंदी देखेगा, महादेव लौटेंगे।

ऊपर आकर कुएँ का मुंह पत्थरों से ढक दिया।

सुबह सिपाहियों ने मंदिर तोड़ा। शिखर गिरा, दीवारें गिरीं। वे गर्भ गृह में पहुँचे, देखा, पीठ खाली। बादशाह को खबर गई, लिंग गायब। खोज हुई, गंगा में जाल डाले, घरों में तलाशी। कुछ नहीं मिला।

औरंगजेब ने उसी जगह मस्जिद की दीवार उठवाई, जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद कहते हैं। उसे लगा, मंदिर मिट गया।

पर काशी जानती थी, मंदिर मिटा नहीं, सो गया।

5. नंदी की प्रतीक्षा

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। रहस्य यह था कि विश्वंभर ने लिंग के साथ एक ताम्रपत्र भी रखा था। उस पर संस्कृत में लिखा था, "जब तक काशी में डोम राजा रहेगा, जब तक गंगा बहेगी, तब तक विश्वनाथ यहीं हैं। जो छिपा है, वही बचेगा।"

सौ साल बीत गए। मंदिर टूटा रहा। लोग उसी मस्जिद की दीवार के बाहर, एक छोटे से आले में पूजा करते रहे। उसे आदि विश्वेश्वर कहते।

इधर विश्वंभर की पोती गंगा बड़ी हुई, उसने अपने बेटे को वही कथा सुनाई। उसने कहा, कुएँ में नंदी है, वह इंतज़ार कर रहा है।

1777 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर को सपना आया। सपने में एक बूढ़ा पंडित, आँखों पर पट्टी, कह रहा था, माँ, मैं ज्ञानवापी में हूँ, मुझे निकालो मत, मेरे पास ही घर बनाओ।

अहिल्याबाई काशी आईं। उन्होंने पंडितों से पूछा। एक बूढ़े डोम ने, जो कल्लू का परपोता था, उन्हें कुएँ तक ले गया। उसने कहा, रानी साहिबा, हमारे पुरखों ने कहा था, लिंग यहीं है, पर उसे छेड़ना नहीं।

अहिल्याबाई समझ गईं। उन्होंने मस्जिद से सट कर, दक्षिण में, 1780 में नया मंदिर बनवाया। वही आज का काशी विश्वनाथ मंदिर है। उन्होंने जानबूझ कर मूल स्थान पर दावा नहीं किया, क्योंकि वह जानती थीं, जो छिपा है, वह रक्षा में है।

उन्होंने मंदिर के सामने नंदी स्थापित नहीं किया, क्योंकि मूल नंदी तो कुएँ की ओर देख रहा था। आज भी ज्ञानवापी मस्जिद की ओर मुंह किए विशाल नंदी बैठा है, 350 साल से प्रतीक्षा में। लोग पूछते हैं, नंदी मस्जिद की ओर क्यों देख रहा है। उत्तर वही है, वह मस्जिद नहीं देख रहा, वह अपने स्वामी को देख रहा है जो कुएँ में हैं।

6. बदल गया इतिहास

इस एक रात ने इतिहास बदल दिया। अगर विश्वंभर उस रात लिंग को गंगा में बहा देते, तो आज कोई प्रमाण न होता। अगर वे लड़ने जाते, तो मारे जाते। उन्होंने छिपाया, इसलिए परंपरा बची।

इसी कारण आज काशी में दो विश्वनाथ हैं। एक जो अहिल्याबाई ने स्थापित किया, जहाँ लाखों जल चढ़ाते हैं। दूसरा जो ज्ञानवापी में है, जिसे नंदी देखता है, जिसे डोम राजा आज भी अपना देवता मानता है।

1839 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर पर सोना चढ़ाया। उन्होंने पूछा, मूल लिंग कहाँ है। पंडितों ने कहा, जहाँ नंदी देख रहा है। रणजीत सिंह ने कहा, फिर सोना उसी दिशा में चढ़ाओ।

2022 में जब कुआँ खोला गया, तो वही ताखा मिला, वही नंदी का मिट्टी का टुकड़ा मिला, जो अब पत्थर बन चुका था। लोगों ने कहा, चमत्कार। काशी ने कहा, नहीं, यह प्रतीक्षा थी।

7. रहस्य का अर्थ

यह कथा सिर्फ मंदिर तोड़ने जोड़ने की नहीं है। यह काशी के विचार की है। काशी लड़ती नहीं, वह छिप जाती है। वह ज्ञान में चली जाती है।

विश्वंभर ने उस रात सिखाया, धर्म की रक्षा तलवार से नहीं, धैर्य से होती है। कल्लू डोम ने सिखाया, शिव का सबसे बड़ा भक्त वह है जो चिता जलाता है, क्योंकि वह जानता है, सब राख है। गंगा बच्ची ने सिखाया, श्रद्धा उम्र नहीं देखती।

इसलिए आज जब तुम काशी विश्वनाथ जाते हो, तो पहले नंदी को देखो। वह तुम्हें मंदिर नहीं, कुएँ की ओर देखता मिलेगा। वह कह रहा है, मैं 350 साल से इंतज़ार कर रहा हूँ, तुम भी प्रतीक्षा करो।

और जब जल चढ़ाओ, तो याद रखो, तुम जिस लिंग पर जल चढ़ा रहे हो, वह अहिल्याबाई का स्थापित है, पर जिस पर तुम्हारी आस्था टिकती है, वह आज भी ज्ञानवापी में है, ठंडे पानी में, अंधेरे में, सुरक्षित।

काशी मरी नहीं, क्योंकि उसने मरना सीखा नहीं। वह छिपना जानती है। और जो छिपता है, वही बचता है।

यही वह रहस्यमयी कथा है जिसने काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास बदल दिया। मंदिर टूटा, पर देवता नहीं। मस्जिद बनी, पर दृष्टि नहीं। नंदी आज भी देख रहा है, और जब तक वह देख रहा है, काशी अमर है।

हर हर महादेव।



08/05/2026

गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति

एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस (1 कोस = करीब2 मील) की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था ।

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा : ‘‘हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना ।

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था ।

लड़के ने प्रेत से कहा : ‘‘मुझे रास्ता दो । प्रेत : ‘‘तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ?

‘‘त्रिवेणी का जल है ।‘‘

"मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है ।

‘‘क्या प्रभाव देखा है ?"

एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय प्राप्त करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा । 8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की : ‘हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया ।

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे, तुझे महान पुण्य होगा ।

‘‘मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति के स्नान का नियम है । यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा ।"

‘‘तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो,फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर,तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा ।"

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा : ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ । ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है ।

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं : ‘‘अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं : ‘‘समुद्रसहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है ।

हर हर गंगे🙏

Sri ramcharimanas path 2026, gram -Garaya , Ballia , U.p
15/02/2026

Sri ramcharimanas path 2026, gram -Garaya , Ballia , U.p

14/01/2026

🚩 मकर संक्रांति: शास्त्र-सम्मत तिथि बनाम प्रशासनिक परिपाटी 🚩
​क्या हमारा प्रशासन 'लकीर का फकीर' बन चुका है? 🤔
​पिछले कई वर्षों से एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। खगोलीय और ज्योतिषीय गणना चीख-चीख कर कह रही है कि मकर संक्रांति 15 जनवरी को है, लेकिन सरकारी कैलेंडर आज भी पुरानी आदत के वश 14 जनवरी की छुट्टी घोषित कर देता है।
​सावधान! सनातन धर्म के पर्व 'तारीख' से नहीं, 'तर्क' और 'विज्ञान' से चलते हैं। ☀️
​🔹 शास्त्रीय और खगोलीय सत्य:
मकर संक्रांति कोई सामान्य तारीख नहीं, बल्कि एक दिव्य खगोलीय घटना है। यह वह क्षण है जब सूर्य देव धनु राशि का परित्याग कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी 'संक्रमण' को संक्रांति कहा जाता है।
​🔹 इस वर्ष की स्थिति:
इस वर्ष सूर्य का मकर प्रवेश 15 जनवरी को हो रहा है। शास्त्रसम्मत, खगोलीय और वैज्ञानिक—तीनों दृष्टियों से यही तिथि निर्विवाद है।
​हमारा प्रश्न प्रशासन से है:
❓ क्या हमारी नीतियां अब भी वैज्ञानिक गणनाओं को अनदेखा करेंगी?
❓ क्या सांस्कृतिक अवकाशों का आधार 'पुरानी आदत' होनी चाहिए या 'शास्त्रीय सत्य'?
​समय आ गया है कि सरकारी निर्णय भी खगोलीय-ज्योतिषीय गणनाओं के अनुरूप हों, ताकि परंपरा और प्रशासन के बीच कोई विरोधाभास न रहे।
​परंपरा का मान रखें, खगोलीय सत्य को स्वीकारें। 🙏
​❄️ मकर संक्रांति — 15 जनवरी ❄️
(खगोलीय एवं ज्योतिषीय गणना के अनुसार)

06/01/2026

एआई से प्रश्न पूछा ----
क्या बिना ऊर्जा के गति हो सकती है??
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इसका सीधा उत्तर है: नहीं, ऊर्जा के बिना गति (Motion) संभव नहीं है।
​भौतिक विज्ञान (Physics) के अनुसार, गति और ऊर्जा एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। इसे समझने के लिए हमें इसे दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखना होगा:
​1. गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का नियम
​विज्ञान में गति की परिभाषा ही ऊर्जा से जुड़ी है। यदि कोई वस्तु गति कर रही है, तो उसके पास गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) होनी ही चाहिए।

गतिज ऊर्जा का सूत्र है -
K.E. = 1/2MV2

इसका मतलब यह है कि यदि वेग (v) शून्य नहीं है (यानी वस्तु चल रही है), तो ऊर्जा (K.E.) कभी शून्य नहीं हो सकती। इसलिए, गति का अस्तित्व ही ऊर्जा की उपस्थिति का प्रमाण है।
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भौतिक ऊर्जा के विषय में हम सब जानते हैं।एक और प्रकार की ऊर्जा होती है, जिससे हम परिचित हैं लेकिन कभी उस पर ध्यान नहीं दिया कि वह कितनी प्रभावकारी हो सकती है?? जबकि उसके प्रभाव से हम सब अपरिचित हों ऐसा भी नहीं है।है न आश्चर्य की बात,,🙂🙂🌼🌻।
वह है भाव ऊर्जा, जिससे हमारा जीवन सर्वाधिक प्रभावित होता है।
नकारात्मक भाव (घृणा द्वेष आदि) से भरे हुए शब्द जब किसी व्यक्ति की ओर प्रक्षेपित किए जाते हैं, तो वह व्यक्ति नकारात्मक रूप से सक्रिय हो जाता है।
जब सकारात्मक भाव (प्रेम, श्रद्धा आदि) से भरे भाव किसी व्यक्ति की ओर प्रक्षेपित किए जाते हैं तो वह सकारात्मक रूप से सक्रिय हो जाता है।
हम भले ही कुछ कहें या न कहें हमारे मन के भाव लोगों को प्रभावित करते हैं। सभी ने ऐसे अनुभव किए होंगे जब किसी ने भले कुछ न कहा हो फिर भी जान लेते हैं कि फलां व्यक्ति हमें पसंद या नापसंद करता है। व्यक्ति के भाव आसपास के लोगों के चित्त में धक्के मारते हैं। और उसीके अनुसार लोग गतिमान होते रहते हैं।
भाव ऊर्जा से संबंधित बिना विशेष ज्ञान के इतना सब कुछ होता रहता है। तो कल्पना कीजिए जिनको भाव ऊर्जा के उपयोग का परास्नातक स्तर का ज्ञान होगा वे कितना प्रभावकारी उपयोग करने में समर्थ होंगे?? तांत्रिक मांत्रिक भाव ऊर्जा का ही उपयोग करते हैं।
विज्ञान भी धीरे धीरे भाव ऊर्जा के महत्व को समझेगा।

02/01/2026

वासना (कामवासना या कामुक इच्छा) से मुक्ति
डॉ आनंद प्रदीक्षित
ये भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण विषय है। हिंदू धर्म, योग और भगवद्गीता के अनुसार वासना मन की सबसे बड़ी शत्रु है, जो आत्मा को बंधन में रखती है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं (गीता 16.21)। यह इच्छा अनियंत्रित होने पर ज्ञान को ढक लेती है और व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है (गीता 3.37-40)।
वासना से मुक्ति के मुख्य उपाय:
इंद्रियों पर संयम (Self-Control):
सबसे पहले इंद्रियों को वश में करें। गीता (3.41) में कहा गया है कि शुरुआत में ही इंद्रियों को नियंत्रित कर इस पाप के प्रतीक (काम) को नष्ट करें। योग सूत्रों में ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम) को यम का हिस्सा माना गया है, जो मन को शुद्ध करता है।
ध्यान और योग अभ्यास:
नियमित ध्यान (मेडिटेशन) से मन स्थिर होता है और वासना कमजोर पड़ती है। गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) में कृष्ण ध्यान का तरीका बताते हैं – शांत स्थान पर आसन लगाकर मन को एकाग्र करें। प्राणायाम और आसन से ऊर्जा ऊपर की ओर (कुंडलिनी जागरण) निर्देशित होती है, जिससे कामेच्छा नियंत्रित होती है।
आत्मज्ञान और बुद्धि का उपयोग:
गीता (3.43) में अंतिम उपाय बताया गया है – आत्मा को बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर, बुद्धि से मन को स्थिर कर इस दुर्जेय शत्रु (काम) को जीतें। आत्मा अमर और आनंदस्वरूप है, वासना केवल शरीर की है। जब यह ज्ञान गहरा होता है, तो इच्छाएं स्वतः कम हो जाती हैं।
भक्ति और उच्चतर रस का अनुभव:
भगवान की भक्ति में लगें। जब दिव्य प्रेम (भगवान का रस) मिलता है, तो सांसारिक रस फीका पड़ जाता है (गीता 2.59)। मंत्र जप (जैसे हरे कृष्ण महामंत्र), भजन, कीर्तन और भगवान का चिंतन करें। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मुझे में मन लगाओ, भक्त बनो, तो मुक्ति मिलेगी।
सात्विक जीवनशैली:
सात्विक भोजन (शुद्ध, सरल भोजन) लें।
व्यसनों (पॉर्न, उत्तेजक सामग्री) से दूर रहें।
ब्रह्म मुहूर्त में उठें, व्यायाम करें।
सत्संग (साधु-संतों का संग) करें।
कामुक विचार आएं तो उन्हें देखें बिना जजमेंट के, और भगवान की ओर मोड़ें।
महत्वपूर्ण बात:
वासना को दबाने से नहीं, बल्कि उच्चतर आनंद (आत्मानंद या भगवान का प्रेम) की ओर मोड़ने से मुक्ति मिलती है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है – धैर्य रखें, नियमित साधना करें। यदि बहुत कष्ट हो, तो किसी गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से परामर्श लें।
गीता का संदेश है: यह शत्रु कठिन है, लेकिन आत्मबल और भगवान की कृपा से जीता जा सकता है। जय श्रीकृष्ण!

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