27/11/2025
“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।’’—वेद, उपनिषद, पुराण एवं शास्त्रीय प्रमाण सहित एक समन्वित अध्ययन।
✓•१. प्रस्तावना : मरुतगण और ‘उनचास वायु’ का दार्शनिक आधार गोस्वामी तुलसीदास कृत सुन्दरकाण्ड के उक्त दोहे में “मरुत उनचास” का उल्लेख है। यह संख्या असंगत नहीं, बल्कि गहन वैदिक-उपनिषदात्मक परम्परा से ग्रहण की गई है।
वेदों में मरुतगण (वायु-तत्त्व के देवसमूह) ४९ या उसके आस-पास संख्या में वर्णित हैं। पुराणों में भी ४९ मरुतों का वर्णन मिलता है—ये द्यौ-प्रकृति में विचरण करने वाले, इन्द्र के सहयोगी और वायुवेग के नियन्ता माने जाते हैं।
रामकथा में जब हनुमान सागर-लङ्घन को उद्यत होते हैं, तभी हरि–प्रेरणा से उनकी शक्ति जाग्रत होती है, और उसी दिव्य-शक्ति-प्रकाश से मरुतगण सक्रिय होते हैं। तुलसीदास इस प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप से दिखाते हैं कि—
हनुमान ब्रह्माण्डीय वात/प्राण-तत्त्व के साथ संयुक्त हुए, देह की समस्त वायु-शक्तियाँ उनके भीतर जाग्रत हुईं, और वे आकाश में उड़ने की क्षमता प्राप्त करते हैं। इस शोध का उद्देश्य इस ऋषि-परम्परा को शास्त्रीय प्रमाण सहित विस्तृत रूप में व्यवस्थित करना है।
✓•२. वेदों में मरुतगण : उनकी संख्या और स्वरूप:
✓•२.१ ऋग्वेद में मरुतों का महत्व;
ऋग्वेद में मरुतों को—
तेजस्वी,
प्राणवर्धक,
पवनगति से भी तीव्र,
इन्द्र के अनिवार्य सहायक
बताया गया है।
ऋग्वेद १.३७.४—
“ये मरुतो मरुतां सन्ति शोभना, दिवो वृजने तिष्ठथो विभ्राजमानाः।”
(मरुत सुंदर, चमकदार, तेजस्वी हैं; वे आकाश में विचरण करते हैं।)
संख्या संबंधी संकेत :
ऋग्वेद २.३४.२ में मरुतों की संख्या ४९ के समकक्ष कही गई—
“सप्त सप्त शतं मरुताम्।”
यहाँ सात–सात की ‘सात पङ्क्तियाँ’ अर्थात् ७ x ७ = ४९ का संकेत स्पष्ट है।
✓•२.२ अथर्ववेद में:
अथर्ववेद ४.२२.७ में मरुतों को “ऋतुशः प्रवाहमान वायु–देवता” कहा गया है, जो ब्रह्माण्डीय गति के नियन्ता हैं।
✓•३. पुराणों का प्रमाण : ४९ मरुतों की उत्पत्ति-कथा
✓•३.१ भागवत पुराण ६.६.३३–३८
दिति व कश्यप की कथा प्रसिद्ध है। दिति ने इन्द्र से द्वेषवश गर्भ धारण किया, जिसे इन्द्र ने ४९ खण्डों में विभाजित किया। प्रत्येक खण्ड से एक-एक मरुत उत्पन्न हुआ। उससे मरुतों की संख्या ४९ पुराणों द्वारा भी स्थापित होती है।
✓•३.२ मार्कण्डेय पुराण:
मरुतों को “इन्द्र के सहचर, आकाशगत वायुशक्तियाँ” कहा गया है। इनके रथ, ध्वजा, मेघ–गर्जन जैसे शब्द वैदिक अर्थ में ऊर्जा–लहरों के संकेत देते हैं।
✓•४. उपनिषदों में वायु–प्राण तत्त्व : ४९ वायुओं की योग-आधारित व्याख्या
उपनिषदों में मरुतों का प्रत्यक्ष उल्लेख कम है, परन्तु प्राण–वायु के विस्तृत तत्त्वज्ञान से ‘मरुतगण’ का सूक्ष्म अर्थ प्रतिपादित होता है।
✓•४.१ प्राणों के पाँच मुख्य रूप (प्रश्नोपनिषद् ३.५):
•१. प्राण
•२. अपान
•३. समान
•४. व्यान
•५. उदान
ये पाँच प्राण ही आगे ४९ उपवायुओं में रूपान्तरित होते हैं।
✓•४.२ उपनिषदों में वायु को ब्रह्म कहा गया है।
छान्दोग्य उपनिषद् ७.१५.१—
“वायुरेव देवता सर्वभूतेषु प्रतिष्ठिता।”
(वायु समस्त जीवन का आधार है।)
बृहदारण्यक १.३.२३—
“प्राणो वै मरुतां सम्राट।”
(प्राण ही मरुतों का अधिपति है।)
अर्थात् मरुतगण प्राण के विविध विभाग हैं।
✓•५. आयुर्वेद में ‘मरुत’ और ‘वात’ : ४९ वायु का चिकित्सकीय आधार: चरक संहिता सूत्रस्थान १२ में वात-दोष = वायु-तत्त्व कहा गया है।
वात के ५ प्रमुख, और उनसे संबंधित ४४ उप-रूप वर्णित हैं।
योग–तन्त्र परम्परा में यह संख्या कुल ४९ मानी गई है।
चरक, सुश्रुत एवं अष्टाङ्गहृदय के अनुसार वायु—
गमन
वेग
उत्सर्जन
इन्द्रिय-चेष्टा
श्वसन
धारण
विभाजन
को नियंत्रित करता है। यही ४९ वायु-रूप विश्व-व्यापी “प्रकृति–वायविक ऊर्जा” के स्थानीय रूप हैं।
✓•६. योग–तन्त्र में ४९ वायु : हनुमान के ‘आकाश-गमन’ का आध्यात्मिक विज्ञान
हनुमान को वायुपुत्र कहा गया है।
उनका सागर-लङ्घन तभी संभव हुआ जब उनकी देह में—
पंचप्राण
पाँच उप-प्राण
नाड़ी तन्त्र की १० वायु
योगिक ८ तान्त्रिक वायु
सांख्य–वैशेषिक की ६ वायु
और आयुर्वेद की १५ सूक्ष्म वायुएँ
मिलकर एक पूर्ण ४९-तत्त्वीय वायु-शक्ति का संचार कर देती हैं।
यह वही शक्ति है जिसे तुलसीदास “मरुत उनचास चले” कहते हैं।
✓•६.१ हनुमान में ऊर्जा का जागरण: अट्टहास (अत्यधिक ओज) प्रकट होते ही—
कुण्डलिनी–प्रवाह सक्रिय होता है, व्यान वायु देह की समस्त नसों में शक्ति भरती है, उदान वायु ऊपर की ओर धकेलकर देह–भार को कम करती है, और प्राण–वायु शरीर को उड्डयन क्षमता देती है।
✓•७. वैज्ञानिक और सांख्यिक दृष्टि : ‘मरुत’ = ‘ऊर्जा–क्षेत्र / तरंग–समूह’ सांख्य दर्शन कहता है कि प्रकृति में गुण–संयोजन के ४९ रूप हैं:
७ स्थायी द्रव्य
प्रत्येक के ७ गुण
कुल ४९ गुण-समूह
यह संख्या वैदिक मरुत-गण (४९ वायु-रूप) से मेल खाती है।
तुलसीदास जब “मरुत उनचास” कहते हैं, तो वे सूक्ष्मतः ४९ ऊर्जा–समूहों का आह्वान कर रहे होते हैं।
✓•८. तुलसीकृत रामचरितमानस का गूढ़ प्रतीकवाद:
✓•८.१ “हरि प्रेरित” का अर्थ अर्थात् हनुमान का बल व्यक्तिगत शक्ति नहीं, बल्कि—
ब्रह्म–चैतन्य
विष्णुतत्त्व
सार्वभौमिक प्राण
परमात्मा की प्रेरणा
से उत्पन्न है।
✓•८.२ “मरुत उनचास चले” का अर्थ: इसका अर्थ तीन स्तरों पर समझा जाता है—
•(१) बाह्य-दैवी स्तर
देवताएँ (मरुत) हनुमान की सहायता हेतु आकाश-पथ में सक्रिय हुए।
•(२) दैहिक-प्राणिक स्तर
उनके भीतर की ४९ प्रकार की वायु–शक्तियाँ पूर्ण जाग्रत हुईं।
•(३) लौकिक-ऊर्जा स्तर
वात, व्यान, उदान आदि से सम्बद्ध समस्त जैवशक्ति हनुमान में चरम पर पहुँच गई।
✓•८.३ “अट्टहास करि गर्जा”:
यह केवल सूक्ष्म उत्साह नहीं, बल्कि—
दीप्त ओज
कुण्डलिनी-उद्गार
मनोबल का शिखर
प्राणशक्ति का विस्फोट
का द्योतक है।
✓•८.४ “कपि बढ़ि लाग अकास”:
जब शरीर में उदान वायु का पराकाष्ठा होती है, तब—
छलांग विशाल होती है
भार हल्का प्रतीत होता है
दिशा में एकाग्रता और वेग दोनो बढ़ जाते हैं
इसी योगिक विज्ञान को तुलसीदास काव्य में दैवी प्रतीकों द्वारा व्यक्त करते हैं।
✓•९. वेद–पुराण–योग का संगम : ४९ वायु और ४९ मरुत–देवता
३ परम्पराओं का स्पष्ट संगम मिलता है:
परम्परा ४९ संख्या का अर्थ तुलसीदास में उपयोग ऋग्वेद ७ × ७ = ४९ मरुत “मरुत उनचास”
उपनिषद ४९ उप-वायु/प्राण-रूप हनुमान के भीतर वायु जागरण
पुराण दिति–कश्यप से उत्पन्न ४९ मरुत दैवी सहायता का संकेत हनुमान में यह तीनों स्तर एक साथ सक्रिय होते हैं।
✓•१०. यज्ञीय अर्थ : अग्नि, वायु और मरुत
वैदिक अग्निहोत्र में—
अग्नि = तेज,
वायु = गति,
मरुत = अग्नि-वायु का सम्मिलित बल
माना गया है।
सुन्दरकाण्ड में हनुमान का सागर-लङ्घन यज्ञ-गति के समान है—
अग्नि-तत्त्व उनके भीतर ओज बनकर,
वायु-तत्त्व बल बनकर,
मरुतगण देह–ऊर्जा बनकर
उदित होते हैं।
✓•११. हनुमान = मानव-ऊर्जा का सर्वोच्च मॉडल ४९ वायु–तत्त्व वास्तव में मानव-चेतना के ४९ पहलू हैं—
•५ स्थूल (पंचप्राण)
•५ उप-स्थूल
•१० नाड़ी वायु
•८ तान्त्रिक वायु
•६ सांख्य वायु
•१५ आयुर्वेदिक सूक्ष्म-वायु
इन सबके पूर्ण जागरण का प्रतिरूप हनुमान हैं।
यही कारण है कि—
‘हरि प्रेरित’ = ‘परमचैतन्य से शक्ति प्राप्त’
‘मरुत उनचास चले’ = ‘सभी प्राण–वायु सक्रिय’
‘अकास’ = ‘सिद्ध अवस्था’
✓•१२. निष्कर्ष : तुलसीदास का वैदिक-उपनिषदात्मक संदेश इस दोहे का वास्तविक संदेश है—
•१. मानव में अपार प्राणशक्ति निहित है।
•२. जब यह शक्ति ‘हरि प्रेरित’ अर्थात् शुद्ध संकल्प से सक्रिय होती है, तब ४९ वायु—
चेतना,
मन,
शरीर,
इन्द्रिय,
नाड़ी,
ओज,
तेज
एक साथ कार्य करते हैं।
•३. इसी क्षण मनुष्य असम्भव को सम्भव कर सकता है।
•४. मरुत उनचास—सभी वैदिक वायु–तत्त्व—मानव का दैवी सामर्थ्य हैं।
•५. सुन्दरकाण्ड का यह प्रसंग योग–वेद–उपनिषद–पुराण का एकीकृत, गहन प्रतीकवाद है।
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