आर्यम्

आर्यम् || ओ३म् ||
गर्व से कहो हम आर्य है |
आर्य?

30/11/2025

आप सभी को नमस्ते
🙏
🌄 सुप्रभात 🌄
प्रातः जागरण, अभिवादन, नित्य कर्म, सन्ध्योपासना-हवन, स्वाध्याय करना फिर आवश्यक कार्य में लग्न हो जाना यही आदर्श जीवन शैली है।

26/11/2024
02/11/2024

गोवर्धन पर्वत धारण करना क्या था?

#डॉ_विवेक_आर्य

गोवर्धन त्यौहार बनाया जा रहा हैं। गोवर्धन के विषय में कथा प्रचलित है। एक बार वृन्दावन में बहुत वर्षा हुई। गौ और ग्वालों के प्राण संकट में पड़ गए। चारों और भारी जल भराव हो गया। वृन्दावन वासी श्रीकृष्ण के पास इस समस्या के समाधान के लिए उपस्थित हुए। श्री कृष्ण जी ने परामर्श दिया कि गोवर्धन पर्वत पर सभी अपनी गौ-धन लेकर चले। वहां पहुंच कर श्री कृष्ण जी ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन के पर्वत को उठा लिया। उसके नीचे सभी सात दिन तक सुरक्षित वर्षा से बचे रहे। इस प्रचलित कथा के स्थान पर युक्ति एवं तर्कसंगत कथा इस प्रकार हैं।

पंडित चमूपति जी अपनी पुस्तक श्री कृष्ण चरित्र में मत भी इसी प्रकार हैं।

श्रीकृष्ण ने समस्या का यही समाधान सोचा कि उन्हें गोवर्धन पर्वत पर ले जाया जाए, उन्होंने यही किया। उन सबको लेकर वहाँ चले गये। पर्वत की खुदाई कराई गई। वृक्ष गिराये गये। साँप, बिच्छू, चीता आदि से वन को खाली कराया गया। सारी बस्ती को गायों के ग्वालों समेत वहीं आवास करा दिया गया। सात दिन तक लगातार वर्षा होती रही, श्रीकृष्ण रात-दिन वहीं डटे रहे। वर्षा की रोकथाम के लिए यज्ञ कराया गया। यही उनका गोवर्धन पर्वत धारण करना था अर्थात गौ का वर्धन अर्थात रक्षा एवं संवर्धन करना।
जो लोग गोवर्धन को श्री कृष्ण जी के चमत्कार के रूप में स्मरण करते हैं। वह वेदों में वर्णित ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव से परिचित नहीं हैं। वेदों के अनुसार निराकार ईश्वर में यह समस्त जगत समाहित हैं। अनगिनत पृथ्वी जैसे गृह और आकाशगंगा उसने अपने भीतर उठा रखी हैं। सृष्टि के कण कण में विद्यमान ईश्वर के लिए भला एक पर्वत को उठाना कौन सी बड़ी बात हैं? यह तो उनके गुणों का अवमूल्यन करना हैं। इसलिए गोवर्धन को उँगली पर उठाना एक अपरिपक्व कल्पित कथन मात्र हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण जी की महिमा उनके गुणों को धारण करने में है। हम जीवन में यज्ञ, हवन करें, योग करें, संयम रखे, नियमित ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना करे, वेदों का स्वाध्याय एवं पठन-पाठन करे। एक ईश्वर की उपासना करें। गो पालन करें।

यही गोवर्धन त्यौहार बनाने का मूल उद्देश्य है।

30/10/2024

महर्षि दयानंद सरस्वती का अमर बलिदान
लेखक - स्वामी भीष्म जी महाराज घरोंडा वाले
अंतिम करने लगे उपदेश महर्षि दयानंद दण्डी!! टेक
प्रकृति परिवर्तनशील इस चक्कर में आना नहीं।
वेद की शिक्षा को याद राखना भुलाना नहीं,
ज्ञान से हो मुक्ति ओर रास्ता अपनाना नहीं,
मुक्ति के बिन जीव का ये मिटे आना जाना नहीं,
आठंगो का पालन करो भूल कर बिसराना नहीं,
जड़ पूजा है अन्धकार, समय को गंवाना नहीं
अज्ञान है कठिन क्लेश जिसे पाते हैं पाखंडी!! 1!!
है मेरी नजरो के आगे काम एक जरुरी आज,
दो वेदों का भाष्य बाकी, इच्छाएं अधुरी आज,
जीवन की लीला तो पुरी होने वाली आज,
सबसे पहले आप जगत में वेदों का प्रचार करना,
विधवाओं की रक्षा करना अनाथो से प्यार करना,
मरती है हजारों गऊवें इनका भी उद्धार करना,
करते दुराचार हमेश लाखों हिजड़े ओर रण्डी!!2!!
आर्य वही जो जीव मात्र की भलाई करे,
प्रेम का प्रचार करे झगड़ा ना लड़ाई करे,
शिखा सूत्र संध्या हवन कर्म ये सुखदाई करे,
आर्य कहावे मिले जब भी रस्ते में नमस्ते करे,
जो भुले भटके शुद्ध करके सीधे रस्ते करे,
वेदों को छपवावे ओर मुल्य में भी सस्ते करे,
ये है कर्म विशेष मिटे दुराचार की मण्डी!! 3!!
अच्छा ना विदेशी राजा बस अपना ही राज रहे,
वेद वेत्ता राजा होवे जिसके सिर पै ताज होवे
मनु की नीती हो जग में ऋषियों का समाज रहे,
इतनी कहकर ऋषि देव ओ३म् ओ३म् गाने लगे,
नेत्र बन्द हो गये और श्वास रुक रुक आने लगे,
आर्य पुरुष जितने थे आंसुवे बहाने लगे,
भीष्म घटना कर पेश ना झुकै ओ३म् की झण्डी!! 4!!

29/10/2024

ओ३म्...
आज तथाकथित "धनतेरस" भनेर भाँडा-कुडा तथा गर-गहना किन्नका लागि होडबाजी गर्ने दिन हैन। आज आरोग्यदाता वैद्म धन्वंतरि ज्यूको जयंती हो जसले यो संसारलाई आयुर्वेदको ज्ञान दिनुभयो।
हाम्रो समाजका पाखण्डी पण्डितहरुले व्यापार गर्ने नियतले जनतामा भ्रम सिर्जना गरेर "धनवंतरी" जस्तो पवित्र शब्दलाई अपभ्रंश गर्दै "धनतेरस" बनाए।
धनतेरस वास्तवमा ऋषि धन्वंतरिको जन्मदिन हो। उनि आयुर्वेदका जनक हुन। तर विडम्बना भनौं पश्चिमी मानसिकता बोकेका दासहरुले यो दिनको वास्तविक अर्थ बिर्सिदिए र यसलाई वस्तु किन्ने दिन बनाइदिए। यो हाम्रा लागि दुःख र दुर्भाग्य हो।
सनातन परम्पराको विज्ञानलाई नबुझ्नाले आज समाजमा यस्ता अनेकौं खालका पाखण्ड चलेका छन् ।
ऋषिले भनेकाछन् कि आयुर्वेदको नियम पालन गर्‍यौ भने तिम्रो जीवनमा स्वास्थ्य रूपी वास्तविक धन आउनेछ।
भनिन्छ- "स्वास्थ्य नै धन हो" र यही नै सुखको मूल पनि हो र वास्तविक धन पनि हो। बाकि त सब मोह माया हो। हामीले यसलाई बचाउन सक्यौं भने संसारको सबैभन्दा ठूलो धन बचाउनेछौँ ।
भगवान धन्वन्तरि जयंतीको देश-विदेशमा रहनुहुने समस्त सनातनीहरुमा हार्दिक शुभकामना..!
🚩🚩🚩🚩🚩जय सनातन ...!🚩🚩🚩🚩🚩

28/10/2024

ओ३म्...
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या
वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् । चाणक्य नी० १०.१३

भावार्थ: ब्राह्मणरुपी वृक्षको जरो सन्ध्या हो, वेद त्यसका हाँगा हुन्, धर्मकर्म उसका पात हुन्।
अतः प्रयत्नपूर्वक जराको रक्षा गर्नु पर्दछ, किनकि जरो काटियो भने या नष्ट भयो भने हाँगा र पात पनि रहँदैनन्। ।
जय सनातन...!

22/10/2024

22.10.2024
"आजकल लोगों में सहनशक्ति बहुत कम हो गई है। इसीलिए छोटी-छोटी बात पर लोग आपस में झगड़ पड़ते हैं। यह अच्छा नहीं है।"
"यदि आप अपने घर में परिवार में समाज में देश में सुख शांति से जीना चाहते हैं। तो इसके लिए एक दूसरे को समझना बहुत आवश्यक है।" "अपनी बात कहने में जल्दबाजी न करें। दूसरे व्यक्ति की बात को शांति से सुनें, फिर उसका ठीक-ठीक अभिप्राय समझने का प्रयास करें, कि वह क्या कहना चाहता है। यदि उसकी बात को ठीक से समझ कर फिर आप अपना अभिप्राय बताएं, तो आप लोगों में आपस में झगड़ा लगभग नहीं होगा। और यदि कभी कहीं होगा भी, तो वहां एक दूसरे को सहन कर लेना भी अच्छा है।"
"छोटी-छोटी बात पर झगड़ा करके रिश्ते तोड़ देना, यह कोई बुद्धिमता की बात नहीं है।" "हां, जहां अत्याचार की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाए, और सीमा पर होने लगे, तब जाकर अलग होने की बात सोचनी चाहिए, उससे पहले नहीं। यदि आप इस प्रकार से प्रयत्न करेंगे, तभी आप ठीक ढंग से अपना जीवन जी पाएंगे। क्योंकि एक दूसरे को सहन करने से ही आप का जीवन सुखमय ढंग से चल पाएगा, अन्यथा नहीं।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

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Ballabgarh
121004

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