02/09/2026
ोषित_संन्यासी_श्रद्धेय_केदार_नाथ_की_विदाई —
विश्वात्म चेतना परिवार के निष्ठावान सेवक, सद्गुरुदेव के कृपापात्र शिष्य तथा सबके प्रिय केदार भाई को भावपूर्ण श्रद्धांजलि
“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।”
अर्थात् आसक्ति और स्वार्थ से मुक्त होकर निरंतर अपने कर्तव्य का पालन करना ही श्रेष्ठ कर्मयोग है।
दिनांक- 2 सितम्बर 2026, बुधवार को विश्वात्म चेतना परिवार ने ऐसे ही एक मौन कर्मयोगी, निष्ठावान सेवक तथा पूज्यपाद सद्गुरुदेव के निष्कपट एवं कृपापात्र शिष्य श्रद्धेय केदार नाथ सा को खो दिया।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है। ऐसा अनुभव हो रहा है मानो विश्वात्म विद्या मंदिर, बलांगीर की सेवा-व्यवस्था का एक सुदृढ़ स्तंभ अचानक हमारे बीच से हट गया हो।
केदार भाई का जीवन किसी पद, प्रतिष्ठा या प्रचार से नहीं, बल्कि गुरु-सेवा, बाल-सेवा, संस्था-सेवा, आरोग्य-सेवा, साधना और निष्काम कर्म से परिभाषित था।
जिस बालक के लिए गाँव वालों ने कहा था— “स्वामीजी, इस बच्चे को अपने साथ ले जाइए”
केदार भाई बचपन से ही सिकलिंग रोग से पीड़ित थे। सन् 1993 की वह घटना आज विशेष रूप से स्मरण हो रही है। पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी जब छत्तीसगढ़ के लुकापड़ा गए थे, तब केदार की शारीरिक स्थिति देखकर गाँव के लोग उसके भविष्य को लेकर अत्यंत चिंतित थे।
गाँव वालों ने सद्गुरुदेवजी से आग्रह किया था—
“स्वामीजी! इस बच्चे को आप अपने साथ ले जाइए। यह गाँव में रहेगा तो शायद बच नहीं पाएगा। आपके पास रहेगा तो अच्छा रहेगा, बच जाएगा।”
सद्गुरुदेवजी उस बालक को अपने साथ बलांगीर ले आए।
कौन जानता था कि उस दिन सद्गुरुदेव के साथ आया वह अस्वस्थ बालक आगे चलकर तीन दशकों से अधिक समय तक गुरुकार्य का एक सुदृढ़ आधार और निष्ठावान प्रहरी बन जाएगा!
उस दिन से आश्रम ही उसका घर बन गया, गुरुकार्य ही उसका कर्म और विश्वात्म चेतना परिवार ही उसका अपना परिवार।
रोग से संघर्ष चलता रहा, लेकिन सेवा कभी नहीं रुकी
सिकलिंग रोग ने जीवनभर केदार भाई की परीक्षा ली।
बीच-बीच में अनेक बार उनकी स्थिति गंभीर हुई। उन्हें बुर्ला तथा बलांगीर मेडिकल में कई बार भर्ती होना पड़ा और आवश्यकता पड़ने पर रक्त भी चढ़ाया गया।
उनके रोग का लंबा इतिहास और जीवनचर्या देखकर डॉक्टर भी कई बार आश्चर्य व्यक्त करते थे कि सिकलिंग जैसी गंभीर जन्मजात बीमारी के बावजूद केदार इतने वर्षों तक इतना सक्रिय, परिश्रमी और सेवामय जीवन कैसे जी रहे हैं!
हम सबके लिए इसका उत्तर था—सद्गुरुदेव की कृपा, उनका अटूट गुरु-विश्वास, नियमित साधना, अनुशासित जीवन और अद्भुत मनोबल।
अस्पताल से लौटने के बाद वे फिर अपने काम में ऐसे लग जाते थे, मानो कुछ हुआ ही न हो।
रोग उन्हें अस्पताल तक पहुँचा सकता था, लेकिन सेवा से अलग नहीं कर सकता था।
शिवानंद आरोग्य मंदिर में आरोग्य-सेवा
केदार भाई की सेवा केवल विद्यालय, कुटीर या आश्रम तक सीमित नहीं थी । दीर्घकाल तक विश्वात्म चेतना परिषद द्वारा संचालित होम्योपैथिक चिकित्सा केंद्र ‘शिवानंद आरोग्य मंदिर’ में वे दिवंगत डॉ. मार्कण्ड साहू जी को निष्ठापूर्वक सहयोग करते रहे।
डॉक्टर के साथ लंबे समय तक रोगी-सेवा करते-करते उन्होंने होम्योपैथिक चिकित्सा के संबंध में भी बहुत-सा व्यावहारिक अनुभव अर्जित कर लिया था।
किसी आपात स्थिति में यदि कोई अस्वस्थ व्यक्ति उनके पास आता, तो वे उसे कभी निराश नहीं करते थे। अपने अनुभव और सेवा-भाव से यथासंभव सहयोग करते थे। अनेक अवसरों पर उनके समयोचित सहयोग और सेवा से रोगियों को राहत भी मिलती थी।
यह उनके व्यक्तित्व का अत्यंत स्पर्शकारी पक्ष था—जो व्यक्ति स्वयं जीवनभर रोग से संघर्ष करता रहा, वही किसी दूसरे का रोग और कष्ट देखकर चुप नहीं रह पाता था।
अपनी पीड़ा भूलकर दूसरे की पीड़ा में सहभागी होना, सेवा का हाथ बढ़ाना और आरोग्य के लिए सहयोग करना—केदार भाई के सेवामय जीवन का यह भी एक उज्ज्वल अध्याय था।
नन्हे-मुन्ने बच्चों के स्नेहमय संरक्षक
ठीकादारपाड़ा स्थित विश्वात्म विद्या मंदिर एवं कुटीर के सुयोग्य सुपरवाइजर के रूप में केदार भाई ने अत्यंत निष्ठापूर्वक अपनी जिम्मेदारी निभाई।
विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों को वे केवल छात्र-छात्रा नहीं मानते थे। उन्हें अपने स्नेह और संरक्षण में रखते थे। बच्चों की छोटी-छोटी आवश्यकताओं से लेकर उनकी सुरक्षा, भोजन अनुशासन तक हर बात पर उनकी दृष्टि रहती थी।
अभिभावकों के साथ भी उनका संबंध अत्यंत मधुर और विश्वासपूर्ण था।
इतने लंबे सेवाकाल में उनके विरुद्ध किसी प्रकार की शिकायत या विरोध का स्वर सुनने को नहीं मिला।
वे वास्तविक अर्थों में अजातशत्रु थे।
प्रभात से रात्रि तक सेवा, उसके बाद साधना
केदार भाई का दिन प्रातःकाल से प्रारंभ हो जाता था।
भोर से लेकर रात्रि लगभग 9 बजे तक विद्यालय, विश्वात्म कुटीर और संस्था की विभिन्न जिम्मेदारियों को वे बिना किसी शिकायत के सुचारु रूप से निभाते थे।
इसके साथ-साथ चंद्रशेखर भवन की देखभाल का दायित्व भी वे उसी आत्मीयता के साथ निभाते थे।
लेकिन रात्रि 9 बजे उनका दिन समाप्त नहीं होता था।
दिनभर की सेवा के बाद वे नियमित रूप से ध्यान, जप, पूजा और महामृत्युंजय मंत्र का जप करते थे।
दिन में कर्मयोग, रात में साधना—यही उनका जीवन था।
उनके हाथ की स्वादिष्ट रसोई भी सभी को मोहित करती थी। स्वयं भोजन बनाकर प्रेम से दूसरों को खिलाने में उन्हें विशेष आनंद मिलता था।
आस-पड़ोस के लोगों के साथ भी उनका व्यवहार आत्मीय और पारिवारिक था।
सद्गुरुदेव के निष्कपट और विश्वस्त शिष्य
केदार भाई पूज्यपाद सद्गुरुदेव के अत्यंत प्रिय और कृपापात्र शिष्य थे।
उनके मन में छल-कपट नहीं था। गुरु के प्रति अटूट विश्वास, संस्था के प्रति निष्ठा, व्यवहार में सरलता और जीवन में सदाचार उनकी पहचान थी।
आचार्य एवं आचार्या के साथ उनका संबंध अत्यंत आत्मीय, श्रद्धापूर्ण और पारिवारिक था।
वे कभी स्वयं को आगे नहीं रखते थे। पद मिले या न मिले, कोई प्रशंसा करे या न करे—उनके लिए गुरुकार्य ही सबसे बड़ा सम्मान था।
इसलिए मैं उन्हें प्रायः कहा करता था—
“केदार एक अघोषित संन्यासी है।”
उन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास धारण नहीं किया था, परंतु घर-द्वार से दूर रहकर तीन दशकों से अधिक समय तक गुरुकार्य में स्वयं को समर्पित कर देना, निजी सुख-सुविधाओं की चिंता न करना, रोग और कष्ट सहते हुए निरंतर सेवा करते रहना और रात्रि में साधना-जप में लगे रहना—क्या यह किसी तपस्या से कम था?
श्रीमद्भगवद्गीता का यह वचन उनके जीवन में साकार होता दिखाई देता है—
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
अर्थात् आसक्ति का त्याग कर योग में स्थित होकर अपने कर्तव्य का पालन करो।
केदार भाई ने इस उपदेश को कहा कम, अपने जीवन में जिया अधिक।
अंतिम यात्रा में गुरु और संस्था का सम्मान
आज जब उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, पूरा वातावरण भावविह्वल हो उठा।
पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी ने उनके पार्थिव शरीर पर वस्त्र एवं पुष्पमाला अर्पित कर अपने इस प्रिय और विश्वस्त शिष्य को अंतिम सम्मान प्रदान किया।
विश्वात्म विद्या मंदिर के छात्र-छात्राओं, आचार्यों, विश्वात्म चेतना परिषद के सदस्यों,शिष्यों, सेवकों तथा अनेक श्रद्धालुओं ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।
जिन नन्हे बच्चों को उन्होंने वर्षों तक स्नेह और संरक्षण दिया, जिन आचार्यों/ आचार्याओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया, जिन अभिभावकों का विश्वास अर्जित किया और जिस संस्था को अपने जीवन के तीन दशकों से अधिक समय समर्पित किया—आज वही विशाल परिवार उन्हें अंतिम प्रणाम कर रहा था।
यह केवल एक अंतिम विदाई नहीं थी।
यह एक सेवामय जीवन के प्रति संपूर्ण विश्वात्म चेतना परिवार की कृतज्ञता थी।
केदार भाई! आपकी सेवा बोलती रहेगी
आज हमने केवल विश्वात्म विद्या मंदिर के एक सुपरवाइजर को नहीं खोया है।
हमने एक सच्चे शिष्य को खोया है।
एक सच्चे भाई को खोया है।
बच्चों ने अपना स्नेहमय संरक्षक खोया है।
विश्वात्म विद्या मंदिर ने अपना एक निष्ठावान सेवक और सुयोग्य संचालक खोया है।
शिवानंद आरोग्य मंदिर ने एक निष्ठावान आरोग्य-सेवक खोया है।
विश्वात्म चेतना परिवार ने अपना एक निष्कपट, विश्वस्त और सदाचारी साथी खोया है।
सन् 1993 में जिस अस्वस्थ बालक के लिए गाँव वालों ने सद्गुरुदेवजी से कहा था—“स्वामीजी, इसे अपने साथ ले जाइए; आपके पास रहेगा तो बच जाएगा”—उसी बालक ने सद्गुरु-सान्निध्य में तीन दशकों से अधिक समय तक सेवा, साधना और समर्पण का जीवन जीकर एक अद्वितीय उदाहरण स्थापित कर दिया।
उनका जीवन स्वयं सद्गुरु-कृपा की एक जीवंत कथा है।
केदार भाई हमें सिखा गए कि जीवन कितना लंबा है, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह जीवन किसके लिए और किस प्रकार जिया गया।
उन्होंने बिना प्रचार के सेवा की,
बिना अपेक्षा के स्नेह दिया,
बिना शिकायत के पीड़ा सही,
बिना पद की आकांक्षा के जिम्मेदारियाँ निभाईं,
स्वयं अस्वस्थ होकर भी दूसरों के आरोग्य के लिए सेवा की
और स्वयं को पूर्णतः गुरुकार्य में समर्पित कर दिया।
इसलिए आज उनकी विदाई के समय मेरे हृदय से फिर वही शब्द निकलते हैं—
“केदार भाई एक अघोषित संन्यासी थे।”
केदार भाई! आज आपका पार्थिव शरीर हमारे बीच नहीं है, लेकिन आपकी निष्ठा विश्वात्म विद्या मंदिर के प्रांगण में, आपका स्नेह बच्चों की स्मृतियों में, आपकी विश्वसनीयता सहकर्मियों के हृदय में, आपकी आरोग्य-सेवा रोगियों की कृतज्ञता में, आपकी साधना आश्रम के वातावरण में और आपकी सेवा विश्वात्म चेतना परिवार के इतिहास में सदैव जीवित रहेगी।
पूज्यपाद सद्गुरुदेव की अहैतुकी कृपा से उनकी पुण्यात्मा को श्रीगुरुचरणों में चिर आश्रय प्राप्त हो।
विश्वात्म चेतना परिवार अपने इस अमूल्य सेवक, प्रिय भाई, आरोग्य-सेवक और मौन कर्मयोगी को अश्रुपूरित नेत्रों से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
स्वामी सत्यवेदानंद सरस्वती
महासचिव
विश्वात्म चेतना परिषद
Swami Satyavedananda Saraswati