25/09/2018
एससी-एसटी एक्ट में आरोपी के क्या हैं कानूनी अधिकार,आरोपी कैसे करें अपना बचाव
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एससी-एसटी एक्ट क्या हैं?
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सबसे पहले तो यह समझें कि एससी-एसटी एक्ट क्या हैं? SC/ST Act को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया था। यह नियम पूरे भारत में 30 जनवरी 1990 से लागू किया गया। यह अधिनियम उस हर एक व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नही हैं तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएँ हैं।
यहाँ गौर करने वाली बात यह हैं कि इसमें प्रत्येक धारा के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान हैं। SC / ST Act के तहत अपराधों के लियें दोषी व्यक्ति को 6 माह से लेकर 5 साल या इससे भी ज़्यादा की सजा के साथ अर्थदण्ड (फाइन) का भी प्रावधान हैं। क्रूरतापूर्ण हत्या के अपराध के लिए मृत्युदण्ड की सजा हैं।
एससी-एसटी एक्ट लगने पर क्या हैं आरोपी के कानूनी अधिकार
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सबसे पहले सम्बंधित थाने से यह जानकारी ले कि एससी-एसटी एक्ट की कौन सी धारा के अंतर्गत एफआईआर दर्ज की गई हैं। अगर उन दर्ज धाराओं में सात साल से कम की सजा हैं तो उनमें बिना नोटिस के गिरफ्तारी नहीं हो सकती हैं। ऐसे मामलों में अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन किया जाएगा।
क्या है अरनेश कुमार मामले में दिशानिर्देश
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सुप्रीम कोर्ट ने अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में दो जुलाई 2014 के अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि सीआरपीसी की धारा 41(1) के तहत जिन मामलों में अभियुक्त की गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है, ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी अभियुक्त को एक नोटिस भेजकर तलब करेगा। यदि अभियुक्त नोटिस का अनुपालन करता है तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्यता का कारण दर्ज नहीं करता। और यह मजिस्ट्रेट के परीक्षण का विषय होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का पालन एससी-एसटी एक्ट में भी किया जायेगा।
हाल में एक याचिका न्यायमूर्ति अजय लाम्बा व न्यायमूर्ति संजय हरकौली की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए पेश हुई। यह याचिका गोण्डा के राजेश मिश्रा ने दाखिल की थी। इसमें अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण पर संशोधित अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी को चुनौती दी गई थी। साथ ही विवेचना के दौरान याची की गिरफ्तारी न किए जाने की भी मांग की गई थी। संसद ने अधिनियम में संशोधन 17 अगस्त 2018 को पास किया था और राजेश मिश्रा के खिलाफ एफआईआर इसी संशोधित अधिनियम के तहत दर्ज हुई थी।
न्यायालय ने मिश्रा की याचिका को यह कहते हुए निस्तारित कर दिया कि प्राथमिकी में जो धाराएं लगी हैं, उनमें सजा सात साल तक की ही है। लिहाजा गिरफ्तारी से पूर्व अरनेश कुमार मामले में दिए दिशानिर्देशों का पालन किया जाए। इसका मतलब हैं कि अगर सात साल से कम की सजा वाली धाराएं लगी हैं तो पहले तो आपको पुलिस गिरफ्तार नही करेगी और अगर फिर भी कर लेती हैं तो आप कोर्ट से तुरन्त जमानत ले सकते हैं। इसमे धारा अग्रिम जमानत के साथ धारा 482 का लाभ लेते हुए पुलिस कारवाई रुकवाने का भी प्रावधान हैं।
एससी-एसटी एक्ट फर्जी पाए जाने पर पीड़ित के अधिकार
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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अदालत में झूठा बयान देना या पुलिस के सामने झूठे एफआईआर दर्ज कराने के मामले में कानून में ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त प्रावधान है। जो ST/SC एक्ट के तहत झूठा मामला पाए जाने पर भी लागू होता हैं। ऐसे मामलों में आईपीसी की धारा-182 के तहत केस दर्ज किया जाता है। किसी भी मामले में झूठा केस दर्ज कराने वाले के खिलाफ आईपीसी की धारा-182 के तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर छह महीने तक कैद का प्रावधान किया गया है। आप आईपीसी की धारा-193 का भी उपयोग उक्त शख्स के खिलाफ कर सकते है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर 7 साल तक कैद का प्रावधान है। ऐसा झूठा बयान जिससे कि किसी शख्स को उम्रकैद तक हो सकती हो तो वैसे मामले में आईपीसी की धारा-195 के तहत केस दर्ज किया जाता है। इन धाराओं के बाद आप मानहानि का दावा भी दीवानी अदालत में कर सकते हैं और मुआवजा हासिल कर सकते हैं।
एससी-एसटी एक्ट में एक आखिरी झूठ यह फैलाया जा रहा हैं कि इस मामले में इंवेस्टिगेटिंग अफसर (IO) और मामले की सुनवाई करने वाला जज दलित होंगे, जो कि सरासर झूठ हैं।