Jayant SEN Sadhna KUTIR

Jayant SEN Sadhna KUTIR HE STAYED MOUN AND WROTE ON THE POWER OF MOUN BEING SILENT WHICH ARE INCRIBED ON THE WAYS OF THIS KUTIYA.

THIS PAGE IS ALL ABOUT JAIN RASHTRA SANT SHREE MAD VIJAY JAYANT SEN SURIJI (MADHUKAR) N HIS LIFES FIRST N THE ONLY MOUN SADHNA WHICH HE CONTINUED FOR 30 DAYS DURING HIS BAGH CHATURMAS IN THE YEAR 2004.

"जहाँ जीत से ज्यादा हार मिले, उसी का नाम संसार है।"
31/05/2026

"जहाँ जीत से ज्यादा हार मिले, उसी का नाम संसार है।"

गुरुप्रसादीखेल में कोई जीतता है, कोई हारता है। कोई हंसता है, कोई रोता है। लेकिन जो खेल को खेल की तरह (मात्र एक खेल के रू...
30/05/2026

गुरुप्रसादी
खेल में कोई जीतता है, कोई हारता है। कोई हंसता है, कोई रोता है। लेकिन जो खेल को खेल की तरह (मात्र एक खेल के रूप में) देखता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम देखते-देखते (भावनात्मक रूप से) जुड़ जाते हैं, इसीलिए समस्या आती है। जुड़ाव के कारण ही कौन जीतता है और कौन हारता है, इसका निर्णय हम खुद करने लगते हैं। इसमें अगर हमारी धारणा के अनुसार परिणाम नहीं आता, तो हम खुद को हारा हुआ महसूस करते हैं। उसके बाद क्या स्थिति होती है, वह आप जानते ही हैं। खेल को सिर्फ देखें, उसे (गंभीरता से) खेलें नहीं। फिर चाहे वह IPL ही क्यों न हो।

30/05/2026
"यदि जगतपिता (ईश्वर) का हाथ हमारे सिर पर हो, तो हमें चिंता क्यों करनी चाहिए?"
30/05/2026

"यदि जगतपिता (ईश्वर) का हाथ हमारे सिर पर हो, तो हमें चिंता क्यों करनी चाहिए?"

29/05/2026

बीतें जन्म कई संयम बिना, ना लक्ष्य कोई था अंतर सुना,
लिपटे कषायों में संयम बिना, दिन रैन चाह बस सिद्धशिला,
अब सौपे हैं हम जीवन, गुरु निपुण हाथों में,
हर एक सास अब समर्पित, शासन शरण में,
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

प्रेरणामंत्र"अगर आपको अपने प्राण प्रिय हैं,तो फिर दूसरों के प्राण क्यों लेते हो!हे जीव! इतना तो समझो,यह मेरे वीर प्रभु (...
28/05/2026

प्रेरणामंत्र
"अगर आपको अपने प्राण प्रिय हैं,तो फिर दूसरों के प्राण क्यों लेते हो!हे जीव! इतना तो समझो,यह मेरे वीर प्रभु (भगवान महावीर) की वाणी है।"

गुरुप्रसादीहिंसा ही यह संसार है। किसी को दुःख दिए बिना एक दिन भी जीना संभव नहीं है, ऐसा यह संसार है। सभी पापों की जड़ भी...
27/05/2026

गुरुप्रसादी
हिंसा ही यह संसार है। किसी को दुःख दिए बिना एक दिन भी जीना संभव नहीं है, ऐसा यह संसार है। सभी पापों की जड़ भी हिंसा ही है। इसीलिए हिंसा से बचने के लिए प्रभु ने व्रत और नियम बताए हैं। सभी व्रतों का पालन भी हिंसा से बचने के लिए ही है।जिस हिंसा से बचना संभव नहीं है, उसके लिए शास्त्रों में आलोचना, प्रायश्चित, प्रतिक्रमण, जयणा, तप, नियम, अभिग्रह आदि कई उपाय बताए गए हैं। यदि आपको दुःख पसंद नहीं है, तो दूसरों को दुःख न दें और यदि शक्ति हो, तो दूसरों के दुःख को दूर करें। आने वाले कल में किसी जीव को बचाने का प्रयत्न करें।

प्रेरणामंत्रजीवन में किसी रोकने या टोकने वाले को अपने पास (सिर पर) रखना, क्योंकिमाली के बिना बगीचा उजड़ जाता है, औरगुरु ...
27/05/2026

प्रेरणामंत्र
जीवन में किसी रोकने या टोकने वाले को अपने पास (सिर पर) रखना, क्योंकिमाली के बिना बगीचा उजड़ जाता है, औरगुरु के बिना जीवन भी जड़ (निर्जीव/चेतनाहीन) बन जाता है।

गुरुप्रसादीऐसी भीषण गर्मी में पशु-पक्षियों के पास सहन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कोई प्यास से, कोई भूख से, तो कोई...
25/05/2026

गुरुप्रसादी
ऐसी भीषण गर्मी में पशु-पक्षियों के पास सहन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कोई प्यास से, कोई भूख से, तो कोई अत्यधिक गर्मी से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ऐसी परिस्थिति तक पहुँचाने वाले कर्म कैसे बंधे?शरीर के प्रति आसक्ति (मोह) के कारण हमारे द्वारा किए जाने वाले अनगिनत पापों का परिणाम क्या होगा, ऐसा सोचने का न तो समय है, न समझ है और न ही भय है? गर्मी से बचने के साधनों का अत्यधिक उपयोग, और उसके सामने इन पापों की पीड़ा नहीं, गर्मी से पीड़ित जीवों का विचार नहीं, परिणाम में क्या आएगा

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