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अयोध्या में आयोजित होने वाली तीन दिवसीय भव्य दीपोत्सव-2025 की तैयारियों की कुछ झलकियां...   #दीपोत्सव
17/10/2025

अयोध्या में आयोजित होने वाली तीन दिवसीय भव्य दीपोत्सव-2025 की तैयारियों की कुछ झलकियां...

#दीपोत्सव

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ...तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।यह जानकर सुखद ...
12/04/2025

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ...तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।

यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे 🙏 मात्र तुलसी पत्र लेते थे।जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।

अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे।डोंगरे जी महाराज कलयुग के दानवीर कर्ण थे।

उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे।-स्वंय कुछ नहीं लिया|

डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम-रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था-'देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ 108 भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।

इसके बाद जहाँ -जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।108 भागवत पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए।तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले-' अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।
इस पर उनकी पत्नी ने कहा,'आपके श्रीमुख से 108 भागवत श्रवण करने के बाद मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है,इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है'।धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।

डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत रस बरसाते थे।
पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला।वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे- रतिभाई पटेल जी |
उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ?फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल- पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।

सेठ रतिभाईपटेल ने रोते हुए बताया था....
जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था किपत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं।

हम उसी समय मर क्यों न गए l
फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।

* ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटि-कोटि नमन भी कम है ।।

जय जय श्री राम राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे|सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ||श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें...
06/04/2025

जय जय श्री राम

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे|
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ||

श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें ।

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥भारत के प्राण, मानवता के आदर्श, धर्म के सर्वोत्तम स्वर...
06/04/2025

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥

भारत के प्राण, मानवता के आदर्श, धर्म के सर्वोत्तम स्वरूप, हमारे आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के पावन अवतरण दिवस 'श्री राम नवमी' की समस्त रामभक्तों एवं प्रदेश वासियों को मंगलमय शुभकामनाएं!

भारत की आस्था, मर्यादा और दर्शन में राम हैं। राम भारत की 'अनेकता में एकता' के सूत्र हैं।

जन-जन की आस्था के केंद्र प्रभु श्री राम की कृपा चराचर जगत पर बनी रहे। सबका कल्याण हो, यही प्रार्थना है।

श्री राम नवमी का यह पावन पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की शिक्षाओं और आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में उतारने के लिए संकल्पित होने का एक अवसर है।

करुणानिधान प्रभु श्री राम की जय!

31/03/2025

रोग शरीर में हों या मन में इनके बीज अचेतन मन की परतों में छुपे होते हैं। आयुर्वेद को व्यवस्थित रूप देने वाले महर्षि चरक के अनुसार पिछले जन्मों के पाप इस जन्म में रोग बन कर हमें सताते हैं। आयुर्वेद की इस मान्यता को विज्ञान अभी तक मिथ ही मानता था पर अब इस बात को विश्व भर के विद्वानो द्वारा जांचा परखा और सही पाया जाने लगा है। आयुर्विज्ञान के हजारों साल के अनुभव बताते हैं कि रोग की जड़ें अचेतन मन में छुपी हुई है।

अचेतन मन क्या है ? सामान्य उत्तर है हमारा बीता हुआ कल। उस कल की अनुभूतियों में कटुता, संताप. पछतावा या कोई कसक है, तो वह रोग-शोक के रूप में प्रकट होती है। आध्यात्मिक चिकित्सकों का कहना है कि बीते हुए कल की सीमाएँ वर्तमान से लेकर बचपन तक ही सिमटी नहीं हैं। इसके दायरे में हमारे पूर्वजन्म की अनुभूतियाँ भी आ जाती हैं। हम अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि मैंने कभी कोई बुरा काम नहीं किया फिर भी मैं बीमारियों से परेशान हूँ. ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा हैं. क्या भगवान बहुत कठोर और निर्दयी है ?

पहली बात तो हमें ये समझ लेनी चाहिए कि हमारे कार्यों और भगवान का कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिए हमें अपनी परेशानियों और पीडाओं के लिए ईश्वर को दोषी नहीं मानना चाहिए. यदि आप सद्गुणी हैं तो आप जीवन में संपन्न और सुखी रहते हैं. यदि आप लोगों को सताते हैं या पाप कर्म करते हैं तो आप पीड़ित होते हैं और तरह तरह की बीमारियाँ कष्ट देती हैं. हमारे कार्यों का हम पर निश्चित रूप से असर होता है.

कभी हमारे कर्मों का प्रभाव इसी जन्म में तो कभी अगले जन्म में मिलता है लेकिन मिलता जरुर है. आशय है कि हम अपने कर्मों के प्रभाव से कभी मुक्त नहीं होते यह बात अलग है कि इसका प्रभाव तुरंत दिखाई न दे . इस लेख में इस बात का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है कि हमारे पाप हमें किस रूप में लौटकर मिलते हैं और पीड़ित करते हैं. यदि आप किसी रोग से पीड़ित है तो ये समझें कि आपने अवश्य ही पूर्व जन्म में कोई पाप किया है. आपके पाप कर्म द्वारा होने वाली कुछ बीमारियों को नीचे दिया जा रहा है.

1. लोगों का धन लूटने वाले - गले की बीमारी से पीड़ित होते हैं.

2. पढ़े लिखे ज्ञानी जन के प्रति दुर्भावना से काम करने वाले व्यक्ति को - सिरदर्द की शिकायत रहती है.

3. हरे पेड़ काटने वाले और सब्जियों की चोरी करने में लगे व्यक्ति अगले जन्म में शरीर के अन्दर - अल्सर (घाव)से पीड़ित होते हैं.

4. झूठे और धोखाधड़ी करने वाले लोगों को - उल्टी की बीमारी होती है.

5. गरीब लोगों का धन चुराने वाले लोगों को - कफ और खांसी से कष्ट होता है.

6. यदि कोई समाज के श्रेष्ठ पुरुष (विद्वान) की हत्या कर देता है तो उसे - तपेदिक रोग होता है.

7. जो अपने गुरु का अपमान करता है उसे - मिर्गी का रोग होता है.

8. वेद और पुराणों का अपमान और निरादर करने वाले व्यक्ति को बार बार - पीलिया होता है.

9. झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति - गूंगे पैदा होते हैं या मुख के रोग से ग्रसित होते है।.

10. वेदों और उसके अनुयायियों का निरादर करने वाले व्यक्ति को - किडनी रोग होता है.

11. जो सांप, घोड़े और गायों का वध करता है वह - संतानहीन होता है.

इस प्रकार ग्रंथो में सभी रोगो के पीछे जो पूर्व जन्म का पाप है वह बताया जाता है। तब उस पाप के प्रायिश्चित कर्म और उसके अनुरूप मंत्र एवं उपाय के साथ साथ औषधीय उपचार जब किया जाये, तब रोग शांत होता है। यही आयुर्वेद का वास्तविक विज्ञान है। इसे न समझकर जो शंकालु जन अपने बड़े रोगो में भी केवल दवाइया खाते रहते है, वे जीवन में लाखो रुपये खर्च करके भी अपने रोग से मुक्ति नहीं पाते। यानि रुपया भी खर्च करते है एवं कष्ट भी पाते है। किन्तु जो इस विज्ञान के अनुसार नियमपूर्वक श्रद्धा भाव से ऋषियों की इस प्रणाली को अपनाते है, वे निश्चित ही रोग का उचित प्रबंधन करके या उसे नष्ट करके सुख पाते है।

15/02/2025

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