सिंह अवलोकन - मन्दिरों की नगरी श्री अयोध्या वर्तमान स्वरूप में हम जिसका दर्शन करते है । वह आज से 2058 वर्ष पूर्व महाराजा वीर विक्रमादित्य ने 5 मूल मन्दिरों की स्थापना कर बसाई हैं। जिसमें 84 कसौटी के स्तम्भों पर निर्मित 7 कलशों वाला श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर प्रथम मन्दिर था । दुर्भाग्यवश सन् 1528 ई0 में मुगलकाल में बाबर बादशाही के समय उस मन्दिर को ध्वस्त कर दिया। उस समय अपने प्राणप्रिय प्रभु को मुगलो
की कुदृष्टि से बचाने हेतु श्रीरामपंचायतन विग्रह को श्री सरयू की धारा में प्रवाहित कर दिया। इसलिये श्रीरामपंचायतन सुरक्षित रहा। कालान्तर में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह के समय में सन् 1748 में यही रामपंचयतन दक्षिण भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को दृष्टान्त द्वारा प्राप्त हुआ।
नागेश सन्निधौ तत्र, इमां मूर्तिं च स्थापय ।
तत्रैव मम् सान्निध्यं सदा भवतु ते द्विजः ।।
उपरोक्त स्वप्न आदेश के अनुसार श्रीरामचन्द्र जन्मभूमि के पंचायतन विग्रह की प्राप्ति ब्राह्मण योगी को सहस्त्रधारा लक्ष्मण धाट पर स्नान करते समय सरयू नदी में हुई जिसे उन्होने सुप्रसिद्व नागेश्वरनाथ के सानिध्य में स्थापना की जो आज श्री कालेराम मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। भारतवासियों को नित्य दर्शनीय आस्था एवं श्रद्वा का केन्द्र है। यह मन्दिर श्री अयोध्या के सिद्ध स्थानों में प्रसिद्व है। हजारों रामभक्त नित्य दर्शन एवं उपासना कर अपनी मनौतियों को पूर्ण करते है प्रारम्भ में यह मन्दिर बहुत छोटा था, मन्दिर के सातवें व्यवस्थापक साकेत वासी वे0 मू0 श्री नत्थूरामभट्ट मढ़ीकर के त्याग तपस्या के अथक प्रयत्न से मन्दिर का ये स्वरूप उभरा जिससे मन्दिर की उन्नति एवं सुधार हुआ । आज मन्दिर का ये रूप उनकी र्कीति स्वरूप विद्यमान है
इस मन्दिर की विशेषता ये है कि यहाँ सम्पूर्ण श्रीरामपंचायतन एक ही शालिग्राम शिला में है जो अन्यत्र दुलर्भ है मध्य में राम जी उनके वामांग में किशोरी जी उनके वमांग में भरत लाल जी राम जी के दक्षिण लक्ष्मण जी उनके दक्षिण शत्रुघ्न लाल जी श्री रामपंचायतन राज्य अभिषेक का दर्शन है लखन लाल जी के हाथ में छत्र का दंण्ड है शत्रुघ्न लाल जी के हाथ में चवर है एवं भरत लाल जी के हाथ में पंखा श्री चरणों में सेवा भाव में श्री हनुमान जी महाराज विराजमान है खुले विग्रह का दर्शन वर्ष में 2 दिन ही होता है सम्वत् सर का प्रथम दिन एवं रामनवमी के दिन ।
श्री राम पंचायतन के ठीक सामने दक्षिणाभिमुख श्री हनुमान जी का विग्रह भी दुलर्भ है जो कि श्यामवर्ण है, चरण के नीचे अहिरावण है हाथ में कटार एवं नेत्र भगवान के युगल चरणों के ओर है जिन्हें शनि जन्य कष्ट होता है उन्हें इनका दर्शन एवं परिक्रमा का बड़ा महत्व है उसी प्रकार मन्दिर के गर्भगृह में मदार के गणपति है जो बड़े ही दुलर्भ है इनका दर्शन एवं दुर्वा चढ़ाने को बड़ा ही महत्व है ।
मन्दिर के सभा मण्डप में श्री वशिष्ठ जी भगवान का विग्रह है ये भी उसी समय सरयू नदी में प्राप्त हुआ था उनके बगल में दाहिने सुंड़ के गणपति है जो कि उत्तर भारत में दुलर्भ दर्शन होते है ये मूर्ति कला के परिक्षेप में ये एक दुर्लभ विग्रह माना जा सकता है, मन्दिर से सटा हुआ एक छोटा राम नाम का मन्दिर है जिसमें 15 करोड़ ‘‘ श्री राम जय राम जय जय राम ’’ त्रियोदशाक्षरी मंत्र जो आन्नद रामायण से प्रतिपादित है उसके साथ हस्तलिखित 4 वेद, 18 पुराण, 6 शास्त्र, तुलसीकृत, अध्यात्म, वाल्मिकी आन्नद एवं अन्यान्न रामायणों का संग्रह, गीता, 108 उपनिषद् एवं अन्य हिन्दु धर्म संस्कृति के ग्रंथ संग्रहित है जिसकी परिक्रमा से पृथ्वी परिक्रमा का लाभ प्राप्त होता है उसी प्रकार भगवान श्री कालेराम जी की परिक्रमा कार्तिक अक्षय नवमी (शुद्धनवमी) एवं कार्तिक शुद्ध एकादशी को होती है जिसकी परिक्रमा का बड़ा महत्व है श्री कालेराम भगवान के उत्सवों में श्री रामजन्मोत्सव, श्रावण मास झूलनोत्सव, कार्तिक मास उत्सव, दशहरा, दीपावली, शरद पूर्णिमा एवं पुरूषोत्तम मासोत्सव बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है जिसमें बाहर से मुम्बई आकाशवाणी की कलाकार सौ. विभावरी बांधवकर बिस्मिल्ला खां के शिष्य गुण्डोपंथ जी राष्ट्रपति पुरूस्कार प्राप्त श्री बाला साहेब पूँछ वाले महाराष्ट्रीय नारदीय पद्धति से कीर्तन करने वाले कीर्तनकार आते रहते है जो यहाँ आकर निष्काम भाव से श्री प्रभु कालेराम प्रभु जी की सेवा करते है यहाँ भगवान की पूजा वैदिक पद्धति से की जाती है यह मन्दिर प्रातः 4.30 से 11.30 तक एवं सायंकाल 4.00 से 9.00 तक दर्शनार्थ खुला रहता है भगवान का नित्य दर्शन तो सर्वसुलभ है ही परन्तु श्री रामनवमी के दिन प्रभु श्री कालेराम भगवान के दर्शनों का विशेष महत्व है ।