บุศชาติ โฮมสเตย์ bussachat homestay

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บุศชาติ โฮมสเตย์ bussachat homestay धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

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03/09/2023

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महादेव के अद्भुत अलौकिक दर्शन ओम नमः शिवाय🙏
24/07/2023

महादेव के अद्भुत अलौकिक दर्शन ओम नमः शिवाय
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क्या आप जानते है इस भीमशिला की अद्भुत अलौकिक दिव्य महिमा के बारे में ?बाबा केदारनाथ और भीमशिला आज दोनो एक दूसरे के तारणह...
24/07/2023

क्या आप जानते है इस भीमशिला की अद्भुत अलौकिक दिव्य महिमा के बारे में ?

बाबा केदारनाथ और भीमशिला आज दोनो एक दूसरे के तारणहार हो चुके हैं,

भीमशिला ने जहां 2013 के त्रासदी में बाबा केदारनाथ धाम ज्योतिर्लिंग मन्दिर की महाप्रलय से रक्षा की, तो वहीं इस सेवाभाव के बदले बाबा ने भीमशिला को पूजनीय बनाकर अमर कर दिया,

आज भारतीय पुरातत्व विभाग आश्चर्यचकित है कि बाबा केदारनाथ मंदिर के चौड़ाई के ही बराबर का ये भीमशिला आखिर प्रकट कहाँ से हुआ?

आज पूरी दुनिया का हिन्दू समाज व अन्य धर्मों के लोग भी इस चमत्कार को नमस्कार कर रहे हैं,

तो आइये आप सब भी र्दशन कीजिये मन्दिर के पीछे स्थित भीमशिला का जो 2013 में आई आपदा के समय महादेव का रखवाला बन केदारनाथ मंदिर के पीछे अपना गदा गाड़कर पूरे प्रलय का अभिमान चकनाचूर कर मन्दिर को लेशमात्र भी क्षति नही होने दिया।

बाद में पूरी बाढ़ के पानी तथा उसके साथ आने वाले बड़े-बड़े पत्थरों को इसी शिला ने रोक कर केदारनाथ मंदिर की रक्षा की थी। भीमशिला की चौड़ाई मन्दिर की चौड़ाई के बिलकुल बराबर है,

भोले बाबा की महिमा वही जानें हम बाबा केदारनाथ की जय जयकार कर उनका गुणगान करें.!

हर हर महादेव 🙏🚩

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो ...
14/07/2023

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहतीं" जब रावण ने जटायु के दोनों पंख का ट डाले... तो मृT यु आई और जैसे ही मृT यु आयी... तो गिद्धराज जटायु ने मृT यु को ललकार कहा... "खबरदार ! ऐ मृTयु आगे बढ़ने की कोशिश मत करना...मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता सीता जी की "सुधि" प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता.. मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौT तब तक खड़ी रही, काँप ती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मृTयु की प्रतीक्षा करते रहे. आँखों में आँसू हैं ...वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं..कितना अलौकिक है यह दृश्य... रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली..जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.... प्रभु "श्रीराम" की शरण में... और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं...ऐसा अंतर क्यों?... ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म *पितामह* ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे .. दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते..तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही...चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये..उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और... जटायु ने नारी का सम्मान किया...अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ... जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है अतः सदैव गलत का विरोध जरूर करना चाहिए सत्य परेशान जरूर होता है, पर पराजित नहीं...

जय श्रीराम, जय गोविंदा ✨🙏💖🕉️🔱

14/07/2023

सनातन ही सत्य है!

ग्रंथ काल्पनिक है जो ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए लिखें तो "फिर यह क्या है"..यह बरगद का वह पेड़ है जो 7000 साल से आ...
14/07/2023

ग्रंथ काल्पनिक है जो ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए लिखें तो "फिर यह क्या है"..यह बरगद का वह पेड़ है जो 7000 साल से आज तक ऐसा ही है इस पेड़ पर सिर्फ तीन पत्ते आते हैं जबकि बरगद का पेड़ बहुत विशाल होता है इस पेड़ का तना आज तक 1 इंच से ज्यादा नहीं हुआ और तीन पत्ते के अलावा चौथा पत्ता नहीं आया और यह तीन पत्ते ब्रह्मा विष्णु महेश के संकेत है। यह पेड सूरत के पास तापी नदी पर स्थित है यह महाभारत के योद्धा अंगराज कर्ण की समाधि है । अब आप सोच रहे होंगे कि युद्ध तो कुरुक्षेत्र हरियाणा में हुआ था तो कर्ण को समाधि सूरत में क्यों दी गई। इसके पीछे कर्ण द्वारा मांगा गया वह वरदान था जिसे भगवान कृष्ण ने पूरा किया जब कर्ण ने कवच और कुंडल इंद्र को दान किए थे तब इंद्र से एक शक्ति बांण और एक वरदान मांगा था कि मैं अधर्म का साथ दे रहा हूं इसलिए मेरी मृTयु निश्चित है परंतु मेरा अंतिम संस्कार कुंवारी जमीन पर किया जाए अर्थात जहां पहले किसी का अंतिम संस्कार ना किया गया हो युद्ध में अर्जुन के हाथों जब कर्ण का वध हुआ. तो कृष्णा ने पांचों पांडवों को बताया कि ये तुम्हारे बड़े भाई है इनकी अंतिम इच्छा थी कि इनका अंतिम संस्कार कुंवारी जमीन पर किया जाए और मेरी दृष्टि में इस पृथ्वी पर सिर्फ एक ही जगह ही तापी नदी के पास नजर आ रही है तब इंद्र ने अपना रथ भेजा और कृष्ण पांचो पांडव और कर्ण के शरीर को आकाश मार्ग से तापी नदी के पास लाए यहां भगवान कृष्ण ने उस ऐक इंच जमीन पर अपना अमुक बांण छोड़ा बांण के ऊपर कर्ण का अंतिम संस्कार हुआ। कृष्ण ने कहा था कि युगो युगांतर तक इस जगह ऐक बरगद का पेड़ रहेगा जिस पर मात्र तीन पत्ते ही आयेगें तब से आज तक इस बरगद के पेड़ पर चौथा पत्ता नही आया और ना ये ऐक इंच से ज्यादा चोड़ा हुआ यहां कर्ण का मंदिर बना हुआ है यहां सभी की मनोकामनाएं पूरी हो जाती दानवीर कर्ण किसी को खाली हाथ नहीं जाने देता...

जय श्रीकृष्णा,जय गोविंदा, जय सनातन धर्म ✨🙏💖🕉️

🌺।।गीता के मूलमंत्र।।🌺⚜️अध्याय १मोह ही सारे तनाव व विषादों का कारण होता है ।⚜️अध्याय २शरीर नहीं आत्मा को मैं समझो और आत्...
13/07/2023

🌺।।गीता के मूलमंत्र।।🌺

⚜️अध्याय १
मोह ही सारे तनाव व विषादों का कारण होता है ।

⚜️अध्याय २
शरीर नहीं आत्मा को मैं समझो और आत्मा अजन्मा-अमर है ।

⚜️अध्याय ३
कर्तापन और कर्मफल के विचार को ही छोड़ना है, कर्म को कभी नहीं ।
⚜️अध्याय ४
सारे कर्मों को ईश्वर को अर्पण करना ही कर्म संन्यास है ।

⚜️अध्याय ५
मैं कर्ता हूँ- यह भाव ही अहंकार है, जिसे त्यागना और सम रहना ही ज्ञान मार्ग है ।

⚜️अध्याय ६
आत्मसंयम के बिना मन को नहीं जीता जा सकता, बिना मन जीते योग नहीं हो सकता ।
⚜️अध्याय ७
त्रिकालज्ञ ईश्वर को जानना ही भक्ति का कारण होना चाहिये, यही ज्ञानयोग है ।

⚜️अध्याय ८
ईश्वर ही ज्ञान और ज्ञेय हैं- ज्ञेय को ध्येय बनाना योगमार्ग का द्वार है ।

⚜️अध्याय ९
जीव का लक्ष्य स्वर्ग नहीं ईश्वर से मिलन होना चाहिये ।
⚜️अध्याय १०
परम कृपालु सर्वोत्तम नहीं बल्कि अद्वितीय हैं ।

⚜️अध्याय ११
यह विश्व भी ईश्वर का स्वरूप है, चिन्ताएँ मिटाने का प्रभुचिन्तन ही उपाय है ।

⚜️अध्याय १२
अनन्यता और बिना पूर्ण समर्पण भक्ति नहीं हो सकती और बिना भक्ति भगवान् नहीं मिल सकते ।
⚜️अध्याय १३
हर तन में जीवात्मा परमात्मा का अंश है- जिसे परमात्मा का प्रकृतिरूप भरमाता है, यही तत्व ज्ञान है ।

⚜️अध्याय १४
प्रकृति प्रदत्त तीनों गुण बंधन देते हैं, इनसे पार पाकर ही मोक्ष संभव है ।

⚜️अध्याय १५
काया तथा जीवात्मा दोनों से उत्तम पुरुषोत्तम ही जीव का लक्ष्य हैं ।
⚜️अध्याय १६
काम-क्रोध-लोभ से छुटकारा पाये बिना जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा नहीं मिल सकता ।

⚜️अध्याय १७
त्रिगुणी जगत् को देखकर दु:खी नहीं होना चाहिये, बस स्वभाव को सकारात्मक बनाने का प्रयास करना चाहिये ।
⚜️अध्याय १८
शरणागति और समर्पण ही जीव का धर्म है और यही है गीता का सार ।

💮।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।।💮

 #अतुल्य_भारतयह शिवमंदिर आज से कोई हजार वर्ष पूर्व बना है "कोरवनग्ला" कर्नाटक में यह मंदिर है..!!मंदिर के बिल्कुल नीचे द...
13/07/2023

#अतुल्य_भारत

यह शिवमंदिर आज से कोई हजार वर्ष पूर्व बना है "कोरवनग्ला" कर्नाटक में यह मंदिर है..!!

मंदिर के बिल्कुल नीचे देखिये, इसके नीचे नींव है भी या नही ..?

या सीधे ही पत्थरो को छाटकर जमीन पर रख दिया..?

और अगर इसमें नींव भरने का काम कोई दूसरी तरह से है, तो भी यह कमाल की कारीगरी है, की नींव होते हुए भी ऐसे प्रतीत होना की इसके नींचे नींव नही है..!!

गर्व करिये अपनी विरासत पर क्यो की आपकी हर एक विरासत महान -- बहुत महान है..!!

जय श्रीराम 🚩🙏💐❣️
ातन
#सनातन_धर्म_ही_सर्वश्रेष्ठ_है

लक्ष्मण रेखा....लक्ष्मण रेखा आप सभी जानते हैं पर इसका असली नाम शायद नहीं पता होगा । लक्ष्मण रेखा का नाम (सोमतिती विद्या ...
13/07/2023

लक्ष्मण रेखा....

लक्ष्मण रेखा आप सभी जानते हैं पर इसका असली नाम शायद नहीं पता होगा । लक्ष्मण रेखा का नाम (सोमतिती विद्या है)

यह भारत की प्राचीन विद्याओ में से जिसका अंतिम प्रयोग महाभारत युद्ध में हुआ था चलिए जानते हैं अपने प्राचीन भारतीय विद्या को

सोमतिती विद्या लक्ष्मण रेखा..

महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है--सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति,,

यह वेदमंत्र कोड है उस सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है,, वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है,, कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है,,

जब महर्षि भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा--राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है??महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है-इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है,,
यह धनुर्वेद में पारंगत हुआ है महर्षि विश्वामित्र के द्वारा,, यह जो ब्रह्मचारी लक्ष्मण है यह एक दुर्लभ सोमतिती विद्या सीख रहा है,,उस समय पृथ्वी पर चार गुरुकुलों में वह विद्या सिखाई जाती थी,,

महर्षि विश्वामित्र के गुरुकुल में,,महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में,, महर्षि भारद्वाज के यहां,, और उदालक गोत्र के आचार्य शिकामकेतु के गुरुकुल में श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि लक्ष्मण उस विद्या में पारंगत था,, एक अन्य ब्रह्मचारी वर्णित भी उस विद्या का अच्छा जानकार था

सोमंब्रहि वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति--इस मंत्र को सिद्ध करने से उस सोमना कृतिक यंत्र में जिसने अग्नि के वायु के जल के परमाणु सोख लिए हैं उन परमाणुओं में फोरमैन

आकाशीय विद्युत मिलाकर उसका पात बनाया जाता है,,फिर उस यंत्र को एक्टिवेट करें और उसकी मदद से एक लेजर बीम जैसी किरणों से उस रेखा को पृथ्वी पर गोलाकार खींच दें,,उसके अंदर जो भी रहेगा वह सुरक्षित रहेगा,, लेकिन बाहर से अंदर अगर कोई जबर्दस्ती प्रवेश करना चाहे तो उसे अग्नि और विद्युत का ऐसा झटका लगेगा कि वहीं राख बनकर उड़ जाएगा जो भी व्यक्ति या वस्तु प्रवेश कर रहा हो,,ब्रह्मचारी लक्ष्मण इस विद्या के इतने जानकर हो गए थे कि कालांतर में यह विद्या सोमतिती न कहकर लक्ष्मण रेखा कहलाई जाने लगी

महर्षि दधीचि,, महर्षि शांडिल्य भी इस विद्या को जानते थे,श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण इस विद्या को जानने वाले अंतिम थे,,उन्होंने कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में मैदान के चारों तरफ यह रेखा खींच दी थी,, ताकि युद्ध में जितने भी भयंकर अस्त्र शस्त्र चलें उनकी अग्नि उनका ताप युद्धक्षेत्र से बाहर जाकर दूसरे प्राणियों को संतप्त न करे,,

मुगलों द्वारा करोडों करोड़ो ग्रन्थों के Jaलाए जाने पर और अंग्रेजों द्वारा महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लूट लूटकर ले जाने के कारण कितनी ही अद्भुत विधाएं जो हमारे यशस्वी पूर्वजों ने खोजी थी लुप्त हो गई,,जो बचा है उसे संभालने में प्रखर बुद्धि के युवाओं को जुट जाना चाहिए, परमेश्वर सद्बुद्धि दे हम सबको.....

जय श्रीराम, जय गोविंदा ✨🕉️🙏💖

स्त्री के मांग में भरे सिंदूर का महत्व क्या होता है जानिए..?ऐसी मान्यता है कि यदि पत्नी के माँग के बीचों,बीच सिंदूर लगा ...
13/07/2023

स्त्री के मांग में भरे सिंदूर का महत्व क्या होता है जानिए..?

ऐसी मान्यता है कि यदि पत्नी के माँग के बीचों,बीच सिंदूर लगा हुआ है तो उसके पति की अकाल मृत्यु नहीं हो सकती है! जो स्त्री अपने माँग के सिंदूर को बालों से छिपा लेती है उसका पति समाज में छिप जाता है! जो स्त्री बीच माँग में सिंदूर न लगाकर किनारे की तरफ सिंदूर लगाती है उसका पति उससे किनारा कर लेता है! यदि स्त्री के बीच माँग में सिंदूर भरा हो तो पति की आयु लम्बी होती है।

रामायण में अलौकिक प्रसंग आता है जब बालि और सुग्रीव के बीच युद्ध हो रहा था तब श्री राम ने बालि को नहीं मारा। जब बालि के हाथों मार खाकर सुग्रीव श्री राम के पास पहुंचा तो श्री राम ने कहा कि तुम्हारी और बालि की शक्ल एक सी है। इसलिए मैं भ्रमित हो गया। अब आप ही बताइए श्री राम के नजरों से भला कोई छुप सकता है क्या?

असली बात तो यह थी जब श्री राम ने यह देख लिया कि बालि की पत्नी तारा की माँग सिंदूर से भरी हुई है तो उन्हेंने सिंदूर का सम्मान करते हुये बालि को नहीं मारा। दूसरी बार जब सुग्रीव ने बालि को ललकारा तब तारा स्नान कर रही थी उसी समय भगवान ने देखा कि मौका अच्छा है और बाण छोड़ दिया तब आप ही बताइये कि जब माँग में सिंदूर भरा हो तो परमात्मा भी उसको नहीं मारते तो फिर उनके सिवाय कोई और क्या मारेगा।

यह पोस्ट मैं इसलिए कर रही हूँ कि आजकल फैशन चल रहा है सिंदूर न लगाने का या हल्का लगाने का या बीच में न लगाकर किनारे लगाने का। मैं आशा करती हूँ कि मेरे इस पोस्ट से आप लोग सिंदूर का महत्व समझ गयी होगीं और अपने पति की लम्बी आयु और नाम का सिंदूर अपने माँग में भरे रहेंगी, धन्यवाद। किसी बहन को बुरा लगे तो क्षमा चाहूंगी !

जय श्री राम , जय गोविंदा , ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏❣️

जन्म से मृत्यु तक कुंडली के 12 भाव....मनुष्य के लिए संसार में सबसे पहली घटना उसका इस पृथ्वी पर जन्म है, इसीलिए प्रथम भाव...
13/07/2023

जन्म से मृत्यु तक कुंडली के 12 भाव....

मनुष्य के लिए संसार में सबसे पहली घटना उसका इस पृथ्वी पर जन्म है, इसीलिए प्रथम भाव जन्म भाव कहलाता है। जन्म लेने पर जो वस्तुएं मनुष्य को प्राप्त होती हैं उन सब वस्तुओं का विचार अथवा संबंध प्रथम भाव से होता है जैसे-रंग-रूप, कद, जाति, जन्म स्थान तथा जन्म समय की बातें। ईश्वर का विधान है कि मनुष्य जन्म पाकर मोक्ष तक पहुंचे अर्थात प्रथम भाव से द्वादश भाव तक पहुंचे।जीवन से मरण यात्रा तक जिन वस्तुओं आदि की आवश्यकता मनुष्य को पड़ती हैवह द्वितीय भाव से एकादश भाव तक के स्थानों से दर्शाई गई है मनुष्य को शरीर तो प्राप्त हो गया, किंतु शरीर को स्वस्थ रखने के लिए, ऊर्जा के लिए दूध, रोटी आदि खाद्य पदार्थो की आवश्यकता होती है अन्यथा शरीर नहीं चलने वाला। इसीलिए खाद्य पदार्थ, धन, कुटुंब आदि का संबंध द्वितीय स्थान से है। धन अथवा अन्य आवश्यकता की वस्तुएं बिना श्रम के प्राप्त
नहीं हो सकतीं और बिना परिश्रम के धन टिक नहीं सकता। धन, वस्तुएं आदि रखने के लिए बल आदि की आवश्यकता होती है इसीलिए तृतीय स्थान का संबंध, बल, परिश्रम व बाहु से होता है। शरीर, परिश्रम, धन आदि तभी सार्थक होंगे जब काम करने की भावना होगी, रूचि होगी अन्यथा सब व्यर्थ है। अत: कामनाओं, भावनाओं का स्थान चतुर्थ रखा गया है। चतुर्थ स्थान मन का विकास स्थान है। मनुष्य के पास शरीर, धन, परिश्रम, शक्ति, इच्छा सभी हों, किंतु कार्य करने की तकनीकी जानकारी का अभाव हो अर्थात् विचार शक्ति का अभाव हो अथवा कर्म विधि का ज्ञान न हो तो जीवनचर्या आगे चलना मुश्किल है।
पंचम भाव को विचार शक्ति के मन के अन्ततर जगह दिया जाना विकास क्रम के अनुसार ही है।यदि मनुष्य अड़चनों, विरोधी शक्तियों, मुश्किलों आदि से लड़ न पाए तो जीवन निखरता नहीं है। अत: षष्ठ भाव शत्रु, विरोध, कठिनाइयों आदि के लिए मान्य है।
मनुष्य में यदि दूसरों से मिलकर चलने की शक्ति न हो और वीर्य शक्ति न हो तो वह जीवन में असफल समझा जाएगा। अत: मिलकर चलने की आदत आवश्यक है और उसके लिए भागीदार, जीवनसाथी की आवश्यकता होती ही है। अत: जीवनसाथी, भागीदार आदि का विचार सप्तम भाव से किया जाता है।
यदि मनुष्य अपने साथ आयु लेकर न आए तो उसका रंग, रूप, स्वास्थ्य, गुण, व्यापार आदि कोशिशें सब बेकार अर्थात् व्यर्थ हो जाएंगी। अत: अष्टम भाव को आयु भाव माना गया है। आयु का विचार अष्टम से करना चाहिए।नवम स्थान को धर्म व भाग्य स्थान माना है। धर्म-कर्म अच्छे होने पर मनुष्य के भाग्य में उन्नति होती है और इसीलिए धर्म और भाग्य का स्थान नवम माना गया है। दसवें स्थान अथवा भाव को कर्म का स्थान दिया गया है।अत: जैसा कर्म हमने अपने पूर्व में किया होगा उसी के अनुसार हमें फल मिलेगा।
एकादश स्थान प्राप्ति स्थान है। हमने जैसे धर्म-कर्म किए होंगे उसी के अनुसार हमें प्राप्ति होगी अर्थात् अर्थ लाभ होगा, क्योंकि बिना अर्थ सब व्यर्थ है आज इस अर्थ प्रधान युग में। द्वादश भाव को मोक्ष स्थान माना गया है। अत: संसार में आने और जन्म लेने के उद्देश्य को हमारी जन्मकुण्डली क्रम से इसी तथ्य को व्यक्त करती है....

जय सनातन धर्म ✨🕉️ जय श्रीराम, जय गोविंदा ✨🙏💖💫

ककनमठ एक ऐसा मंदिर जिसे मनुष्य ने नहीं बल्कि भूत-प्रेतों ने बनाया था - भगवान महादेव का प्राचीन मंदिर।मुस्लिम शासकों ने इ...
13/07/2023

ककनमठ एक ऐसा मंदिर जिसे मनुष्य ने नहीं बल्कि भूत-प्रेतों ने बनाया था - भगवान महादेव का प्राचीन मंदिर।

मुस्लिम शासकों ने इसे तोड़ने के लिए गोले तक दागे, लेकिन ग्वालियर चंबल अंचल के बीहड़ों में बना सिहोनिया का ककनमठ मंदिर आज भी लटकते हुए पत्थरों पे टिका हुआ है।

चंबल के बीहड़ में बना ये मंदिर 10 किलोमीटर दूर से ही दिखाई देता है. जैसे-जैसे इस मंदिर के नजदीक जाते हैं इसका एक एक पत्थर लटकते हुए भी दिखाई देने लगता है. जितना नजदीक जाएंगे मन में उतनी ही भय व्याप्त होने लगता है। लेकिन किसी में भी इतनी शक्ति नहीं जो इसके लटकते हुए पत्थरों को भी हिला सके. आस-पास बने कई छोटे-छोटे मंदिर नष्ट हो गए हैं, लेकिन इस मंदिर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
मंदिर के बारे में कमाल की बात तो यह है कि जिन पत्थरों से यह मंदिर बना है, आस-पास के इलाके में ये पत्थर नहीं मिलता है.

इस मंदिर को लेकर कई तरह की किवदंतियां हैं, पूरे अंचल में एक किवदंती सबसे ज्यादा मशहूर है कि मंदिर का निर्माण भूतों ने किया था।
मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग विराजमान है, जिसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि भगवान शिव का एक नाम भूतनाथ भी है.
भोलेनाथ ना सिर्फ देवी-देवताओं और इंसानों के भगवान हैं बल्कि उनको भूत-प्रेत व दानव भी भगवान मानकर पूजते हैं। पुराणों में लिखा है कि भगवान शिव की शादी में देवी-देवताओं के अलावा भूत-प्रेत भी बाराती बनकर आए थे और इस मंदिर का निर्माण भी भूतों ने किया है।

कहा जाता है कि रात में यहां वो नजारा दिखता है, जिसे देखकर किसी भी मानव का मन कांप जायेगा।
ककनमठ मंदिर का इतिहास हजारो साल हजार पुराना है एवं बेजोड़ स्थापत्य कला का उदाहरण ये मंदिर पत्थरों को एक दूसरे से सटा कर बनाया गया है।
मंदिर का संतुलन पत्थरों पर इस तरह बना है कि बड़े-बड़े तूफान और आंधी भी इसे हिला नहीं पाई।

जनमानस यह मानते हैं कि कोई चमत्कारिक अदृश्य शक्ति है जो मंदिर की रक्षा करती है। इस मंदिर के बीचो बीच शिव लिंग स्थापित है। 120 फीट ऊंचे इस मंदिर का उपरी सिरा और गर्भ गृह सैकड़ों साल बाद भी सुरक्षित है।

इस मंदिर को देखने में लगता है कि यह कभी भी गिर सकता है लेकिन ककनमठ मंदिर सैकडों सालों से इसी तरह टिका हुआ है यह एक अदभुत पक्ष है। इसकी एक औऱ ये विशेषता है कि इस मंदिर के आस पास के सभी मंदिर टूट गए हैं, लेकिन ककनमठ मंदिर आज भी सुरक्षित है। मुरैना में स्थित ककनमठ मंदिर पर्यटकों के लिए विशेष स्थल है।
यहां की कला और मंदिर की बड़ी-बड़ी शिलाओं को देख कर पर्यटक भी इस मंदिर की प्रशंसा करने से खुद को नहीं रोक पाते।
मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमायें पर्यटकों को खजुराहो की याद दिलाती है।

ओ३म् नमः शिवाय 🙏 हर हर हर महादेव।

भज मन 🙏
ओ३म् शान्तिश् शान्तिश् शान्तिः

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