27/08/2026
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥3.6॥
भावार्थ :
जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है ।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥10.3॥
भावार्थ :
जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।
आप सभी प्रभु प्रेमियो का प्यार और साथ इसी तरह बना रहे
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🚩जय श्रीमन्नारायण❤
#भगवानभक्ति
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