Bhagwanbhaktii

Bhagwanbhaktii प्रभु भक्ति से मिलते हैं प्रभु का नाम जपते रहे

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये          सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।          भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां ...
26/05/2026

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

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सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ भावार्थ :हे नारायणी! तुम सब प्रकार का...
26/05/2026

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

भावार्थ :
हे नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगल मयी हो। कल्याण दायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:॥

भावार्थ :
मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

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शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं          ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।          रामा...
25/05/2026

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ॥ १ ॥

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नमस्ते भगवान रुद्र भास्करामित तेजसे ।नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ॥ भावार्थ :हे भगवान ! हे रुद्र ! आपका तेज अनगिनत स...
25/05/2026

नमस्ते भगवान रुद्र भास्करामित तेजसे ।
नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ॥

भावार्थ :
हे भगवान ! हे रुद्र ! आपका तेज अनगिनत सूर्योंके तेज समान है । रसरूप, जलमय विग्रहवाले हे भवदेव ! आपको नमस्कार है ।

शर्वाय क्षितिरूपाय नंदीसुरभये नमः ।
ईशाय वसवे सुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने ॥

भावार्थ :
नंदी और सुरभि कामधेनु भी आपके ही प्रतिरूप हैं । पृथ्वीको धारण करनेवाले हे शर्वदेव ! आपको नमस्कार है । हे वायुरुपधारी, वसुरुपधारी आपको नमस्कार है ।

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अतुलितबलधामं   हेमशैलाभदेहं          दनुजवनकृशानुं   ज्ञानिनामग्रगण्यम्।          सकलगुणनिधानं    वानराणामधीशं          ...
23/05/2026

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

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संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय ।सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय ॥ भावार्थ...
23/05/2026

संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय ।
सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय ॥

भावार्थ :
जो संसार में घटित होनेवाले समस्त घटनाओं में परिवर्तन करने में सक्षम हैं, जो राक्षस, पिशाच से लेकर सिद्धगणों द्वारा घिरे रहते हैं | सिद्ध, सर्प, ग्रह-गण एवं इन्द्रादि से सेवित हैं तथा जो बाघाम्बर धारण किए हुए हैं, उन शिवजी को नमस्कार करता हूँ ।

भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय ।
गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय गोक्षीरधारधवलाय नम: शिवाय ॥

भावार्थ :
जिन्होंने भस्म लेपद्वारा शृंगार किया हुआ है, जो अति शांत एवं सुन्दर वनका आश्रय करनेवालों के वश में हैं, जिनका श्री पार्वतीजी कटाक्ष नेत्रोंद्वारा निरिक्षण करती हैं तथा जिनका गोदुग्ध की धाराके समान श्वेत वर्ण है, उन शिवजी को नमस्कार करता हूँ ।

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यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥3.21॥ भावार्थ :श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता ह...
22/05/2026

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥3.21॥

भावार्थ :
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥11.37॥

भावार्थ :
हे महात्मन्! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्, असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं ।

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यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥ भावार्थ :जो न कभी हर्षित हो...
21/05/2026

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥

भावार्थ :
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥

भावार्थ :
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है ।

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सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ भावार्थ :सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने ...
20/05/2026

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

भावार्थ :
सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी ! तुम्हें नमस्कार है ।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि । मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

भावार्थ :
सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मी ! तुम्हें सदा प्रणाम है ।

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वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:।निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥ भावार्थ :हे हाथी के जैसे विशालकाय जिसक...
20/05/2026

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

भावार्थ :
हे हाथी के जैसे विशालकाय जिसका तेज सूर्य की सहस्त्र किरणों के समान हैं । बिना विघ्न के मेरा कार्य पूर्ण हो और सदा ही मेरे लिए शुभ हो ऐसी कामना करते है ।

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

भावार्थ :
मैं उन भगवान् गजानन की वन्दना करता हूँ, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, सुवर्ण तथा सूर्य के समान देदीप्यमान कान्ति से चमक रहे हैं, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करते हैं, एकदन्त हैं, लम्बोदर हैं तथा कमल के आसनपर विराजमान हैं ।

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नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये          सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।          भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां ...
19/05/2026

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
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