06/03/2025
श्री हनुमत्सहस्रनाम स्तोत्र
श्री हनुमत् सहस्रनाम स्तोत्र का माहात्म्य:-
श्री हनुमत् सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से उत्कृष्ट बल,अपरिमित बुद्धि एवं पराविद्या की प्राप्ति होती है।
समस्त गृह क्लेशों का निस्तारण हो जाता है।
भूत, प्रेत, एवं अन्य प्रकार के अरिष्टों का विनाश होता ।
इसके पाठ के प्रभाव से के मानवीय गुणों में अभिरुचि का उदय होता है तथा पापों से निवृत्ति होती है।
इस पाठ से विशेष रूप से आत्मशान्ति मिलती है तथा अन्त: करण में निर्मलता की प्राप्ति होती है।
धन-धान्य की अभिवृद्धि होती है तथा साधक का मानसिक तनाव कम होता है।
अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत के समान कान्तियुक्त शरीर वाले दैत्यरूपी वन को ध्वंस करने वाले, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान् जी हैं। श्रीहनुमान जी महराज एकादश रुद्रावतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। श्री हनुमान जी महराज की विधिवत् आराधना एवं अर्चना करने के लिए श्रीहनुमत् सहस्रनाम स्तोत्र सर्वोत्तम है। हनुमान जी श्री राम जी के अनन्य भक्त हैं। हनुमान जी सर्वदा राम भक्ति में ही लीन रहते हैं । ये ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं अर्थात् मेधाशक्ति बहुत ही प्रखर है। जो साधक हनुमत् सहस्रनाम का पाठ विधिवत् करता है या किसी ब्राह्मण द्वारा कराता है, उसके फलस्वरूप हनुमान जी की कृपा से उस साधक की भी मेधा प्रखर हो जाती है, तथा समस्त अरिष्टों से निवृत्ति हो जाती है। भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है तथा समस्त मनोकामनाएं हनुमत् स्तवन् से शीघ्र ही परिपूर्ण हो जाती हैं। हनुमत् आराधना करने से शनि ग्रह जनित कष्टों से भी निवृत्ति होती है। कलियुग में श्री हनुमानजी महाराज प्रत्यक्ष देवता हैं। जहां भी राम कथा होती है वहां निश्चित ही विराजमान रहते हैं। यह स्तोत्र मन्त्र महार्णव में पूर्वखण्ड के नवम तरङ्ग में श्रीरामचन्द्र जी द्वारा कही गयी है
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