22/04/2026
गवई कमाल हैं।
जब पद पर थे, तब विदेशों में जाकर बताते थे
हजारों साल शोषण हुआ, पानी तक नहीं पीने दिया गया,
मैं यहाँ तक संविधान से पहुँचा हूँ…
पूरा बौद्ध, संविधानवादी, अंबेडकरवादी मूड।
और उसी टाइम कोर्ट में क्या बोलते हैं?
“अगर भगवान विष्णु के इतने भक्त हो, तो भगवान विष्णु से ही प्रार्थना करो मूर्ति ठीक करने के लिए।”
मतलब उस टाइम भगवान भी कटाक्ष में,
भक्त भी लाइन में।
अब आगे देखो…
रिटायरमेंट हुआ…
तो सीधे मंदिर लाइन चालू।
बागेश्वर धाम पहुँचे,
धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री से मुलाकात।
और ये वही हैं जो पहले रुद्राभिषेक भी कर रहे थे,
फिर पद मिला तो पूरा “तर्क-विज्ञान” चालू,
अब पद गया तो फिर से “भक्ति मोड” ऑन।
सीधी बात है
जब कुर्सी होती है तो भगवान पर सवाल,
जब कुर्सी जाती है तो भगवान याद।
पहले बोलो भगवान से प्रार्थना करो,
अब खुद ही भगवान के दरबार में हाजिरी।
अब ये आस्था है या
कुर्सी के हिसाब से बदलने वाला सिस्टम?
बस यही समझ नहीं आता… 🤔