आचार्य श्री जगदीश जी महराज

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 #प्रकृति - जो दिख रहा है (दृश्य)  #पुरुष -  जो देख रहा है (दृष्टा) है   #सद्गुरु - जो दृश्य और दृष्टा में अंतर स्पष्ट क...
14/05/2026

#प्रकृति - जो दिख रहा है (दृश्य)
#पुरुष - जो देख रहा है (दृष्टा) है
#सद्गुरु - जो दृश्य और दृष्टा में अंतर स्पष्ट कर दे वह गुरु होता है
#आचार्य जगदीश जी महाराज श्रीमद् भागवत कथा सरस प्रवक्ता

आपका:- कर्म ही ऐसा ऑफिसर है जो कभी  #रिश्वत नहीं लेता
10/04/2026

आपका:-
कर्म ही ऐसा ऑफिसर है
जो कभी #रिश्वत नहीं लेता

09/04/2026

जाको पिता पातकी होई । वाके बंस न तिष्ठइ कोई ।।
का अर्थ है कि जिस व्यक्ति के पिता पापी या अधर्मी होते हैं, उसके कुल या वंश में कोई भी व्यक्ति प्रतिष्ठा (मान-सम्मान) प्राप्त नहीं कर पाता। यह कहावत कर्म और विरासत के प्रभाव को दर्शाती है, जहाँ पिता के कुकर्मों का असर आने वाली पीढ़ियों की साख पर भी पड़ता है।

17/02/2026

राम भजन बिन सुनहु खगेशा ।
मिटय न जीवन केर कलेशा ।।

05/02/2026

दुनिया एक ही है पर ! सबकी अलग अलग है
जहां तक जिसका मन पहुंचता है वहां तक उसका संसार है

03/10/2025
" #विवाहित_स्त्रियों_के_कर्तव्य"विवाहित स्त्री के लिये पतिव्रतधर्म के समान कुछ भी नहीं है, इसलिये उसे मनसा-वाचा-कर्मणा प...
15/07/2025

" #विवाहित_स्त्रियों_के_कर्तव्य"
विवाहित स्त्री के लिये पतिव्रतधर्म के समान कुछ भी नहीं है, इसलिये उसे मनसा-वाचा-कर्मणा पति के सेवापरायण होना चाहिये। स्त्री के लिये पतिपरायणता ही मुख्य धर्म है। इसके सिवा अन्य सब धर्म गौण हैं। महर्षि मनु ने स्पष्ट लिखा है कि स्त्रियों को पति की आज्ञा के बिना यज्ञ, व्रत, उपवास आदि कुछ भी न करने चाहिये। स्त्री केवल पति की सेवा-शुश्रुषा से ही उत्तम गति पाती है एवं स्वर्गलोक में देवता लोग भी उसकी महिमा गाते हैं। जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत, उपवास आदि करती है, वह अपने पति की आयु को हरती है और स्वयं नरक में जाती है।
इसलिये पति की आज्ञा के बिना यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत आदि भी नहीं करने चाहिये, दूसरे लौकिक कर्मो की तो बात ही क्या? स्त्री के लिये पति ही तीर्थ है, पति ही व्रत है, पति ही देवता एवं परम पूजनीय गुरु है। ऐसा होते हुए भी जो स्त्रियाँ अपने पति की आज्ञा के बिना दूसरे को गुरु बनाती हैं, वे घोर नरक को प्राप्त होती हैं। आजकल बहुत-से धूर्त लोग साधु, महन्त और भक्तों के वेष में 'बिना गुरु मुक्ति नहीं होती'-ऐसा भ्रम फैलाकर भोली-भाली स्त्रियों को मुक्ति का झूठा प्रलोभन देकर उनके धन और सतीत्व का हरण करते हैं और घोर नरक के भागी बनते हैं। ऐसे धूर्त-ठगों से माताओं और बहनों को खूब सावधान रहना चाहिये। ऐसे पुरुषों का मुख देखना भी धर्म नहीं है। मनु आदि शास्त्रकारों ने स्त्रियों की मुक्ति तो केवल पातिव्रत से ही बतलायी है। गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं-

एकइ धर्म एक व्रत नेमा।
काय बचन मन पति पद प्रेमा॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई।
पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥

वही स्त्री पतिव्रता है, जो अपने मन से पति का हित-चिन्तन करती है, वाणी से सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलती है, शरीर से उसकी सेवा एवं आज्ञा का पालन करती है। जो पतिव्रता होती है, वह अपने पति की इच्छा के विरुद्ध कुछ भी आचरण नहीं करती। वह स्त्री पति सहित उत्तम गति को प्राप्त होती है और उसी को लोग साध्वी कहते हैं। स्त्रियों के लिये इस लोक और परलोक में पति ही नित्य सुख का देनेवाला है।
इसलिये स्त्रियों को किंचिन्मात्र भी पति के प्रतिकूल आचरण कभी नहीं करना चाहिये। जो नारी ऐसा करती है, यानी पति की इच्छा और आज्ञा के विरुद्ध चलती है, उसको इस लोक में निन्दा और मरने पर नीच गति की प्राप्ति होती है।

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई।
बिधवा होड पाइ तरुनाई॥

इस प्रकार पति की इच्छा के विरुद्ध चलने वाली की यह गति लिखी है। फिर जो नारी दूसरे पुरुषों के साथ रमण करती है, उसकी घोर दुर्गति होती है, इसमें तो कहना ही क्या है ?

पति बंचक परपति रति करई।
रौरव नरक कल्प सत परई॥

अत: स्त्रियों को जाग्रत् की तो बात ही क्या, स्वप्न में भी परपुरुष का चिन्तन नहीं करना चाहिये वही उत्तम पतिव्रता है, जिसके मन में ऐसा भाव है-

उत्तम के अस बस मन माहीं।
सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

पति यदि कामी हो, शील एवं गुणों से रहित हो तो भी साध्वी यानी पतिव्रता को उसे ईश्वर के समान मानकर उसकी सदा सेवा-शुश्रुषा करनी चाहिये-

विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः।
उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पति:॥

अपमान तो अपने पति का कभी नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो नारी अपने पति का अपमान करती है, वह परलोक में जाकर महान् दुःखों को भोगती है।

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना।
अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना।
नारि पाव जमपुर दुख नाना॥

साध्वी स्त्रियों को पुरुषों और स्त्रियों के जो सामान्य धर्म बतलाये हैं, उनका पालन करना चाहिये। पतिव्रत-धर्म के रहस्य को जानने वाली स्त्रियों को अपने पति से बड़े सास, ससुर आदि की बड़े आदर के साथ सेवा-पूजा और आज्ञापालन करनी चाहिये; क्योंकि वे पति के भी पति हैं। पतिव्रतधर्म के आदर्श स्वरूप सीता, सावित्री आदि ने ऐसा ही किया है। जब सावित्री अपने पति के साथ वन में गयी, तब पति की आज्ञा होने पर भी वह सास-ससुर की आज्ञा लेकर ही गयी थी। श्रीसीताजी भी श्रीरामचन्द्रजी के साथ माता कौसल्या से आज्ञा, शिक्षा और आशीर्वाद लेकर ही गयी थीं।
साध्वी स्त्री को उचित है कि अपने लड़के लड़कियों को आचरण एवं वाणी द्वारा उत्तम शिक्षा दें । माता-पिता जो आचरण करते हैं, बालकों पर उनका विशेष असर पड़ता है। अत: स्त्रियों को झूठ-कपट आदि दुराचार एवं काम-क्रोध आदि दुर्गुणों का सर्वथा त्याग करके उत्तम आचरण करने चाहिये। बहुत-सी स्त्रियाँ लड़कियों को 'राँड़' और लड़कों को 'तू मर जा' 'तेरा सत्यानाश हो' इत्यादि कटु और दुर्वचन बोलती हैं, एवं उनको भुलाने के लिये 'मैं तुझे अमुक चीज मँगवा दूँगी' इत्यादि झूठा विश्वास दिलाती हैं और 'बिल्ली आयी' 'हाऊ आया' इत्यादि का झूठा भय दिखाती हैं। इससे बहुत नुकसान होता है, अतएव ऐसी बातों से स्त्रियों को बचना चाहिये। बालक का चित्त कोमल होता है, उसमें ये बातें सहज ही जम जाती हैं और वह झूठ बोलना, धोखा देना आदि सीख जाता है, एवं अत्यन्त भीरु और दीन बन जाता है। बालकों के मन में वीरता, धीरता और गम्भीरता उत्पन्न हो, ऐसे ओज और तेज भरे हुए सच्चे वचनों द्वारा उनको आदेश देना चाहिये। उनमें बुद्धि और ज्ञान की उत्पत्ति के लिये सत्-शास्त्र की शिक्षा देनी चाहिये। बालकों को गाली आदि नहीं देनी चाहिये; क्योंकि गाली देना उनको गाली सिखाना है। अश्लील, गंदे-कड़वे अपशब्दों का प्रयोग भी नहीं करना चाहिये। संग का बहुत असर पड़ता है। पशु-पक्षी भी संग के प्रभाव से सुशिक्षित और कुशिक्षित हो जाते हैं। सुना जाता है कि मण्डनमिश्र के द्वार पर रहने वाले पक्षी भी शास्त्रवचनों का उच्चारण किया करते थे। देखा जाता है कि गाली बकनेवालों के पास रहने वाले पक्षी भी गाली बका करते हैं। अत: सदा सत्य, प्रिय, सुन्दर और मधुर हितकर वचन ही बहुत प्रेम से, धीमे स्वर से और शान्ति से बोलने चाहिये। बालकों के सम्मुख पति के साथ हँसी-मजाक एवं एक शब्या पर सोना बैठना कभी नहीं करना चाहिये। जो स्त्रियाँ ऐसा करती हैं, वे अपने बालकों को व्यभिचार की शिक्षा देती हैं।
परपुरुष का दर्शन, स्पर्श, एकान्त-वास एवं उसके चित्र का भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। लोभ, मोह, शोक, हिंसा, दम्भ, पाखण्ड आदि से सदा बचकर रहना चाहिये और उत्तम गुण एवं आचरणों के लिये गीता, रामायण, भागवत, महाभारत एवं सती-साध्वी स्त्रियों के चरित्र पढ़ने का अभ्यास रखना चाहिये और उनके अनुसार ही बालकों को शिक्षा देनी चाहिये।
बच्चों को खिलाने-पिलाने इत्यादि में भी अच्छी शिक्षा देनी चाहिये। मदालसा ने अपने बालकों को बाल्यावस्था में ही ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा देकर उन्हें उच्च श्रेणी का बना दिया था। बच्चे बुरे बालकों एवं बुरे स्त्री-पुरुषों का संग करके कुशिक्षा ग्रहण न कर लें, इसके लिये माता-पिता को विशेष ध्यान रखना चाहिये। बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिये, जिससे उनका प्रेम श्रृंगार, देह की सजावट, विलासिता आदि में न होकर सदाचार, सद्गुण, सादगी, सेवा और ईश्वर तथा धर्म आदि में प्रवृत्ति हो।
बालकों को गहने पहनाकर नहीं सजाना चाहिये। इससे स्वास्थ्य की हानि एवं कहीं- कहीं प्राणों का भी जोखिम ही जाता है। बल बढ़ाने के लिए व्यावाम और बुद्धि की वृद्धि के लिये विद्या एवं उत्तम शिक्षा देनी चाहिये। थियेटर सिनमा आदि देखने का व्यसन और बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, भाँग, गाजा, सुलाफा आदि मादक वस्तुओं का सेवन करने की आदत न पढ़ जाय इसके लिये भी माता-पिता को ध्यान रखना चाहिये। लड़की और लड़क के खान पान ज्यार-दुलार और व्यवहार में भेद भाव नहीं रखना चाहिये। प्रायः स्त्रियों खान-पान, प्यार-दुलार आदि में भी लड़कों के साथ जैसा व्यवहार करती हैं, लड़कियों के साथ बैसा नही करतीं। उनका अपमान करती हैं। जो स्त्रियाँ इस प्रकार अपने ही बालकों में विषमता का व्यवहार करती हैं, उनसे समता की आशा कैसे की जा सकती है ? इस प्रकार की विषमता से इस लोक में आपकीर्ति और परलोक में दुर्गति होती है। अत: बालकों के साथ समता का ही व्यवहार रखना चाहिये।
बहुत-सी स्त्रियाँ भूत, प्रेत, देवता, पीर आदि का किसीे में आवेश समझकर भय करने लग जाती हैं। यह प्रायः व्यर्थ बात है। ऐसी बात पर कभी बहम-विश्वास नहीं करना चाहिये। इस प्रकार की बातें अधिकांश में तो हिस्टीरिया आदि की बीमारी से होती हैं। बहुत-सी जगह तो जान-बूझकर ऐसा ढोंग किया जाता है कभी-कभी वहम या भय से भी आवेश आ जाता है। अत: इन पर विश्वास नहीं करना चाहिये। यह सब व्यर्थ की और हानिकारक बातें हैं। इसलिये स्त्रियों को जादू-टोना, हाथ दिखाना, झाड़-फूँक, मन्त्र आदि अपने या अपने घरवालों पर नहीं करवाने चाहिये एवं ऐसा करने वाली स्त्रियों का संग भी नहीं करना चाहिये।
वेश्या, व्यभिचारिणी, लड़ाई-झगड़ा करने वाली निर्लज्ज और दुष्ट स्त्रियों का संग कभी नहीं करना चाहिये। परंतु उनसे घृणा और द्वेष भी नहीं करना चाहिये। उनके अवगुणों से ही घृणा करनी चाहिये। बड़ों की, दुखियों की और घर पर आये हुए अतिथियों की एवं अनाथों की सेवा पर विशेष ध्यान देना चाहिये। यज, दान, तप, सेवा, तीर्थ, व्रत, देवपूजन आदि पति के साथ उनकी आज्ञा के अनुसार उनके सन्तोष के लिये अनुगामिनी होकर करें, स्वतन्त्र होकर नहीं।
पति का जो इष्ट है, वही स्त्री का भी इष्ट है, अत: पति के बताये हुए इष्टदेव परमात्मा के नाम का जप और रूप का ध्यान करना चाहिये। स्त्रियों के लिये पति ही गुरु है। यदि पति को ईश्वरभक्ति अच्छी न लगती हो तो पिता के घर से प्राप्त हुई शिक्षा के अनुसार भी ईश्वरभक्ति, बाहरी भजन, सत्संग, कीर्तन आदि न करके गुप्तरूप से मन में ही भगवान् का स्मरण, जप और ध्यान करना चाहिये। भक्ति का मन से विशेष सम्बन्ध होने के कारण जहाँ तक बन सके, गुप्तरूप से भक्ति करनी चाहिये, क्योंकि गुप्तरूप से की हुई भक्ति विशेष महत्त्व की होती है।
पति जो कुछ भी कहे उसका अक्षरश: पालन करे, किंतु जिस आज्ञा के पालन से पति नरक का भागी हो, उसका पालन नहीं करना चाहिये। जैसे पति काम, क्रोध, लोभ, मोहवश चोरी या किसी के साथ व्यभिचार करने, मांस-मदिरा सेवन करने, किसी को विष पिलाने, जान से मारने, भ्रूणहत्या-गोहत्या आदि घोर पाप करने के लिये कहे तो वह नहीं करे। ऐसी आज्ञा का पालन न करने से अपराध भी समझा जाय तो भी पति को नरक से बचाने के लिये उसका पालन नहीं करना चाहिये। जिस काम से पति का परम हित हो, वह काम स्वार्थ छोड़कर करने की सदा चेष्टा करनी चाहिये । पतियों को चाहिये कि वे अपनी सदाचार परायणा साध्वी पत्नियों को कदापि बुरे आचरण करने का आदेश भूलकर भी न दें ।
विधवा स्त्रियों की सेवा पर विशेष ध्यान देना चाहिये; क्योंकि अपने धर्म में दृढ़ रहने वाली विधवा स्त्री देवी के समान है। उसकी सेवा-शुश्रूषा करने, उसके साथ प्रेम करने से स्त्री इस लोक में सुख और परलोक में उत्तम गति पाती है। जो स्त्री विधवा को सताती है, वह उसकी हाय से इस लोक में दुखिया हो जाती है और मरने पर नरक में जाती है। ऊपर बताये हुए पतिव्रत-धर्म को स्वार्थ छोड़कर पालन करने वाली साध्वी स्त्री इस लोक में परम शान्ति एवं परम आनन्द को प्राप्त होती है।
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🚩❗जय महादेव❗🚩
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

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24/12/2024

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॥ श्रीहरिः ॥भक्तमाल ग्रंथएकादश पाठ (१२) श्रीपृथुजीके अवतारकी कथामहाराज 'अङ्ग' की पत्नी सुनीथा, जो साक्षात् मृत्युकी कन्य...
11/12/2024

॥ श्रीहरिः ॥

भक्तमाल ग्रंथ

एकादश पाठ (१२) श्रीपृथुजीके अवतारकी कथा

महाराज 'अङ्ग' की पत्नी सुनीथा, जो साक्षात् मृत्युकी कन्या थीं, उससे 'वेन' नामक पुत्र हुआ, जो अपने नाना मृत्युके स्वभावका अनुसरण करनेके कारण अत्यन्त क्रूरकर्म करनेवाला हुआ। फलस्वरूप उसकी दुष्टतासे उद्विग्न होकर राजर्षि अंग नगर छोड़कर चले गये। राजाके अभाव में राज्यमें अराजकता न फैल जाय, इसलिये ऋषियोंने और कोई उपाय न देखकर वेनको अयोग्य होनेपर भी राजपदपर अभिषिक्त कर दिया। स्वभावसे क्रूर, ऐश्वर्य पाकर अत्यन्त उन्मत्त, विवेकशून्य वेन जब धर्म एवं धर्मात्मा पुरुषोंको विनष्ट करनेपर तुल गया और ऋषियोंके समझानेपर भी समझना तो दूर रहा, उल्टे उनकी अवहेलना की, तब क्षुब्ध ऋषियोंने क्रोध करके हुँकारमात्रसे वेनको मार डाला। परंतु कोई राजा नहीं होनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर ऋषियोंने वेनके शरीरका मन्थन किया। प्रथम जाँघका मन्थन किया तो उसमेंसे एक बौना पुरुष, कुरूप, काला-कलूटा उत्पन्न हुआ और जब उसने पूछा कि मैं क्या करूँ? तो ऋषियोंने कहा- 'निषीद' (बैठ जा), इसीसे वह निषाद कहलाया। फिर वेनकी भुजाओंका मन्थन किया तो एक स्त्री पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ। ऋषियोंने पुरुषको 'पृथु' नामसे एवं स्त्रीको 'अर्चि' नामसे सम्बोधित किया। ऋषि-ब्राह्मणोंको श्रीपृथुजीके हाथमें बिना किसी रेखासे कटा हुआ चक्रका एवं पाँवमें कमलका चिह्न देखकर बड़ा हर्ष हुआ कि पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें निरन्तर भगवान्‌की सेवामें रहनेवाली श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं।

सुन्दर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत महाराज पृथुका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेक अलंकारोंसे सजी हुई महारानी अर्चिके साथ वे दूसरे अग्निदेवके सदृश जान पड़ते थे। सब लोगोंने उन्हें तरह-तरहके उपहार भेंट किये। इसके पश्चात् सूत, मागध और बन्दीजनोंने स्तुति की। ब्राह्मणोंने पृथुजीको प्रजाका रक्षक उद्घोषित किया।

वेनके अत्याचारसे उत्पीड़ित पृथ्वीने समस्त औषधियोंको अपनेमें छिपा लिया था और चूँकि बहुत समय बीत गया था, अतः वे औषधियाँ पृथ्वीके उदरमें जीर्ण हो गयी थीं। यही कारण है कि जब श्रीपृथुजीका राज्य हुआ तब भी पृथ्वी रसा होकर भी रसहीना ही बनी रही। फलस्वरूप भूखके कारण प्रजाजनोंके शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। उन्होंने अपने स्वामी पृथुके पास आकर कहा। तब पृथुजीने क्रोधमें भरकर पृथ्वीको लक्ष्यकर बाण चढ़ाया। पृथ्वी प्रथम तो डरकर गोरूप धारणकर भागी, परंतु कहीं भी बचाव न देखकर श्रीपृथुजीकी शरणमें आ गयी। तब श्रीपृथुजीने पृथ्वीके संकेतसे गोरूपधारिणी पृथ्वीका दोहन किया, जिससे पुनः सभी अन्न और औषधियाँ प्रकट हो गयीं। प्रजा सुख-चैनसे रहने लगी।

परमः धर्मात्मा श्रीपृथुजीने सौ अश्वमेधयज्ञ करनेका संकल्पकर निन्यानवे यज्ञ पूर्ण होनेपर जब सौवे अश्वमेधयज्ञका प्रारम्भ किया तो इन्द्रने अपना सिंहासन छीने जानेके भयसे बहुत विघ्न किया। तब इन्द्रका वध करनेके लिये उद्यत श्रीपृथुजीको याजकोंने यज्ञमें क्रोधको अनुचित बताकर स्वयं मन्त्रबलसे बलपूर्वक इन्द्रको अग्निमें हवनकर देनेका निश्चय किया। तब लोकस्रष्टा जगत्-पितामह ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंको समझाकर रोका। श्रीपृथुजीका सौ यज्ञ करनेका जो आग्रह था, उससे निवृत्तकर इन्द्रसे सन्धि करा दी। महाराज पृथुके निन्यानबे यज्ञोंसे ही यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको भी बड़ा सन्तोष हुआ। वे देवराज इन्द्रको साथ लेकर श्रीपृथुजीके सामने प्रकट हुए। अपने ही कर्मसे लज्जित इन्द्र श्रीपृथुजीके चरणोंमें गिरना ही चाहते थे कि श्रीपृथुजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया। भगवान्‌का दर्शनकर श्रीपृथुजी निहाल हो गये। आँखोंमें प्रेमाश्रु, शरीरमें रोमांच, हृदयमें उमड़ा हुआ अनन्त आनन्द-सागर, यह थी उस समय श्रीपृथुजीकी अवस्था। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान्‌की स्तुति की। भगवान्ने पृथुजीके गुणोंकी सराहना करते हुए, वर माँगनेको कहा। तब शपृथुजी बोले-

न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्न यत्रयुष्यच्चरणाम्बुजासवः । महत्तमान्तहृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः ।।

(भागवत)

मुझे तो उस मोक्षपदकी भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुखद्वारा निकला हुआ आपके चरण-कमलोंका मकरन्द नहीं है, जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुननेका सुख नहीं मिलता है। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीला-गुणोंको सुनता ही रहूँ। इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उनको अपनी भक्तिका वर प्रदानकर भगवान् अन्तर्धान हो गये।

बहुत कालतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालनकर श्रीपृथुजी सनत्कुमारजीके उपदेशोंका स्मरणकर कि 'अब मुझे अन्तिम पुरुषार्थ मोक्षके लिये प्रयत्न करना चाहिये' पृथ्वीका भार पुत्रोंको सौंपकर अपनी पत्नीसहित तपोवनको चले गये और वहाँ जाकर भगवान् सनत्कुमारने जिस परमोत्कृष्ट अध्यात्मयोगकी शिक्षा दी थी, उसीके अनुसार पुरुषोत्तम श्रीहरिकी आराधना करने लगे और अन्तमें भगवान्‌के श्रीचरण-कमलोंका चिन्तन करते हुए ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये। यह देखकर महाराज पृथुकी पतिव्रता पत्नी अर्चिने चिता बनायी और अपने पतिके साथ सती हो गयीं। परम साध्वी अर्चिको इस प्रकार अपने पति वीरवर पृथुका अनुगमन करते देख सहस्त्रों वरदायिनी देवियोंने अपने-अपने पतियोंके साथ उनकी स्तुति की। वहाँ देवताओंके बाजे बजने लगे। देवांगनाओंने पुष्प-वृष्टि की।

ऐसे भगवत कथा रसिक एवं धर्म धुरंधर पृथु भगवान की जय हो
जय सियाराम

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