Shri Dwarkadhish Mandir & saat mandir trust Aurangabad

Shri Dwarkadhish Mandir & saat mandir trust Aurangabad It is pushtimargiya temple. Seva of Shree Dwarkadhish is done here. Vakpati foundation's pushtimargiya pathshaala is also being run here.

26/10/2017
25/10/2017

"स एकाकी न रमते।"
"स द्वितीयमैच्छत्।"
"स आत्मानं द्वेधा पातयत्।"
"पतिश्च पत्नीश्चाभवत्।"

ये सभी श्रुतिवचन कहते हैं:-

-वे अकेले रमण नहीं करते।
-उन्होंने दूसरे की इच्छा की।
-उन्होंने अपने में से ही
दूसरा स्वरूप प्रकट किया।
-वे ही पति भी बने और
वे ही पत्नी भी बने।

इन सभी श्रुतिवचनों की
यथार्थता को ... प्रत्यक्ष दिखानेवाली
लीला के दर्शन करके ही...
अष्टछाप महानुभाव गाते हैं:-

"श्यामा को सिंगार श्याम को..."

"एक प्राण वपु दोय।"

दंडवत् प्रणाम ... सदैव रसरूपिणी लीला
द्वारा... निज-अंगीकृत, निःसाधन परिकर का
निरोध... अनायास सिद्ध कर देनेवाले...
श्रीयुगलसरकार के पावन चरणकमलों में...!!!

22/10/2017
18/10/2017

"लटकत चलत जुवती-सुखदानी।
संध्या समे सखामण्डल में
सोभित तन गौरज लपटानी।।
मोरमुकुट गुंजा पीयरो पट,
मुख मुरली कूजत मृदु बानी।
'चतुर्भुज' प्रभु गिरिधारी आये बन तें,
लै आरती वारत नंदरानी।।"

अष्टछाप महानुभाव श्रीचतुर्भुजदासजी ने...
"आवनी" के इस पद में... जो अद्भुत शब्दचित्र
प्रस्तुत किया है... बस वैसे ही तादृश दर्शन...
यहाँ इस चित्र में हो रहे हैं...!!!

साथ ही साथ... "नन्दव्रज" की ऐसी भव्यता और
संपन्नता का ऐसा मनोरम निरूपण... बहुत ही कम
चित्रों में दृश्यमान होता है...!!!

किन्तु... चित्रकार जिसका चित्रण करने में असमर्थ
है... वह है... वन से व्रज में पधार रहे वनमाली के
दर्शन से व्रजांगनाओं के हृदय में उद्भूत हो रहे विविध
भाव-मनोरथ... जिन को ...उन्होंने स्वयं... "श्रीगोपीगीत"
के बारहवें श्लोक में इस प्रकार प्रकट किये हैं :--

"दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै-
र्वनरूहाननं बिभ्रदावृतम्।
धनरजस्वलं दर्शयन् मुहु-
र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि।।"

परमप्रेमरूपा व्रजरत्नाओं के पावन पादपद्मों में
भूरिशः वन्दन करते हुए... उनसे यही विनती करें...
कि... उनकी भावसमृद्धि के अंशमात्र का दान...
हमें भी... उन्हीं की आड़ी से प्राप्त हो...!!!

17/10/2017

"लाल माई बैठे राजत हटरी।
रानी जू साज सम्हार धर्यो
बलराम कृष्ण को बट री॥
लडुआ गुंजा पकवान बहुत कर
भर भर थार धरी है मठरी।
गृह गृह तें गोपी सब आई
भीर भयी तहाँ ठट री॥
तोल तोल के देत सबन को
भाव अटल कर राख्यो अट री।
'रसिक' प्रभु के नयनन लागी
श्रीवृषभानकुँवरी की रट री॥"

कैसी अद्भुत, कैसी मधुर लीला
है यह...!!!

अपने ही अवर स्वरूप... श्रीगिरिराजजी
को आरोगाने के लिये... आवश्यक
सामग्री की आपूर्ति स्वयं ही कर
रहे हैं...!!!

यही तो रहस्य है ...पुष्टि पुरुषोत्तम
की पुष्टि का...!!!

श्रुति के अनुसार... प्रथम तो जीव का वरण करते हैं...
फिर... उससे जिस भाव का अंगीकार करना चाहते
हैं ...उसे स्वयं उसके हृदय में स्थापित करते हैं...
और फिर... उस जीव के भाव से भावित... स्वयं के
आनंद का ...स्वयं ही भोग करके... जीव
को स्वरूपानंद के दान से
कृतार्थ करते हैं...!!!

"हटरी" की ऐसी ललित लीला के अनुभव की
पात्रता... लीलापुरुषोत्तम की कृपा से... हमें कब
प्राप्त होगी... ???!!!

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