25/11/2021
संघ का शुभारम्भ
डॉक्टरजी के मन में संघ की कल्पना निश्चित हो चुकी थी। अब उसे विचार जगत् से व्यवहार-जगत् मे लाना था। उसका सूत्रपात उन्होंने विजयादशमी के शुभ मुहूर्त पर करने का तय किया। तदनुसार 1925 के दशहरे के दिन अपने घर में पन्द्रह-बीस लोगों को इकट्ठा करके उन्होंने सबसे कहा कि ‘‘हम लोग आज से संघ शुरू कर रहे है।’’ प्रारम्भ की इस बैठक में श्री भाऊजी कावरे, श्री अण्णा सोहोनी, श्री विश्वनाथराव केळकर, श्री बाळाजी हुद्दार, श्री बापूराव भेदी आदि सज्जन उपस्थित थे। संघ के श्रीगणेश की घोषणा करने के उपरान्त डॉक्टरजी ने सबके सामने प्रश्न रखा कि ‘‘संघ में प्रत्यक्ष क्या कार्यक्रम किये जायें जिससे कि हम कह सकें कि संघ शुरू हो गया’’ तथा इस सम्बन्ध में उनके विचार सुने। बैठक के अन्त में डॉक्टरजी ने अत्यन्त प्रभावी ढंग से यह स्पष्टीकरण किया कि संघ शुरू करने के अर्थ हैं कि हम शारीरिक, सैनिक तथा राजकीय, तीनों प्रकार की शिक्षा लें तथा दूसरों को देना प्रारम्भ करें।
सामान्यतः जब कोई नयी संस्था बनती है तो पहले ही दिन उसका नाम, रसीद, बही, निधि, संविधान, कार्यालय आदि का विचार एवं आयोजन तथा अखबारों में उसका बड़े ठाट के साथ गाजा-बाजा किया जाता है। किन्तु संघ के आरम्भ में इन सब बातों का अभाव ही था। उस विजयादशमी के दिन तो संघ की दृष्टि से दो ही बातें बीजरूप से निश्चित हुई थीं। पहली, हिन्दू राष्ट्र के पुनरुत्थान की डॉक्टरजी के मन की महत्त्वाकांक्षा, तथा दूसरी, उसको साकार करने के लिए समर्पित किया हुआ डॉक्टरजी का चारित्र्यपूर्ण, ध्येयनिष्ठ तथा सेवामय जीवन।
हिन्दू राष्ट्र को संघटित करने का प्रारम्भ डॉक्टरजी ने अपनी विजयिष्णु मनोभावना के अनुरूप ‘सीमोल्लंघन’ के शुभ मुहूर्त पर किया। व्यक्तिगत जीवन से समष्टि-जीवन की ओर, दासता से स्वातंत्र्य की ओर, निद्रा से जाग्रति की ओर, दैन्य से स्वर्गतुल्य सुख की ओर, तथा दुर्बलता से दिग्विजय सामर्थ्य की ओर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को ले जाने वाला सीमोल्लंघन डॉक्टरजी ने उसी दिन प्रारम्भ किया। प्रभु रामचन्द्रजी ने चौदह लोकों के ऊपर राज्य करनेवाले तथा देवताओं को भी दास बनानेवाले रावण को इसी दिन रामबाण का प्रताप दिखाया था, तथा विराट की गौओं को भगाकर ले जानेवाले कौरवों को पराभूत करने के लिए कारणीभूत गाण्डीव का टंकार भी अर्जुन ने इसी दिन सुनाया था। दुष्टों को भयकम्पित करनेवाले बलवान् हिन्दू राष्ट्र को जाग्रत् करने के लिए इस प्रकार विजय का स्मरण करा देनेवाली विजयादशमी के अतिरिक्त और कौनसा मुहूर्त सयुक्तिक हो सकता था ?
डॉक्टरजी के सम्पर्क में जो तरुण एवं बाल आये थे उनका जिस बही में नाम लिखा गया था उसमें उनका नाम, आयु, शिक्षा तथा किस व्यायामशाला में जाते हैं, यह सब जानकारी लिखी हुई मिलती है। प्रारम्भ में संघ के आज के समान प्रतिदिन के कार्यक्रम नहीं थे। संघ के सदस्य से इतनी ही अपेक्षा थी कि वह किसी भी व्यायामशाला में जाकर पर्याप्त व्यायाम करे। रविवार को प्रातः पाँच बजे सबको इतवार दरवाजा प्राथमिक शाला के मैदान में एकत्रित किया जाता था। इस एकत्रीकरण के अवसर पर कुछ दिनों पश्चात् श्री मार्तण्डराव जोग की देखरेख में सैनिक शिक्षण भी प्रारम्भ कर दिया गया था। प्रारम्भ में कुछ महीनों रविवार तथा गुरुवार को राजकीय वर्ग बिला नागा होते थे। इन राजकीय वर्गों का उद्देश्य संघ के सभासदों (उस समय यही शब्द रूढ़ था) को देश की वर्तमान परिस्थिति तथा अपने कर्तव्य का ज्ञान देना तथा संघटन मजबूत करने के लिए कैसे प्रयत्न किये जायें, इस विषय में मार्गदर्शन करना था। ये वर्ग ‘अनाथ विद्यार्थी गृह’ में एवं श्री बडकस, श्री टालाटुले, श्री मार्तण्डराव जोग तथा डॉक्टरजी के घर पर अदल-बदलकर होते थे। उनमें डॉक्टरजी के भाषण तो होते ही थे पर उनके साथ तरुणों में से श्री बाळाजी हुद्दार, श्री दादा परमार्थ, श्री भैयाजी दाणी आदि को भी बोलने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता था। श्री विश्वनाथराव केळकर के भाषण भी इन वर्गों में होते थे। इन राजकीय वर्गों के समान कुछ उत्सवों के निमित्त भी भाषण होते थे। ये राजकीय वर्ग ही आगे चलकर ‘बौद्धिक वर्ग’ नाम सन् 1927 के बाद प्रचलित हुआ दिखता है।
संघ के तरुण तथा बाल प्रमुख रूप से श्री अण्णा खोत की ‘नागपुर व्यायामशाला’ में जाते थे। इसका कारण यह हो सकता है कि प्रथम तो वहाँ व्यायामशाला की दृष्टि से साधन-सामग्री उत्तम थी तथा दूसरे डॉक्टरजी एवं एवं अण्णा खोत के बीच बड़ी घनिष्ठता थी। डॉक्टरजी के संघटन के सदस्य उस व्यायामशाला में दण्ड, बैठक, मलखम्भ, एकदण्डी(Single-bar), दुदण्डी(Double-bar) आदि के कार्यक्रम करते थे। उस समय डॉक्टरजी स्वयं देखरेख के लिए उपस्थित रहते थे। 1925 के पहले व्यायाशालाओं में स्कूली विद्यार्थी तथा व्यवसायी लोग ही जाते थे। सरकार की वक्र दृष्टि के भय से कॉलेज के तरुण विद्यार्थी वहाँ दिखायी नहीं देते थे। किन्तु डॉक्टरजी के प्रयत्नों से ऐसे तरुणों की संख्या बढ़ने लगी तथा कुछ दिनों में उस व्यायामशाला के शिक्षक श्री दत्तोपन्त मारुलकर तथा श्री अण्णा सोहोनी को इतने लोगों की ओर ध्यान देना कठिन होने लगा।
व्यायाम के अतिरिक्त भी अनेक बातें डॉक्टरजी के सम्मुख थीं। इसलिए संघ में आनेवाले तरुणों को स्वतंत्र रूप से शिक्षा देने का विचार शुरू हुआ। इसी समय राजा लक्ष्मणराव भोंसले ने अपने पुत्र के यज्ञोपवीत संस्कार के उपलक्ष्य में जो दान दिया उससे श्री दत्तोपन्त मारुलकर ने अण्णा खोत की व्यायामशाला से अलग ‘महाराष्ट्र व्यायामशाला’ तथा ‘प्रताप अखाड़ा’ स्वतंत्र रूप से प्रारम्भ किया। इन नवीन व्यायामशालाओं को चन्दा देनेवालों में डॉक्टरजी का नाम सबसे ऊपर लिखा हुआ मिलता है। इस समय अखाड़े और संघ, इस प्रकार दो स्वरूप संघटन के दिखते हैं। अब इन नये अखाड़ो में संघ के घटक जाने लगे। परन्तु थोड़े ही दिनों में ‘महाराष्ट्र व्यायामशाला’ तथा ‘नागपुर व्यायामशाला’ के बीच प्रतिद्वन्द्विता तथा खिंचाव शुरू हो गया। ऐसा लगा कि कि उनके बीच के झगड़े में संघ व्यर्थ ही फँस जायेगा। तब डॉक्टरजी ने संघ को अलग ले जाने का निश्चय किया। तदनुसार ‘इतवार दरवाजा प्राथमिक शाला’ के मैदान में श्री अण्णा सोहानी ने स्वतंत्र रूप से संघ के लाठी के कार्यक्रम शुरू कर दिये। प्रारम्भ में व्यायामशाला तथा संघ के अलग-अलग कार्यक्रम होते थे तथा अन्त में प्रार्थना के लिए सब इकट्ठे आ जाते थे।
संघ का बाह्य रूप अखाड़े जैसा ही था। 1926 की अप्रैल में रामनवमी के मेले के अवसर पर सभी संघ के सदस्यों को रामटेक ले जाने का विचार डॉक्टरजी के मन में आया। रामटेक में यात्रा के समय भारी भीड़ रहती थी तथा अनेक यात्रियों को अव्यवस्था के कारण धक्का-मुक्की का कष्ट तो सहना ही पड़ता था उन्हें दर्शन भी ठीक तरह से नहीं मिल पाते थे। डॉक्टरजी ने सोचा कि यह अव्यवस्था संघ के अनुशासित तरुणों के बल पर थोड़ी-बहुत दूर की जा सकी तो संघटन के बल तथा उसकी श्रेष्ठता की एक छाप लोगों के मन पर लग जायेगी। साथ ही इस निमित्त से संघ के सदस्यों का आत्मविश्वास तथा संघनिष्ठा भी कुछ अंशों में बढ़ जायेगी। इस द्विविध हेतु से वे सभी सदस्यों को रामटेक ले जाने के लिए प्रयत्नशील हुए। ‘अनाथ विद्यार्थी गृह’ के विद्यार्थी प्रतिवर्ष रामटेक जाते थे। वे जाते समय अपने साथ ‘भगवाध्वज’ ले जाते थे। उसी समय यदि अपने लोगों को भी वहाँ ले जाना है तो उनका अलग नाम तथा अलग वेश रहना चाहिए जिससे उनका पृथक् प्रभाव व परिणाम लोगों को दिख सके, यह विचार उस समय डॉक्टरजी के मन में आया। उन्होंने संघ का नाम निश्चित करने के विषय में अपने सहकारियों के साथ बातचीत प्रारम्भ की तथा दिनांक 17 अप्रैल को अपने घर इस उद्देश्य से बैठक बुलायी। इस बैठक में संघ के नाम के सम्बन्ध में बुहत-से सुझाव आये तथा प्रत्येक ने अपने सुझाव के समर्थन में युक्तियाँ भी दीं। उस काल के नागपुर के कार्यवाह ने जो वृत्त लिखा हैं उसमें वे कहते हैं ‘‘सभा में छब्बीस सदस्य उपस्थित थे। इस सभा में संघ के लिए अनेक नाम सुझाये गये। उन पर वाद-विवाद होकर तीन मत के निमित्त सभा के सम्मुख रखे गये।’’ ये तीन नाम थे (1) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, (2) जरिपटका मण्डल, (3) भारतोद्धारक मण्डल। इनमें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम स्वीकृत हुआ।
प्रा. पां. कृ. सावळापूरकर भी इस बैठक में उपस्थित थे। वे लिखते हैं ‘‘...........डॉक्टरजी ने संघ का नाम पहले ही अपने मन में निश्चित कर रखा था। तथापि हम भी कुछ अपने मन से कर सकते हैं यह आत्मविश्वास तरुणों के मन में जगाने के लिए डॉक्टरजी ने भावी स्वयंसेवकों को नाम सुझाने के लिए कहा। कॉलेज में उसी वर्ष प्रवेश करनेवाले एक विद्यार्थी ने (आज वे डिस्ट्रिक्ट जज हैं) ‘जरिपटका मण्डल’ नाम सुझाया था उस पर बड़े उत्साह से भाषण किया। अन्यों ने भी समय पर जो सूझ गया सो नाम बताया। यह सब होने के बाद ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम ही क्यों ठीक है, इस पर भाषण करने की डॉक्टरजी ने मुझे आज्ञा दी। मैं लगभग आधा घण्टा बोला, और अच्छा बोला। मेरे भाषण पर डॉक्टरजी खूब खुश हुए तथा उन्होंने सबके सामने मुझे शाबाशी दी। डॉक्टरजी के विचार सुनकर मेरे ऊपर जो संस्कार हुए उनके कारण ही मैं वह भाषण कर सका यह तो स्पष्ट ही है, अर्थात् यह श्रेय उनका ही है।’’
‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम अत्यन्त विचारपूर्वक निश्चित किया गया था। ‘हिन्दुस्थान इसमें रहनेवाले सब लोगों का राष्ट्र है’ यह गलतफहमी उस समय हिन्दू नेताओं के मन में इतनी गहरी बैठी थी कि उन्हें हिन्दू-संघटन का काम राष्ट्रीय लगना सम्भव ही नहीं था। अतः डॉक्टरजी ने यह शब्द गलत एवं गलत स्थान पर प्रयुक्त किया है, यह पराये शत्रु तथा स्वकीय मित्र दोनों ही बोलने लगे। राष्ट्रीयत्व की विकृत कल्पना लेकर चलनेवाले लोगों ने संघ के ‘राष्ट्रीय’ विश्लेषण का विरोध किया होगा किन्तु डॉक्टरजी का यह दृढ़ विचार था कि हिन्दुस्थान में हिन्दू समाज की हर बात, हर संस्था तथा आन्दोलन राष्ट्रीय है तथा वही सही अर्थों में पूरी-पूरी राष्ट्रीय हो सकती है। परस्पर-विरोधी परम्परा, संस्कृति तथा भावना वाले लोगों की खींचतान कर बाँधी हुई गठरी राष्ट्र नहीं होती, बल्कि धर्म, संस्कृति, देश, भाषा तथा इतिहास के साधर्म्य से ‘हम सब एक हैं’ यह ज्ञान तथा ‘‘एक रहेंगे’ इसका निश्चय होकर जो अपूर्व आत्मीयता तथा तन्मयता हृदय से उत्पन्न होती है वही राष्ट्र का अधिष्ठान है, इस सत्य को वे अच्छी तरह से जानते थे। परायो ने हिन्दुओं के आत्मविश्वास पर आघात करने के लिए संघ को साम्प्रदायिक, राष्ट्र विरोधी तथा संकुचित कह तो इसमें आश्चर्य करने लायक कोई बात नहीं। कारण, हिन्दू समाज के स्वत्व-जागरण का अर्थ है उनका मरण। इसलिए हिन्दू समाज के मन में आत्मीयता की अर्थात् राष्ट्रीयता की जाग्रति न होने पाये इस उद्देश्य को सम्मुख रख ‘हिन्दुस्थान यहाँ रहनेवाले सबका है’ इस प्रकार का स्वार्थी प्रचार उन्होंने जोर से शुरू कर रखा था। यह प्रचार इतना सफल हुआ था कि आँखों देखते हिन्दू समाज की परकीयों द्वारा योजनाबद्ध रूप से चारों ओर से मारपीट होते हुए भी उसका प्रतिकार करने के लिए संघटित होना संकुचित लगने लगा था तथा उलटे आक्रमणकारियों का आलिंगन करने की आत्मघातकी वृत्ति दुर्दैव से श्रेयस्कर और सही समझी जाने लगी। डॉक्टरजी को समाज का यह दयनीय दृश्य स्पष्ट दिखता था। अतः लोगों की तात्कालिक निन्दा-स्तुति की चिन्ता न करते हुए जो सत्य था, इतिहास-सम्मत था, राष्ट्र के लिए हितकर था, परन्तु करने में कठिन था, वही संघकार्य उन्होंने निर्भयता से प्रारम्भ किया। छोटे बच्चे को घुट्टी पिलाते समय वह हाथ-पैर पीटकर खूब जोरों से रोता है। आत्मविस्मृत हिन्दू समाज की उस समय की स्थिति भी इसी प्रकार की थी। किन्तु बच्चे के आक्रोश करने पर भी माँ जिस प्रेम और आग्रह के साथ बच्चे को घुट्टी पिलाती है वही लगन और आग्रही वृत्ति ‘हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है’ यह आरोग्यप्रद एवं हितकर औषधि हिन्दू समाज के गले उतारने वाले डॉक्टरजी के हृदय में ओतप्रोत थी।
राष्ट्रीयत्व की यह दिशा देने के लिए डॉक्टरजी ने संघ की स्थापना की थी। उस समय की स्थिति उन्हें कैसी लगती थी यह देखने लायक है। अपनी स्मरणिका में वे लिखते हैं ‘‘..........महात्मा गांधी के असहयोग-आन्दोलन के समय का राष्ट्र को चढ़ा हुआ जोश ठण्डा हो गया था तथा उस आन्दोलन के कारण राष्ट्र में उत्पन्न होनेवाले दोष सिर ऊपर निकालकर घूमने लगे थे। राष्ट्रीय आन्दोलन का जोर कम होकर आपस में द्वेष और मत्सर स्पष्ट दृष्टिगोचर होते थे। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच झगड़े पराकाष्ठा को पहुँचते दिखायी देते थे। जाति-जाति के बीच झगड़े शुरू थे, ब्राह्मणेतरवाद ताण्डव नृत्य कर रहा था। किसी भी संस्था में एकसूत्रता नहीं दिखती थी। असहयोग-आन्दोलन में दूध पीकर पुष्ट हुए यवनरूपी सर्प अफनी विषभरी फुँफकारी सर्वत्र छोड़कर राष्ट्र में कलह उत्पन्न कर रहे थे।’’ इस सम्पूर्ण अनावस्था के बाह्य रूप विविध दिखे तो भी उनका मूल कारण हिन्दुओं की आत्मविस्मृति एवं असंघटितता है, यह अचूक निदान डॉक्टरजी ने कर लिया था तथा इन बाह्य लक्षणों का विचार न करते हुए मूल रोग को ही समाप्त करने की दृष्टि से संघटन की चिकित्सा शुरू की थी। उन्हें विश्वास था कि मूल रोग को यदि जड़ सहित खोदकर निकाल दिया गया तो उसके बाह्य लक्षण अपने आप क्रमशः नष्ट हो जायेंगे। कहा जा सकता है कि दिल्ली के मुगल तख्त के मूल पर ही कुठाराघात करनेवाले बाजीराव की दृष्टि ही डॉक्टरजी के इन प्रयत्नों के पीछे थी।
संस्था का नामकरण हो जाने के उपरान्त सभी घटकों को विशिष्ट वेश बनवाने का डॉक्टरजी ने आग्रह किया तथा अधिकांश लोग रामनवमी के मेले पर रामटेक में उसी वेश में उपस्थित रहे। प्रारम्भ में संघ ने उसी वेश को स्वीकार किया जो कि कांग्रेस अधिवेशन के समय डॉ. परांजपे तथा डॉ. हेडगेवार के नेतृत्व में बनाये गये ‘भारत सेवक समाज’ के स्वयंसेवकों का था। उसमें खाकी निकर, खाकी कमीज तथा दो बटनों की खाकी टोपी का अन्तर्भाव होता था। खाकी निकर की लम्बाई उस समय घुटने तक होती थी। दिनांक 19 अप्रैल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अनाथ विद्यार्थी गृह तथा बजरंग संघ की एक संयुक्त बैठक हुई तथा उसमें रामटेक जाने की योजना बनायी गयी।
रामटेक के उस मेले में रामनवमी के एक दिन पहले ही सब स्वयंसेवक वहाँ पहुँच गये। प्रातःकाल आठ बजे व्यवस्था के लिए टेकरी पर जाते हुए वे समर्थ रामदास के ‘मनाचे श्लोक’ गाते तथा संचलन करते हुए गये। यह सब लोगों के लिए एक नयी चीज थी, इसलिए दिन-भर वहाँ की जनता में संघ के स्वयंसेवक तथा उनके कार्यक्रम चर्चा के विषय बन गये। हजारों दर्शनार्थियों को भीड़ उमड़ने पर पुलिस वाले उनकी कोई व्यवस्था नहीं कर पाते थे। कारण, उनकी संख्या और कर्तव्यनिष्ठा दोनों ही कम पड़ते थे। संघ के स्वयंसेवकों तथा उनके सहकारियों ने प्रवेश द्वार के पास खड़े रहकर लोगों को प्रार्थनापूर्वक लाइन में खड़ा कर दिया तथा बारी-बारी से दर्शनों के लिए जाने की व्यवस्था कर दी। उन्होंने स्थान-स्थान पर पानी भरकर यात्रियों के लिए प्याऊ की भी व्यवस्था की। इस समय एक और बात ध्यान में आयी कि भावुक हिन्दुओं के अज्ञान का लाभ उठाने के दृष्टि से मुसलमान फकीर नगारखाने तक छोटी-छोटी कबरें बनाकर पीरों के नाम पर भोले-भाले यात्रियों से पैसा ऐंठते रहते थे। भोले-भाले लोगों को इन झूठे पीरों के आक्रमण का कुछ भी ज्ञान नहीं था तथा जिनको वह खटकता था उन्हें उसको रोकने का साहस नहीं होता था। डॉक्टरजी ने अपने सहकारी तथा रामटेक के अपने मित्रों की सहायता से इन पीरों का उच्चाटन कर दिया। डॉक्टरजी धार्मिक थे, कट्टर हिन्दू थे तथा सहिष्णुता भी उनके स्वभाव में थी। परन्तु पीरों को नाम पर हिन्दुओं पर आक्रमण करनेवाले मुसलमानों की इर प्रकार गरीबों को लूटने की चाल वे सहन नहीं कर सकते थे। मुसलमानों के समान ही, भीड़ में से दर्शन कराने के सहारे पैसा कमानेवाले पण्डों को भी डॉक्टरजी द्वारा लाइन में खड़ा करके बारी-बारी से दर्शनों की व्यवस्था करने के कारण नुकसान हो गया। भगवान् से अब सिफारिश करने की गुंजाइश नहीं बची तथा इस प्रकार कुछ हाथ गरम करने का जो मौका मिल जाता था वह भी जाता रहा। अतः वे भी डॉक्टरजी से मन-ही-मन नाराज थे। किन्तु धर्मक्षेत्र में अधर्म को मिटाने में लबार और ठगों को क्या लगेगा इसकी उन्होंने कभी चिन्ता नहीं की। पौशाला के रूप में लोगों को पानी पिलाकर उनकी पीठ पर फिरनेवाला डॉक्टरजी का ममता-भरा हाथ पशुता तथा नीचता को देखते ही वज्रमुष्टि बन जाता था। उनका यही स्वभाव था। प्रातः आठ से सायं पाँच बजे तक स्वयंसेवकों ने वहाँ काम किया। फिर रात्रि को भोजन के उपरान्त विश्राम किया। संघ के प्रारम्भ से ही हाथ में लिया गया वह कार्यक्रम बहुत वर्षो तक चलता रहा तथा अधिकाधिक संख्या में स्वयंसेवक वहाँ जाते रहे।
रामटेक का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद संघ में श्री सोहोनी के नेतृत्व में लाठी-शिक्षण का कार्य पहले के समान ही आरम्भ हो गया। इस आकर्षण के कारण नये-नये तरुण संघ में आने लगे। श्री अनन्त गणेश उपाख्य अण्णा सोहोनी का कद ऊँचा तथा वर्ण गौर था। उनके शरीर में बल और फुर्ती दोनों ही थे। वे लाठी, तलवार, भाला तथा छुरी चलाने में बड़े निपुण थे। उनकी कुशलता मन को सहज आकृष्ट करनेवाली थी। संख्या के इस प्रकार बढ़ने पर डॉक्टरजी ने नये-नये घटकों को भी धीरे-धीरे संघ की विचारधारा से अवगत कराना प्रारम्भ किया। चाहे जिस तरुण को एकदम संघ में प्रवेश नहीं मिलता था। यदि कोई तरुण संघ में प्रवेश लेना चाहता था तो संघ को दो पुराने स्वयंसेवको यह प्रमाणित करना पड़ता था कि उनका उससे अच्छा सम्बन्ध है। तब डॉक्टरजी दो-तीन बार उसको बुलाकर उससे बातचीत करते थे। यह बातचीत बड़े सहज भाव से तथा आजादी के साथ होती थी। परन्तु डॉक्टरजी का ध्यान आनेवाले स्वंयसेवक के स्वभाव, वृत्ति तथा गुणों के परखने की ओर रहता था। वे नाम, गाँव, उम्र, शिक्षा, पालक, मित्र, सायंकाल के कार्यक्रम आदि बातों की पूछताछ करते थे। बहुत-से आनेवाले तरुणों के घरवालों में अनेक डॉक्टरजी के परिचित ही निकल आते थे। इस प्रकार की प्राथमिक पृच्छा के बाद डॉक्टरजी उससे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्न पूछते थे। वे इन प्रश्नों के द्वारा देखते थे कि व्यक्ति की गहराई तथा समझदारी कितनी है। ‘‘यहाँ से वापस जाते समय यदि पुलिसवाले ने पूछा कि ‘तू डॉक्टर हेडगेवार के के यहाँ गया था तथा वहाँ क्या बातचीत हुई’ तो क्या उत्तर देगा’’, ‘‘संघ में क्यों आना चाहते हो’’, ‘‘कल संघ में मतभेद हो गया तो क्या करोगे’’ आदि अनेक प्रश्न रहते थे। इनके वह क्या उत्तर देता है इसका विचार कर उसे दो-चार दिन के बाद फिर आने को कहकर बिदा करते थे। इस भेंट में आनेवाले के मनोभाव को समझने के साथ-साथ अपने प्रश्नों के द्वारा उसके मन में समाज की स्थिति तथा उसके प्रति अपने कर्तव्य के सम्बन्ध में विचारों को चालना मिल जाये, यह भी उनका प्रयत्न रहता था। ‘‘लाठी सीखने की इच्छा क्यों हो रही है’’, ‘‘अकेले लाठी सीखने से क्या होगा’’, ‘‘तुम अपने साथ और कितने तरुण ला सकते हो’’ आदि प्रश्न थे जो व्यक्ति के विचारों को शान्त नहीं बैठने दे सकते थे। यदि कोई समझदार तरुण मिल गया तो फिर उनके प्रश्न जरा दूसरे ढंग के रहते थे। उससे वे पूछते ‘‘स्वराज्य के अर्थ क्या हैं, स्वराज्य चाहिए यह कहनेवाले कितने और उसके लिए प्रयत्न करनेवाले कितने ?’’ यह हिसाब पूछकर वे उसके ध्यान में ला देते थे अँगुलियों पर गिनने लायक व्यक्ति भी स्वराज्य के बारे में प्रयत्न नहीं करते हैं। डॉक्टरजी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि एक बार उनसे जो मिल गया फिर उसके पैर अपने आप उनके घर की ओर ही बढ़ जाते थे। उनके शब्द ओठ से नहीं, हृदय से निकलते थे। फूल की सुगन्धि जैसे महक जाती है वैसी ही डॉक्टरजी के त्यागपूर्ण एवं ध्येयनिष्ठ जीवन का स्वर उनकी कृति और उक्ति से स्वभावतः ही प्रकट होता था। उनका प्रेम ऊपर-ऊपर का तथा औपचारिक नहीं था बल्कि उनकी उत्कट एवं अनन्य देशभक्ति का रंग उनसे मिलने आनेवाले पर चढ़े बिना नहीं रहता था। उनसे मिलकर वापस जानेवाले को वे जीने तक पहुँचाने आते थे तथा उसके कन्धे पर हाथ रखकर अपने प्रसन्न हास्य की उसके ऊपर आनन्दमयी वर्षा करते हुए पूछते थे कि ‘‘फिर कब आओगे ?’’ इस प्रश्न से घर की ओर मुड़े हुए पैर भी कुछ देर रुक गये हैं यही अनुभव होता था।
नये-नये स्वयंसेवकों की भर्ती के कारण ‘इतवार दरवाजा प्राथमिक शाला’ का आँगन छोटा पड़ने लगा अतः नये स्थान की खोज प्रारम्भ हुई। डॉ. खानखोजे, श्री भाऊजी कावरे तथा डॉक्टरजी ने 1908-9 से लगाकर जिस मोहिते के बाड़े का अपने क्रान्तिकारी गुप्त कामों के लिए उपयोग किया था उस ओर उनकी दृष्टि गयी। किन्तु 1908 की तुलना में 1926 में बाड़े में बहुत टूट-फूट हो चुकी थी। डॉ. खानखोजे ने 1908 में बाड़े का वर्णन इन शब्दों में किया है ‘‘यह एक छोटा सा किला ही था। उस समय वृद्ध साळूबाई अकेली सरदारी ठाट-बाट के साथ उसमें रहती थीं। उनमें पुराने मराठों का देशाभिमान बहुत मात्रा में जाग्रत् था। बाड़े के विशाल पत्थरवाले दरवाजे पर एक सिपाही रात-दिन पहरा देता रहता था। बिना अनुमति के कोई अन्दर नहीं जा सकता था। बाड़ा दुमंजिला था तथा अन्दर बड़े-बड़े दालान थे।’’ पर 1926 में इस बाड़े की कुछ दीवारें तथा नींव ही बची थी। इधर-उधर गिरी हुई दिवारों के ढेर के नीचे उसका प्राचीन वैभव धूल में मिल कराह रहा था। साळूबाई के बाद बाड़े का कोई वारिस नहीं बचा, अतः उसकी दुर्दशा होना स्वाभाविक ही था। इस खण्डहर का उपयोग डॉ. परांजपे तथा डॉ. हेडगेवार ने 1920 में कांग्रेस-अधिवेशन के समय भी किया था। किन्तु उस समय जैसे-तैसे जो भाग काम में आ सका था वह भी अब ढह गया था। फिर भी उस स्थान की साफ-सफाई कराने तथा वहाँ संघस्थान बनाने का विचार हुआ। उस समय श्री भाऊजी कावरे ने अपने मजाकिया स्वभाव के अनुसार कुह कि ‘‘श्रीमन्त साळूबाई के बाद बाड़ा भूतों को मिला था तथा उनसे आजकल मुझे उत्तराधिकार में मिला है। अतः आप जैसा चाहें वैसा उसका उपयोग कीजिए।’’
संघस्थान के लिए जगह निश्चित करने के उपरान्त आजकल खड़े पत्थरवाले दरवाजे के पूर्व की ओर कुछ भाग साफ किया गया। यह काम संघ लगने के पूर्व तथा छुट्टी के दिन अन्य समय भी होता था। कुदाल, फावड़ा तथा तसला लेकर डॉक्टरजी स्वयं अन्य तरुण स्वयंसेवकों के साथ गिरी पड़ी भीतों के मलबे को साफ करने में जुटते थे। ऊँट पर बैठकर भेड़ चराने की पद्धति का उन्होंने बाहर भली भाँति अनुभव किया था तथा उन्हें उससे बड़ी घृणा तथा अरुचि हो गयी थी। उनकी तो धारणा थी कि अपने को बड़ा समझकर दूसरों को आदेश मात्र न देते हुए नेता को भी सबके साथ मिलकर काम करना चाहिए। खरे नेतृत्व का तथा खरे स्वयंसेवक का यह प्रथम पाठ डॉक्टरजी ने मोहिते बाड़े की धूल में अपने श्रमसीकरों के द्वारा दिया था। संघ के ये प्रथम ‘घूल-अक्षर’ थे जो आज भी स्वयंसेवकों को प्रेरणा देते हैं, तथा जो समाज में यथार्थ रूप से ‘अक्षर’ होकर रहेंगे।
संघ में नियमित रूप से लाठी की शिक्षा दिनांक 28 मई 1926 से आरम्भ हुई। उसके लिए धीरे-धीरे नयी आज्ञाएँ बनाने की आवश्यकता हुई। श्री अण्णा सोहोनी ने यह काम बड़ी सफलता के साथ कर दिखाया। अंग्रेजी की आज्ञाएँ सामान्यतः प्रचलित होते हुए भी उन्हें स्वीकार न करते हुए आग्रहपूर्वक स्वभाषा में आज्ञाएँ बनायी गयीं। इनके बनाने में मराठी, हिन्दी तथा संस्कृत सभी भाषाओं का आधार लिया गया था। जिस समय घर और बाहर चारों ओर अंग्रेजी का ही बोलबाला था तथा उस भाषा का उपयोग करने में कुछ विशेष गौरव का अनुभव होता था उस समय स्वभाषाओं में आज्ञाएँ निर्माण करने का आग्रह एवं प्रयत्न कुछ लोगों को अतिरेकी लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉक्टरजी का स्वभाव व्यवहार की मर्यादाओं को लाघँकर कभी शेखचिल्ली के समान ‘अति’ या कल्पना-जगत् में विचरने का नहीं था। अतः शाखा के कार्यक्रम में ‘सावधान’, ‘दक्ष’, ‘आराम’ आदि आज्ञाओं का प्रयोग करते हुए भी सैनिक शिक्षण के लिए आपद्धर्म के नाते उन्हें अंग्रेजी आज्ञाओं का प्रयोग करने में भी कोई झिझक नहीं हुई। हवा देखकर नौका के पाल को उस दिशा में मोड़ने का कौशल्य उनके पास था, किन्तु गन्तव्य का निर्धारण हवा के रुख के आधार पर नहीं किया जा सकता यह भी वे भली-भाँति जानते थे।
इन शारीरिक कार्यक्रमों के अन्त में प्रार्थना शुरू की गयी। उसमें एक मराठी तथा एक हिन्दी का पद था। मराठी-पद कहाँ से लिया गया इसका पता नहीं चलता, परन्तु बताते हैं कि उन दिनों प्राथमिक पाठशालाओं में वह प्रार्थना के रूप में गाया जाता था। हिन्दी प्रार्थना ‘आर्य समाज’ में प्रचलित प्रार्थना कुछ रूपान्तर करके ही गयी थी। यह प्रार्थना निम्नलिखित थीः-
नमो मातृभूमी जिथे जन्मलो मी
नमो हिन्दुभूमी जिथे वाढ़लो मी।
नमो धर्मभूमी जियेच्याच कामीं
पडो देह माझा सदा ती नमी मी।।
हे गुरो श्री रामदूता शील हमको दीजिए
शीघ्र सारे सद्गुणों से पूर्ण हिन्दू कीजिए।
लीजिए हमको शरण में रामपन्थी हम बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीरव्रतधारी बनें।।
मोहिते बाड़े पर श्री अण्णा सोहोनी तथा उनके द्वारा कुछ चुने हुए प्रशिक्षित तरुणों के द्वारा स्वयंसेवकों के भिन्न-भिन्न पथक बनाकर लाठी आदि की शिक्षा प्रारम्भ की गयी। लाठी-भाला आदि के हाथ चलाते हुए दोनों पैरों पर दबकर खड़े रहने का पैंतरा अन्य अखाड़ों तथा व्यायामशालाओं से भिन्न एवं संघ की शारीरिक शिक्षा की विशेषता थी। किन्तु उससे भी बढ़कर अण्णा सोहोनी द्वारा आविष्कृत एवं संघ में प्रचलित ‘युद्धयोग’ अपनी आक्रामकता, आवेश, संरक्षणक्षमता आदि की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण था। ‘युद्धयोग’ की पद्धति अन्य कहीं प्रचलित नहीं थी।
लाठी की यह विशेष शिक्षा श्री अण्णा सोहोनी को प्रसिद्ध क्रान्तिकारक स्व. दामोदर बळवन्त उपाख्य भिड़े भटजी से मिली थी। भिड़े भटजी ने ही सेनापति बापट को क्रान्ति की दिक्षा दी थी तथा वे ही प्रयत्नपूर्वक डॉ. मुंजे को राजनीति के अखाड़े में लाने के लिए उत्तरदायी थे। बिना बोले शान्त रीति से तथा लगन के साथ देशभक्ति का प्रसार करनेवालों में उनकी गणना प्रमुख रूप से करनी होगी। इस प्रकार के महान् व्यक्ति से मिला हुआ लाठी-भाला आदि आयुधों का शिक्षणक्रम तथा पैंतरा संघ में प्रचलित हुआ तथा आगे क्रम से प्रगति भी करता गया।
उस समय के संघ के कार्यवाह श्री रघुनाथराव बाण्डे के द्वारा एक पुस्तिका में लिखी गयी टिप्पणियाँ डॉक्टरजी के उन दिनों के प्रयत्नों पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। उनसे यह पता चलता है कि दिनांक 21 जून 1926 को अनाथ विद्यार्थी गृह में एक बैठक हुई थी। उस बैठक में प्रत्येक स्वयंसेवक को बताया गया कि वह एक कागज पर अपना ध्येय, संघ का ध्येय तथा वह संघ का चालक हो गया तो संघ की कार्यपद्धति और रचना कैसी रखेगा इन सबके सम्बन्ध में अपने विचार लिखे। यह भी निश्चित हुआ कि वह कागज डॉक्टरजी के पास दिनांक 28 जून तक पहुँचा देना चाहिए। स्पष्ट है कि दूसरों को विचार के लिए प्रवृत्त करने की यह डॉक्टरजी की योजना थी। केवल डॉक्टरजी बोलते रहें तथा तरुण स्वयंसेवक चुपचाप सुनकर ‘जो बताया वह करनेवाले तथा जो दिया वह खानेवाले’ दास की प्रवृत्ति से उनके अनुयायी कहलाकर व्यवहार करें, यह बात डॉक्टरजी को पसन्द नहीं थी। डॉक्टरजी का दृढ़ विश्वास था कि यदि स्वयंसेवकों के विचार को प्रेरणा दी तो वे विशुद्ध हिन्दू समाज की ओर, तथा उस संकल्प की पूर्ति के लिए अपना जीवन समर्पण करने की ओर स्वयं खिंचते चले जायेंगे। उनको यह कभी भी आशंका नहीं होती थी कि यदि स्वयंसेवकों को चारों ओर की परिस्थिति की कल्पना हुई तो हिन्दू राष्ट्र के प्रति उनका विश्वास डगमगा जायेगा। प्रत्युत उन्हें तो यही लगता थी कि देश की यथार्थ स्थिति का ज्ञान तरुण मन को हुआ तो उसे यह समझ में आ जायेगा कि संघटन के अतिरिक्त इस परिस्थिति को बदलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है, तथा उसमें से ही स्वयं प्रयत्न करने की प्रेरणा उत्पन्न होगी। डॉक्टरजी को इस प्रकार के विचारवान् तथा स्वयंस्फूर्तिवाले कार्यकर्ता निर्माण करने थे और इस हेतु उन्होंने स्वयंसेवकों से संघ के विषय में उपर्युक्त विचार लिखने को कहा था।
इन दिनों प्रत्येक मास के प्रथम रविवार को बैठक होती थी जिसमें पिछले मास का प्रतिवेदन सबके सम्मुख रखा जाता था। उसी समय अगले महीने-भर के कार्यक्रम भी निश्चित होते थे। उन दिनों यह नियम था कि प्रत्येक स्वयंसेवक महीने में कम-से-कम एक-दो बार डॉक्टरजी से अवश्य ही मिले। इस समय डॉक्टरजी तथा अन्य अधिकारी आग्रहपूर्वक इस बात की पूछताछ करते थे कि स्वयंसेवक व्यायामशाला में जाता है या नहीं।
डॉक्टरजी ने रक्षाबन्धन का उत्सव भी संघ में मनाया। इस उत्सव पर साधारणतया बहन के द्वारा भाई को तथा ब्राह्मणों के द्वारा शेष समाज को राखी बाँधने की पद्धति प्रचलित थी। उसके पीछे बहन और ब्राह्मणों की रक्षा करने का अभिवचन अभिप्रेत है। डॉक्टरजी ने इसे राष्ट्र की तथा बन्धुत्व के आधार पर परस्पर की रक्षा करने का निश्चय प्रकट करनेवाले त्योहार का रूप देकर राष्ट्रीयता की संस्कार-निर्मित का महत्वपूर्ण साधन बनाया। पहला रक्षाबन्धन-उत्सव तुलसी बाग में दिन के दो बजे बैठक के रूप में मनाया गया।
मस्जिद के सामने बाजा बजाते हुए निकलने के अधिकार को अबाधित रखने की दृष्टि से संघ के प्रारम्भिक दिनों में स्वयंसेवक डॉक्टरजी की प्रेरणा से इस प्रकार के जुलूसों में भाग लेते थे। 1925 के प्रारम्भ में नागपुर में हिन्दू-मुसलमानों के झगड़ों का फैसला करने के लिए पं. मोतीलाल नेहरू, डॉ. महमूद तथा मौलान अबुलकलाम आजाद की एक जाँच-समिति बैठी थी। उस समिति ने निर्णय दिया था कि भोंसले घराने की तथा जागोबा की कोई भी शोभायात्रा मस्जिद के सामने से कभी भी बाजा बजाते हुए निकल सकती है तथा अन्य शोभायात्राएँ शहर की पाँच प्रमुख मस्जिद के सामने दोपहर तथा सायंकाल की नमाज के समय आधा-आधा घण्टा छोड़कर अन्य समय बाजे के साथ निकल सकती है। किन्तु यह निर्णय कागज पर ही रह गया था। मुसलमानों की हठधर्मी तथा हिन्दुओं की भीरुता हो इसके लिए कारण थी। इस स्थिति को देखकर डॉक्टरजी का विचार था कि मुसलमानों ने जैसे ही ‘‘बाजा बन्द करो’’ कहा वैसे ही उससे भी कड़कती आवाज के साथ ‘‘बाजा बजाओ’’ कहनेवाले साहसी हिन्दू हर शोभायात्रा के साथ होने चाहिए। जैसी कि अपेक्षा थी स्वयंसेवकों के इन शोभायात्राओं में भाग लेने के कारण वे निर्विध्न रूप से निकलने लगीं। कुछ दिनों के बाद तो संघ जैसे-जैसे बढ़ने लगा वैसे-वैसे मुसलमानों का हठ कम होकर उनमें भी समझदारी दिखने लगी। ‘‘भय बिन होय न प्रीति’’ यह उक्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के मानव-स्वभाव के गहरे अध्ययन का ही परिपाक है। वैसे इस