15/01/2026
*सब तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार*:
गंगा सागर मेला भारत के प्राचीनतम एवं पवित्र धार्मिक मेलों में से एक है। यह मेला पश्चिम बंगाल के गंगासागर नामक स्थान पर आयोजित होता है, जहाँ पवित्र गंगा नदी बंगाल की खाड़ी से मिलती है। इस संगम को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के पावन दिन यहाँ स्नान, दान और पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी भाव को व्यक्त करती यह प्रसिद्ध बानी प्रचलित है—
“सब तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार।”
गंगा सागर मेले का संबंध कपिल मुनि और राजा सगर की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार राजा सगर के 60,000 पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। बाद में उनके वंशज राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या कर माता गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया, जिनके पावन जल से सगर पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई। माना जाता है कि यह दिव्य घटना इसी गंगासागर स्थल पर घटित हुई थी। इसीलिए यह स्थान युगों से श्रद्धा और आस्था का केंद्र बना हुआ है।
ऐतिहासिक दृष्टि से गंगा सागर मेला हजारों वर्षों से निरंतर आयोजित होता आ रहा है। इसका उल्लेख विभिन्न पुराणों एवं धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। विद्वानों के अनुसार यह मेला 1500–2000 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है, जबकि धार्मिक परंपराएँ इसे और भी पुरातन मानती हैं। समय के साथ इसकी महत्ता और विस्तार निरंतर बढ़ता गया।
यह मेला प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी (मकर संक्रांति) को लगता है, जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस शुभ अवसर पर लाखों श्रद्धालु गंगासागर में स्नान कर दान-पुण्य करते हैं और कपिल मुनि के मंदिर में दर्शन करते हैं। इस आध्यात्मिक भावना को दर्शाती एक और भावपूर्ण बानी इस प्रकार है—
“जहाँ गंगा सागर से मिल जाए,
वहीं जीवन का उद्धार हो जाए।”
आज गंगा सागर मेला कुंभ मेले के बाद भारत का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक एकता का सजीव प्रतीक है।