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22/03/2025

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08/03/2025

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01/03/2025

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कौन हैं भगवान कल्कि? कलियुग में कब और कहां लेंगे जन्म? भविष्य पुराण में छिपा है रहस्य आइये जानते हैं: हिंदू धर्म शास्त्र...
13/01/2025

कौन हैं भगवान कल्कि? कलियुग में कब और कहां लेंगे जन्म? भविष्य पुराण में छिपा है रहस्य आइये जानते हैं
: हिंदू धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का जिक्र किया गया है. इन 10 अवतारों में से विष्णु के 9 अवतार धरती पर हो चुके हैं. अब सभी को इंतजार है भगवान के 10वें अवतार कल्कि का.
धर्म शास्त्रों के अनुसार जब भी धरती पर बुराई व अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है तब उसका अंत करने के लिए भगवान अवतार लेते हैं. कलियुग में भी भगवान धरती पर अवतार लेंगे और बुराइयों का अंत करेंगे. कलियुग के भगवान कल्कि होंगे.तो आइए जानते हैं,
कब जन्म लेंगे भगवान कल्कि?
मत्स्य पुराण में भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की तरह ही 10वें अवतार कल्कि का वर्णन किया गया है. इस पुराण के अनुसार भगवान कल्कि धरती पर कलियुग के अंतिम चरण में जन्म लेंगे. यानि जब कलियुग समाप्त होने वाला होगा तब भगवान विष्णु कल्कि के रूप में धरती पर आएंगे.तो आइए जानते हैं,
कहां होगा भगवान कल्कि का जन्म?
भविष्य पुराण के अनुसार धर्म ग्रंथों में दी गई जानकारियों के अनुसार भगवान विष्णु के 10वें अवतार भगवान कल्कि सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन जन्म लेंगे. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के संभल जिले में विष्णु भक्त ब्राह्मण परिवार के घर में होगा. ग्रंथों के अनुसार भगवान कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होंगे और दुष्टों का नाश करेंगे. उनके घोड़े का नाम देवदत्त होगा. और
कल्कि 64 कलाओं से परिपूर्ण होंगे, वह हाथ में तीर-कमान धारण कर धरती पर धर्म की स्थापना करेंगे. कलयुग के अंतिम समय में कल्कि का जन्म होगा. कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्षों का होगा. अभी कलियुग का प्रथम चरण चल रहा है जिसमें से कलियुग के 5126 साल बीत चुके हैं और 426875 साल अभी बाकी हैं.

मार्कंडेयपुराण के अनुसार आज से हजारों वर्ष पूर्व धरती पर एक असुर हुआ करता था जिसका नाम था रक्तबीज | रक्तबीज ने भगवान ब्र...
12/01/2025

मार्कंडेयपुराण के अनुसार आज से हजारों वर्ष पूर्व धरती पर एक असुर हुआ करता था जिसका नाम था रक्तबीज | रक्तबीज ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और उनसे ये वरदान माँगा की वो उसे अमर कर दें | भगवान ब्रह्मा ने उसे ऐसा वरदान देने से मना कर दिया पर इसके बदले में उन्होंने रक्तबीज को ये वरदान दिया की जब भी रक्तबीज किसी से युद्ध करेगा और उस युद्ध में अगर उसके तन से एक भी रक्त की बूँद धरती पर गिरेगी तो उसके खून से एक नया रक्तबीज जन्म ले लेगा |
इस शक्तिशाली वरदान की वजह से रक्तबीज ने अनगिनत युद्ध जीते और धरती पर उसका दुराचार धीरे धीरे बढ़ता गया | रक्तबीज के बढ़ते उत्पात को ख़त्म करने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर उसपर आक्रमण कर दिया पर उसके वरदान के आगे देवता भी हार गए, और
हारे हुए देवता माँ दुर्गा के पास सहायता मांगने पहुचे | माँ दुर्गा ने देवताओं की प्रार्थना सुनकर तब अपना सबसे प्रचंड स्वरूप माँ काली का रूप लिया और वो निकल पड़ी रक्तबीज का वध करने | रक्तबीज को सामने पा के माँ काली अपने रौद्र रूप में आ गयी | उन्होंने उसपर सीधा वार शुरू किया पर रक्त की हर एक बूँद के साथ एक नया रक्तबीज पैदा हो जाता था | ये देख कर माँ काली और भी रुष्ट हो गयी | तब उन्होंने अपनी जीभ का विस्तार किया और रक्तबीज के शरीर से गिर रही हर एक बूँद को वो सीधे अपनी जीव से पी जाती | देखते ही देखते उन्होंने रक्तबीज का वध कर दिया |

पुराणिक कथाओ के अनुसार महिषासुर एक असुर था। महिषासुर के पिता रंभ, असुरों का राजा था जो एक बार जल में रहने वाले एक भैंस स...
12/01/2025

पुराणिक कथाओ के अनुसार महिषासुर एक असुर था। महिषासुर के पिता रंभ, असुरों का राजा था जो एक बार जल में रहने वाले एक भैंस से प्रेम कर बैठा और इन्हीं के योग से महिषासुर का आगमन हुआ। इसी वज़ह से महिषासुर इच्छानुसार जब चाहे भैंस और जब चाहे मनुष्य का रूप धारण कर सकता था। संस्कृत में महिष का अर्थ भैंस होता है।

महिषासुर सृष्टिकर्ता ब्रम्हा का महान भक्त था और ब्रम्हा जी ने उन्हें वरदान दिया था कि कोई भी देवता या दानव उसपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

महिषासुर बाद में स्वर्ग लोक के देवताओं को परेशान करने लगा और पृथ्वी पर भी उत्पात मचाने लगा। उसने स्वर्ग पर एक बार अचानक आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया तथा सभी देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया। देवगण परेशान होकर त्रिमूर्ति ब्रम्हा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। सारे देवताओं ने फिर से मिलकर उसे फिर से परास्त करने के लिए युद्ध किया परंतु वे फिर हार गये।

कोई उपाय न मिलने पर देवताओं ने उसके विनाश के लिए दुर्गा का सृजन किया जिसे शक्ति और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। देवी दुर्गा ने महिषासुर पर आक्रमण कर उससे नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसी उपलक्ष्य में हिंदू भक्तगण दस दिनों का त्यौहार दुर्गा पूजा मनाते हैं और दसवें दिन को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। जो बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है।

विष्णु भगवान का ‘मुरारी’ नाम कैसे पड़ा ?वामन पुराण के अनुसार प्राचीन काल में कश्यप ऋषि का औरस पुत्र ‘मुर’ नाम का एक असुर...
11/01/2025

विष्णु भगवान का ‘मुरारी’ नाम कैसे पड़ा ?
वामन पुराण के अनुसार प्राचीन काल में कश्यप ऋषि का औरस पुत्र ‘मुर’ नाम का एक असुर था । असुरों का स्वभाव होता है देवताओं से लड़ना । असुरों ने कई बार देवताओं से युद्ध किया, परन्तु जीत सदैव देवताओं की हुई; क्योंकि जहां भगवान का आश्रय हो, जीत वहीं होती है । बार-बार हारने से असुर बलहीन हो गए । मुर दैत्य ने सोचा कि कहीं देवता हमें मार ही न दें; इसलिए मरने के डर से भयभीत होकर उसने बहुत काल तक ब्रह्माजी की तपस्या की । उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा ।

मुर ने कहा—‘जो मैं मांगूं, उसे आप दें तो मैं अपनी बात कहूँ ।’

ब्रह्माजी ने कहा—‘तुम्हारी तपस्या से मैं कृतज्ञ हूँ, तुम जो मांगोगे, वह मैं दूंगा ।’

मुर ने कहा—‘मैं युद्धक्षेत्र में या कहीं भी अपनी हथेली जिसके शरीर पर रख दूँ, वह मर जाए; चाहे वह अमर ही क्यों न हो ?’

देवता अमर होते हैं; इसलिए यह बात मुर ने देवताओं के लिए कही थी । असुरों की बुद्धि माया से मोहित होती है, इसलिए वे विनाश ही मांगते हैं ।

ब्रह्माजी ने ‘तथाऽस्तु’ कह दिया । मुर दैत्य वर पाकर त्रिभुवन में घूमा; परन्तु किसी की भी हिम्मत उससे युद्ध करने की नहीं हुई ।

मुर दैत्य ने सोचा—यमराज ही सबको मारने वाला है, अतएव सबसे पहले उसी को मारना चाहिए । सो वह यमराज के पास पहुंचा ।

यमराज ने बुद्धिमानी से काम लेते हुए कहा—‘मैं तो निर्बल हूँ, मुझसे तुम क्या लड़ोगे ? तुम्हें लड़ना ही है तो मैंने सुन रखा है कि वैकुण्ठ में जो नारायण है, वह बहुत बलवान है । देवताओं को सारा बल वहीं से प्राप्त होता है । उनको तुम समाप्त कर दो, तो तुम्हारी जीत सदा के लिए हो जाएगी ।’

मुर दैत्य को बात समझ आ गई । वह तुरंत वैकुण्ठ लोक पहुंच गया और भगवान नारायण के पास जाकर खड़ा हो गया ।

भगवान ने उससे कहा—‘तुम यहां किस काम से आए हो ?’

मुर दैत्य ने कहा—‘मैं तुमसे युद्ध करने आया हूँ ।’

मुर की बात सुनकर भगवान नारायण ने कहा—‘तुम आए हो मुझसे लड़ने के लिए, परन्तु जैसे किसी को ज्वर हो जाए तो उसका कलेजा कांपता है; उसी प्रकार तुम्हारा कलेजा क्यों कांप रहा है ? मैं तुम्हारे जैसे डरपोक से नहीं लड़ता ।’

मुर दैत्य ने कहा—‘तुम मुझे डरपोक कहते हो, मेरा कलेजा कहां कांप रहा है ?’

भगवान ने कहा—‘तुम हाथ लगाकर देखो, कांप रहा है या नहीं ?’

मुर ने जैसे ही कलेजे पर हाथ रखा, वह जैसे केले की जड़ कट कर गिर जाती है, वैसे ही पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरते ही भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया । सभी देवता वहां आकर भगवान की जय-जयकार कर कहने लगे—‘आपने सबको बचा लिया, नहीं तो यह दैत्य किसी को छोड़ता नहीं ।’

उस दिन से भगवान का नाम ‘मुरारी’ (मुरारि) हो गया—‘मुरारि’ अर्थात् मुर के शत्रु, मुर को मारने वाले ।

19/10/2024

Balaji temple mehndipur

12/09/2024

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