11/01/2025
विष्णु भगवान का ‘मुरारी’ नाम कैसे पड़ा ?
वामन पुराण के अनुसार प्राचीन काल में कश्यप ऋषि का औरस पुत्र ‘मुर’ नाम का एक असुर था । असुरों का स्वभाव होता है देवताओं से लड़ना । असुरों ने कई बार देवताओं से युद्ध किया, परन्तु जीत सदैव देवताओं की हुई; क्योंकि जहां भगवान का आश्रय हो, जीत वहीं होती है । बार-बार हारने से असुर बलहीन हो गए । मुर दैत्य ने सोचा कि कहीं देवता हमें मार ही न दें; इसलिए मरने के डर से भयभीत होकर उसने बहुत काल तक ब्रह्माजी की तपस्या की । उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा ।
मुर ने कहा—‘जो मैं मांगूं, उसे आप दें तो मैं अपनी बात कहूँ ।’
ब्रह्माजी ने कहा—‘तुम्हारी तपस्या से मैं कृतज्ञ हूँ, तुम जो मांगोगे, वह मैं दूंगा ।’
मुर ने कहा—‘मैं युद्धक्षेत्र में या कहीं भी अपनी हथेली जिसके शरीर पर रख दूँ, वह मर जाए; चाहे वह अमर ही क्यों न हो ?’
देवता अमर होते हैं; इसलिए यह बात मुर ने देवताओं के लिए कही थी । असुरों की बुद्धि माया से मोहित होती है, इसलिए वे विनाश ही मांगते हैं ।
ब्रह्माजी ने ‘तथाऽस्तु’ कह दिया । मुर दैत्य वर पाकर त्रिभुवन में घूमा; परन्तु किसी की भी हिम्मत उससे युद्ध करने की नहीं हुई ।
मुर दैत्य ने सोचा—यमराज ही सबको मारने वाला है, अतएव सबसे पहले उसी को मारना चाहिए । सो वह यमराज के पास पहुंचा ।
यमराज ने बुद्धिमानी से काम लेते हुए कहा—‘मैं तो निर्बल हूँ, मुझसे तुम क्या लड़ोगे ? तुम्हें लड़ना ही है तो मैंने सुन रखा है कि वैकुण्ठ में जो नारायण है, वह बहुत बलवान है । देवताओं को सारा बल वहीं से प्राप्त होता है । उनको तुम समाप्त कर दो, तो तुम्हारी जीत सदा के लिए हो जाएगी ।’
मुर दैत्य को बात समझ आ गई । वह तुरंत वैकुण्ठ लोक पहुंच गया और भगवान नारायण के पास जाकर खड़ा हो गया ।
भगवान ने उससे कहा—‘तुम यहां किस काम से आए हो ?’
मुर दैत्य ने कहा—‘मैं तुमसे युद्ध करने आया हूँ ।’
मुर की बात सुनकर भगवान नारायण ने कहा—‘तुम आए हो मुझसे लड़ने के लिए, परन्तु जैसे किसी को ज्वर हो जाए तो उसका कलेजा कांपता है; उसी प्रकार तुम्हारा कलेजा क्यों कांप रहा है ? मैं तुम्हारे जैसे डरपोक से नहीं लड़ता ।’
मुर दैत्य ने कहा—‘तुम मुझे डरपोक कहते हो, मेरा कलेजा कहां कांप रहा है ?’
भगवान ने कहा—‘तुम हाथ लगाकर देखो, कांप रहा है या नहीं ?’
मुर ने जैसे ही कलेजे पर हाथ रखा, वह जैसे केले की जड़ कट कर गिर जाती है, वैसे ही पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरते ही भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया । सभी देवता वहां आकर भगवान की जय-जयकार कर कहने लगे—‘आपने सबको बचा लिया, नहीं तो यह दैत्य किसी को छोड़ता नहीं ।’
उस दिन से भगवान का नाम ‘मुरारी’ (मुरारि) हो गया—‘मुरारि’ अर्थात् मुर के शत्रु, मुर को मारने वाले ।