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कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?यह तब की बात है जब पाण्डव अपने ते...
28/12/2021

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?

यह तब की बात है जब पाण्डव अपने तेरह वर्ष के अज्ञातवास पर थे, और इस दौरान वे घने जंगलों में वास कर रहे थे। सभी भाई पेड़ की छाया में बैठकर विश्राम कर रहे थे कि अचानक हैरान और परेशान एक मुनि उनके पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि एक हिरण उनके हाथों से यज्ञ की लकड़ी लेकर भाग गया, उन्हें वह वापस चाहिए।

पांचों भाइयों ने मुनि की सहायता करने हेतु उस हिरण की खोज आरंभ कर दी। खोज करते हुए वे सभी काफी आगे निकल गए, गर्मी का समय था तो वे काफी थक भी गए। अब उन्हें इस तपती गर्मी में अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी चाहिए था, लेकिन दूर-दूर तक उन्हें कोई जलाशय ना दिखा।

अंतत: पानी खोजने का काम सबसे छोटे भाई सहदेव को सौंपा गया। कुछ दूर चलने पर सहदेव को एक जलाशय दिखाई दिया। वह वहां पहुंचा और उसने देखा कि जलाशय में बेहद ठंडा पानी है, पानी साथ ले जाने की बजाय सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सहदेव पानी पीने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो एक आवाज़ सुनाई दी।

यह आवाज़ अदृश्य यक्ष की थी जो चाहता था कि सहदेव पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दे और फिर पानी पीये। लेकिन सहदेव ने यक्ष की एक ना सुनी और जैसे ही पानी अपने होठों से लगाया वह चक्कर खाकर गिर गया। यक्ष ने उसे मूर्छित कर दिया....

जब काफी देर तक सहदेव ना लौटा तो अन्य भाईयों को चिंता होने लगी। फिर एक-एक करके क्रमानुसार नकुल, अर्जुन और भीम सभी उस जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की चेतावनी सुने बिना पानी पी लिया और बदले में यक्ष ने उन्हें मूर्छित कर दिया।

अब बचे थे युधिष्ठिर... सभी भाई कब से निकले थे लेकिन वापस ना लौटे। अब आखिरकार युधिष्ठिर ने सबको खोजने का फैसला किया और निकल पड़े। जब वे जलाशय के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके चारो भाई जमीन पर गिरे हुए हैं, लेकिन क्यों, इस बात से अनजान थे युधिष्ठिर।

उन्होंने अपने सामने शीतल जल का जलाशय देखा, और कुछ भी अन्य करने से पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए जैसे ही आगे बढ़े तो उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। यक्ष ने उन्हें चेतावनी दी कि वे पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दें, तभी वह उन्हें पानी पीने देगा।

कुछ धैर्य दिखाते हुए युधिष्ठिर मान गए और कहा कि पूछो तुम्हें क्या पूछना है। युधिष्ठिर के आग्रह पर यक्ष ने उनसे कुल सौ सवाल पूछे लेकिन यहां हम आपके सामने कुछ गिने-चुने सवाल रखने जा रहे हैं। साथ ही जानिए इन सवालों पर युधिष्ठिर का क्या जवाब था....

यक्ष ने अपना पहला सवाल किया... उसने युधिष्ठिर से पूछा कि कौन हूं मैं?

जिस पर जवाब आया कि ‘तुम न श

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?यह तब की बात है जब पाण्डव अपने ते...
28/12/2021

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?

यह तब की बात है जब पाण्डव अपने तेरह वर्ष के अज्ञातवास पर थे, और इस दौरान वे घने जंगलों में वास कर रहे थे। सभी भाई पेड़ की छाया में बैठकर विश्राम कर रहे थे कि अचानक हैरान और परेशान एक मुनि उनके पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि एक हिरण उनके हाथों से यज्ञ की लकड़ी लेकर भाग गया, उन्हें वह वापस चाहिए।

पांचों भाइयों ने मुनि की सहायता करने हेतु उस हिरण की खोज आरंभ कर दी। खोज करते हुए वे सभी काफी आगे निकल गए, गर्मी का समय था तो वे काफी थक भी गए। अब उन्हें इस तपती गर्मी में अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी चाहिए था, लेकिन दूर-दूर तक उन्हें कोई जलाशय ना दिखा।

अंतत: पानी खोजने का काम सबसे छोटे भाई सहदेव को सौंपा गया। कुछ दूर चलने पर सहदेव को एक जलाशय दिखाई दिया। वह वहां पहुंचा और उसने देखा कि जलाशय में बेहद ठंडा पानी है, पानी साथ ले जाने की बजाय सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सहदेव पानी पीने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो एक आवाज़ सुनाई दी।

यह आवाज़ अदृश्य यक्ष की थी जो चाहता था कि सहदेव पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दे और फिर पानी पीये। लेकिन सहदेव ने यक्ष की एक ना सुनी और जैसे ही पानी अपने होठों से लगाया वह चक्कर खाकर गिर गया। यक्ष ने उसे मूर्छित कर दिया....

जब काफी देर तक सहदेव ना लौटा तो अन्य भाईयों को चिंता होने लगी। फिर एक-एक करके क्रमानुसार नकुल, अर्जुन और भीम सभी उस जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की चेतावनी सुने बिना पानी पी लिया और बदले में यक्ष ने उन्हें मूर्छित कर दिया।

अब बचे थे युधिष्ठिर... सभी भाई कब से निकले थे लेकिन वापस ना लौटे। अब आखिरकार युधिष्ठिर ने सबको खोजने का फैसला किया और निकल पड़े। जब वे जलाशय के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके चारो भाई जमीन पर गिरे हुए हैं, लेकिन क्यों, इस बात से अनजान थे युधिष्ठिर।

उन्होंने अपने सामने शीतल जल का जलाशय देखा, और कुछ भी अन्य करने से पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए जैसे ही आगे बढ़े तो उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। यक्ष ने उन्हें चेतावनी दी कि वे पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दें, तभी वह उन्हें पानी पीने देगा।

कुछ धैर्य दिखाते हुए युधिष्ठिर मान गए और कहा कि पूछो तुम्हें क्या पूछना है। युधिष्ठिर के आग्रह पर यक्ष ने उनसे कुल सौ सवाल पूछे लेकिन यहां हम आपके सामने कुछ गिने-चुने सवाल रखने जा रहे हैं। साथ ही जानिए इन सवालों पर युधिष्ठिर का क्या जवाब था....

यक्ष ने अपना पहला सवाल किया... उसने युधिष्ठिर से पूछा कि कौन हूं म

🚩🚩 । जय श्री हरि विष्णु। 🚩🚩आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है । ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल द...
28/12/2021

🚩🚩 । जय श्री हरि विष्णु। 🚩🚩

आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है । ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट झेला होता है ।

अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण एक 'धनंजय प्राण' को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं ।

ये प्राण, आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिये सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है । धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है ।

बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है ।

उसे बेचैनी होने लगती है, घबराहट होने लगती है । सारा शरीर फटने लगता है, खून की गति धीमी होने लगती है । सांँस उखड़ने लगती है । बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं ।

अर्थात् अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्च्छा आने लगती है । चैतन्य ही आत्मा के होने का संकेत है और जब आत्मा ही शरीर छोड़ने को तैयार है - तो चेतना को तो जाना ही है और वो मूर्छित होने लगता है ।

बुद्धि समाप्त हो जाती है और किसी अनजाने लोक में प्रवेश की अनुभूति होने लगती है - यह चौथा आयाम होता है ।

फिर मूर्च्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्रिय से बाहर निकल जाती है । इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है । यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिह्न होता है ।

शरीर छोड़ने से पहले - केवल कुछ पलों के लिये आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत-प्रतिशत सजीव करती है - ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध न रहे - और फिर उसी समय आत्मा निकल जाती है और शरीर खाली मकान की तरह निर्जीव रह जाता है ।
इससे पहले घर के आसपास कुत्ते-बिल्ली के रोने की आवाजें आती हैं । इन पशुओं की आँखे अत्याधिक चमकीली होती है जिससे ये रात के अँधेरे में तो क्या सूक्ष्म-शरीर धारी आत्माओं को भी देख लेते हैं ।

जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृतात्माओं के रूप में होते है उसे लेने आते हैं और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते-बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते हैं और अनजान होने की वजह से उन्हें देखकर रोते हैं और कभी-कभी भौंकते भी हैं ।

शरीर के पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी तरह सूक्ष्म-

🙏🌹🙏*मन तुम्हे ध्यान से बचाएगा। वह हजार बहाने खोजेगा। वह कहेगा कि इतनी सुबह, इतनी सर्द सुबह, कहां उठ कर ध्यान कर रहे हो? ...
21/12/2021

🙏🌹🙏

*मन तुम्हे ध्यान से बचाएगा। वह हजार बहाने खोजेगा। वह कहेगा कि इतनी सुबह, इतनी सर्द सुबह, कहां उठ कर ध्यान कर रहे हो? थोड़ा विश्राम कर लो। रात भर वैसे तो नींद नहीं आई, और अब सुबह से ध्यान? वैसे तो थके हो, अब और थक जाओगे। शांत पड़े रहो। कल करना। इतनी जल्दी भी क्या है? कौन सा जीवन चूका जा रहा है? हजार बहाने मन खोजता है।*

*कभी कहता है, शरीर ठीक नहीं, तबियत जरा ठीक कर लूँ । कभी कहता है, घर में काम है। कभी कहता बाज़ार है, दूकान है नौकरी है समय नहीं मिलता। कभी कहता अभी उम्र नहीं हुई। कभी कहता पूजा पाठ तो चल ही रहा है।*

*ध्यान से बचने की मन पूरी कोशिश करता है। क्योंकि ध्यान सीधा रास्ता है जो मालिक तक पहुँचाता है जीवन के लक्ष्य का प्रयोजन पूरा करता है।*

*परमात्मा से लोग वंचित हैं -* *इसलिए नहीं कि वह बहुत कठिन है, इसलिए वंचित हैं कि वह बहुत सरल है; इसलिए वंचित नहीं कि बहुत दूर है, इसलिए वंचित हैं कि बहुत पास है...*

*इसलिए सिर्फ भजन सिमरन ध्यान करो बाकी सब प्रभु की मौज ।*

*_┈┉══❀((हरि ॐ))❀══┉┈_*

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🌺 श्री परमहंस अद्वैत स्वरूप मत 🌺👍*मन और स्थूल शरीर का सम्बन्ध*चक्की में दो पाटे होते हैं। उनमें यदि एक स्थिर रह कर दूसरा...
21/12/2021

🌺 श्री परमहंस अद्वैत स्वरूप मत 🌺
👍*मन और स्थूल शरीर का सम्बन्ध*

चक्की में दो पाटे होते हैं। उनमें यदि एक स्थिर रह कर दूसरा घूमता रहे तो अनाज पिस जाता है और आटा बाहर आ जाता है। यदि दोनों पाटे एक साथ घूमते रहेंगे तो अनाज नहीं पिसेगा और परिश्रम व्यर्थ होगा।*

इसी प्रकार मनुष्य में भी दो पाटे हैं- एक मन और दूसरा शरीर। उसमें मन स्थिर पाटा है और शरीर घूमने वाला पाटा है! अपने मन को भगवान के प्रति स्थिर किया जाए और शरीर से गृहस्थी के कार्य किए जाएं। प्रारब्ध रूपी खूँटा, शरीर रूपी पाटे में बैठकर उसे घुमाता है और घुमाता रहेगा लेकिन मन रूपी पाटे को सिर्फ भगवान के प्रति स्थिर रखना है। देह को तो प्रारब्ध पर छोड़ दिया जाए और मन को नाम सुमिरन और सदगुरु ध्यान में विलीन कर दिया जाए।

राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि ।सरबस तजि रसबस भये, नैन कोर तन चाहि ।।नैंक नैन की कोर मोरि मोहन बस कीनें ।राधे तेरे रूप...
21/12/2021

राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि ।
सरबस तजि रसबस भये, नैन कोर तन चाहि ।।
नैंक नैन की कोर मोरि मोहन बस कीनें ।
राधे तेरे रूप की पटतर को दीनें ।।
कमल कोस अलि ज्यौं चलैं तारे रँगभीनें ।
श्रीभट तन अंजन छुवै लालन लव लीने ।।

हे श्री राधे आपके रूप की उपमा किससे दी जाए क्यूँकि आपके नेत्रों की कोर के कटाक्ष से वशीभूत होकर श्री श्याम सुंदर अपना सर्वस्व त्याग कर इन्हीं के होकर रह गये हैं । हे राधे तुम्हारे नेत्रों की उपमा देना किसी रसिक कवि के वश की बात नहीं क्यूँकि जो मनमोहन सब के मन को वश में कर लेते हैं, ऐसे मोहन को भी तूने अपने नेत्रकोर को नेक-सा [थोड़ा सा] मोड़कर अर्थात् उनसे कटाक्ष कर अपने आधीन कर लिया है।

जिस प्रकार कमल-सम्पुट में प्रविष्ट भ्रमर शोभायमान लगता है ऐसे ही तुम्हारे नेत्रों के तारे (गोलक) रूपी भ्रमर अंजन से अनुरञ्जित होने के कारण शोभायमान दिखता है । श्री भट्टजी कहते हैं- इस प्रकार श्री प्रियाजी के नेत्रों में लगे हुए कटीले अञ्जन की ओर थोड़ी सी भी दृष्टि के चले जाने पर श्रीलालजी उनके छवि-दर्शन में ही लीन होकर रह जाते हैं ।
👀💞❣️💞👀

श्रीचैतन्य महाप्रभु की कोटि के रससिद्ध सन्त तो स्वयं श्रीराधारानी के स्वरूप ही होते हैं। वैसे प्राय: उच्च कोटि के रससिद्...
15/12/2021

श्रीचैतन्य महाप्रभु की कोटि के रससिद्ध सन्त तो स्वयं श्रीराधारानी के स्वरूप ही होते हैं। वैसे प्राय: उच्च कोटि के रससिद्ध संत किसी उच्च महाभावापन्न सखी अथवा मंजरी के प्रतिनिधि रूप होते हैं। ऐसी गोपी भावापन्ना किसी सन्त से दीक्षा हुए बिना निकुञ्जलीला में प्रवेश प्राय: होता नहीं है। यह रस की अनादि सिद्ध परिपाटी है। श्रीपोद्दार महाराज ऐसे ही‌ बहुत ही उच्च कोटि के रससिद्ध सन्त थे। उन्होंने निर्गुण निराकार मत के परमाग्रही पू. गुरुदेव को चरण स्पर्श करके सगुण साकारवादी बना दिया था। उन्हें साक्षात् सगुण-साकार वृन्दावनेश्वर के दर्शन कराये, परन्तु यह कृपा उन्होंने अपने सिद्ध सन्तस्वरूप से ही की थी। यहाँ उन्होंने अपने महाभाव-मय रससिद्ध राधाभाव भावित स्वरूप को संगुप्त ही रखा था, क्योंकि राधाभाव की विलक्षण अति उच्च प्रीतिस्थिति को प्राप्त करने के पू. गुरुदेव उस समय सर्वथा अनधिकारी थे। वे तो रासलीला आदि श्रीमद्भागवद्गीता के प्रसंगों को प्रक्षिप्त मानते थे, उनकी मखौल उड़ाया करते थे। अत: कृपाशक्ति ने उन्हें मात्र वृन्दावनेश्वर श्री कृष्ण के, कदम्बवृक्ष के नीचे स्थित रूप के ही दर्शन पाने का अधिकारी माना था।
अब उनकी उत्कट जिज्ञासा भक्तिलीला बीज को प्राप्त करने की हो रही थी। यथार्थत: यही तथ्य है कि श्रीकृष्ण दर्शन तो सुलभ है, वे तो असुरों, दुर्योधनादि कृष्णद्वेषी जनों को भी दर्शन दे देते हैं, परन्तु भक्तिलीला का बीज तो उद्धवादि श्रीकृष्ण के अन्तरंग सखाओं को भी गोपियों की चरणधूलि की कृपा से ही मिल सकता है। श्रीकृष्ण भगवान स्वयं भी किसी को अपना प्रेम नहीं दे सकते। भगवान श्रीकृष्ण को भी अपना प्रेम देने के लिये राधा रूप ही ग्रहण करना पड़ता है अत: जबतक पू. गुरुदेव श्रीपोद्दार महाराज के सखी स्वरूपा सिद्धदेह से सम्पर्कित नहीं होते उनका निकुंजलीला में प्रवेश असंभव था।
श्री मन्महाप्रभु ने श्री सनातनगोस्वामीपाद को शिक्षा देते हुए मध्यलीला के बाईसवें परिच्छेद के ४८ वें पयार छन्द में कहा है - “कृष्ण भक्ति जन्म मूल हय साधु-संग' यहाँ साधु का अर्थ गोपीभावापन्न किसी रससिद्ध सन्त से ही है।
श्रीमन्महाप्रभु श्री रूपशिक्षा में भी कहते हैं -
*ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव*
*गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाये भक्तिलता बीज ।।१३।।*
यह भक्तिबीज महत्कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। यहाँ केवल कृष्णकृपा उन्होंने नहीं कहा वरं 'कृष्णप्रिया' का ही वाचक यहां 'गुरु' शब्द है। कृष्ण-प्रिया गोपीजन एवं श्री राधारानी ही प्रीतिभक्ति का बीज प्रदान कर सकती हैं - यही तात्पर्य है।
प्रेम' कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा का नाम है। कृष

ना महिनो की गिनती, ना सालो का हिसाब.... तेरा मेरा इश्क़ बेइंतहा..., बेहिसाब.... राधे राधे राधे राधे राधे🙏💕
15/12/2021

ना महिनो की गिनती, ना सालो का हिसाब....

तेरा मेरा इश्क़ बेइंतहा..., बेहिसाब....

राधे राधे राधे राधे राधे🙏💕

_*एकादशी का आनन्द*__जनाबाई सेविका थीं। उनका सौभाग्य था कि वह संत नामदेव के घर में परिचारिका का काम करती थीं। पानी भरना, ...
15/12/2021

_*एकादशी का आनन्द*_

_जनाबाई सेविका थीं। उनका सौभाग्य था कि वह संत नामदेव के घर में परिचारिका का काम करती थीं। पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन मांजना, कपड़े धोना और चक्की पीसना उनका नित्यकार्य था।_

_*संत नामदेव जी के घर में हमेशा भगवान का भजन कीर्तन होता था। भक्ति की अविरल सरिता बहती थी। धीरे धीरे जनाबाई भी इस सरिता में स्नान करने की अभ्यस्त हो गईं। मन और प्राणों के द्वार खुल गए। (संत संग का प्रभाव)*_

_भक्ति का प्रवाह अंदर तक होने लगा। अब तो जनाबाई के मुख ही नहीं प्राणों से भी पवित्र भगवन्नाम का का निरंतर उच्चारण होने लगा। *एक बार एकादशी के दिन संत नामदेव जी के यहां भक्तमंडली जमा हुई थी। पूरी रात भगवान विट्ठल का नाम कीर्तन चलता रहा। दिन भर व्रत के चलते जनाबाई ने अन्न ग्रहण नहीं किया था। भक्त जन कीर्तन करते रहे और एक कोने में बैठकर जनाबाई प्रेमाश्रु बहाती रहीं।*_

_द्वादशी का पक्ष लगा और पारण उपरांत, जनाबाई घर लौट गईं। पूरी रात की थकान थी। अगले दिन उठने में देर हो गई। जब नींद खुली तो हड़बड़ाकर उठ बैठीं। शीघ्र नित्यकर्म से निवृत होकर भक्त शिरोमणि नामदेव के घर पहुंची। झाड़ू किया, बर्तन मांजे और कपड़े धोने के लिए नजदीक चंद्रभागा नदी के किनारे पहुंचीं।_

_कपड़े धोते धोते ध्यान आया कि जिस कमरे में कीर्तन होता है उसे व्यवस्थित करना तो भूल ही गईं। कपड़े धोने के लिए डुबाए जा चुके थे। उसे छोड़कर जाना भी संभव नहीं था। *पूर्व दिन के एकादशी व्रत, भजन, संतो के संग और रात्रि जागरण का आनन्द था कि जनाबाई का हृद्य अपने आराध्य के लिए पूरी व्यवस्था नहीं कर पाने के बोझ से भर आया। भक्त के मन की पीड़ा भगवान तक पहुंच जाती है। वह तत्काल कोई न कोई उपाय करते हैं।*_

_*लीला हुई! जनाबाई चिंता में बैठी थीं कि तभी एक वृद्ध महिला वहां आ पहुंची और पूछा कि आखिर किस चिंता में डूबी हो! जनाबाई ने सारी परेशानी बता दी। उन्होंने कहा कि जाओ तुम कीर्तन का कमरा ठीक कर आओ तुम्हारे कपड़े मैं धो दूंगी। जनाबाई को तो जैसे संजीवनी मिल गई।* उन्होंने कहा, माता तुम कपड़े धोना मत। बस केवल देखभाल करती रहो, मैं तुरंत कमरा ठीक करके आती हूं। *प्रभु की माया! जनाबाई को इतना भी अवकाश नहीं था, कि वह सोचतीं कि आखिर यह वृद्धा है कौन! और उसके मन की व्यथा उसने इतनी आसानी से कैसे जान ली!* वो तुरंत भागीं और कमरे की व्यवस्था करके उल्टे पांव लौटीं।_

_तभी उन्होंने दूर से देखा की वो वृद्धा जा रही थीं और सारे कपड़े धुल कर सूख रहे थे। कपड़े धुल भी गए, सूख भी गए। यह सारा काम इतनी जल्दी कैसे हो गया! जनाबाई तुरंत उस वृद्धा के पीछे दौड़

*हरिनाम करो और कानों से सुनो* तभी संसार का कूड़ा कचरा जो अनंतकोटी जन्मो से हृदह में भरा पड़ा है, अश्रुधारा से बहकर शरीर से...
12/12/2021

*हरिनाम करो और कानों से सुनो*

तभी संसार का कूड़ा कचरा जो अनंतकोटी जन्मो से हृदह में भरा पड़ा है, अश्रुधारा से बहकर शरीर से बाहर निकल जायेगा और हृदह निर्मल हो जाएगा शुद्ध हो जाएगा ठाकुर जी के बैठने के लायक हो जाएगा,
*हृदह में एक ही वस्तु रह सकती है या तो संसार या तो भगवान* इसलिए सतर्क होकर भक्ति करे
हम कृष्ण के है और कृष्ण हमारे है, हमारे पास जो कुछ भी है सब कृष्ण का है इसलिए हर वस्तु पहले कृष्ण को अर्पित करे फिर प्रसाद रूप से ग्रहण करे तो दिव्य प्रेम की प्राप्ति होगी
भगवान के प्रसाद की 4 परिक्रमा करके महाप्रसाद का आशीर्वाद प्राप्त करे, प्रसाद से मन सुधरता है ,मन और बुद्धि की चंचलता कम होती है और मन कृष्ण में लगता है, यह शास्त्रों की वाणी है, सन्तो की वाणी है, सभी धर्म ग्रन्थों की वाणी है, इस पर पूर्णनिष्ठा पूर्ण श्रद्धा रखे ,पूर्ण विश्वास रखे, तो जीवन कृष्णमयी होगा, भक्तिमय होगा, आनंदमय होगा🙏

भक्ति का क्या फल है?आज का प्रभु संकीर्तन।जब हम अपना एक पग भक्ति की ओर बढ़ाते हैं तो हमारे अंदर धीरे धीरे सत्वगुण का समावे...
12/12/2021

भक्ति का क्या फल है?

आज का प्रभु
संकीर्तन।

जब हम अपना एक पग भक्ति की ओर बढ़ाते हैं तो हमारे अंदर धीरे धीरे सत्वगुण का समावेश होने लगता हैं।जैसे जैसे हम भक्ति में स्वयं को लगाते हैं, हम दूसरों की निंदा,मोह, माया को छोड़कर सत्यप्रकाश की ओर बढ़ते जाते हैं।मन के भीतर से सारे विकार स्वतः ही बाहर निकल जाते हैं।हमारे जीवन मे सुख शांति और संतुष्टि प्रवेश कर जाते हैं।फिर अच्छा-बुरा, लाभ-हानि,मेरा तेरा कुछ शेष नही रह जाता।भक्त में अनेको सतगुण स्वतः उतपन्न हो जाते हैं। हम सभी में कुछ न कुछ अच्छाई, और कुछ न कुछ बुराई जरूर होती है।हमे दुसरो की अच्छाई को पकड़ उनकी बुराइयों से आंखे बंद कर लेनी चाहिए।क्योंकि हमें अपना आपा सुधारना है, दूसरे तो हमारे व्यवहार से एक न एक दिन स्वयं सुधर जाएंगे आपके बुराई को नजरअंदाज करने से एक न एक दिन व्यक्ति को अपनी गलतियों का अहसास जरूर होता है।और उसका जीवन ही बदल जाता है।वह सदैव हमें ही ढूंढने का प्रयास करता है।पढिये कथा। एक बार एक व्यक्ति की उसके बचपन की टीचर से मुलाकात होती है । वह उनके चरण स्पर्श कर अपना परिचय देता है।वे बड़े प्यार से पूछती है, 'अरे वाह, आप मेरे विद्यार्थी रहे है, अभी क्या करते हो, क्या बन गए हो ?'
मैं भी एक टीचर बन गया हूं ' वह व्यक्ति बोला,' और इसकी प्रेरणा मुझे आपसे ही मिली थी जब में 7 वर्ष का था।'उस टीचर को बड़ा आश्चर्य हुआ, और वे बोली कि,' मुझे तो आपकी शक्ल भी याद नही आ रही है, उस उम्र में मुझसे कैसी प्रेरणा मिली थी ??'
वो व्यक्ति कहने लगा कि ....
जब में चौथी क्लास में पढ़ता था, तब एक दिन सुबह सुबह मेरे सहपाठी ने अपनी महंगी घड़ी चोरी होने की आपसे शिकायत की थी।
आपने क्लास का दरवाज़ा बन्द करवाया और सभी बच्चो को क्लास में पीछे एक साथ लाइन में खड़ा होने को कहा था। फिर आपने सभी बच्चों की जेबें टटोली थी। मेरे जेब से आपको घड़ी मिल गई थी जो मैंने चुराई थी। पर चूंकि आपने सभी बच्चों को अपनी आंखें बंद रखने को कहा था तो किसी को पता नहीं चला कि घड़ी मैंने चुराई थी।
टीचर उस दिन आपने मुझे लज्जा व शर्म से बचा लिया था। और इस घटना के बाद कभी भी आपने अपने व्यवहार से मुझे यह नही लगने दिया कि मैंने एक गलत कार्य किया था। आपने बगैर कुछ कहे मुझे क्षमा भी कर दिया और दूसरे बच्चे मुझे चोर कहते इससे भी बचा लिया था।'
ये सुनकर टीचर बोली, ' मुझे भी नही पता था बेटा कि वो घड़ी किसने चुराई थी।'
वो व्यक्ति बोला,'नहीं टीचर, ये कैसे संभव है ? आपने स्वयं अपने हाथों से चोरी की गई घड़ी मेरे जेब से निकाली थी।'
टीचर बोली.....
'बेटा मैं जब सबके पॉकेट चेक कर रही थी,

*💠🤝💠जय श्री राधे कृष्णा 💠🤝💠**हे कान्हा••••••जब भी आना••!!!!* *!!सबके लिए बस खुशियां ही लाना!!**!!कान्हा जो रोए हैं उन्हे...
12/12/2021

*💠🤝💠जय श्री राधे कृष्णा 💠🤝💠*

*हे कान्हा••••••जब भी आना••!!!!*
*!!सबके लिए बस खुशियां ही लाना!!*
*!!कान्हा जो रोए हैं उन्हें हंसाना!!*
*!!कान्हा जो रूठे हैं उन्हें मनाना!!*
*!!कान्हा प्यारे तुम जब भी आना!!*
*!!सबके लिए बस खुशियां ही लाना!!*

*!!राधे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।राधे!!*
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