10/06/2022
"भगवानः"
"भग्ग रागो, भग्ग दोसो, भग्ग मोहो ति भगवा"- अर्थात जिसने अपने "चित" से राग, व्देष और मोह का समूल नष्ट कर दिया इस अर्थ में "भगवान"।
"भगवान" शब्द के मूल में "भगवा" शब्द हैं जिसका अर्थः-
"भग्गरागोति भगवा"-राग को भग्न-नष्ट कर इस अर्थ में "भगवान"।
"भग्गदोसोति भगवा"-द्वेष को भग्न-नष्ट कर इस अर्थ में "भगवान"।
और
"भग्गमोहोति भगवा"-मोह को भग्न-नष्ट कर इस अर्थ में"भगवान"।
"भग्गकण्डकोति भगवा"-कंटक को भग्न-नष्ट कर इस अर्थ में "भगवान"।
"भग्गकिलेसोति भगवा"-क्लेश को भग्न-नष्ट कर इस अर्थ में "भगवान"।
उक्त शब्द के मूल पाली भाषिक अर्थ के स्पष्ट रुप में "गौरव, गरिमायुक्त" अर्थ से "भगवान" कहलाएँ।
"नाम रुप" के प्रति "तृष्णा" को काट-भग्न कर डाला, उस कटे गाँठ वाले "दुःख-मुक्ती" से जिसने "संसार की तृष्णा" को इस शब्द के मूल पाली भाषिक अर्थ के स्पष्ट रुप से "भगवान" कहलाएँ।
"संज्ञा, संस्कार और विज्ञान" को जो "निरुध्द कर" या नष्ट-भग्न कर इस अर्थ में "भगवान"।
"भजि विभजि पविभजि धम्मरतनन्ति भगवा"-अर्थात जिसने "धम्म रत्न" का जैसे "अणुओं रेणुओं" के खण्ड-खण्ड 'अभिनिष्करण' इस अर्थ में "भगवान"।
"भवानं अन्तकरोति भगवा"-अपने "भव-संस्कारों" नष्ट कर "निर्वाण" तक पहुँचे इस अर्थ में "भगवान"।
भजि, विभजि, पविभजि"-अर्थात जिसने एक महान वैज्ञानिक की भाँति "धम्म रत्न" का "अणुओं" में क्षण प्रतिक्षण खण्ड-खण्ड कर "अणुओं" का विश्लेषण कर "परमाणु" के छोटे-छोटे रुप में जाना इस अर्थ में "भगवान"।
बौध्द पाली-प्राकृत ग्रन्थ (वाङमय) की मदद से बौध्द भाषिक "भगवान" शब्द के मूल अर्थ रुप को स्पष्ट किया जा सकता हैं।
ब्राह्मणि और ब्राह्मणवादी लेखकों नें मूलतः वास्तविक पागलपन में उसे (पाली-प्राकृत भाषा को) दबाकर रख दिया हैं।
एक बेकार की झूठ मूठ की व्यक्तिशः प्रसिद्धी कि सुर्खियों के लिए नाम मात्र के अम्बेडकरराईट या वादी आँखें मूंदे हूँए कोल्हू के बैल उच्च शिक्षित इदर-उदर के सन्देहों को ले सिर्फ फिर रहें हैं?
विश्व प्रसिद्ध "मूल भारतीय बौध्द सभ्यता" में "भगवान" शब्द अत्यंत सरल हैं, इस के साथ कोई भी "तत्व" कि उलझन जुड़ी हूई नहीं हैं।
"भगवान" शब्द कि गूँज, मूल रुप, या पहचान अर्थ बोध क्या हैं!
उक्त प्रश्न अन्तर्विरोध तथा पूर्णतःबेहूदगियों भरा हैं?
जैसे आँखें बन्द कोल्हूँ के बैल कोल्हूँ के इर्द-गीर्द गोल घूमते नज्झ़र आतें हैं, वैसे हि कुछ तथाकथित "नाम मात्र के अम्बेडकर-वादी" उच्च शिक्षा में शिक्षित छिछोरे "बैल-बुध्दिवंत","गंवार बुध्दिजिवी" और "गुलाम प्रवृत्ती" के लम्पट इन्सान "God= ईश्वर जैसे भ्रम तथा अन्ध-श्रध्दा के इर्द-गीर्द ही घूमत नज्झ़र" आ रहें हैं।"भगवान" शब्द का अर्थ जिसने मानव जीवन कि "तृष्णाओं" को भंग (समूल नष्ट), विखंडित कर दिया हो वह भगवान् हैं।
पालि भाषा मे भगवान का अर्थ:-
पालि का भगवान अथवा भगवा दो शब्दों से बना हैं:–
"भग + वान्।"
पालि में भग मायने होता हैं :–
भंग करना, तोडना, समुल नष्ट करना, विखंडित होना, विखंडन में भाग करना अणुओं के टुकड़े टुकड़े के उपलब्धि को बांटना आदि और वान् का अर्थ हैं।
धारण्कर्ता, "तृष्णा" आदि।
यानि जिसने "तृष्णाओं" को खण्ड खण्ड कर दिया हो वह भगवान।
पालि-प्राकृत ग्रंथ संपदा में बुद्ध के लिये प्रयुक्त "भगवान" अथवा "भगवा" शब्द को परिभाषित करने के बहुत से उदाहरण प्रस्तुत किया गए हैं :
"भग्गरागोति भगवा" : जिसने राग को भग्न किया कर लिया वह भगवान।
"भग्गदोसोति भगवा" : जिसने द्वेष को भग्न किया हो वह भगवान।
"भग्गमोहोति भगवा" : जिन्होंने मोह को भग्न किया हो वह भगवान।
"भग्गमानोति भगवा" : जिन्होंने मन विकार को भग्न किया हो वह भगवान।
"भग्गकिलेसोति भगवा" : जिन्होंने क्लेश को भग्न किया हो वह भगवान।
"भवानं अंतकरोति भगवा" : जिन्होंने भव संस्कारों का अंत कर लिया हो वह भगवान।
"भग्गकण्ड्कोति 'भगवा" : जिन्होंने कंटक भाव को भग्न कर लिए हो वह भगवान।
"भग्गमानोति भगवा" : जिन्होंने अभिमान भाव नष्ट कर लिया हो वह भगवान।
"भग्गदिट्ठीति भगवा" : जिन्होंने दार्शिनिक मान्याताओं को भग्न कर लिया हो वह भगवान।
"भग्गकिलेसोति भगवा" : जिन्होंने क्लेश (काषाय) भाव को भग्न कर लिए हो वह भगवान।
"भजि विभजि पविभजि धम्म्रतन्तिभगवा" : भजि यानी जिसने धम्म रत्नों का भंजन किया हो वह भगवान।
^पालि-प्राकृत भाषा^ में ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं...! जिसमें "भगवान" शब्द का अर्थ *संस्कृत भाषा* के शाब्दिक अर्थ से बिल्कुल ही भिन्न भिन्न या अलग अलग मूलतः अर्थ प्रस्तुत किया गए हैं।
पालि में एक सुत्त हैं :
इतिपि सो भगवा अरहं, सम्मासम्बुद्धो,
विज्जा-चरण-सम्पन्नो, सुगुतो, लोकविदु,
अनुत्तरो, पुरिस-दम्मसारथी सत्था देव-मनुस्सानं, बुद्धो भगवा ति|
ऐसे जो अहर्त (जीवन मुक्त) है,
सम्यक् (सम्पूर्ण), सम्बुद्ध (जागृत), विञ्ञ (सर्वोच्च ज्ञानी), आचरणों में शील संपन्न, सुगत (विश्वास पात्र), मानव लोक में लोकप्रिय, जिन्होंने प्रश्न प्रतिप्रश्न के द्वंद्व का दमन किया, संसार के देव और मनुष्य के मार्गदर्शक हैं,
वहीं बुद्ध भगवान् हैं।
संपूर्ण जागृत हैं,
लोभ, द्वेष और मोह से मुक्त ऐसे भगवान हैं,
सर्वज्ञ हैं,
सम्यक ज्ञान और आचरण में परिपूर्ण हैं,
सुगति प्राप्त हैं,
वर्तमान और भूत भविष्य को जानने वाले हैं,
"यथावादी तथाकारी" जैसा कहते हैं वैसा करते हैं,
ऐसे आचरण वाले हैं,
मानव जीवन के लोभ, द्वेष और मोह से छुडाने वाले अप्रतिम सारथी हैं,
देवता और मनुष्यों के मार्गदर्शक या सास्ता हैं,
सम्यक पर दर्शक हैं,
सर्वोत्तम उपदेशक हैं,
मनुष्य जीवन में अनुपम, श्रेष्ठतम् और सर्वोत्तम बुध्द वहीं भगवान हैं।
जब हमारी जिम्मेदारी नाम ही शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं रहा तो मानव बुद्धि का विकास ही पूर्णतः रुक जाता हैं..!
तब तो कहना हि क्या?
"भगवान" शब्द पर प्रश्न को सुनकर "मैंने*" शून्य या अल्प सा विचार यहाँ प्रस्तुत एवं स्पष्ट कर दिया है।
मेरा नाम "धम्मानंद एल. वासनिक" है, फिलहाल मैं डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर नगर, बुद्ध विहार परिसर गॅलेक्सि हॉस्पिटल,अमरावती, विदर्भ प्रदेश (महा), भारत रहता हूं।
राष्ट्र संत गाडगे बाबा विश्वविद्यालय अमरावती से पालि-प्राकृत तथा राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रहा हूँ।
मैं पालि-प्राकृत ग्रंथ संपदा और राजनीति का पक्षधर हूँ,
जो बहिष्कृत अस्पृश्य-पिछड़ा समाज के शोषितों की पक्षधर है।
रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना और नई-नई आर्ट सीखना, मेरे व्यक्तित्व में "बुद्धिस्ट" लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।
"भवतू सब्ब मंगलम्।"
🙏🏻
जय भीम...
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