15/10/2023
माँ महामाया, सरगुजा और सरगुजा के पुरे विश्व में फैले प्रवासियों की अटूट आस्था की शक्तिपीठ केन्द्र, आदिशक्ति, महाशक्ति, प्रचण्ड चंडी, छिन्नमस्तक, उदार, ममतामयी वन देवी महामाया के साथ आदिकाल से एक साथ दो देवी प्रतिमा विराजमान थीं, जिन्हें "बड़ी समलाईं" और "छोटी समलाई" कहा जाता था. जनश्रुति अनुसार महाराजा को स्वप्न में महसूस हुआ की दोनों देवियों में एक साथ न रह सकने के स्तर तक झगड़ा या विवाद हो गया, या महाराजा द्वारा आस्था स्थल की संख्या बढ़ाने या आक्रांताओं की मूर्ति चोरी प्रयास से बचाव के उद्देश्य से दोनों देवियों को अलग-अलग स्थापित किया गया. जब बड़ी, छोटी दोनों समलाई माँ एक हीं स्थान पर थीं तब इनकी चमत्कारिक शक्तियों और तेज से अचंभित मराठे बार-बार पूरी मूर्तियां ढो कर अपहृत करनें में असमर्थ होने पर सिर काट कर ले गए, इसलिए प्रतिवर्ष शारदेय नवरात्र आरम्भ संधि रात्रि में एक कुम्हार परिवार द्वारा रात्रि में पीढ़ी दर पीढ़ी महामाया समलाया का नया सिर बनाया जाता है.
दुर्लभ देववृक्ष "अक्षयवट" की शीतल छाँव से आच्छादित बड़ी समलाया जिन्हें अब "महामाया" कहा जाता है, उनकी संगत के लिए बायीं ऒर मिर्जापुर से विन्ध्वासिनी देवी की काली रंग की प्रतिमा लाकर स्थापित की गईं वहीँ छोटी समलाया को मूल जगह से करीब पौन किलोमीटर शहर की ऒर पास में स्थापित किया गया. इस लिए मान्यता है कि दोनों देवी बहनों की एक साथ दर्शन किये बिना "महामाया दर्शन" बिल्कुल अपूर्ण या कम प्रभावी होता है. पहले दीदी "बड़ी समलाया" यानी "महामाया" फिर वापसी में बहन "छोटी समलाया" यानी "समलाया" का दर्शन किया जाना चाहिए.
महामाया द्वारा प्रसन्न हो दिया आशीर्वाद या मन्नत पर समलाया में मत्था टेकने के बाद मुहर लगनें पर प्रभावी या फलीभूत होती हैं, सरगुजा शक्ति का केंद्र रही है, रतनपुर, सम्बलपुर और डोंगरगढ़, झारसुगड़ा सहित कई जगहों पर सरगुजा की मूर्तियां या उनके अंगों के अंश ले जाने की जनश्रुति है.
~ #गोविन्द_शर्मा, (परिवर्धित-14.10.2016, fb
Govind Sharma & Surguja Sambhag Ek NaZar