17/06/2020
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी |
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी |
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी |
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी |
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी |
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी |
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी |
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी |
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार |
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार |
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार |
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ |
महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में |
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में |
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में |
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में |
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी |
किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी |
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी |
रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी |
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया |
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया|
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया |
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया |
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया |
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया |
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया |
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया |
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात |
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात |
उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात |
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार |
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार |
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार |
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार |
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान |
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान |
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान |
बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान |
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी |
यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी |
झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी |
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी |
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम |
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम |
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम |
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम |
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में |
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में |
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में |
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में |
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार |
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार |
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार |
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार |
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी |
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी |
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी |
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी |
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार |
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार |
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार |
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार |
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी |
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी |
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी |
हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी |
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी |
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी |
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी |
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी |
यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी |
होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी |
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी |
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी ।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी ।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ।
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