25/01/2026
जय सियाराम
सुंदरकांड का एक गूढ़ रहस्य — “उनचास मरुत”
सुंदरकांड का पाठ करते हुए जब 25वें दोहे पर दृष्टि ठहरती है, तो मन स्वतः ही गहरे चिंतन में चला जाता है।
लंका दहन के प्रसंग में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं—
“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥”
अर्थात—
भगवान श्रीराम की प्रेरणा से उस क्षण उनचास पवन चल पड़े।
हनुमान जी अट्टहास कर गर्जना करते हुए अपना विराट स्वरूप धारण कर आकाश को छूने लगे।
यहाँ प्रश्न उठता है—
ये ‘उनचास मरुत’ कौन हैं?
तुलसीदास जी इस पर सीधे कुछ नहीं कहते, पर सुंदरकांड पूरा करने के बाद जब वेद–पुराणों का अध्ययन किया जाता है, तो सनातन ज्ञान की गहराई पर गर्व होता है।
वेदों में वायु को केवल एक तत्व नहीं, बल्कि सात शाखाओं में विभाजित बताया गया है।
वायु का स्वरूप उसके स्थान के अनुसार बदलता है—
जल में स्थित वायु अलग है, आकाश में अलग, अंतरिक्ष में अलग और पाताल में स्थित वायु का स्वभाव भी भिन्न है।
वेदों में वर्णित वायु की सात प्रमुख शाखाएँ हैं—
1️⃣ प्रवह – पृथ्वी से मेघमंडल तक स्थित, मेघों को संचालित करने वाली शक्तिशाली वायु।
2️⃣ आवह – सूर्यमंडल में स्थित, सूर्य की गति को ध्रुव से आबद्ध रखने वाली।
3️⃣ उद्वह – चंद्रलोक में प्रतिष्ठित, चंद्र की गति की नियंत्रक।
4️⃣ संवह – नक्षत्र मंडल में स्थित, समस्त नक्षत्रों की गति की आधारशिला।
5️⃣ विवह – ग्रह मंडल में स्थित, ग्रहों के चक्र को संचालित करने वाली।
6️⃣ परिवह – सप्तर्षि मंडल में स्थित, ऋषियों के आकाशीय भ्रमण की कारण।
7️⃣ परावह – ध्रुव में स्थित, जो समस्त मंडलों को स्थिरता प्रदान करती है।
इन सातों वायुओं के सात-सात गण बताए गए हैं, जो विभिन्न लोकों और दिशाओं में विचरण करते हैं—
ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष तथा भूलोक की चारों दिशाओं में।
इस प्रकार—
7 × 7 = 49
यही हैं वे उनचास मरुत, जिनका उल्लेख तुलसीदास जी ने एक ही पंक्ति में कर दिया।
यह तुलसीदास जी के दिव्य वायु-ज्ञान का प्रमाण है—
जिसकी गहराई से आधुनिक विज्ञान भी आज विस्मित होता है।
यही सनातन धर्म की विशेषता है—
जहाँ एक-एक चौपाई में ब्रह्मांड का रहस्य छिपा है।
हम अक्सर रामायण और गीता पढ़ तो लेते हैं,
पर जब शब्दों के भीतर छिपे अर्थों का मंथन करते हैं,
तो ज्ञान के नए द्वार खुलते चले जाते हैं।
जय श्रीराम 🚩
जय हनुमान 🙏
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