Bol Bhartari Baba ki Jai

Bol Bhartari Baba ki Jai Bhartari baba ki jai . ALWAR Bhartari temple is a holy place in the district of Alwar. Samadhi of Shri Bhrathari was built by his disciples and devotees.

It is said that this place have come into existence hundreds years Before Christ. They made this place a permanent memory of the great sage Bhartrihari. Maharaj Bhartrihari who was a king of Ujjain had renounced his kingdom and become a Nath, disciple of Guru Gorakhnath. He practiced his ascetism here in this wild place full of jungles, wild animals and high Aravali Hills around. A small rivulet o

f clean water flows by. People worship the entombment of Bhartrihari. Here an incessantly burning lamp is cautiously guarded and it has been hurning for centuries. There is a Dhuni ( a fire place maintained by Nath Sadhus) which also keeps fire ablaze in every season and at every time. Bharatrihari in fact was infatuated with his beautiful wife Pingle who, however, was disloyal to him. When her infidelity was revealed to the king, he at once abandoned the queen, the kingdom and the royal palace and became a Nath. He accepted Guru Gorakhnath as his Guru and since then Bharatrihari became a Yogi. It is believed that Bhartrihari is immortal. He has not died and he visits the place now in any form, but no one can recognize him. Today lacs and lacs of people have their strong faith in Bhartrihari. The samadhi Sthal has now been built properly and tens of dharmshalas have also come up. In the month of Bhadrapad, Millions of people go to the samadhi. Throughout the year, in fact, pilgrims keep on visiting the place. This is a holy and natural place. Guru Gorakhnath. There is a Dhuni ( a fire place maintained by Nath Sadhus) which also keeps fire ablaze in every season and at every time.. While all festivals related to Lord Shiva are observed here, a special mela (fair) is held at this spot once in a year in the month of Bhadrapad. This temple belongs to the Nath cult. The customs is that of keeping dhuna fire burning and the Akshaydeep alight. This is virtually a wild and holy place where wandering Mendicants, Sadhus, Sanyasis, Nath, Snake Charmers, Tantrics, Mantrics and other people gifted with spiritual powers keep on visiting.This temple is in district of Alwar and near to the Sariska Tiger Project park. Some photographs from Bhartari temple........................... Akhand dhuni in the bharatri temple. A devotee worshiping in the Bharatari Temple... Pure and natural water coming from aravali hills...............Devotees offer bhuna chana and prasadam to monkeys, near temple......... You can see yogis and sadhus of Nath community............ Statue of Baba Bhartari in the temple....................

04/12/2025
10/10/2025
29/08/2025

लोकगीतों में भरथरी बाबा:
*कैंया आऊं रे भरथरी बाबा बरखा जोर दे री सै*

अलवर के लोक देवता भर्तृहरि नाथ का मेला हुआ शुरू , अष्टमी को रहेगा भर मेला

अलवर 28 अगस्त। दिल्ली और जयपुर के मध्य अरावली पर्वतमाला की गोद ‌मे यूं तो अनेक संत महात्माओं ने तपस्या की लेकिन उज्जैन के लोकप्रिय राजा से वीत रागी बने भर्तृहरि बाबा के महानतम तपबल के आगे सभी को नत मस्तक होना पड़ता है। राजपाट छोड़कर योग धारण करने के बाद भरथरी बाबा अलवर के निकट सरिस्का जंगल में जहां अखंड तप करते हुए समाधिस्थ हो गए थे वह स्थान भर्तृहरि बाबा के नाम से ही प्रसिद्ध हो गया। इसी स्थान पर सदियों से भादो के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को वार्षिक मेला भरता है। भर्तृहरि बाबा अलवर के लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं । भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भरथरी बाबा की घर-घर ज्योत देखी जाती है। अलवर ही नहीं अपितु राजस्थान और अन्य के प्रदेशों से ‌ लाखों की संख्या में श्रद्धालु भरथरी बाबा के दर्शन करने के लिए आते हैं। इस बार भर्तृहरि बाबा के मेले से पहले बारिश भी अच्छी हो रही है। खास तौर पर अनेक नजदीकी गांवों से मेले में जाने वाले ग्रामीण श्रद्धालु‌ पहले पैदल ही भरथरी बाबा के मेले में जाते रहे हैं इसलिए भरथरी बाबा के मेले को लेकर एक लोकगीत आज भी काफी लोकप्रिय है... अलवर की सड़कां पै भारी रपटन हो री सै ....कैंया आऊं रे भरथरी बाबा बरखा जोर देरी सै... फिर भी बारिश हो या भीषण गर्मी बाबा के दर पर लोग खिचे चले आते हैं। मेले के अलावा साल भर भी लोग खासी तादात में भारत हरी बाबा के दर्शन करने दूर दूर से आते रहते हैं। मेले का जो आकर्षण है वह अन्य मेलों से कुछ ज्यादा ही भिन्न कहा जा सकता है। जैसे कुंभ मेले में नागा साधु आस्था और आकर्षण का केंद्र होते हैं इसी तरह भर्तृहरि बाबा के मेले में नाथ संप्रदाय के अनेक साधुओं की पूरी संगत आती है। ‌ लोक भाषा में इन्हें कनफड़े साधु कहा जाता है। मान्यता है कि स्वयं भर्तृहरि बाबा भी साधु के रूप में अपने तपस्या स्थल पर अवश्य पहुंचते हैं। उनके दुर्लभ दर्शन किसी सौभाग्यशाली को ही होते हैं। भर्तृहरि मेले में विभिन्न गांवो के सामाजिक संगठनों की ओर से शीतल जल और शरबत आदि की प्याऊ भी लगाई जाती है। इसके अलावा श्रद्धालुओं के लिए अखंड भंडारे चलते हैं। लोकगीतों की तरह ही एक भजन भी भरथरी बाबा के बारे में सर्वाधिक गया जाता है जिसकी प्रारंभिक पंक्ति इस प्रकार है---
हुई सफल कमाई महाराज भरतरी थारी।
मालिक के कारण जोग फकीरी धारी।।

इन पंक्तियों में नश्वर संसार को त्याग कर वीतराग धारण करने के बारे में कितनी गहराई छुपी हुई है। महाराजा भरथरी को जब एहसास हुआ कि उनकी प्राणों से भी प्यारी रानी पिंगला अश्वशाला के प्रमुख क्रूर सिंह के मोह जाल में फंस गई और इसी के चलते उनका भाई विक्रमादित्य बिछुड़ गया तो संसार से उन्हें पूरी तरह से विरक्ति हो गई। वे गुरु की शरण में जा पहुंचे जहां गुरु गोरखनाथ ने उन्हें लोक कल्याण के लिए तपस्या का आदेश दिया। इससे पहले उनके सांसारिक मोह को पूरी तरह से दूर करने के लिए उन्होंने रानी पिंगला से मां कहकर भिक्षा लाने का आदेश भी दिया, ताकि भर्तृहरि के मन में रानी पिंगला के प्रति द्वेष या घृणा का भाव भी नहीं रहे। इस परीक्षा में राजा भरथरी खरे उतरे। अंत में गुरु के आदेश से ‌ उज्जैन से चलकर अलवर की निकट सरिस्का के घनघोर जंगल में पहुंचे जहां उन्होंने ओम नमः शिवाय का जाप करते हुए अखंड तब शुरू किया। अंकित तपस्या इतनी कठोर थी कि उनके ऊपर मिट्टी और दीमक चढ़ती रही और वे भगवान शिव के चरणों में लीन होकर समाधिस्थ हो गए।
भरथरी एक ऐसे लोक देवता हैं जिनके बारे में लाखों ‌लोगों की अटूट आस्था है। किसान परिवारों में सुख शांति के साथ ही पशुओं की बहबूदी के लिए भी बाबा को दूध और घी अर्पित किया जाता है। इसके अलावा जब भी कोई नया वाहन खरीदते हैं तो अलवर जिले के अधिकांश लोग भरथरी बाबा के सबसे पहले पहुंचते हैं। ‌
*भर्तृहरि में है गुप्त गंगा*
लोक देवता भरथरी बाबा पर स्थान से पहाड़ की तरफ से वर्ष भर पवित्र पानी बहता रहता है जो भरतरी बाबा के मंदिर तक आता है। इसमेंश्रद्धालु आचमन और स्नान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह जल गंगा के समान पवित्र है इसीलिए इसे गुप्त गंगा का नाम दिया गया।
*मेले में लगती हैं हस्तशिल्प के सामान की अनेक अस्थाई दुकानें*
भारत हरि बाबा के मेले में प्रसाद और खाने-पीने की स्टालों के अलावा अनेक ऐसी दुकान लगाई जाती है हैं जिम हस्तशिल्प का सामान मिलता है। इनमें आज भी घर गृहस्ती के कई ऐसे सामान की अच्छी डिमांड रहती है जैसे मूसल, मथानी से लेकर चिमटा, बेलन आदि सभी उपयोगी समान मिलता है।
*भरथरी जी ने लिखे थे तीन ग्रंथ*
न्याय प्रिय और प्रजा वत्सल राजा रहे भर्तृहरि जी ने अपने जीवन काल में तीन ऐसे ग्रंथ लिखे जो आज भी उतने ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। उनके ग्रंथों के नाम नीति शतक, श्रृंगार शतक, और वैराग्य शतक है। नीति शतक में शासन और राजनीति संबंधी नीतियों का बखान किया गया है। वही श्रृंगार शतक में स्त्री के रूप लावण्य और उसके शारीरिक सौष्ठव के बारे में सुंदर वर्णन किया गया है। इसके अलावा वैराग्य शतक में सांसारिक मोह को त्यागने और परलोक को सुधारने के बारे में लिखा गया है।

अलवर में राजर्षि अभय समाज संस्था की ओर से रामलीला समापन के बाद 15 दिवस तक धार्मिक और सामाजिक नाटक महाराजा भरथरी का शानदार मंचन पारसी थिएटर शैली में बरसों से किया जाता है। इस नाटक के भी तीन भाग श्रृंगार नीति और वैराग्य पर ही आधारित होते हैं। यह नाटक इतना अधिक लोकप्रिय हो चुका है कि अलवर के अलावा संस्था गई अन्य राज्यों में भी इसका सफल मंचन कर चुकी है।

🙏🏼 बोल भर्तृहरि बाबा की जय हो🙏🏼🙏🏼“भर्तृहरि बाबा मेले की हार्दिक शुभकामनाएं”🙏🏼
29/08/2025

🙏🏼 बोल भर्तृहरि बाबा की जय हो🙏🏼

🙏🏼“भर्तृहरि बाबा मेले की हार्दिक शुभकामनाएं”🙏🏼

29/01/2025
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14/01/2025

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