20/06/2023
🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹
🌹*युवक डॉक्टरपर कृपा तथा उनको श्रीकृष्णके प्रत्यक्ष दर्शन*
🌹*प्राप्तिसूत्र : श्रीशिवकुमारजी केडियाके पत्र-संग्रहकी प्रतिलिपि*
🌹श्रीकेडियाजीको इस घटनाकी सब बातें पू. राधाबाबा द्वारा ही लिखकर दी गयी थीं । इस घटनाका उल्लेख श्रीराधाबाबाने मेरे सम्मुख भी सन् १९५१-५२ में किया था, वह उल्लेख पूरा इस पत्रसे मिलता-जुलता है । दूसरे इस घटनाके मुख्य पात्र रतनगढ़के डॉक्टर भार्गवसे मेरा भी व्यक्तिगत सम्बन्ध अति आन्तरिक रहा है । काष्ठमौनके पश्चात् रतनगढ़में पू. राधाबाबा १९५८ में डॉक्टर भार्गवसे ही सर्वप्रथम मुखर हुए थे । तब मैं एवं श्रीमाधवशरणजी श्रीवास्तव दोनोंने डॉक्टर साहबसे घण्टों वार्त्ता की थी । उस समय उन्होंने, यह घटना उनके ही साथ घटित हुई है, ऐसा हम दोनोंके सम्मुख स्वीकार किया था । उनका जो भी वर्णन था वह भी हू-बहू इस पत्रसे मिलता-जुलता है ।
🌹एक डॉक्टर नये-नये रतनगढ़में आये थे । वे युवक थे । ग्रामके सभी युवकोंमें उन दिनों ‘भाईजी’ बहुत ही लोकप्रिय थे । इस लोक-प्रियताके पीछे भाईजीका निस्वार्थ लोक-सेवामय व्यवहार एवं उनकी सबके प्रति प्रकट होनेवाली अलौकिक आत्मीयता ही हेतु थी । रतनगढ़में राजकीय अस्पतालमें वे नये-नये नियुक्त होकर आये थे । एक दिवस वे सायंकाल भाईजीसे मिलने उनकी हवेलीमें चले आये ।
🌹 प्रथम मिलनमें ही श्रीभाईजी ( श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार )-ने उन्हें अतिशय आत्मीयतासे नहला दिया । मानों जैसे वे उनके परिवारके ही सदस्य हों—इस प्रकार उनको तत्क्षण ही भाईजीने अपने एवं अपने परिवारका पारिवारिक डाक्टर ( Family Doctor ) तो नियुक्त कर ही लिया, साथ ही अनेक सम्पन्न एवं प्रतिष्ठित परिवारोंमें जहाँ श्रीभाईजीके प्रति अधिक सद्भावना थी, वहाँ भी उनको पारिवारिक डाक्टर बना लेनेके लिये उन्होंने प्रशंसा-पत्र लिख दिये । भाईजी द्वारा विश्वास व्यक्त कर देनेके कारण अनेक सम्भ्रान्त परिवारोंकी पारिवारिक सँभाल डाक्टरके जिम्मे आ गयी, एवं ग्राममें डाक्टर साहबकी इज्जत हो गयी । वैसे वे अपने पेशेमें कुशल थे । अतः उन्होंने कुछ ही दिनोंमें सर्वत्र लोकप्रियता अर्जित कर ली । उनके हाथमें यश भी था अतः डाक्टर युवक सभी मारवाड़ी परिवारोंमें बुलाये जाने लगे ।
🌹 वैसे डाक्टर महोदय सच्चे चरित्रवान् थे, परन्तु आध्यात्मिक पृष्ठभूमि न होने एवं नवयुवक होनेके कारण वे स्त्रियोंके अंग-स्पर्श ( नाड़ी आदि देखनेके हेतुसे ) करते तो उन्हें काम-विकार हो आता था । डाक्टरको तो जाँचके लिये आँख, नाड़ी, पेट, कमर सभी स्पर्श करने पड़ते ही हैं । डाक्टर साहब जब युवती बहु-बेटियोंके अंग-स्पर्श करते, तो वे विकारग्रस्त एवं चंचल हो उठते ।
🌹 एक दिवस वे डाक्टर मेरे ( परमपूज्य श्रीराधाबाबाके ) पास मिलने चले आये, उन्होंने मुझसे एकान्तमें अकेले ही मिलने एवं वार्त्ताका समय चाहा । मैंने उनको सायंकाल उनकी सुविधानुसार किसी समय भी आनेको कह दिया ।
🌹 सायंकाल लगभग पाँच बजे डाक्टर साहब मेरे पास आये । डाक्टरने अपनी समग्र मनोदशा निश्छल होकर मेरे सम्मुख रख दी । डाक्टरका अभीतक विवाह भी नहीं हुआ था । वह बहुत ही सरल, सीधा एवं सच्चरित्र युवक था । वैसे उसका जीवन अबतक पवित्र रहा था, परन्तु उसे अपने व्यवसायकी दृष्टिसे स्त्री-शरीर संस्पर्श करना ही पड़ता था । स्पर्शके समय बहुत संयम रखनेपर भी वह विकृत एवं चंचल हो उठता था ।
🌹 जिस निश्छलतासे उसने सब बातें मुझे बतायीं, उसी निश्छलतासे मैंने उसे सभी बातें श्रीभाईजीको भी कह देनेकी बात कही । वह भाईजीसे कहनेमें बहुत ही संकोच अनुभव कर रहा था । वह मुझसे कहने लगा कि ‘भाईजीने मुझपर बहुत विश्वास किया है, यदि मैंने सब बातें भाईजीके सम्मुख खोलकर रख दीं और उन्होंने सम्भ्रान्त परिवारोंमें किसीसे भी यह बात प्रकट कर दी, तो मेरी रतनगढ़में फिर प्रैक्टिस ही उखड़ जायेगी । बाबा ! भाईजीके सम्मुख मुझे मत भेजिये ।’ मैंने उसे समझाया कि “जब श्रीभाईजीने तुम्हें पहली भेंटमें ही इतना विश्वास और स्नेह दिया है, तो तुम्हें उनके सामने निश्छलतापूर्वक सब बात रख देनी चाहिये; चाहे तुम्हारी प्रैक्टिस उखड़े या जमे, तुम्हें भाईजी-जैसे सन्तसे विश्वासघात कदापि नहीं करना चाहिये ।
🌹तुम भगवान्के सम्मुख तो सच्चे रहोगे कि मैं जो था, जैसा था, भाईजीके सम्मुख आईनेकी तरह स्पष्ट था, भाईजी-जैसे महासिद्ध सन्तसे तुमने दुराव-छिपाव नहीं किया । उनसे विश्वासघात करके अपनी प्रैक्टिस जमानेमें मुझे तो तुम्हारा न तो पारमार्थिक एवं न ही लौकिक—किसी भी प्रकारका हित समझमें आता है ।”
🌹 मेरी बात डाक्टरको जँच गयी । वह मेरे पाससे सीधा भाईजीके पास चला गया । भाईजीके सम्मुख जैसे मैंने उसे समझाया था, उसने ठीक वैसे ही स्पष्ट अपनी स्थिति रख दी । भाईजी तो उससे ये बातें सुनते ही एकदम क्रोधमें भर गये । उन्होंने क्रोधमें भरकर उस डाक्टरको तुरन्त अपने पाससे चले जानेको कहा, और कहा कि “आगेसे मुझे मुख नहीं दिखावें । मैंने आपको सच्चरित्र समझकर, विश्वास करके बहू-बेटियों वाले इज्जतदार घरोंमें भेजा था, मुझे आपसे यह आशा नहीं थी ।”
🌹भाईजीके क्रोधसे डाक्टरकी दशा तो ऐसी हो गयी कि वह यदि अवसर पा जाये तो जमीनमें ही समा जाये । उसका तन पसीने-पसीने हो गया । उसके मुखसे बस, इतनी-सी बात निकली—‘भाईजी ! क्षमा करिये, आजसे मैं आपके अथवा ग्राममें किसी भी सम्भ्रान्त परिवारके घर प्रेक्टिस करने नहीं जाऊँगा ।’ यह कहकर वह उठकर ज्योंही जाने लगा, भाईजी कुछ द्रवित हुए ।
🌹उन्होंने कहा—“डाक्टर साहब ! आप मेरे बालक हैं, इसलिये मैं अपना समझकर आपपर उत्तेजित हो गया था । देखिये ! अभी तो मैं किसी परमावश्यक कार्यमें व्यस्त हूँ । आप कल सायंकाल इसी समय मेरे पास अवश्य आइयेगा । मेरे स्वभावमें यह दोष है कि मैं अपने जनोंपर कभी-कभी इस प्रकार उत्तेजित एवं क्रोधित हो उठता हूँ ।”
🌹डाक्टर नीचा मुख करके उठकर बाहर आ गया और मेरे पास आकर वह फफक कर रोने लगा । मैंने उसे धैर्य बँधाया; कहा कि “आपपर निश्चय ही भगवत्कृपाकी वर्षा हुई है । आप निश्चय ही मेरी बात मान लीजिये कि भाईजीका यह रोष आपका अनन्त मंगल करेगा ।” डाक्टरको ढाढ़स बँधाकर मैंने उसे विदा किया ।
🌹 दूसरे दिवस डाक्टर सायंकाल उसी समय मेरे पास आया और मुझे प्रणाम कर भाईजीके कमरेमें चला गया । उसने जैसे ही भाईजीके कमरेमें प्रवेश होनेके लिये परदा उठाया, उसके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा ।
🌹उसने स्पष्ट खुली-आँखोंसे देखा कि भाईजीकी डेस्कके एक कोनेकी ओर कैशोर अवस्थाके भगवान् श्रीकृष्ण मयूर-मुकुट धारण किये बैठे हैं और झुककर वह सब पढ़ रहे हैं, जो भाईजी लिख रहे हैं । इस प्रकारका एक चित्र श्रीसूरदासजीके संदर्भमें ‘कल्याण’ में कुछ दिन पूर्व छप भी चुका था । इस छपे चित्रमें अंधे सूरदासजी ‘एकतारा’ नामक वाद्य बजाकर भजन गा रहे हैं और श्रीकृष्ण बैठे उनका गायन अति तन्मयतापूर्वक सुन रहे हैं ।
🌹उस डाक्टरने ठीक उसी छपे चित्रकी तरह जब भाईजीके सम्मुख भगवान्को बैठे देखा, तो एकबार तो उसे ऐसा लगा कि मानो उसे मस्तिष्कगत भ्रम हो रहा है । वह कमरेसे बाहर आया, उसने पास ही रखी पानीकी टंकीसे अपना मुख धोया, फिर श्रीभाईजीके कक्षमें पुनः झाँका । पुनः इसी प्रकार भगवान्को बैठे देखकर डाक्टर घबड़ा गया । बाहर आकर उसने पुनः अपनी जेबसे एक पिन निकाली और अपने शरीरमें चुभोकर पुनः भाईजीके कमरेमें झाँका । उसे पुनः भगवान्की वही छवि दृष्टिगोचर हुई । अब डाक्टर एकदम भावाभिभूत हो उठा । वह दौड़ा-दौड़ा मेरे कमरेमें आ गया । उसे होश नहीं था ।
🌹वह मात्र इतना ही बोल रहा था — ‘बाबा ! दिख गये । बाबा ! निहाल हो गया । बाबा ! भगवान्के दर्शन हो गये ।’ वह मुझसे लिपट गया, उसका शरीर पसीनेसे लथपथ था । उसकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे । उसके मुखसे वाणी नहीं निकल रही थी । रोते-रोते हिचकी बँध गयी थी । मैं उसके मस्तकपर हाथ फेर रहा था, इतनेमें ही हँसते-हँसते भाईजी भी मेरे कमरेमें चले आये । डाक्टर तो भाईजीको देखते ही मुझे छोड़कर उनसे लिपट गया । वह तो एक ही शब्द रट रहा था—‘भाईजी ! आपको पहचान नहीं पाया, क्षमा कर दीजिये । न जाने मेरा कौन महाभाग्य था कि आपके दर्शनोंका अवसर मिला । मुझ अधमको क्षमा कर दीजिये । आपने तो मुझे निहाल कर दिया ।’
🌹 मैंने देखा, भाईजीके अश्रु भी स्नेहसे छलछला आये थे । उन्होंने डाक्टरका मस्तक अपनी गोदमें रख लिया था । वे उसके मस्तकपर हाथ फेर रहे थे । कुछ देर पश्चात् डाक्टर स्वस्थ-चित्त हुआ । वह उठकर बैठ गया ।
🌹 उस दिवसके पश्चात् डाक्टरको पाँचवर्षतक कभी काम-विकार नहीं हुआ । पाँचवर्ष पश्चात् भाईजीने ही उसका विवाह किसी पवित्र बालिकासे करवा दिया ।
🌹🌹🌹🌹 भक्त और भगवान की जय 🌹🌹🌹🌹