Krishnam Vande Jagat Gurum Hare Krishna

Krishnam Vande Jagat Gurum Hare Krishna It's a short effort of Krishna consciousness which helps people to understand the supreme personality of lord Krishna. He is God as well as our good friend

हरे कृष्ण🌹*पवित्र भगवत् प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य है-  जो यह मान कर अपना जीवन बनाता है, वही वास्तव में मनुष्य कहलाने य...
17/07/2023

हरे कृष्ण

🌹*पवित्र भगवत् प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य है- जो यह मान कर अपना जीवन बनाता है, वही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य है। भोगों में आसक्त, अशांत तथा पाप जीवन मनुष्य से तो कर्म के अनाधिकारी पशु आदि भी श्रेष्ठ हैं। अतः इस लक्ष्य को सामने रखकर, इसके लिए दृढ़ संकल्प करके मानव को सतत प्रयत्नशील होना चाहिए। नीचे लिखे कुछ साधन इसमें सहायक और लाभप्रद हो सकते हैं।*

*1.भगवत् प्रेम को ही जीवन का एकमात्र परम उद्देश्य समझना और इसे हर हालत में निरंतर लक्ष्य में रखकर ही सब काम करना।*

*2. जहां तक बने, सहज ही स्वरूपत: भोग-त्याग तथा भोगासक्ति का त्याग करना। जगत् के किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति में राग ना रखना।*

*3. अभिमान, मद, गर्व, आदि को तनिक सा भी आश्रय न देकर, सदा अपने को अकिंचन, भगवान के सामने दीनातिदीन मानना।*

*4. कहीं भी ममता ना रखकर, सारी ममता एकमात्र भगवान् प्रियतम श्री कृष्ण के चरणों में केंद्रित कर देना।*

*5. जगत् के सारे कार्य उन भगवान प्रियतम श्रीकृष्ण की चरण सेवा के भाव से ही करना।*

*6. किसी भी प्राणी में द्वेश-द्रोह न रखकर, सबमें श्री राधा- माधव की अभिव्यक्ति मानकर, सब के साथ विनयका, यथासाध्य उनके सुख- हित संपादन का बर्ताव करना। सबका सम्मान करना, पर स्वयं कभी मान न चाहना, न कभी स्वीकार करना।*

*7. जगत् का स्मरण छोड़कर, नित्य- निरंतर भगवान के स्वरुप, नाम, लीला, आदि का प्रेम के साथ स्मरण करना।*

*8. प्रतिदिन नियत संख्या में, जितना जो सुविधा पूर्वक कर सकें - महामंत्र/युगल मंत्र का जप करना।*
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*अथवा*
*राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे*
*राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे*
*दिन भर इस मंत्र को रटते रहना। सुविधा हो तो कुछ समय तक इसी का कीर्तन करना।*

*9. स्व-सुख वांच्छा का, निज इंद्रिय तृप्ति का, अपने मन के अनुकूल भोग-मोक्ष की इच्छा का सर्वथा परित्याग करके भगवान श्री कृष्ण को ही प्रियतम रूप से भजना, तथा प्रत्येक कार्य केवल उन्हीं के सुखार्थ करना।*

*10. आगे बढ़े हुए प्रेमी साधक 'मंजरी' भाव से उपासना कर सकते हैं। मंजरी भाव का अर्थ है - अपने को श्री राधा जी की किंकरी मानकर, आठों पहर श्री राधा माधव के सुख-सेवा-संपादन में अपने को सर्वथा खो देना-- केवल सेवामय बना देना।*

*11. अपने साधन-भजन तथा भगवत्कृपा से होने वाली अनुभूतियों को यथासाध्य गुप्त रखना।*

*12. सम्मान-पूजा-प्रतिष्ठा को विष के समान समझकर उनसे सदा बचना। बुरा कार्य ना करना, पर अपमान को अमृत के समान मानकर उसका आदर करना।*

*उपर्युक्त 12 साधनों को श्रद्धा-प्रेम पूर्वक अपनाने का प्रयत्न करनेपर श्रीराधामाधव की सहज कृपा से हमारा जीवन उनके प्रेम-मार्ग पर चलने लायक बन सकेगा, ऐसी आशा है।*

🌹*पुस्तक --- श्री राधामाधव चिंतन*🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹श्रद्धेय श्रीराधाबाबा🌹🌹🌹🌹🌹*🌹हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था मे रहें, भजन को पकड़ें*      🌹  माता ...
04/07/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹🌹🌹🌹श्रद्धेय श्रीराधाबाबा🌹🌹🌹🌹🌹

*🌹हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था मे रहें, भजन को पकड़ें*

🌹 माता देवहूति जी कहती हैं---

*अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।*
*तेपुस्तपस्ते जुहुव: सस्नुरार्या ब्रह्मनूचुर्नाम गृह्णन्ति ये ते।* (श्रीमद्भा. ३/३३/७)

🌹 'बड़े आश्चर्य की बात है--जिसने तुम्हारा नाम लिया, उसने सारी तपस्या कर डाली, हवन कर लिए, तीर्थ स्नान कर लिया, वेद-पारायण कर लिया एवं उसने सभी आर्यगुणों का संचय कर लिया। इसलिए जिसकी जीभ पर तुम्हारा नाम है, वह चाण्डाल होने पर भी अत्यन्त पूज्य है।'

🌹 इस श्लोक से यह बात मन मे कई बार आती है कि सचमुच कलियुग के अनर्थकारी वातावरण में पड़कर हम लोगों ने शास्त्रों पर श्रद्धा खो दी; अन्यथा श्रीमद्भागवत के एक बार पढ़ लेने पर भी भगवान का नाम कैसे छूटना चाहिए। यह वचन अर्थवाद नहीं है। इनको कहने वाली स्वयं भगवतज्जननी हैं एवं जगत पर प्रकट करने वाले महाऋषि वेदव्यास हैं। किंतु समय के फेर से हम इसे पढ़कर भी नहीं पढ़ते, सुनकर भी नहीं सुनते।

🌹 मन कभी-कभी विचित्र तरह से धोखा देता है। भजन में लगना चाहता नहीं, इसलिये अनेक युक्तियों से मनुष्य को प्रलोभित करता है। मन तीर्थ करने की सलाह देता है, बड़ी-बड़ी आडम्बरपूर्ण चेष्टाओं के द्वारा उपासना के लिये प्रेरित करता है, तपस्या का नया नया रूप लाकर सामने रखता है, दया एवं धर्माचरण की नयी-नयी योजना उपस्थित करता है, किंतु एकनिष्ठ होकर निरन्तर भजन की सलाह बहुत कम देता है जिस एक भजन से सर्वस्व की सिद्धि अत्यन्त सुलभता से होती है, उसमें प्रवृत्त नहीं होने देता। इसलिये महात्मा पुरुष कहते हैं--‘सावधान रहो, भजन को मुख्य बनाओ, और सारे कर्मो को गौण रखो।'

🌹 उपर्युक्त कथन का यह अर्थ नहीं हैं कि तीर्थ नहीं करना चाहिये। यदि सम्भव हो तो अवश्य करना चाहिये। श्रद्धापूर्वक एवं पापरहित तीर्थाटन अत्यन्त हितकर होता है। किंतु यदि हमें भगवान ने ऐसी परिस्थिति में रखा हो, जहाँ तीर्थाटन सुगम न हो, बड़े-बडे पुण्यकर्मो का आचरण कठिन हो तो इससे हताश होने की कोई बात नहीं है। सबका फल हमें मिल जायगा, यदि हमने ठीक भजन किया। तीर्थ में तीर्थापन क्या है, यह विचारें। किसी भी धर्म, किसी भी सम्प्रदायका कोई भी तीर्थ क्यों न हो, उसका तीर्थपन दो बातों के कारण ही है— (१) या तो भगवान ने वहाँ साक्षात् कोई लीला की है अथवा (२) किसी संत ने उपासना की है (उपासना का प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकता है)। अतः यदि हमने ठीक जैसा चाहिये वैसा भजन किया तो प्रभु हमें कृतार्थ करने के लिये अवतीर्ण होकर एक नये तीर्थ का निर्माण कर सकते हैं। इसलिये हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था में रहें, भजन को पकड़े। मन नहीं लगता, कोई बात नहीं, जीभ के द्वारा भगवान के नाम का आश्रय लें--जिह्वाग्रे, नहि मनसः अग्रे। इस भजन से ही जगन्नियन्ता सर्वेश्वर हमारे पास आ जायँगे, आ ही नहीं जायेंगे, बल्कि सर्वेश्वर, सर्वस्वतन्त्र होकर भी भजने वाले के अधीन हो जायँगे।।

*सुमिरि पवनसुत पावन नामू।*
*अपने बस करि राखे रामू।।* (मानस १/२५/३)

🌹 यह सर्वथा सत्य सिद्धान्त है।

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹  🌹🌹 *भगवान सदा तुम्हारे साथ हैं*🌹🌹🌹              🌹जब तुम सचमुच सुधर जाओगे, तब तुम्हारे बिना बोले ही...
30/06/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹 *भगवान सदा तुम्हारे साथ हैं*🌹🌹🌹
🌹जब तुम सचमुच सुधर जाओगे, तब तुम्हारे बिना बोले ही तुम्हारा जीवन जगत्‌को सीख देगा। बल्कि यदि उस हालतमें तुम एकान्तमें भी रहोगे, तब भी तुम्हारे अंदरके सद्गुणोंके सुवाससे जगत्‌को सुख और कल्याण प्राप्त होगा।

🌹दूसरे लोगोंके साथ वैसा ही बर्ताव करो, जैसा तुम दूसरोंसे अपने लिये चाहते हो। सबके गुण देखो और अभिमान छोड़कर नम्रताके साथ उन्हें लेते चले जाओ।'

'🌹जैसे धनका लोभी चुपचाप धन कमानेमें लगा रहता है, वह धनके लिये व्याख्यान नहीं दिया करता, वैसे ही चुपचाप दैवी गुणोंकी सम्पत्ति कमानेमें लगे रहो। न तो ढिंढोरा पीटो और न केवल बात बनाने में ही जीवन बिताओ।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹*युवक डॉक्टरपर कृपा तथा उनको श्रीकृष्णके प्रत्यक्ष दर्शन*🌹*प्राप्तिसूत्र : श्रीशिवकुमारजी केडियाके प...
20/06/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹
🌹*युवक डॉक्टरपर कृपा तथा उनको श्रीकृष्णके प्रत्यक्ष दर्शन*

🌹*प्राप्तिसूत्र : श्रीशिवकुमारजी केडियाके पत्र-संग्रहकी प्रतिलिपि*

🌹श्रीकेडियाजीको इस घटनाकी सब बातें पू. राधाबाबा द्वारा ही लिखकर दी गयी थीं । इस घटनाका उल्लेख श्रीराधाबाबाने मेरे सम्मुख भी सन् १९५१-५२ में किया था, वह उल्लेख पूरा इस पत्रसे मिलता-जुलता है । दूसरे इस घटनाके मुख्य पात्र रतनगढ़के डॉक्टर भार्गवसे मेरा भी व्यक्तिगत सम्बन्ध अति आन्तरिक रहा है । काष्ठमौनके पश्चात् रतनगढ़में पू. राधाबाबा १९५८ में डॉक्टर भार्गवसे ही सर्वप्रथम मुखर हुए थे । तब मैं एवं श्रीमाधवशरणजी श्रीवास्तव दोनोंने डॉक्टर साहबसे घण्टों वार्त्ता की थी । उस समय उन्होंने, यह घटना उनके ही साथ घटित हुई है, ऐसा हम दोनोंके सम्मुख स्वीकार किया था । उनका जो भी वर्णन था वह भी हू-बहू इस पत्रसे मिलता-जुलता है ।

🌹एक डॉक्टर नये-नये रतनगढ़में आये थे । वे युवक थे । ग्रामके सभी युवकोंमें उन दिनों ‘भाईजी’ बहुत ही लोकप्रिय थे । इस लोक-प्रियताके पीछे भाईजीका निस्वार्थ लोक-सेवामय व्यवहार एवं उनकी सबके प्रति प्रकट होनेवाली अलौकिक आत्मीयता ही हेतु थी । रतनगढ़में राजकीय अस्पतालमें वे नये-नये नियुक्त होकर आये थे । एक दिवस वे सायंकाल भाईजीसे मिलने उनकी हवेलीमें चले आये ।

🌹 प्रथम मिलनमें ही श्रीभाईजी ( श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार )-ने उन्हें अतिशय आत्मीयतासे नहला दिया । मानों जैसे वे उनके परिवारके ही सदस्य हों—इस प्रकार उनको तत्क्षण ही भाईजीने अपने एवं अपने परिवारका पारिवारिक डाक्टर ( Family Doctor ) तो नियुक्त कर ही लिया, साथ ही अनेक सम्पन्न एवं प्रतिष्ठित परिवारोंमें जहाँ श्रीभाईजीके प्रति अधिक सद्भावना थी, वहाँ भी उनको पारिवारिक डाक्टर बना लेनेके लिये उन्होंने प्रशंसा-पत्र लिख दिये । भाईजी द्वारा विश्वास व्यक्त कर देनेके कारण अनेक सम्भ्रान्त परिवारोंकी पारिवारिक सँभाल डाक्टरके जिम्मे आ गयी, एवं ग्राममें डाक्टर साहबकी इज्जत हो गयी । वैसे वे अपने पेशेमें कुशल थे । अतः उन्होंने कुछ ही दिनोंमें सर्वत्र लोकप्रियता अर्जित कर ली । उनके हाथमें यश भी था अतः डाक्टर युवक सभी मारवाड़ी परिवारोंमें बुलाये जाने लगे ।

🌹 वैसे डाक्टर महोदय सच्चे चरित्रवान् थे, परन्तु आध्यात्मिक पृष्ठभूमि न होने एवं नवयुवक होनेके कारण वे स्त्रियोंके अंग-स्पर्श ( नाड़ी आदि देखनेके हेतुसे ) करते तो उन्हें काम-विकार हो आता था । डाक्टरको तो जाँचके लिये आँख, नाड़ी, पेट, कमर सभी स्पर्श करने पड़ते ही हैं । डाक्टर साहब जब युवती बहु-बेटियोंके अंग-स्पर्श करते, तो वे विकारग्रस्त एवं चंचल हो उठते ।

🌹 एक दिवस वे डाक्टर मेरे ( परमपूज्य श्रीराधाबाबाके ) पास मिलने चले आये, उन्होंने मुझसे एकान्तमें अकेले ही मिलने एवं वार्त्ताका समय चाहा । मैंने उनको सायंकाल उनकी सुविधानुसार किसी समय भी आनेको कह दिया ।

🌹 सायंकाल लगभग पाँच बजे डाक्टर साहब मेरे पास आये । डाक्टरने अपनी समग्र मनोदशा निश्छल होकर मेरे सम्मुख रख दी । डाक्टरका अभीतक विवाह भी नहीं हुआ था । वह बहुत ही सरल, सीधा एवं सच्चरित्र युवक था । वैसे उसका जीवन अबतक पवित्र रहा था, परन्तु उसे अपने व्यवसायकी दृष्टिसे स्त्री-शरीर संस्पर्श करना ही पड़ता था । स्पर्शके समय बहुत संयम रखनेपर भी वह विकृत एवं चंचल हो उठता था ।

🌹 जिस निश्छलतासे उसने सब बातें मुझे बतायीं, उसी निश्छलतासे मैंने उसे सभी बातें श्रीभाईजीको भी कह देनेकी बात कही । वह भाईजीसे कहनेमें बहुत ही संकोच अनुभव कर रहा था । वह मुझसे कहने लगा कि ‘भाईजीने मुझपर बहुत विश्वास किया है, यदि मैंने सब बातें भाईजीके सम्मुख खोलकर रख दीं और उन्होंने सम्भ्रान्त परिवारोंमें किसीसे भी यह बात प्रकट कर दी, तो मेरी रतनगढ़में फिर प्रैक्टिस ही उखड़ जायेगी । बाबा ! भाईजीके सम्मुख मुझे मत भेजिये ।’ मैंने उसे समझाया कि “जब श्रीभाईजीने तुम्हें पहली भेंटमें ही इतना विश्वास और स्नेह दिया है, तो तुम्हें उनके सामने निश्छलतापूर्वक सब बात रख देनी चाहिये; चाहे तुम्हारी प्रैक्टिस उखड़े या जमे, तुम्हें भाईजी-जैसे सन्तसे विश्वासघात कदापि नहीं करना चाहिये ।

🌹तुम भगवान्‌के सम्मुख तो सच्चे रहोगे कि मैं जो था, जैसा था, भाईजीके सम्मुख आईनेकी तरह स्पष्ट था, भाईजी-जैसे महासिद्ध सन्तसे तुमने दुराव-छिपाव नहीं किया । उनसे विश्वासघात करके अपनी प्रैक्टिस जमानेमें मुझे तो तुम्हारा न तो पारमार्थिक एवं न ही लौकिक—किसी भी प्रकारका हित समझमें आता है ।”

🌹 मेरी बात डाक्टरको जँच गयी । वह मेरे पाससे सीधा भाईजीके पास चला गया । भाईजीके सम्मुख जैसे मैंने उसे समझाया था, उसने ठीक वैसे ही स्पष्ट अपनी स्थिति रख दी । भाईजी तो उससे ये बातें सुनते ही एकदम क्रोधमें भर गये । उन्होंने क्रोधमें भरकर उस डाक्टरको तुरन्त अपने पाससे चले जानेको कहा, और कहा कि “आगेसे मुझे मुख नहीं दिखावें । मैंने आपको सच्चरित्र समझकर, विश्वास करके बहू-बेटियों वाले इज्जतदार घरोंमें भेजा था, मुझे आपसे यह आशा नहीं थी ।”

🌹भाईजीके क्रोधसे डाक्टरकी दशा तो ऐसी हो गयी कि वह यदि अवसर पा जाये तो जमीनमें ही समा जाये । उसका तन पसीने-पसीने हो गया । उसके मुखसे बस, इतनी-सी बात निकली—‘भाईजी ! क्षमा करिये, आजसे मैं आपके अथवा ग्राममें किसी भी सम्भ्रान्त परिवारके घर प्रेक्टिस करने नहीं जाऊँगा ।’ यह कहकर वह उठकर ज्योंही जाने लगा, भाईजी कुछ द्रवित हुए ।

🌹उन्होंने कहा—“डाक्टर साहब ! आप मेरे बालक हैं, इसलिये मैं अपना समझकर आपपर उत्तेजित हो गया था । देखिये ! अभी तो मैं किसी परमावश्यक कार्यमें व्यस्त हूँ । आप कल सायंकाल इसी समय मेरे पास अवश्य आइयेगा । मेरे स्वभावमें यह दोष है कि मैं अपने जनोंपर कभी-कभी इस प्रकार उत्तेजित एवं क्रोधित हो उठता हूँ ।”

🌹डाक्टर नीचा मुख करके उठकर बाहर आ गया और मेरे पास आकर वह फफक कर रोने लगा । मैंने उसे धैर्य बँधाया; कहा कि “आपपर निश्चय ही भगवत्कृपाकी वर्षा हुई है । आप निश्चय ही मेरी बात मान लीजिये कि भाईजीका यह रोष आपका अनन्त मंगल करेगा ।” डाक्टरको ढाढ़स बँधाकर मैंने उसे विदा किया ।

🌹 दूसरे दिवस डाक्टर सायंकाल उसी समय मेरे पास आया और मुझे प्रणाम कर भाईजीके कमरेमें चला गया । उसने जैसे ही भाईजीके कमरेमें प्रवेश होनेके लिये परदा उठाया, उसके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा ।

🌹उसने स्पष्ट खुली-आँखोंसे देखा कि भाईजीकी डेस्कके एक कोनेकी ओर कैशोर अवस्थाके भगवान् श्रीकृष्ण मयूर-मुकुट धारण किये बैठे हैं और झुककर वह सब पढ़ रहे हैं, जो भाईजी लिख रहे हैं । इस प्रकारका एक चित्र श्रीसूरदासजीके संदर्भमें ‘कल्याण’ में कुछ दिन पूर्व छप भी चुका था । इस छपे चित्रमें अंधे सूरदासजी ‘एकतारा’ नामक वाद्य बजाकर भजन गा रहे हैं और श्रीकृष्ण बैठे उनका गायन अति तन्मयतापूर्वक सुन रहे हैं ।

🌹उस डाक्टरने ठीक उसी छपे चित्रकी तरह जब भाईजीके सम्मुख भगवान्‌को बैठे देखा, तो एकबार तो उसे ऐसा लगा कि मानो उसे मस्तिष्कगत भ्रम हो रहा है । वह कमरेसे बाहर आया, उसने पास ही रखी पानीकी टंकीसे अपना मुख धोया, फिर श्रीभाईजीके कक्षमें पुनः झाँका । पुनः इसी प्रकार भगवान्‌को बैठे देखकर डाक्टर घबड़ा गया । बाहर आकर उसने पुनः अपनी जेबसे एक पिन निकाली और अपने शरीरमें चुभोकर पुनः भाईजीके कमरेमें झाँका । उसे पुनः भगवान्‌की वही छवि दृष्टिगोचर हुई । अब डाक्टर एकदम भावाभिभूत हो उठा । वह दौड़ा-दौड़ा मेरे कमरेमें आ गया । उसे होश नहीं था ।

🌹वह मात्र इतना ही बोल रहा था — ‘बाबा ! दिख गये । बाबा ! निहाल हो गया । बाबा ! भगवान्‌के दर्शन हो गये ।’ वह मुझसे लिपट गया, उसका शरीर पसीनेसे लथपथ था । उसकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे । उसके मुखसे वाणी नहीं निकल रही थी । रोते-रोते हिचकी बँध गयी थी । मैं उसके मस्तकपर हाथ फेर रहा था, इतनेमें ही हँसते-हँसते भाईजी भी मेरे कमरेमें चले आये । डाक्टर तो भाईजीको देखते ही मुझे छोड़कर उनसे लिपट गया । वह तो एक ही शब्द रट रहा था—‘भाईजी ! आपको पहचान नहीं पाया, क्षमा कर दीजिये । न जाने मेरा कौन महाभाग्य था कि आपके दर्शनोंका अवसर मिला । मुझ अधमको क्षमा कर दीजिये । आपने तो मुझे निहाल कर दिया ।’

🌹 मैंने देखा, भाईजीके अश्रु भी स्नेहसे छलछला आये थे । उन्होंने डाक्टरका मस्तक अपनी गोदमें रख लिया था । वे उसके मस्तकपर हाथ फेर रहे थे । कुछ देर पश्चात् डाक्टर स्वस्थ-चित्त हुआ । वह उठकर बैठ गया ।

🌹 उस दिवसके पश्चात् डाक्टरको पाँचवर्षतक कभी काम-विकार नहीं हुआ । पाँचवर्ष पश्चात् भाईजीने ही उसका विवाह किसी पवित्र बालिकासे करवा दिया ।

🌹🌹🌹🌹 भक्त और भगवान की जय 🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹साधकको यह निश्चय रखना चाहिये कि परमात्मा मेरा सबसे सच्चा सुहृद् है, नित्य संगी है, मुझे सदा पापोंसे...
19/06/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹साधकको यह निश्चय रखना चाहिये कि परमात्मा मेरा सबसे सच्चा सुहृद् है, नित्य संगी है, मुझे सदा पापोंसे बचाता है। मुझे तो बस उसी के शरण होकर उसीका चिन्तन करना चाहिये, फिर सारा भार उसीके ऊपर है।
🌹 जो साधक परम विश्वासके साथ ऐसा कर लेता है वह निस्संदेह समस्त विघ्नोंको लाँघकर परमात्माको पा लेता है। भगवान् ने कहा है, मुझमें चित्त लगानेवाला मेरी कृपासे सब प्रकारके संकटोंसे अनायास ही तर जाता है। ' *मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि'*
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹भगवान सदा तुम्हारे साथ हैं🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹सबके साथ मित्रताका बर्ताव करो*🌹🌹🌹🌹🌹सबके साथ सहानुभूति और नम्र...
15/06/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹🌹🌹🌹भगवान सदा तुम्हारे साथ हैं🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹🌹🌹सबके साथ मित्रताका बर्ताव करो*🌹🌹🌹🌹

🌹सबके साथ सहानुभूति और नम्रतासे युक्त मित्रताका बर्ताव करो। संसारमें अधिक मनुष्य ऐसे ही मिलेंगे जिनकी कठिनाइयाँ, जिनके कष्ट तुम्हारी कल्पनासे कहीं अधिक हैं। तुम इस बात को समझ लो और किसीके साथ भी अनादर और द्वेषका व्यवहार न करके विशेष प्रेमका व्यवहार करो।

🌹तुमसे कोई बुरा बर्ताव करे तो उसके साथ भी अच्छा बर्ताव करो और ऐसा करके अभिमान न करो। दूसरेकी भलाईमें तुम जितना ही अपने अहंकार और जागतिक स्वार्थको भूलोगे, उतना ही तुम्हारा वास्तविक हित अधिक होगा।

-🌹--श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार 🌹

े (कल्याण-कुञ्ज-भाग-६)

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹पापमोचनी एकादशी 🌹🌹🌹🌹माना जाता है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो...
18/03/2023

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹🌹पापमोचनी एकादशी 🌹🌹🌹🌹
माना जाता है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं . #श्रीकृष्ण इस व्रत का महत्व धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था. इस दिन भगवान #विष्णु की विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए. पापमोचनी एकादशी व्रत करने से पापों का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
पापमोचनी एकादशी की कथा को सुनने पढ़ने से हजार गोदान का फल मिलता है। इस व्रत को करने से ब्रह्महत्या , सुरापान आदि जैसे पाप भी नष्ट होते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति होती।

🌹 लोमेश ऋषि ने महाराजा मांधाता को सुनाई थी. एक बार देवताओं के खजांची कुबेर के बाग में गन्धर्व कन्याएं किन्नरो के साथ विहार करती थी .उस बाग मे बहुत से ऋषि मुनि भी तपस्या करते थे।

🌹 उस बाग में मेधावी नामक ऋषि भी वहां तपस्या करते थे ।मंजुघोषा नाम की अप्सरा मेधावी ऋषि को मोहित करने के लिए वीणा पर बैठकर मधुर गीत गाने लगी। अपनी चूड़ियों और नूपुर की झंकार और नृत्य कर ऋषि को रिझाने लगी।

🌹फलस्वरूप ऋषि मंजुघोषा के साथ रमण करने लगे ।एक दिन मंजुघोषा ऋषि से कहा कि मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दें। ऋषि ने उसे कुछ समय और ठहरने के लिए कहा।

🌹अप्सरा कहने लगी महाराज स्मरण करे मुझे यहां पर आए कितने वर्ष हो गए हैं। ऋषि विचार किया तो उन्हें 57 वर्ष 7 माह और 3 दिन बीत गए थे ।इस बात का ज्ञान होते हैं ऋषि ने क्रोधित होकर कहा कि तुमने मेरी तपस्या भंग की है तू दूराचारणी है ,तूने मेरे साथ घात किया है।

🌹ऋषि ने अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से अप्सरा पिशाचनी हो गई । उसने दीन वचन में ऋषि से इस शाप से मुक्ति का निवारण पूछा ।उसके दीन वचन सुनकर मेधावी ऋषि कहने लगे कृष्ण चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पापों का नाश करने वाली है। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारी इस पिशाचनी योनि इस से मुक्ति हो जाएगी।

🌹 ऐसा कहकर मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन। ऋषि के आश्रम चले गए । च्यवन ऋषि ने मेधावी ऋषि से पूछा कि पुत्र तुमने ऐसा क्या अनर्थ किया है जो तुम्हारे सारे पुण्य क्षीण हो गए हैं ।

🌹मेधावी ऋषि ने पिता को बताया कि एक अप्सरा के साथ रमण के कारण उनके सारे पुण्य क्षीण हो गए और मैंने घोर पाप किया है ।आप मुझे उससे मुक्ति का उपाय बताए उन्होंने कहा कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे ।

🌹मंजुघोषा व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और वह दिव्य रूप धारण करके स्वर्ग लोक चली गई। लोमेश ऋषि कहने लगे कि लगे कि पापमोचनी का व्रत करने से पाप नष्ट होते हैं।

🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

हरे कृष्ण*🌹🌹🌹🌹वृंदावन  की  रज*🌹🌹🌹🌹🌹किसी आयुर्वैदिक संस्थान से रिटायर होकर एक वैद्य जी अपनी पत्नी से बोले:-आज तक मैं संसा...
07/03/2023

हरे कृष्ण

*🌹🌹🌹🌹वृंदावन की रज*🌹🌹🌹🌹🌹
किसी आयुर्वैदिक संस्थान से रिटायर होकर एक वैद्य जी अपनी पत्नी से बोले:-
आज तक मैं संसार में रहा अब ठाकुर जी के चरणों में रहना चाहता हूं। तुम मेरे साथ चलोगी या अपना शेष जीवन बच्चों के साथ गुजारोगी।

पत्नी बोली:- "चालीस वर्ष साथ रहने के बाद भी आप मेरे ह्रदय को नहीं पहचान पाए मैं आपके साथ चलूंगी।

वैद्य जी बोले:- "कल सुबह वृन्दावन के लिए चलना है। अगले दिन सुबह दोंनो वृन्दावन जाने के लिए तैयार हुए।

अपने बच्चों को बुलाया और कहा:- प्यारे बच्चों हम जीवन के उस पार हैं तुम इस पार हो।

आज से तुमसे तो हमारा हाट बाट का साथ है। असली साथी तो सबके श्री हरि ही हैं।
वृन्दावन आए तो दैवयोग से स्वामी जी से भेंट हुई। उन्होंने गुजारे लायक चीजों का इन्तजाम करवा दिया।

दोंनो का आपस में बोलना चालना भी कम हो गया केवल नाम जाप में लगे रहते और स्वामी जी का सत्संग सुनते।

जैसा कुछ ठाकुर जी की कृपा से उपलब्ध होता बनाते पकाते और प्रेम से श्री हरि जी को भोग लगाकर खा लेते।

किन्तु अभाव का एहसास उन्हें कभी नहीं हुआ था।
जाड़े का मौसम था। तीन दिन से दोंनो ने कुछ नहीं खाया था। भूख और ठंड खूब सता रही थी।

अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी... वैद्य जी ने उठ कर दरवाजा खोला सामने एक किशोरी खड़ी थी बोली:-
स्वामी जी के यहां आज भंडारा था उन्होंने प्रशाद भेजा है।

वैद्य जी ने प्रशाद का टिफिन पकड़ा तभी एक किशोर अंदर आया और दोनों के लिए गर्म बिस्तर लगाने लगा।

वैद्य जी की पत्नी बोली:- ध्यान से बच्चों हमारे यहां रोशनी का कोई प्रबंध नहीं है। कहीं चोट न लग जाए।

इतने में किशोर बाहर गया और दीपक, घी और दियासलाई लेकर आ गया। कोठरी में रोशनी कर दोनों चले गए।

दोनों ने भर पेट खाना खाया और गर्म बिस्तर में सो गए।
अगले दिन स्वामी जी का टिफिन वापिस करने गए तो उन्होंने कहा:- टिफिन तो हमारा है पर यहां कल कोई भंडारा नहीं था और न ही उन्होंने कोई प्रशाद या अन्य सामान भिजवाया है।

यह सुनकर दोनों सन्न रह गए। वह समझ गए ये सब बांके बिहारी जी की कृपा है।
दोनों को बहुत ग्लानि हो रही थी प्रभु को उनके कष्ट दूर करने स्वयं आना पड़ा।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹आपके घर में कोई व्यक्ति भक्ति करता है,तो आपके घर में कोई नुकसान नहीं कर सकता...**जबतक विभीषण जी लंका ...
28/02/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹
आपके घर में कोई व्यक्ति भक्ति करता है,तो आपके घर में कोई नुकसान नहीं कर सकता...*

*जबतक विभीषण जी लंका में रहते थे , तबतक रावण ने कितना भी पाप किया, परंतु विभीषण जी के पुण्य के कारण, भक्ति के कारण रावण सुखी रहा... और शासन करता रहा...*

*परंतु जब विभीषण जी जैसे भगवतवत्सल भक्त को लात मारी और लंका से निकल जाने के लिए रावण ने कहा, तब से रावण का विनाश होना शुरू हो गया...*

*अंत में रावण की सोने की लंका का दहन हो गया और रावण के पीछे कोई रोने वाला भी नहीं बचा...*

*ठीक इसी तरह हस्तिनापुर में जबतक विदुर जी जैसे भक्त रहते थे , तब तक कौरवों को सुख ही सुख मिला...*

*परंतु जैसे ही कौरवों ने विदुर जी का अपमान करके राजसभा से चले जाने के लिए कहा और विदुर जी का अपमान किया, तब भगवान श्रीकृष्ण जी ने विदुर जी से कहा कि - काका ! आप अभी तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान करिए... कौरवों का विनाश होने का समय आ चुका है... इनका अंत निश्चित है...*

*और भगवान श्रीकृष्ण जी ने विदुर जी को तीर्थयात्रा के लिए भेज दिया ,और जैसे ही विदुर जी ने हस्तिनापुर को छोड़ा , कौरवों का पतन होना चालू हो गया और अंत में राजपाट भी गया और कौरवों के पीछे कोई कौरवों का वंश भी नहीं बचा...*

*इसी तरह हमारे परिवार में भी जबतक कोई भक्त या पुण्यशाली आत्मा होती है, तब तक हमारे घर में आनंद ही आनंद रहता है...*

*🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹जब एक स्त्री का मान रखने के लिये स्वयं श्री कृष्ण स्त्री बन गये...🌹🌹राणा सांगा के पुत्र और अपने पत...
25/02/2023

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌹जब एक स्त्री का मान रखने के लिये स्वयं श्री कृष्ण स्त्री बन गये...🌹

🌹राणा सांगा के पुत्र और अपने पति राजा भोजराज की मृत्यु के बाद जब संबन्धीयो के मीरा बाई पर अत्याचार अपने चरम पे जा पहुँचे तो मीरा बाई मेवाड़ को छोड़कर तीर्थ को निकल गई। घूमते-घूमते वे वृन्दावन धाम जा पहुँची।

🌹जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा बाई से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि ‘वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल। आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा यहां कोई और भी पुरुष है।

🌹जीव गुसाईं ने सुबह जब भगवान कृष्ण के मंदिर के पट खोले तो हैरत से उनकी आँखें फटी रह गई, सामने विराजमान भगवान कृष्ण की मूर्ति घाघरा चोली पहने हुये थी, कानों में कुंडल, नाक में नथनी, पैरों में पाजेब, हाथों में चूड़ियाँ मतलब वे औरत के संपूर्ण स्वरूप को धारण किये हुये थे।
जीव गुसाईं ने मंदिर सेवक को आवाज लगाई, किसने किया ये सब ??
कृष्ण की सौगंध पुजारी जी मंदिर में आपके जाने के बाद किसी का प्रवेश नही हुआ ये पट आपने ही बंद किये और आपने ही खोले।

🌹जीव गुसाईं अचंभित थे, सेवक बोला कुछ कहूँ पुजारी जी -
वे खोए-खोए से बोले, हाँ बोलो..
पास ही धर्मशाला में एक महिला आई हुई हैं जिसने कल आपसे मिलने की इच्छा जताई थी, आप तो किसी महिला से मिलते नहीं इसलिये आपने उनसे मिलने से मना कर दिया, परन्तु लोग कहते हैं कि वो कोई साधारण महिला नही उनके एकतारे में बड़ा जादू हैं कहते हैं वो जब भजन गाती हैं तो हर कोई अपनी सुधबुध बिसरा जाता हैं, कृष्ण भक्ति में लीन जब वो नाचती हैं तो स्वयं कृष्ण का स्वरूप जान पड़ती हैं, आपने उनसे मिलने से इंकार किया कही ऐसा तो नही भगवान जी आपको कोई संदेश देना चाहते हो ??
जीव गुसाईं तुरंत समझ गए कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई हैं, मीरा बाई कोई साधारण महिला नही अपितु कोई परम कृष्णभक्त हैं।
🌹वे सेवक से बोले भक्त मुझे तुरंत उनसे मिलना हैं चलो कहाँ ठहरी हैं वो मैं स्वयं उनके पास जाऊँगा।
जीव गुसाईं मीरा जी के सामने नतमस्तक हो गये और भरे कंठ से बोले मुझ अज्ञानी को आज आपने भक्ति का सही स्वरूप दिखाया हैं देवी इसके लिये मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा।आईए चलकर स्वयं अपनी भक्ति की शक्ति देखिये।
🌹मीरा बाई केवल मुस्कुराई वे कृष्ण कृष्ण करती उनके पीछे हो चली। मंदिर पहुँचकर जीव गौसाई एक बार फिर अचंभित हुये कृष्ण भगवान वापस अपने स्वरूप में लौट आये थे,पर एक अचम्भा और भी था उन्हें कभी कृष्ण की मूर्ति में मीरा बाई दिखाई पड़ती तो कभी मीराबाई में कृष्ण l

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹विजया एकादशी का महत्त्व:🌹🌹🌹धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले: हे जनार्दन! आपने माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकाद...
16/02/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹विजया एकादशी का महत्त्व:🌹🌹

🌹धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले: हे जनार्दन! आपने माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का अत्यन्त सुंदर वर्णन करते हुए सुनाया। अब आप फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए।

🌹श्री भगवान बोले: हे राजन्, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य को विजय प्राप्त‍ होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है। इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। भयंकर शत्रुओं से जब आप घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो उस विकट स्थिति में विजया नामक एकादशी आपको विजय दिलाने की क्षमता रखती है।

🌹विजया एकादशी व्रत कथा!🌹

🌹एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान का कहिए। ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कही। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है।

🌹त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी जो विष्णु के अंशावतार थे, जब उनको चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहाँ पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में चल दिए।

🌹घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुँचे तो जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया। वहाँ से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।

🌹श्री रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सम्पत्ति से लंका को प्रस्थान किया। जब श्री रामचंद्रजी समुद्र के किनारे पहुँचे तब उन्होंने मगरमच्छ आदि से युक्त उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे।

🌹श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदाल्भ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए।

🌹मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषे! मैं अपनी सेना ‍सहित यहाँ आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूँ। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूँ।

🌹वकदाल्भ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या मिट्‍टी का एक घड़ा बनाएँ। उस घड़े को जल से भरकर तथा पाँच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एका‍दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें।

🌹तत्पश्चात घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें ‍और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें। हे राम! यदि तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी। श्री रामचंद्रजी ने ऋषि के कथनानुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई।

🌹अत: हे राजन्! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र! जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹श्राप मे भी सौभाग्य 🌹🌹🌹🌹महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब वो बड़े दुःखी रहते थे ...
13/02/2023

🌹🌹🌹🌹🌹हरे कृष्ण🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌹🌹🌹श्राप मे भी सौभाग्य 🌹🌹🌹
🌹महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब वो बड़े दुःखी रहते थे । पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था...

🌹मजे की बात ये कि इस हौंसले की वजह किसी ऋषि-मुनि या देवता का वरदान नहीं बल्कि श्रवण के पिता का श्राप था....!

🌹दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था...

(कालिदासजी ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)

🌹श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि ''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ, वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा.....'!'

🌹दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा ?)

🌹यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया....!!

🌹ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई....!

🌹सुग्रीव जब सीताजी की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें क्या मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये....!

🌹प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...!

उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?

🌹तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... ''मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था, तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....!!''

🌹सोचिये, अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो जाता...!!

🌹इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-

🌹"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें। वही पुरुषार्थी है....!!!"

🌹ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझो....!!!

🌹संदेश -अगर आज मिले सुख से आप खुश हो तो कभी अगर कोई दुख, विपदा, अड़चन आ जाये तो घबराना नहीं ! क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो....!!

🌹रामायण हम सनातनी लोगों का गौरव है। इसलिए आप सभी मित्रों और माताओं बहनों से अनुरोध है कि कृपया यह पोस्ट सभी ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपने सभी मित्रों और बंधुजनो तक अवश्य पहुंचाएं।

🌹🌹🌹🌹🌹हरी बोल 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Address

Bhiwadi
Alwar
301019

Opening Hours

9am - 5pm

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Krishnam Vande Jagat Gurum Hare Krishna posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Krishnam Vande Jagat Gurum Hare Krishna:

Share