18/07/2026
तंत्र शिरोमणि सिद्ध संत बामाखेपा जिसने माँ तारा को केवल देखा नहीं, बल्कि माँ कहकर जीया
"कुछ लोग मंदिर में देवी की पूजा करते हैं…
कुछ लोग देवी के दर्शन करते हैं…
लेकिन इस धरती पर एक ऐसा साधक भी हुआ, जिसने देवी को अपनी माँ बना लिया।"
यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि भारत की शाक्त परंपरा में पूजनीय सिद्ध संत बामाखेपा की कथा है।
वह बालक जिसे संसार नहीं, केवल माँ चाहिए थी
वीरभूम की पावन धरती पर जन्मा वह बालक अन्य बच्चों जैसा नहीं था।
जहाँ दूसरे बच्चे मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे, वहाँ उसकी आँखें किसी अदृश्य माँ को खोजती थीं।
लोग पूछते
बामा... क्या चाहिए?
वह धीरे से कहता—
मुझे मेरी माँ चाहिए...
वह माँ कोई सांसारिक स्त्री नहीं थी...
वह थीं माँ तारा।
कहा जाता है कि बचपन से ही उसका मन घंटों मंदिर में बैठा रहता। कभी मूर्ति को निहारता, कभी रोता, कभी हँसता, तो कभी ऐसी ध्यानावस्था में चला जाता कि बाहरी संसार का उसे कोई भान नहीं रहता।
जब गुरु स्वयं साधक को खोजने आए
कहा जाता है कि जब साधक की पुकार सच्ची होती है, तब गुरु भी उसे खोज लेते हैं।
ऐसा ही हुआ।
बामा के जीवन में प्रवेश हुआ महान तांत्रिक गुरु कैलासपति बाबा का।
उन्होंने बालक की आँखों में वह अग्नि देख ली, जो सामान्य मनुष्य में नहीं होती।
उन्होंने कहा
यह बालक संसार के लिए नहीं आया है। इसकी मंज़िल स्वयं माँ तारा हैं।
गुरु ने उन्हें तारा-मंत्र की दीक्षा दी और साधना का मार्ग बताया।
यहीं से बामा केवल भक्त नहीं रहे...
वे साधक बन गए।
श्मशान... जहाँ मृत्यु समाप्त हो जाती है
गुरु ने उन्हें वहाँ भेजा, जहाँ जाने से संसार डरता है...
श्मशान रात का अंधकार...
चारों ओर चिताओं की राख...
सियारों की आवाज़...कुत्तों का झुंड...
और उन्हीं के बीच बैठा एक युवा साधक
माँ... माँ... माँ...
लोगों को वहाँ मृत्यु दिखाई देती थी।
बामा को वहाँ माँ दिखाई देती थीं।
कहा जाता है कि धीरे-धीरे श्मशान के सियार, कुत्ते और अन्य जीव उनके साथी बन गए। वे उन्हें कभी भय का कारण नहीं लगे। साधक और प्रकृति के बीच का भेद जैसे मिट गया था।
जब देवी मूर्ति नहीं, माँ बन गईं
एक दिन वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से थी।
बामा मंदिर पहुँचे उन्होंने माँ को देखा...
और फूट-फूटकर रो पड़े।
कहा जाता है कि उस दिन उनके लिए पत्थर की प्रतिमा नहीं रही...उनके सामने जीवित माँ खड़ी थीं।
वह माँ से बातें करते...
माँ से हँसते...
माँ से शिकायत करते...
कभी रूठ जाते...
कभी बालक की तरह गोद में सो जाते..
उनका और माँ का संबंध भक्त और भगवान का नहीं...
माँ और पुत्र का था।
जब पुत्र ने माँ को जूठा भोग खिलाया
यही वह प्रसंग है जिसे सुनकर सामान्य मनुष्य चौंक जाता है।
कहा जाता है कि बामाखेपा पहले स्वयं भोग का स्वाद चख लेते...
फिर वही भोग माँ को अर्पित कर देते।
मंदिर के लोग क्रोधित हो उठे।
उन्हें अपमानित किया गया।
परंतु माँ ने संकेत दिया
जिसे मेरा पुत्र प्रेम से खिलाए, वही मेरे लिए सबसे पवित्र भोग है।
यह नियम तोड़ना नहीं था...
यह प्रेम का वह स्तर था जहाँ औपचारिकता समाप्त हो जाती है।
माँ से लड़ने वाला भक्त
बामाखेपा केवल प्रार्थना नहीं करते थे।
वे माँ से झगड़ते भी थे।
कभी कहते—
आज तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"
कभी रूठकर मंदिर से चले जाते।
फिर थोड़ी देर बाद लौट आते।
क्योंकि माँ से नाराज़ हुआ जा सकता है...
माँ को छोड़ा नहीं जा सकता।
यही पुत्र और माँ का संबंध है।
माँ तारा की असीम कृपा
कहा जाता है कि धीरे-धीरे बामाखेपा के भीतर ऐसी करुणा, ऐसी शांति और ऐसी तेजस्विता प्रकट हुई कि दूर-दूर से लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे।
लेकिन वे कभी स्वयं को सिद्ध नहीं कहते थे।
वे केवल एक बात कहते
मैं कुछ नहीं जानता... मेरी माँ सब जानती हैं बड़ी मां
पंचमुंडी आसन और अंतिम विश्राम
तारापीठ की साधना में पंचमुंडी आसन का विशेष महत्व माना जाता है। तांत्रिक परंपराओं में इसे गहन साधना और वैराग्य का प्रतीक माना गया है।
संत बामाखेपा ने इसी साधना-परंपरा में साधना की और अंततः माँ तारा की कृपा में लीन हो गए।
आज भी तारापीठ में उनकी समाधि माँ तारा के चरणों के निकट श्रद्धा का केंद्र है। वहाँ पहुँचने वाले अनेक श्रद्धालु पहले माँ तारा को प्रणाम करते हैं और फिर उस साधक को, जिसने माँ को केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन भर "माँ" कहकर पुकारा।
संसार आज भी बामाखेपा को समझने का प्रयास करता है।
कुछ उन्हें तांत्रिक कहते हैं...
कुछ महायोगी...
कुछ सिद्ध पुरुष...
लेकिन शायद उनका सबसे सच्चा परिचय यही है
वह एक ऐसा बालक था...
जो बड़ा कभी हुआ ही नहीं।
वह जीवन भर माँ की गोद खोजता रहा...
और अंततः वहीं विश्राम कर गया।
शायद इसी कारण तारापीठ आज भी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि माँ और पुत्र के अमर प्रेम का साक्षी माना जाता है।
जय माँ तारा।
जय तंत्र शिरोमणि सिद्ध संत बामाखेपा।
साभार फेसबुक