सिद्ध श्री ग्वेल माँ कालिका शक्तिपीठ

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तंत्र शिरोमणि सिद्ध संत बामाखेपा जिसने माँ तारा को केवल देखा नहीं, बल्कि माँ कहकर जीया"कुछ लोग मंदिर में देवी की पूजा कर...
18/07/2026

तंत्र शिरोमणि सिद्ध संत बामाखेपा जिसने माँ तारा को केवल देखा नहीं, बल्कि माँ कहकर जीया

"कुछ लोग मंदिर में देवी की पूजा करते हैं…
कुछ लोग देवी के दर्शन करते हैं…
लेकिन इस धरती पर एक ऐसा साधक भी हुआ, जिसने देवी को अपनी माँ बना लिया।"

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि भारत की शाक्त परंपरा में पूजनीय सिद्ध संत बामाखेपा की कथा है।
वह बालक जिसे संसार नहीं, केवल माँ चाहिए थी

वीरभूम की पावन धरती पर जन्मा वह बालक अन्य बच्चों जैसा नहीं था।

जहाँ दूसरे बच्चे मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे, वहाँ उसकी आँखें किसी अदृश्य माँ को खोजती थीं।

लोग पूछते
बामा... क्या चाहिए?
वह धीरे से कहता—
मुझे मेरी माँ चाहिए...

वह माँ कोई सांसारिक स्त्री नहीं थी...
वह थीं माँ तारा।

कहा जाता है कि बचपन से ही उसका मन घंटों मंदिर में बैठा रहता। कभी मूर्ति को निहारता, कभी रोता, कभी हँसता, तो कभी ऐसी ध्यानावस्था में चला जाता कि बाहरी संसार का उसे कोई भान नहीं रहता।

जब गुरु स्वयं साधक को खोजने आए
कहा जाता है कि जब साधक की पुकार सच्ची होती है, तब गुरु भी उसे खोज लेते हैं।
ऐसा ही हुआ।
बामा के जीवन में प्रवेश हुआ महान तांत्रिक गुरु कैलासपति बाबा का।
उन्होंने बालक की आँखों में वह अग्नि देख ली, जो सामान्य मनुष्य में नहीं होती।

उन्होंने कहा
यह बालक संसार के लिए नहीं आया है। इसकी मंज़िल स्वयं माँ तारा हैं।

गुरु ने उन्हें तारा-मंत्र की दीक्षा दी और साधना का मार्ग बताया।
यहीं से बामा केवल भक्त नहीं रहे...
वे साधक बन गए।

श्मशान... जहाँ मृत्यु समाप्त हो जाती है
गुरु ने उन्हें वहाँ भेजा, जहाँ जाने से संसार डरता है...
श्मशान रात का अंधकार...
चारों ओर चिताओं की राख...
सियारों की आवाज़...कुत्तों का झुंड...
और उन्हीं के बीच बैठा एक युवा साधक
माँ... माँ... माँ...
लोगों को वहाँ मृत्यु दिखाई देती थी।
बामा को वहाँ माँ दिखाई देती थीं।

कहा जाता है कि धीरे-धीरे श्मशान के सियार, कुत्ते और अन्य जीव उनके साथी बन गए। वे उन्हें कभी भय का कारण नहीं लगे। साधक और प्रकृति के बीच का भेद जैसे मिट गया था।

जब देवी मूर्ति नहीं, माँ बन गईं
एक दिन वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से थी।
बामा मंदिर पहुँचे उन्होंने माँ को देखा...
और फूट-फूटकर रो पड़े।
कहा जाता है कि उस दिन उनके लिए पत्थर की प्रतिमा नहीं रही...उनके सामने जीवित माँ खड़ी थीं।
वह माँ से बातें करते...
माँ से हँसते...
माँ से शिकायत करते...
कभी रूठ जाते...
कभी बालक की तरह गोद में सो जाते..

उनका और माँ का संबंध भक्त और भगवान का नहीं...
माँ और पुत्र का था।

जब पुत्र ने माँ को जूठा भोग खिलाया
यही वह प्रसंग है जिसे सुनकर सामान्य मनुष्य चौंक जाता है।
कहा जाता है कि बामाखेपा पहले स्वयं भोग का स्वाद चख लेते...
फिर वही भोग माँ को अर्पित कर देते।
मंदिर के लोग क्रोधित हो उठे।
उन्हें अपमानित किया गया।
परंतु माँ ने संकेत दिया
जिसे मेरा पुत्र प्रेम से खिलाए, वही मेरे लिए सबसे पवित्र भोग है।

यह नियम तोड़ना नहीं था...
यह प्रेम का वह स्तर था जहाँ औपचारिकता समाप्त हो जाती है।

माँ से लड़ने वाला भक्त
बामाखेपा केवल प्रार्थना नहीं करते थे।
वे माँ से झगड़ते भी थे।
कभी कहते—
आज तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"
कभी रूठकर मंदिर से चले जाते।
फिर थोड़ी देर बाद लौट आते।

क्योंकि माँ से नाराज़ हुआ जा सकता है...
माँ को छोड़ा नहीं जा सकता।
यही पुत्र और माँ का संबंध है।

माँ तारा की असीम कृपा
कहा जाता है कि धीरे-धीरे बामाखेपा के भीतर ऐसी करुणा, ऐसी शांति और ऐसी तेजस्विता प्रकट हुई कि दूर-दूर से लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे।

लेकिन वे कभी स्वयं को सिद्ध नहीं कहते थे।

वे केवल एक बात कहते

मैं कुछ नहीं जानता... मेरी माँ सब जानती हैं बड़ी मां

पंचमुंडी आसन और अंतिम विश्राम
तारापीठ की साधना में पंचमुंडी आसन का विशेष महत्व माना जाता है। तांत्रिक परंपराओं में इसे गहन साधना और वैराग्य का प्रतीक माना गया है।

संत बामाखेपा ने इसी साधना-परंपरा में साधना की और अंततः माँ तारा की कृपा में लीन हो गए।

आज भी तारापीठ में उनकी समाधि माँ तारा के चरणों के निकट श्रद्धा का केंद्र है। वहाँ पहुँचने वाले अनेक श्रद्धालु पहले माँ तारा को प्रणाम करते हैं और फिर उस साधक को, जिसने माँ को केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन भर "माँ" कहकर पुकारा।

संसार आज भी बामाखेपा को समझने का प्रयास करता है।
कुछ उन्हें तांत्रिक कहते हैं...

कुछ महायोगी...

कुछ सिद्ध पुरुष...

लेकिन शायद उनका सबसे सच्चा परिचय यही है

वह एक ऐसा बालक था...
जो बड़ा कभी हुआ ही नहीं।

वह जीवन भर माँ की गोद खोजता रहा...

और अंततः वहीं विश्राम कर गया।

शायद इसी कारण तारापीठ आज भी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि माँ और पुत्र के अमर प्रेम का साक्षी माना जाता है।

जय माँ तारा।
जय तंत्र शिरोमणि सिद्ध संत बामाखेपा।


साभार फेसबुक

12/07/2026

तो क्या आप काली को खरीदना चाहते हैं?
‘जब रामकृष्ण परमहंस ने रानी रासमणि को थप्पड़ मारा...’

एक बार रानी रासमणि (दक्षिणेश्वर मंदिर की संस्थापक) दक्षिणेश्वर आईं और गंगा में स्नान करने के बाद, जप और ध्यान के लिए देवी माँ के मंदिर में गईं।
उस समय श्री रामकृष्ण भी वहीं थे। रानी रासमणि ने उनके भक्ति-गीत कई बार सुने थे और उन्हें वे बहुत पसंद थे, इसलिए उन्होंने उनसे गाने का आग्रह किया।
श्री रामकृष्ण ने गाना शुरू किया, लेकिन अचानक वे रुक गए और रासमणि की ओर मुड़कर बोले: "क्या! यहाँ भी आप ऐसे विचार मन में ला रही हैं!"
ऐसा कहते हुए उन्होंने रानी रासमणि को थप्पड़ मार दिया।
तुरंत मंदिर में हड़कंप मच गया। रासमणि की महिला परिचारिकाएँ चिल्लाने लगीं, और मंदिर के रक्षक तथा अधिकारी श्री रामकृष्ण को खींचकर बाहर ले जाने के लिए मंदिर की ओर दौड़े। वे हिचकिचा रहे थे, बस रानी के आदेश का इंतजार कर रहे थे।
लेकिन रासमणि शांत भाव से आत्म-चिंतन में डूबी बैठी थीं। गाना सुनने के बजाय, वह एक मुकदमे के बारे में सोच रही थीं।
उन्हें आश्चर्य हुआ कि श्री रामकृष्ण को पता चल गया था कि वह क्या सोच रही थीं। जब उन्हें अपने आस-पास की स्थिति का आभास हुआ, तो उन्होंने देखा कि लोग उनके चारों ओर खड़े थे और श्री रामकृष्ण को दंडित करने के लिए तैयार थे, जो चुपचाप बैठे मुस्कुरा रहे थे। तब रासमणि ने आदेश दिया: "इस युवा पुजारी की कोई गलती नहीं है। इनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करें।"
यहाँ ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वृद्ध, परिपक्व और महान काली साधक रामकृष्ण परमहंस नहीं थे, बल्कि एक 'युवा पुजारी' के रूप में उन्होंने रानी को थप्पड़ मारा था।
सबके सामने थप्पड़ खाने के बाद महान रामकृष्ण के प्रति रानी का समर्पण तो समझ में आता है, लेकिन उन्होंने उस युवा पुजारी की महानता को तब भी पहचान लिया था, जब वे उस महान व्यक्तित्व के रूप में स्थापित नहीं हुए थे।

महाविद्या - क्रियाशील शक्ति।
यहाँ रानी रासमणि ने कालिका को एक मंदिर में स्थापित करने के लिए ऐतिहासिक स्थान प्रदान किया। वह मंदिर जो भविष्य में कालिका शक्ति के साथ सबसे पवित्र और प्रतिष्ठित स्थानों में से एक के रूप में जाना जाने वाला था।
फिर भी, रानी रासमणि ने स्वयं काली को वहाँ स्थापित नहीं किया। क्योंकि उन्हें माँ कमला और माँ भुवनेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त था, और उन्हें धन-वैभव मिला हुआ था।
उचित रूप से उन्हें एक माध्यम बनने की अनुमति दी गई जिसके ज़रिए काली को स्थापित किया जा सके, लेकिन वे पुजारिन नहीं बन सकीं।
काली का यही सरल सत्य है कि जो व्यक्ति काली को प्राप्त कर लेता है, वह उन्हें धन के बदले नहीं बेच सकता, काली के सिवा किसी और की पूजा नहीं कर सकता।
एक पैसा कमाने की क्षमता मैं काली को प्राप्त करने के लिए समर्पित करता हूँ।
अपने वरिष्ठ को प्रसन्न करने की क्षमता, कार्यस्थल पर, राजनीतिक उद्देश्यों के लिए, या किसी प्रकार का लाभ प्राप्त करने के लिए, मैं काली को प्राप्त करने के लिए उन्हें समर्पित करता हूँ।
किसी स्वार्थवश किसी अन्य मनुष्य की प्रशंसा करना, उसे प्रसन्न करना, काली की सिद्धि प्राप्त करने के मार्ग में संभव नहीं है।
यही कारण है कि एक साधारण काली पुजारी पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली प्राणी है।
रामकृष्ण रानी के प्रति दयालु थे, उन्होंने उन्हें थप्पड़ मारा था।
यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो देवी रानी पर बहुत प्रतिकूल प्रतिक्रिया देतीं।
गुरु उनके प्रति दयालु थे।
रानी रासमणि एक महान परोपकारी थीं, फिर भी वे अपने इन प्रयासों के लिए नहीं, बल्कि इस साधारण तथ्य के लिए जानी जाती हैं कि उन्होंने दक्षिणेश्वर का निर्माण करवाया, जहाँ कालिका विराजमान थीं... किसके लिए?
रानी के लिए?
क्या अपनी दौलत के लिए?
काली साधारण सूती धोती पहने, साधारण पुजारी के सामने बैठी थीं।
काली का पहला नाम श्मशान काली है, केवल काली ही किसी को श्मशान से परे प्रसिद्धि दिला सकती हैं, जहाँ व्यक्ति को न केवल 'स्मरण' किया जाता है, बल्कि पूजा जाता है और मृत्यु के बाद सदियों तक उसका आह्वान किया जाता है।
रानी ने उन्हें गर्भगृह दिया, काली के प्रति उनके प्रेम को शांत करने का स्थान, और उन्होंने उन्हें शाश्वत महिमा प्रदान की, क्योंकि वे किसी स्वामी की पूजा करने या गर्भगृह बनाने के लिए खुद कोई व्यवसाय चलाने के लिए बाध्य नहीं थे, उन्होंने वह सारा प्रयास काली की पूजा में लगाया।
काली नहीं चाहती थीं कि वे इसके लिए परिश्रम करें, उनके अपने तरीके हैं।

यही स्वरूप और बहुत सी समानताएँ एक अन्य महान काली साधक, रामप्रसाद सेन में भी पाई जाती हैं।
निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे रामप्रसाद सेन काली के प्रति इतने प्रेम से परिपूर्ण थे कि एक दिन वे अपने नियोक्ता की लेखा-पुस्तक पर उनका नाम लिखते चले गए, उनकी लीला में लीन होकर।
यह देखकर नियोक्ता साधक को डांटने के बजाय उसके चरणों में गिर पड़ा और उससे घर छोड़ने का अनुरोध किया और आश्वासन दिया कि उसे हर महीने उसका मासिक वेतन (25 रुपये) मिलता रहेगा और उसे फिर कभी काम नहीं करना पड़ेगा।
नियोक्ता ने उन रचनाओं को काली देवी द्वारा उसके साधारण सांसारिक जीवन पर दिया गया सबसे बड़ा उपहार बताया।
इसलिए, उच्च स्तर पर, काली देवी का साधक एक आश्रित व्यक्ति होता है, जहाँ केवल दिव्य आत्मीयता और दिव्य उन्माद होता है।

जय माँ आद्यामहाकाली।
भैरवकालिका नमोस्तुते।

फेसबुक से ही साभार

सूअर का दांत किस ग्रह से सम्बंधित है ? रावण रावण संहिता में बताये गए हैं, सुअर का दांत पहनने के गुप्त फायदे, कुछ रहस्यमई...
01/06/2026

सूअर का दांत किस ग्रह से सम्बंधित है ? रावण रावण संहिता में बताये गए हैं, सुअर का दांत पहनने के गुप्त फायदे, कुछ रहस्यमई और सम्पूर्ण जानकारी - Which Planet is Represented by Tooth of Pig, Swine, or Boar ? Its Uses in 'Tantra-Totka' and for protection of Evil Eye, Inauspicious, Ominous, or Sinister Influences :

1. सूअर का दांत (शूकर दंत) पर बहुत ही अलग-अलग जानकारी है; कई इसे मंगल, कई बुध, कई शुक्र और लाल-किताब सूअर को तो केतु ग्रह से सम्बंधित मानती है, पर इसके दांत के बारे में कुछ नहीं कहा गया। सूअर के दांत का उपयोग तांत्रिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी किया जाता है। सूअर गन्दा और निंदित प्राणी माना जाता है, किंतु तंत्र साधना और अध्यात्म में इसका बड़ा महत्व माना जाता हैं। सूअर-दन्त का प्रयोग लॉकेट के रूप में किया जाता है। सूअर दन्त से वशीकरण प्रयोग किये जाते हैं और व्यापार को बढ़ने के लिए तथा भूत प्रेत जैसी बाधा को दूर करने के लिए भी इसका उपयोग होता है। तंत्र साधना या तांत्रिक क्रिया में बहुत से जानवरों के शरीर के अंग इस्तेमाल होते हैं, जैसे बिल्ली की जेर, उल्लू के नाख़ून, काले हिरन के सींग, शेर के नाख़ून, और सूअर का दांत। तांत्रिक क्रिया में इन सब का बड़ा महत्व है और कानूनी तोर पर ये प्रतिबंधित है। इसी वजह से ये वस्तुए काफी ऊंची कीमत में मिलती है ।

2. वैसे तो किसी भी जानवर को मारकर उससे तंत्र क्रिया करना ठीक नहीं, ये एक महापाप है। पुराने लोग स्वतः ही मरे हुए जानवर के अंगों से तरह तरह की तंत्र साधना किया करते थे, इसलिए इन जानवरो के अंग बाजार में मिलने काफी दुर्लभ थे, पर आजकल इनकी मांग बढ़ने से, इनका शिकार होने लगा है, जो अनैतिक और गलत है। विशेष तौर पर इस उद्देश्य के लिए मारे गए जानवर के अंग पर तंत्र करना उतना अच्छा काम नहीं करता, जितना स्वाभाविक रूप से मरे हुए जानवर के ऊपर करता है। हम वैसे भी इस तरह के अप्रमाणित, इधर-उधर के तुक्के, सोशल मीडिया पर भेड़चाल के आधार पर लिखते नहीं।

3. कई घरों में छोटे बच्चों को बाघ का नाखून, सूअर का दन्त आदि पहनवाने की परंपरा थी, और कई लोग आज भी इन्हें पहनते हैं। कुछ लोग सूअर के दांत को बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और तंत्र-मंत्र से बचाने के लिए पहनते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, सूअर का दांत पहनने से व्यापार में सफलता, आत्मविश्वास और आर्थिक समृद्धि मिल सकती है। अगर कोई जातक घर में लगातार क्लेश से परेशान हो, पैसा हाथ में नहीं टिकता, कोई शत्रु बार-बार परेशान कर रहा हो या फिर बुरी नजर से आपका घर और कारोबार नष्ट हो रहा हो, तो ऐसे में आप शुक्र दन्त का प्रयोग कर सकते हैं और प्रयोग से बदलाव को आप खुद ही महसूस कर सकते हैं। यदि किसी को लगता है, कि उसके ऊपर काला जादू हो रखा है, तो ऐसे में व्यक्ति सूअर के दांत का प्रयोग कवच के रूप में कर सकता है। अब यह मान्यताएं हैं, कितनी सही, या गलत, कोई नहीं जानता। हम भी ऐसा दावा नहीं करते, कि यह इस तरह के काम अवश्य करेगा। यह लेख नेट से ली गई जानकारी, कुछ पंडितों, ज्योतिषियों और पुराने बज़ुर्गों से हुई बात, और इन सब को ध्यान में रखकर, जो हमारा विचार बना है, उसके आधार पर लिख रहे हैं। रावण रचित, 'रावण संहिता' में भी इसके कई लाभ बताए गए हैं।

3. सही मायने में तो जंगली सुअर के दांत धारण करने से ही अधिक लाभ मिलते हैं, पर जंगली सुअर के एक दांत की कीमत कई लाखो रुपए तक जाती है। एक नेट लिंक में तो जंगली सूअर के एक दांत की कीमत करीब 20 लाख रुपए बताई गई है। हम नहीं जानते, कि यह कितना सही है, पर कीमती तो
होगा ! क्योंकि, इन चीज़ों का कोई तय मोल तो होता नहीं, मांग और आपूर्ति (Demand and supply) के आधार पर तय होता है, इसी प्रकार उल्लू के पंजे आदि की कीमत इतनी अधिक सुनी है, कि विश्वास नहीं होता। ऐसा माना जाता है कि व्यापार में लाभ के लिए सूअर दंत का ताबीज, या लॉकेट धारण करने से, या इसके कार्यस्थल पर रखने से लाभ ही लाभ मिलता है। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि यदि व्यापार या कार्यस्थल पर किसी सूअर दंत को बाहर लगाते हैं तो काफी लाभ होता है। इस बात पर विश्वास और यकीन करने वाले जंगली सुअर के दांत की मुँह मांगी कीमत देने को तैयार हो जाते है। क्योंकि जंगली सूअर के दांत की कीमत बहुत अधिक है, इसलिए किसी भी सूअर के दांत से भी लाभ मिल सकता है। बड़ी बात यह है, कि आम सूअर को अधिकतर मांस विक्रेता काटते ही हैं, उसके दांत उनसे लोग खरीद लेते हैं। क्योंकि इन सूअरों को दांत प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं मारा जाता, इसलिए कोई दोष भी नहीं लगता।

4. वैसे तो सूअर को गन्दा प्राणी माना जाता है, पर यह केवल इसलिए है, क्योंकि यह आमतौर पर गन्दगी खाने के लिए छोड़ दिया जाता है, अन्य जानवरों की तरह पाल कर, ढंग से खिलाया नहीं जाता। पर इसे एक अन्य दृष्टि से भी देखा जा सकता है। सूअर को "वाराह" भी कहा जाता है, और यह भगवान विष्णु के वराह अवतार से भी जुड़ा है। इस कारण, सूअर का दांत एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, सूअर का दांत नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, और तंत्र-मंत्र से बचाने के लिए पहना जाता है।

5. हमारे विचार में सूअर के दांत का प्रयोग करने में कोई दोष नहीं है। इसको सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह के मंत्र का प्रयोग करने की हम सलाह नहीं देते। तंत्र टोटके के नकारात्मक परिणाम भी हो सकते हैं। हम तो यह भी सलाह देंगे, कि किसी भी तरह के वशीकरण के प्रयोग के चक्कर मे ना फंसें। केवल भगवान विष्णु को, उनके वराह अवतार को स्मरण करके प्रणाम करके, जैसे बताया है, वैसे ही धारण करें।

6. शुक्र दन्त को सिद्ध करने की आसान विधि :
पहले, आप इसे अच्छी तरह से धो लें, उचित होगा, डेटोल, सेवलॉन, स्पिरिट, आदि किसी रोगाणुरोधक घोल में, कुछ समय डुबो दें, या साबुन से अच्छी तरह धो लें, ताकि कोई बैक्टीरिया या कीटाणु न लगे रहें।
फिर आप इसे दूध, जल और गंगाजल के मिश्रण में कम से कम दो घंटे डुबो दें। फिर सूअर के दांत को सामने रख कर उसकी पंचोपचार पूजा (अर्थात्, गंध लगाना, फूल चढ़ाना, धूप (लोबान), आरती और नैवेद्य अर्पित करना ) करे और साथ में ही भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करे। वैसे तो किसी मन्त्र का जाप आवश्यक नहीं है, फिर भी करना हो, तो निम्न मन्त्र का जाप करें और दांत को लॉकेट, या तज़ीब के रूप में धारण कर लें :
“ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं वाराह-दन्ताय भैरवाय नमः।”

7. i. अगर धन अनावश्यक रूप से ज्यादा खर्च हो रहा हो तो ऐसे में आप सूअर दन्त को अपनी तिजोरी में रख लें।
ii. अगर किसी भी व्यक्ति को बार बार बुरी नजर लग रही हो तो ऐसे में वह व्यक्ति सूअर के दांत का ताबीज, या लॉकेट बना के पहन ले।
iii. अगर आपके घर को बार-बार बुरी नजर लग रही हो तो ऐसे में आप सूअर के दांत को घर के दरवाजे के ऊपर लटका दीजिये, इससे सुरक्षा होगी।
iv. पति-पत्नी के बीच बिना किसी बात के झगडा होता हो, तो हो सकता है, जब रिश्ते को बुरी नजर लग गई है। ऐसे में एक सूअर का दांत बिस्तर के नीचे रख दे, इससे आपको फायदा महसूस होगा।
v. अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसके घर पर भूत प्रेत का साया है और घर में सभी लोग डरे हुए रहते हैं, बार बार बीमार पड़ते हैं, तो घर के चारो कोनो में, या फिर घर में सूअर के दांत को रख दीजिये, इससे आपका पूरा घर सुरक्षित हो जायेगा।
vi. अगर घर का द्वार दक्षिण दिशा की ओर हो और इसके कारण घरवाले परेशान हो रहे हो, तो ऐसे में सूअर का दांत लाल कपडे में बाँध कर दरवाजे के ऊपर लटका देना चाहिए |
ध्यान दें:
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये मान्यताएं ज्योतिष और तांत्रिक प्रथाओं से जुड़ी हैं, और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हैं।
जय हनुमान, जय सिया-राम !

नोट :
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फोटोज : गूगल के सौजन्य से साभार

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19/03/2026
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जय माई!आने वाले चैत्र नवरात्र कुंजिका पाठ और हवन होने हैं इस हेतु प्रति कुंजिका 101 की दक्षिणा भी देय होगीकुछ साथी अखंड ...
05/03/2026

जय माई!

आने वाले चैत्र नवरात्र कुंजिका पाठ और हवन होने हैं
इस हेतु प्रति कुंजिका 101 की दक्षिणा भी देय होगी

कुछ साथी अखंड दीपक के लिए पूछ रहे थे तो ये भी होगा जिन्हें अखंड दीपक लगाने हो
वो भी उसकी सूचना समय रहते दे दें ताकि समय से व्यवस्था बन सके

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