Gurbani Vichaar Sewa Society

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रे चित चेतसि की न दयाल दमोदर बिबहि न जानसि कोई ॥ जे धावहि ब्रहमंड खंड कउ करता करै सु होई ॥१॥ रहाउ ॥ जननी केरे उदर उदक मह...
26/04/2020

रे चित चेतसि की न दयाल दमोदर बिबहि न जानसि कोई ॥ जे धावहि ब्रहमंड खंड कउ करता करै सु होई ॥१॥ रहाउ ॥ जननी केरे उदर उदक महि पिंडु कीआ दस दुआरा ॥ देइ अहारु अगनि महि राखै ऐसा खसमु हमारा ॥१॥ कुमी जल माहि तन तिसु बाहरि पंख खीरु तिन नाही ॥ पूरन परमानंद मनोहर समझि देखु मन माही ॥२॥ पाखणि कीटु गुपतु होइ रहता ता चो मारगु नाही ॥ कहै धंना पूरन ताहू को मत रे जीअ डरांही ॥३॥३॥ {पन्ना 488}

Meaning------

अर्थ: हे (मेरे) मन! दया के घर परमात्मा को तू क्यों नही सिमरता? (देखना) किसी और की आस ना लगाए रखना। अगर तू सारी सृष्टि के देसों-परदेसों में भी भटकता फिरेगा, तो भी वही कुछ होगा जो करतार करेगा।1। रहाउ।

माँ के पेट के जल में उस प्रभू ने हमारा दस सोतों वाला शरीर बना दिया; खुराक दे के माँ के पेट की आग में वह हमारी रक्षा करता है (देख, हे मन!) वह हमारा मालिक ऐसा (दयालु) है।1।

कछुआ पानी में रहता है, उसके बच्चे बाहर (रेत पर रहते हैं), ना (बच्चों के) पंख हैं (कि उड़ के कुछ खा लें), ना (कछुए के) थन (हैं कि बच्चों को दूध पिलाए); (पर हे जीवात्मा!) मन में विचार के देख, वह सुंदर परमानंद पूर्ण प्रभू (उनकी पालना करता है)।2।

पत्थर में कीड़ा छुपा हुआ रहता है (पत्थर में से बाहर जाने के लिए) उसका कोई रास्ता नहीं; पर उसको (पालने वाला) भी पूर्ण परमात्मा है; धंना कहता है– हे जीवात्मा! तू भी ना डर।3।3।

नोट: ये तीनों शबद राग आसा में हैं। पहला और तीसरा शबद भगत धंना जी के हैं। यहाँ कोई भी सिद्धांत गुरमति के विरुद्ध नहीं दिख रहा।

19/04/2020

Wahguru ji ka Khalsa Wahguru ji ki Fateh !!

बसंतु महला ३ ॥ अंतरि पूजा मन ते होइ ॥ एको वेखै अउरु न कोइ ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ ॥१॥ मेरा...
18/04/2020

बसंतु महला ३ ॥ अंतरि पूजा मन ते होइ ॥ एको वेखै अउरु न कोइ ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ ॥१॥ मेरा प्रभु मउलिआ सद बसंतु ॥ इहु मनु मउलिआ गाइ गुण गोबिंद ॥१॥ रहाउ ॥ गुर पूछहु तुम्ह करहु बीचारु ॥ तां प्रभ साचे लगै पिआरु ॥ आपु छोडि होहि दासत भाइ ॥ तउ जगजीवनु वसै मनि आइ ॥२॥ भगति करे सद वेखै हजूरि ॥ मेरा प्रभु सद रहिआ भरपूरि ॥ इसु भगती का कोई जाणै भेउ ॥ सभु मेरा प्रभु आतम देउ ॥३॥ आपे सतिगुरु मेलि मिलाए ॥ जगजीवन सिउ आपि चितु लाए ॥ मनु तनु हरिआ सहजि सुभाए ॥ नानक नामि रहे लिव लाए ॥४॥४॥ {पन्ना 1173}

पद्अर्थ: अंतरि = (उस मनुष्य के) अंदर ही। पूजा = भक्ति। मन ते = मन से, जुड़े मन से। होइ = (होय) होती रहती है। ऐको = एक (परमात्मा) को ही। दूजै = माया के मोह में (फस के)। लोकी = दुनिया के। सतिगुरि = गुरू ने। मैनो = मुझे।1।

मउलिआ = (हर जगह) खिला हुआ है, (हर जगह) प्रकाशमान है। सद बसंतु = सदा खिले रहने वाला परमात्मा। गाइ = गा के।1। रहाउ।

गुर पूछहु = गुरू की शिक्षा लो। वीचारु = (परमात्मा के गुणों की) विचार। तां = तब। आपु = स्वै भाव। छोडि = छोड़ के। होहि = अगर तू हो जाए। भाइ = (शब्द 'भउ' का अधिकरण कारक एक वचन) भावना में। दासत = (दासत्व)। शब्द 'दास' से भाव वाचक संज्ञा। दासत भाइ = (दासत भाय) सेवक स्वभाव में, दासत्व भाव में। तउ = तब। जग जीवनु = जगत का जीवन प्रभू, जगत को पैदा करने वाला प्रभू। मनि = मन में।2।

भगति = बँदगी। सद = सदा। हजूरि = हाजर नाजर, अंग संग। रहिआ भरपूरि = सब जगह व्यापक है। कोई = जो कोई मनुष्य। भेउ = भेद। सभु = हर जगह। आतम देउ = परमात्मा।3।

आपे = (प्रभू) स्वयं ही। मेलि = मिला के। मिलाऐ = (अपने साथ) मिलाता है। सिउ = साथ। लाऐ = जोड़ता है। हरिआ = आत्मिक जीवन से भरपूर। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाऐ = सुभाय, प्यार में। नामि = नाम में। लिव = लगन। रहे लाऐ = लगाए रखते हैं।4।

अर्थ: हे भाई! सदा आनन्द-स्वरूप मेरा परमात्मा (हर जगह) अपना प्रकाश कर रहा है। उस परमात्मा के गुण गा-गा के (मेरा) यह मन सदा खिला रहता है।1। रहाउ।

हे भाई! (जो भी मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसके) अंदर ही जुड़े मन से परमात्मा की भक्ति होती रहती है, (वह मनुष्य हर जगह) सिर्फ परमात्मा को (बसता) देखता है, (कहीं भी परमात्मा के बिना) किसी और को नहीं देखता। हे भाई! दुनियां ने माया के मोह में फस के सदा बहुत दुख पाया है, पर गुरू ने (मेहर कर के) मुझे सिर्फ परमात्मा ही (हर जगह बसता) दिखा दिया है (और, मैं दुख से बच गया हूँ)।1।

हे भाई! (तुमने भी अगर दुखों से बचना है, तो) गुरू की शिक्षा लो, और, परमात्मा के गुणों को अपने मन में बसाए रखो, (जब प्रभू को अपने मन में बसाओगे) तब सदा कायम रहने वाला परमात्मा के साथ (तुम्हारा) प्यार बन जाएगा। हे भाई! अगर तू स्वै भाव (अहंकार) छोड़ के सेवक-भाव में टिका रहे, तो जगत को पैदा करने वाला परमात्मा (तेरे) मन में आ बसेगा।2।

हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करता है, वह परमात्मा को सदा अपने अंग-संग देखता है, प्यारा प्रभू उसको हर जगह व्यापक दिखाई देता है। हे भाई! जो भी मनुष्य परमात्मा की इस भक्ति (के करिश्मे) का भेद समझ लेता है, उसको परमात्मा हर जगह बसता दिखाई दे जाता है।3।

पर, हे भाई! (भक्ति की दाति उसकी अपनी मेहर से ही मिलती है) जगत का जीवन प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू मिला के (अपने चरणों में) जोड़ता है, वह स्वयं ही मनुष्य का चिक्त अपने साथ जोड़ता है। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़े रखते हैं, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं, उनका मन उनका तन आत्मिक जीवन से भरपूर रहता है।4।4।

(Dhan Dhan Baba Farid Ji )
Shri Guru Granth Sahib !!

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16/04/2020

World's youngest mail developer fromJammu and Kashmir is helping India to fight Coronavirus, children are considered to be the nation's future, and from Jammu has proved this statement correct, and makes community pride, The 10th standard student at BSF senior Secondary school, has built the COVID care Jammu website to help and solve the Coronavirus crisis. Nowadays which is useful for entire country.
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15/04/2020

सोरठि महला ५ ॥
हरि नामु रिदै परोइआ ॥ सभु काजु हमारा होइआ ॥ प्रभ चरणी मनु लागा ॥ पूरन जा के भागा ॥१॥
मिलि साधसंगि हरि धिआइआ ॥ आठ पहर अराधिओ हरि हरि मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ रहाउ ॥
परा पूरबला अंकुरु जागिआ ॥ राम नामि मनु लागिआ ॥ मनि तनि हरि दरसि समावै ॥ नानक दास सचे गुण गावै ॥२॥८॥७२॥ {पन्ना 627}

पद्अर्थ: रिदै = हृदय में। परोइआ = अच्छी तरह बसा लिया। सभु = सारा। काजु = जीवन मनोरथ। जा के = जिस मनुष्य के।1।

मिलि = मिल के। साध संगि = साध-संगति में। अराधिओ = सिमरा। मन चिंदिआ = मन इच्छित। रहाउ।

परा पूरबला = अनेकों पहले जन्मों का। अंकुरु = अंगूर। जागिआ = फूट पड़ा। नामि = नाम में। मनि तनि = मन से तन से, पूरी तरह से। दरसि = दर्शन मे। सचे = सदा स्थििर हरी के।2।


अर्थ: ( हे भाई! जिस भी मनुष्य ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा का नाम सिमरन किया, आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का नाम याद किया, उसने हरेक मन-मांगी मुरादें पा लीं। रहाउ।

हे भाई! जिस मनुष्य के भाग्य अच्छी तरह जाग पड़ते हैं, उसका मन परमात्मा के चरणों में लीन रहता है।
हे भाई! जब परमात्मा का नाम अच्छी तरह दिल में बसा लिया जाता है, तब हम जीवों का सारा जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है।1।

हे दास नानक! (कह– साध-संगति में मिल के जब किसी मनुष्य के) अनेकों पूर्बले जन्मों के संस्कारों के बीज अंकुरित हो जाते हैं (पूर्बले संस्कार जाग जाते हैं, तब उसका) मन परमात्मा के नाम में लगने लग जाता है,
वह मनुष्य मन से तन से परमात्मा के दीदार में मस्त रहता है, वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाता रहता है।2।8।72।

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