18/04/2020
बसंतु महला ३ ॥ अंतरि पूजा मन ते होइ ॥ एको वेखै अउरु न कोइ ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ ॥१॥ मेरा प्रभु मउलिआ सद बसंतु ॥ इहु मनु मउलिआ गाइ गुण गोबिंद ॥१॥ रहाउ ॥ गुर पूछहु तुम्ह करहु बीचारु ॥ तां प्रभ साचे लगै पिआरु ॥ आपु छोडि होहि दासत भाइ ॥ तउ जगजीवनु वसै मनि आइ ॥२॥ भगति करे सद वेखै हजूरि ॥ मेरा प्रभु सद रहिआ भरपूरि ॥ इसु भगती का कोई जाणै भेउ ॥ सभु मेरा प्रभु आतम देउ ॥३॥ आपे सतिगुरु मेलि मिलाए ॥ जगजीवन सिउ आपि चितु लाए ॥ मनु तनु हरिआ सहजि सुभाए ॥ नानक नामि रहे लिव लाए ॥४॥४॥ {पन्ना 1173}
पद्अर्थ: अंतरि = (उस मनुष्य के) अंदर ही। पूजा = भक्ति। मन ते = मन से, जुड़े मन से। होइ = (होय) होती रहती है। ऐको = एक (परमात्मा) को ही। दूजै = माया के मोह में (फस के)। लोकी = दुनिया के। सतिगुरि = गुरू ने। मैनो = मुझे।1।
मउलिआ = (हर जगह) खिला हुआ है, (हर जगह) प्रकाशमान है। सद बसंतु = सदा खिले रहने वाला परमात्मा। गाइ = गा के।1। रहाउ।
गुर पूछहु = गुरू की शिक्षा लो। वीचारु = (परमात्मा के गुणों की) विचार। तां = तब। आपु = स्वै भाव। छोडि = छोड़ के। होहि = अगर तू हो जाए। भाइ = (शब्द 'भउ' का अधिकरण कारक एक वचन) भावना में। दासत = (दासत्व)। शब्द 'दास' से भाव वाचक संज्ञा। दासत भाइ = (दासत भाय) सेवक स्वभाव में, दासत्व भाव में। तउ = तब। जग जीवनु = जगत का जीवन प्रभू, जगत को पैदा करने वाला प्रभू। मनि = मन में।2।
भगति = बँदगी। सद = सदा। हजूरि = हाजर नाजर, अंग संग। रहिआ भरपूरि = सब जगह व्यापक है। कोई = जो कोई मनुष्य। भेउ = भेद। सभु = हर जगह। आतम देउ = परमात्मा।3।
आपे = (प्रभू) स्वयं ही। मेलि = मिला के। मिलाऐ = (अपने साथ) मिलाता है। सिउ = साथ। लाऐ = जोड़ता है। हरिआ = आत्मिक जीवन से भरपूर। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाऐ = सुभाय, प्यार में। नामि = नाम में। लिव = लगन। रहे लाऐ = लगाए रखते हैं।4।
अर्थ: हे भाई! सदा आनन्द-स्वरूप मेरा परमात्मा (हर जगह) अपना प्रकाश कर रहा है। उस परमात्मा के गुण गा-गा के (मेरा) यह मन सदा खिला रहता है।1। रहाउ।
हे भाई! (जो भी मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसके) अंदर ही जुड़े मन से परमात्मा की भक्ति होती रहती है, (वह मनुष्य हर जगह) सिर्फ परमात्मा को (बसता) देखता है, (कहीं भी परमात्मा के बिना) किसी और को नहीं देखता। हे भाई! दुनियां ने माया के मोह में फस के सदा बहुत दुख पाया है, पर गुरू ने (मेहर कर के) मुझे सिर्फ परमात्मा ही (हर जगह बसता) दिखा दिया है (और, मैं दुख से बच गया हूँ)।1।
हे भाई! (तुमने भी अगर दुखों से बचना है, तो) गुरू की शिक्षा लो, और, परमात्मा के गुणों को अपने मन में बसाए रखो, (जब प्रभू को अपने मन में बसाओगे) तब सदा कायम रहने वाला परमात्मा के साथ (तुम्हारा) प्यार बन जाएगा। हे भाई! अगर तू स्वै भाव (अहंकार) छोड़ के सेवक-भाव में टिका रहे, तो जगत को पैदा करने वाला परमात्मा (तेरे) मन में आ बसेगा।2।
हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करता है, वह परमात्मा को सदा अपने अंग-संग देखता है, प्यारा प्रभू उसको हर जगह व्यापक दिखाई देता है। हे भाई! जो भी मनुष्य परमात्मा की इस भक्ति (के करिश्मे) का भेद समझ लेता है, उसको परमात्मा हर जगह बसता दिखाई दे जाता है।3।
पर, हे भाई! (भक्ति की दाति उसकी अपनी मेहर से ही मिलती है) जगत का जीवन प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू मिला के (अपने चरणों में) जोड़ता है, वह स्वयं ही मनुष्य का चिक्त अपने साथ जोड़ता है। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़े रखते हैं, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं, उनका मन उनका तन आत्मिक जीवन से भरपूर रहता है।4।4।
(Dhan Dhan Baba Farid Ji )
Shri Guru Granth Sahib !!