Acharya Satish Mishra

Acharya Satish Mishra Ram Katha and Srimad Bagvat Katha

28/06/2026

जगे हो आप मधुसूदन,मुझे किस बात की चिन्ता । तुम्हारे हाथ जीवन रथ,करूं किस बात की चिन्ता।।

जमाना चाहे दुश्मन हो,डगर कांटों भरी चाहे। मुझे न फिक्र बिल्कुल है,शरों की हो झङी चाहे।।
तुम्हीं को अब तो करनी है,मेरे विश्वास की चिन्ता।।1

मुझे ना द्रोण से भय है,मुझे ना भीष्म से भय है। जहां पर तुम कृपा करते,वहां हर हाल में जय है।।
तुम्हीं को सौंप दी मैने ,मेरे आघात की चिन्ता।।2

कर्ण हो शल्य हो चाहे,साथ में आपके रहते।
सभी को मार डालुंगा,ऋषी मुनि सिद्ध ये कहते ।।
गोद में हूं तुम्हें करनी,मेरे हालात की चिन्ता।।3

हार अरु जीत के संग में,बुद्धि मन गात की चिन्ता।
तुम्हीं पर छोङ दी मैंने ,तात अरु मात की चिन्ता।।
तुम्हें ही अब तो करनी है,मेरी दिन रात की चिन्ता।।4

कङी हो धूप सूरज की,भले ही शीत की आंधी।
दया की छांव तेरी है,कटे सब आधि अरु व्याधी।।
तुम्हारे बल पै सोता हूं,तुम्हेंसब बात की चिन्ता।।5

मुझे सब याद है मोहन,मेरी मां का दुखी जीवन।
सभा में खीचना साङी,द्रोपदी का करुण क्रन्दन।।
तुम्हारे हाथ में प्यारे,मेरे जज्बात की चिन्ता।।6

कर्ण की गालियां चुभती,वनों के गम भी है ताजी ।
दुखों का भार ढोकर भी,तेरी मर्जी में हूं राजी ।।
शरण में आ गया त्र्यम्बक,करो तुम दास की चिन्ता।।7

28/06/2026

*शिवजी का प्रसाद खाने के बारे में निर्णय!!!*
अक्सर कथावाचक बड़ा रस लेकर कहते हैं कि शिवजी का प्रसाद नहीं लेना चाहिए. आस्थावान दुविधा में होजाता है कि प्रसाद लें या न लें, खाएं या न खाएं.

शिवजी भगवान हैं और उनका ही प्रसाद त्याज्य! बात समझ से परे लगती है.पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करना स्वभाविक और उत्तम क्रिया की परिपाटी है. फिर शिवजी के लिए ही यह प्रतिबन्ध क्यों?

अस्तु, अपनी तरफ से न तो कोई तर्क न टिप्पणी मूल शिवपुराण की बात श्लोकों के अर्थ के साथ प्रस्तुत है, निर्णय आप करें कि शिवजी का नैवेद्य लेना चाहिए या नहीं?

अग्राह्यं शिवनैवेद्यमिति पूर्वं श्रुतं वचः ।
ब्रूहि तन्निर्णयं बिल्वमाहात्म्यमपि सन्मुने ॥

ऋषिगण बोले- हे महामुने ! हमने पहले सुना है कि भगवान् शिवको अर्पित किया गया नैवेद्य अग्राह्य होता है, अतएव नैवेद्यके विषयमें निर्णय और बिल्वपत्रका माहात्म्य भी कहिये ॥ १ ॥

सूत उवाच

शृणुध्वं मुनयः सर्वे सावधानतयाधुना ।
सर्वं वदामि सम्प्रीत्या धन्या यूयं शिवव्रताः ॥2।।

शिवभक्तः शुचिः शुद्धः सद्व्रती दृढनिश्चयः ।
भक्षयेच्छिवनैवेद्यं त्यजेदग्राह्यभावनाम् ॥ ३।।

दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः ।
भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः ॥ ४।।

अलं यागसहस्त्रेणाप्यलं यागार्बुदैरपि ।
भक्षिते शिवनैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५।।

यद्गृहे शिवनैवेद्यप्रचारोऽपि प्रजायते। तद्गृहं पावनं सर्वमन्यपावनकारणम्।। ६।।

आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा ।
भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम् ॥७।।

आगतं शिवनैवेद्यमन्यदा ग्राह्यमित्यपि। विलम्बे पापसम्बन्धो भवत्येव हि मानवः ॥८।।

न यस्य शिवनैवेद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते ।
स पापिष्ठः गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम् ॥९।।

सूतजी बोले- हे मुनियो ! अब आप सब सावधानीसे सुनें। मैं प्रेमपूर्वक सब कुछ कह रहा हूँ। आप लोग शिवव्रत धारण करनेवाले हैं, अतः आपलोग धन्य हैं ॥ २ ॥

जो शिवका भक्त, पवित्र, शुद्ध, सव्रती तथा दृढ़निश्चयी है, उसे शिवनैवेद्य अवश्य ग्रहण करना चाहिये और अग्राह्य भावनाका त्याग कर देना चाहिये ॥ ३ ॥

शिवनैवेद्यको देखनेमात्रसे ही सभी पाप दूर हो जाते हैं और शिवका नैवेद्य भक्षण करनेसे तो करोड़ों पुण्य स्वतः आ जाते हैं ॥ ४॥

हजार यज्ञोंकी बात कौन कहे, अर्बुद यज्ञ करनेसे भी वह पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता है, जो शिवनैवेद्य खानेसे प्राप्त हो जाता है। शिवका नैवेद्य खानेसे तो शिवसायुज्यकी प्राप्ति भी हो जाती है ॥ ५ ॥

जिस घरमें शिवको नैवेद्य लगाया जाता है या अन्यत्रसे शिवको समर्पित नैवेद्य प्रसादरूपमें आ जाता है, वह घर पवित्र हो जाता है और वह अन्यको भी पवित्र करनेवाला हो जाता है ॥ ६ ॥

आये हुए शिवनैवेद्यको प्रसन्नतापूर्वक सिर झुकाकर ग्रहण करके भगवान् शिवका स्मरण करते हुए उसे खा लेना चाहिये ॥ ७ ॥

आये हुए शिवनैवेद्यको दूसरे समयमें ग्रहण करूँगा-ऐसी भावना करके जो मनुष्य उसे ग्रहण करनेमें विलम्ब करता है, उसे पाप लगता है ॥ ८॥

जिसमें शिवनैवेद्य ग्रहण करनेकी इच्छा उत्पन्न नहीं होती, वह महान् पापी होता है और निश्चित रूपसे नरकको जाता है ॥ ९ ॥

हृदये चन्द्रकान्ते च स्वर्णरूप्यादिनिर्मिते ।
शिवदीक्षावता भक्तेनेदं भक्ष्यमितीर्यते ॥ १०।।

शिवदीक्षान्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम् ।
सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम् ॥ ११।।

हृदयमें अवस्थित शिवलिंग या चन्द्रकान्तमणिसे बने हुए शिवलिंग अथवा स्वर्ण या चाँदीसे बनाये गये शिवलिंगको समर्पित किया गया नैवेद्य शिवकी दीक्षा लिये भक्तको खाना ही चाहिये-ऐसा कहा गया है ॥ १० ॥

इतना ही नहीं शिवदीक्षित भक्त समस्त शिवलिंगोंके लिये समर्पित महाप्रसादरूप शुभशिवनैवेद्यको खा सकता है ॥ ११ ॥

अन्यदीक्षायुजां नृणां शिवभक्तिरतात्मनाम्।
श्रणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनैवेद्यभक्षणे ॥ १२।।

शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः ।
पाषाणे राजते स्वर्णे सुरसिद्धप्रतिष्ठिते ॥ १३।।

काश्मीरे स्फाटिके रात्ने ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः ।
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोनैवेद्यभक्षणम् ॥ १४।।

ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत्।
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥ १५।।

चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः ।
चण्डाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तितः ॥ १६

बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धे लिङ्गे स्वयम्भुवि ।
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥ १७।।

स्नापयित्वा विधानेन यो लिङ्गस्नपनोदकम् ।
त्रिः पिबेत्त्रिविधं पापं तस्येहाशु विनश्यति ॥ १८।।

अग्ग्राह्यं शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् ।
शालग्रामशिलासङ्गात्सर्वं याति पवित्रताम् ॥ १९।।

लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्यं मुनीश्वराः ।
सुपवित्रं च तज्ज्ञेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः ॥ २०।।

नैवेद्यनिर्णयः प्रोक्त इत्थं वो मुनिसत्तमाः ।२१।।

जिन मनुष्योंने अन्य देवोंकी दीक्षा ली है और शिवकी भक्तिमें वे अनुरक्त रहते हैं, उनके लिये शिवनैवेद्यके भक्षणके विषयमें निर्णयको प्रेमपूर्वक आप सब सुनें ॥ १२ ॥

हे ब्राह्मणो ! शालग्राममें उत्पन्न शिवलिंग, रसलिंग (पारदलिंग), पाषाणलिंग, रजतलिंग, स्वर्णलिंग, देवों और सिद्ध मुनियोंके द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग, केसरके बने हुए लिंग, स्फटिकलिंग, रत्नलिंग और ज्योतिर्लिंग आदि समस्त शिवलिंगोंके लिये समर्पित नैवेद्यका भक्षण करना चान्द्रायण व्रतके समान फल देनेवाला कहा गया है ॥ १३-१४॥

यदि ब्रह्महत्या करनेवाला भी पवित्र होकर शिवका पवित्र निर्माल्य धारण करता है और उसे खाता है, उसके सम्पूर्ण पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ॥

जहाँ चण्डका अधिकार हो, वहाँ शिवलिंगके लिये समर्पित नैवेद्यका भक्षण मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; जहाँ चण्डका अधिकार न हो, वहाँ भक्तिपूर्वक भक्षण करना चाहिये ॥ १६ ॥

बाणलिंग, लौहलिंग, सिद्धलिंग, स्वयम्भूलिंग और अन्य समस्त प्रतिमाओंमें चण्डका अधिकार नहीं होता है ॥ १७ ॥

जो विधिपूर्वक शिवलिंगको स्नान कराकर उस स्नानजलको तीन बार पीता है, उसके समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥

[चण्डके द्वारा अधिकृत होनेके कारण] अग्राह्य शिवनैवेद्य पत्र-पुष्प-फल और जल-यह सब शालग्रामशिलाके स्पर्शसे पवित्र हो जाता है ॥ १९ ॥

हे मुनीश्वरो ! शिवलिंगके ऊपर जो भी द्रव्य चढ़ाया जाता है, वह अग्राह्य है और जो लिंगके स्पर्शसे बाहर है, उसे अत्यन्त पवित्र जानना चाहिये ॥ २० ॥

हे मुनिश्रेष्ठो ! इस प्रकार मैंने शिवनैवेद्यका निर्णय कह दिया।

शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, अध्याय 22.

29/04/2026

शुकदेव जी के जन्म की कथा
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इनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ मिलती हैं। कहीं इन्हें व्यास की पत्नी वटिका के तप का परिणाम और कहीं व्यास जी की तपस्या के परिणामस्वरूप भगवान शंकर का अद्भुत वरदान बताया गया है। विरजा क्षेत्र के पितरों के पुत्री पीवरी से शुकदेव का विवाह हुआ था।

एक कथा ऐसी भी है कि जब जब इस धराधाम पर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधिका जी का अवतरण हुआ, तब श्रीराधिकाजी का क्रीडाशुक भी इस धराधाम पर आया। उसी समय माता पार्वती ने भगवान शिव से ऐसे गूढ़ ज्ञान देने का अनुरोध किया जो संसार में किसी भी जीव को प्राप्त न हो. वह अमरत्व का रहस्य प्रभु से सुनना चाहती थीं।

अमरत्व का रहस्य किसी कुपात्र के हाथ न लग जाए इस चिंता में पड़कर महादेव पार्वती जी को लेकर एक निर्जन प्रदेश में गए।

उन्होंने एक गुफा चुनी और उस गुफा का मुख अच्छी तरह से बंद कर दिया. फिर महादेव ने देवी को कथा सुनानी शुरू की. पार्वती जी थोड़ी देर तक तो आनंद लेकर कथा सुनती रहीं।

जैसे किसी कथा-कहानी के बीच में हुंकारी भरी जाती है उसी तरह देवी काफी समय तक हुंकारी भरती रहीं लेकिन जल्द ही उन्हें नींद आने लगी।

उस गुफा में तोते यानी शुक का एक घोंसला भी था. घोसले में अंडे से एक तोते के बच्चे का जन्म हुआ. वह तोता भी शिव जी की कथा सुन रहा था।

महादेव की कथा सुनने से उसमें दिव्य शक्तियां आ गईं. जब तोते ने देखा कि माता सो रही हैं. कहीं महादेव कथा सुनाना न बंद कर दें इसलिए वह पार्वती की जगह हुंकारी भरने लगा।

महादेव कथा सुनाते रहे. लेकिन शीघ्र ही महादेव को पता चल गया कि पार्वती के स्थान पर कोई औऱ हुंकारी भर रहा है. वह क्रोधित होकर शुक को मारने के लिए उठे.
शुक वहां से निकलकर भागा. वह व्यास जी के आश्रम में पहुंचा. व्यास जी की पत्नी ने उसी समय जम्हाई ली और शुक सूक्ष्म रूप धारण कर उनके मुख में प्रवेश कर गया।

महादेव ने जब उसे व्यास की शरण में देखा तो मारने का विचार त्याग दिया. शुक व्यास की पत्नी के गर्भस्थ शिशु हो गए. गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो प्राप्त था।

शुक ने सांसारिकता देख ली थी इस लिए वह माया के पृथ्वी लोक की प्रभाव में आना नहीं चाहते थे इसलिए ऋषि पत्नी के गर्भ से बारह वर्ष तक नहीं निकले. व्यास जी ने शिशु से बाहर आने को कहा लेकिन वह यह कहकर मना करता रहा कि संसार तो मोह-माया है मुझे उसमें नहीं पड़ना. ऋषि पत्नी गर्भ की पीड़ा से मरणासन्न हो गईं.
भगवान श्री कृष्ण को इस बात का ज्ञान हुआ. वह स्वयं वहां आए और उन्होंने शुक को आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा.
श्री कृष्ण से मिले वरदान के बाद ही शुक ने गर्भ से निकल कर जन्म लिया. जन्म लेते ही शुक ने श्री कृष्ण और अपने पिता-माता को प्रणाम किया और तपस्या के लिये जंगल चले गए।

व्यास जी उनके पीछे-पीछे ‘पुत्र !, पुत्र कह कर पुकारते रहे, किन्तु शुक ने उस पर कोई ध्यान न दिया. व्यास जी चाहते थे कि शुक श्रीमद्भागवत का ज्ञान प्राप्त करें. किन्तु शुक तो कभी पिता की ओर आते ही न थे. व्यास जी ने एक युक्ति की. उन्होंने श्री कृष्ण लीला का एक श्लोक बनाया और उसका आधा भाग शिष्यों को रटा कर उधर भेज दिया जिधर शुक ध्यान लगाते थे.
एक दिन शुकदेव जी ने भी वह श्लोक सुना. वह श्री कृष्ण लीला के आकर्षण में खींचे सीधे अपने पिता के आश्रम तक चले आए.
पिता व्यास जी से ने उन्हें श्रीमद्भागवत के अठारह हज़ार श्लोकों का विधि वत ज्ञान दिया. शुकदेव ने इसी भागवत का ज्ञान राजा परीक्षित को दिया, जिस के दिव्य प्रभाव से परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीत लिया।

शुकदेव मुनि का परिवार एवं जीवनी
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मुनिश्रेष्‍ठ शुकदेव जी महर्षि वेदव्‍यास जी के पुत्र थे। आपने प्रारंभिक अध्‍ययन अपने पिताश्री वेदव्‍यासजी से ही उनके आश्रम में किया। कालांतर में वेदाध्‍ययन के लए देवगुरु बृहस्‍पति जी के पास उनको भेजा गया, जहां उन्‍होंने वेदशास्‍त्र, इतिहास आदि का अध्‍ययन पूर्ण किया।
विद्याध्‍ययन के पश्‍चात आप पिताश्री के आश्रम में आकर रहने लगे। सांसारिक बंधन एवं जीवों के जन्‍म-मरण से आपका मन व्‍यथित रहने लगा। आप सांसारिक बातों से उदासीन रहने लगे। अपनी अप्रतिम प्रतिभा के कारण प्रारंभ से ही आप देवताओं एवं ऋषियों एवं मानव मात्र के श्रद्धापत्र हो गये। अपका गृहस्‍थाश्रम के प्रति विमोह देखकर व्‍यासजी चिंतित होने लगे, तथा विवाह बंधन में आबद्ध करने हेतु व्‍यास जी इन्‍हें समझाने एवं प्रेरित करने लगे। इस प्रसंग में पिता पुत्र के मध्‍य विचार विमर्श भी होता। व्‍यास जी जहां गृहस्‍थाश्रम से श्रेष्‍ठ कोई दूसरा धर्म नहीं मानते वहीं शुकदेव जी गृहस्‍थाश्रम के कष्‍ट गिनाते। व्‍यास जी शुकदेव को समझाते ब्रह्मचारी, वानप्रस्‍थी, संन्‍यासी तथा गृहस्‍थी सभी गृहस्‍थाश्रम से ही पैदा होते हैं। वेद और स्‍मृतियों के विधानानुसार भी गृहस्‍थाश्रम ही श्रेष्‍ठ है तथा तीनों अन्‍य आश्रम वालों का पोषणकर्ता भी गृहस्‍थाश्रम है, यहां तक कि देवता भी अपना पोषण गृहस्‍थाश्रम से ही पाते हैं। व्‍यास जी उन्‍हें समझाते कि मनुष्‍य के चार ऋण होते हैं। पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण और मनुष्‍य ऋण। इन ऋणों की मुक्ति गृहस्‍थाश्रम से ही संभव है। जहां वह माता-पिता की सेवा व भरण-पोषण कर पितृ ऋण से, यज्ञादि सम्‍पन्‍न कराकर देव ऋण से, वेदों का अध्‍ययन और तपस्‍या कर ऋषि ऋण से तथा दान, दया, सहायता आदि द्वारा मनुष्‍य ऋण से उऋण हो सकता है।

विभिन्‍न उदाहरण देकर व्‍यास जी जब शुकदेव जी को गृहस्‍थाश्रम के लिए तैयार नहीं कर सके तो उन्‍होंने शुकदेव जी को अपने यजमान मिथिलापुरी नरेश राजा जनक के पास धर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान प्राप्‍त करने हेतु भेजा। राजा जनक गृहस्‍थ होते हुए भी प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग के पूर्ण और मुमुक्षु थे। सही नहीं वे शास्‍त्र मर्यादानुसार- रहकर गृहस्‍थी ही नहीं अपितु सुचारू रूप से राज्‍य संचालन भी करते थे। वे अपने को राजा नहीं बल्कि प्रजा का प्रतिनिधि मानते थे। उनमें न राजमद था न ही राज के प्रति लिप्‍सा। वे देह में रहकर भी विदेह कहलाते थे।

राजा जनक ने शुकदेव जी की अनेकानेक विधियों से परीक्षा ली और अन्‍त में राजा ने उनकी गृहस्‍थाश्रम की शंकओं का समाधान किया तथा यह भी बताया कि सभी आश्रमों में गृहस्‍थाश्रम ही सबसे बड़ा आश्रम है। राजा के उपदेशों से शुकदेव मुनि की शंकओं का सामधान हो गया और वे अपने पिता के आश्रम में आ गये।
शुकदेव जी का विवाह वहिंषद जी, जो स्‍वर्ग में वभ्राज नाम के सुकर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, की पुत्री पीवरी से हुआ। विवाह के समय शुकदेव जी 25 वर्ष के थे। गृहस्‍थाश्रम में रहकर भी शुकदेव जी योग मार्ग का अनुसरण करने लगे। उन्‍होंने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई जिसके श्रवण फल से सर्पदंश-मृत्‍यूपरांत भी परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

पीवरी से शुकदेव जी के 12 महान तपस्‍वी पुत्र हुए जिनके नाम भ‍ूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर, श्‍वेत कृष्‍ण, अरुण और श्‍याम, नील, धूम वादरि एवं उपमन्‍यु थे। जिनके गुरुकृत नाम क्रमश: भारद्वाज, पराशर(द्वितीय), कश्‍यप, कौशिक, गर्ग, गौतम, मुदगल, शाण्डिल्‍य, कौत्‍स, भार्गव, वत्‍स एवं धौम्‍य हुए और कीर्तिमती नामक एक योगिनी पतिधर्म पालन करने वाली कन्‍या। कीर्तिमती का विवाह भारद्वाज वंशज काम्पिल्‍य नगर के राजा अणुह से हुआ। महान योगी ब्रह्मदत्त जी को कीर्तिमती ने जन्‍म दिया। हरिवंश पुरण में शुकदेव जी का वंश विस्‍तार बताया गया है। शुकदेव जी के संतान होने के सम्‍बंध में भ्रांति है।

शुकदेव जी के विवाह एवं उनकी संतान के सम्‍बंध में देवी भागवत का वृत्तांत
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"पितरों की एक सौभाग्‍यशाली कन्‍या थी। इस सुकन्‍या का नाम पीवरी था। योग पथ के पथिक होते हुए भी शुकदेव जी ने उसे अपनी पत्‍नी बनाया। उस कन्‍या से उन्‍हें चार पुत्र हुए कृष्‍णख्‍ गौर प्रभ, भूरि और देवश्रुत। कीर्ति नाम की एक कन्‍या हुई। परम तेजस्‍वी शुकदेव जी ने विभ्राज कुमार महामना अणुह के साथ इस कन्‍या का विवाह कर दिया। अणुह के पुत्र ही ब्रह्मदत्त हुए। शुकदेव जी के दोहित्र ब्रह्मदत्त बड़े प्रतापी राजा हुए। साथ ही ब्रह्म ज्ञानी भी थे। नारद जी ने उन्‍हें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया था।

हरिवंश पुरण में शुकदेव जी की संतान के सम्‍बंध में जो वर्णन किया गया है उसके अनुसार-

स तस्‍यां पितृकन्‍यायां पीवयां जनयिष्‍यति।
कन्‍यां पुत्रांश्‍च चतुरो योगाचार्यान महाबलान।।52।।

कृष्‍णं गौरं प्रभुं शम्‍भुं कृत्‍वीं कन्‍यां तथैव च।
ब्रह्मदत्तस्‍य जननीं महिर्षी त्‍वणुहस्‍य च।।53।।

अर्थ: - वे ही शुकदेव पितरों की कन्‍या पीवरी में कृष्‍ण, गौर, प्रभु और शम्‍भु इन चार महाबली योगाचार्य पुत्रों तथा ब्रह्मदत्त की जननी और अणुह की पत्‍नी कृत्‍वी नामवाली कन्‍य को उत्‍पन्‍न करेंगे।"
पुराणें में यह आख्‍यान भी आता है - वृहस्‍पति जी ने ब्रह्मा जी के पास जा शुकदेव जी का किसी योग्‍य कन्‍या से विवाह करने की प्रार्थना की। उन्‍होंने वर्हिषद की कन्‍या पीवरी को, इनके योग्‍य मान इसके साथ विवाह करने की आज्ञा दी। वर्हिषद "स्‍वर्ण" में वभ्राज नाम के सुंदर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, जिनकी पूजा सभी देवगण, राक्षस, यक्ष, गन्‍धर्व, नाग, सुपर्ण और सर्प भी करते हैं।" वर्हिषद को ऋषि पुलस्‍त्‍य के आशीर्वाद से एक पुत्री प्राप्‍त हुई थी। जिसका नाम पीवरी रखा गया। इस कन्‍या ने ब्रह्माजी की तपस्‍या की थी और ब्रह्माजी से उसने वेदों के ज्ञाता, ज्ञानी, योगी और अपने योग्‍य वर पाने का वरदान पाया था। ब्रह्माजी की आज्ञा से इसी पीवरी नामक कन्‍या के सा‍थ शुकदेवजी ने ब्राह्म विधि से विवाह किया। इस पीवरी को योग-माता और धृतवृता (पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली) शब्‍दों से भी पुकारा जाता है। विवाह के समय शुकदेव जी की आयु 25 वर्ष की थी। शुकदेव जी गृहस्‍थ आश्रम में रहकर तपस्‍या और योग मार्ग का अनुसरण करने लगे।
राजा परीक्षित को अपने श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई व उसका उद्धार किया। वेदों के प्रचार के साथ-साथ शुकदेव जी युगद्रष्‍टा भी थे। वे गृहस्‍थ धर्म का पालन करते हुए पत्‍नी, पुत्रों के भी सम्‍यक रूप से पालक थे।

कूर्म पुराण के अनुसार शुकदेव जी
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शुकस्‍याsस्‍याभवन् पुत्रा: पञ्चात्‍यन्‍ततपस्विन:।
भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।

कन्‍या कीर्तिमतती चैव योगमाता धृतवृता।।(कूर्म पुराण)
शुकदेव जी के महान तपस्‍वी पांच पुत्र थे। जिनके नाम भरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर थे और एक कन्‍या जिसका नाम कीर्तिमती था जो योगिनी और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली थी।

सौर पुराण के अनुसार
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भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।
कन्‍या कीर्तिमती नाम वंशायैते प्रकीर्तिता:।। (सौर पुराण)

भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर नाम के पांच पुत्र थे। तथा कीर्तिमती नामक एक कन्‍या थी। ये सब ही अपने वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले थे।
कन्‍या कीर्तिमती भारद्वाज वंश काम्पिल्‍य नगर के नृप अणुह जी को ब्‍याही गई थी। महान योगी और सब जीवों को बोली समझने वाले ब्रह्मदत्त जी का जन्‍म इसी कीर्तिमती के उदर से हुआ था।

ब्रह्माण्‍ड पुराण अनुसार शुकदेव जी पुत्र-पुत्री
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श्‍लोक-
काल्‍यां पराशराज्‍जज्ञे कृष्‍णद्वैपायन: प्रभु:।
द्वैपायनादरण्‍यां वै शुको जज्ञे गुणान्वित।।

भूरिश्रवा प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णौ गौरश्‍च पण्‍चम:।
कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।।

जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सात्‍वणुहस्‍य च।
श्‍वेता कृष्‍णाश्‍च गौराश्‍च श्‍यामा धूम्रास्‍तथारुणा।।

नीलो वादरिकश्‍चैव सर्वे चैते पराशरा:।
पाराशराणामष्‍टौ ते पक्षा: प्रोक्‍ता महात्‍मनाम्।।

ब्रह्माण्‍डपुराण पाद 3 अध्‍याय 9 अनुसार
पाराशर मुनि से काली (सत्‍यवती) में कृष्‍ण- द्वैपायन उत्‍पन्‍न हुए। कृष्‍णद्वैपायन से आरणी में सर्वगुण सम्‍पन्‍न शुकदेव उत्‍पन्‍न हुए। शुकदेव से पीवरी से भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण, गौर और कीर्तिमती कन्‍या जो अणुह ऋषि को ब्‍याही थी; जिसके ब्रह्मदत्त उत्‍पन्‍न हुआ (जो योग शास्‍त्र का प्रधान आचार्य था) और श्‍वेत, कृष्‍ण, गौरश्‍याम, धूम्र, अरुण, नील बादरि ये पुत्र और उत्‍पन्‍न हुए।

लिंग पुराण में अनुसार 12 पुत्र एवं एक कन्‍या होने का प्रमाण
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श्‍लोक-
द्वैपायनोह्यरण्‍यां वै शुकमुत्‍पादयत्‍सुतम्।
उपमन्‍यू च पीवर्यां विद्धी मे शुक सूनव:।।
भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरस्‍तु पञ्चम:।
कन्‍या कीर्तिम‍ती चैव योगमाता धृतव्रता।।
श्‍वेत: कृष्‍णश्‍च गौरश्‍च श्‍यामो धूम्रस्‍तथारुण:।
नीलो वादरिकश्‍चैव सर्वे चैते पाराशरा:।।

अर्थ लिंग महापुराणे अध्‍याय 65
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व्‍यास द्वैपायन से अरणी में शुक उत्‍पन्‍न हुए। शुक से पीवरी से 1. उपमन्‍यू 2. भूरिश्रवा, 3. प्रभु, 4. शम्भु 5. कृष्‍ण 6. गौर 7. कीर्तिमती कन्‍या और श्‍वेतकृष्‍ण, 8. गौरश्‍याम, 9. धूम्र, 10. अरुण, 11. नील, 12. बादरि ये पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। इसी प्रकार अन्‍य पुराणों में भी लिखा है।

श्‍लोक-
ये तानुत्पाद्य धर्मात्‍मा ये योगाचार्यान्‍महाब्रतान्।
श्रुत्‍वा स्‍वजनकाद्धर्मान् व्‍यासादमितबुद्धिमान।।

महायोगी ततो गन्‍ता पुनर्नावर्तिनीं गतिम्।
यत्तत्‍पदमनुद्विग्‍नमव्‍ययं ब्रह्म शास्‍वतम्।। ।।

हरिवंशोपपुराणे पर्व 1 अध्‍याय 18
इस प्रकार महायोगी शुकदेव जी पूर्वोक्‍त 12 पुत्र और एक पुत्री को उत्‍पन्‍न करके अपने पिता वेदव्‍यास से मोक्ष धर्मों को सुनकर उस वैकुण्‍ठ लोक में जाएंगे, जिसमें जाकर कभी नहीं लौटते और जिसमें जाकर नित्‍य सुख के भागी होकर मुक्‍त हो जाते हैं।

ऊपर लिखे हुए प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र और 1 कन्‍या कीर्तिमती उत्‍पन्‍न हुई। कन्‍या का तो विभ्राज के पुत्र अणुह के स‍ाथ विवाह कर दिया और 12 पुत्रों को विद्या पढ़ाने के लिए 12 ऋषियों के पास भेज दिया। जिन ऋषियों के पास विद्या पढ़ने के लिए शुकदेव जी ने अपने 12 पुत्रों को भेजा था,

पारीक्ष संहिता(पृ. 24) के अनुसार शुकदेव जी के पुत्रों के नाम
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शुकस्‍याप्‍यभवान्‍पुत्रा द्वादशैव महातपा:।
पीवर्यां पितृकन्‍यायां द्वादशादित्‍यसन्निभा:।।

भ‍ूरिश्रवा प्रभु: शंभु: कृष्‍णो गौरश्‍च पंचम: ब्रह्माण्‍ड। श्‍वेत: कृष्‍णश्‍च गौरश्‍च श्‍यामो धूम्रस्‍तथैवच।।

वादरिश्‍चोपन्‍युश्‍च सर्वे चैते पाराशरा:।
कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।।

शुकदेव जी के पितृ - कन्‍यापीवरी नाम की स्‍त्री से द्वादश पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (1) भूरिश्रवा (2) प्रभु (3) शंभु (4) कृष्‍ण (5) गौर (6) श्‍वेत (7) कृष्‍ण (8) गौर (9) श्‍याम (10) धूम्र (11) बादरि (12) उपमन्‍यु। ये सब पराशर के वंश में है।

जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सा त्‍वणुहस्‍य च।
नामान्‍तरणि चैतेषां कृतानि गुरुभिस्‍तदा।।

भारदाजस्‍तु प्रथमो द्वितीयस्‍तु पराशर:।
तृतीय: कश्‍यपो नाम्‍ना कौशिकस्‍तु चतुर्थक:।।

गर्गश्‍च पंचमो ज्ञेय उपमन्‍युस्‍तु षष्‍ठक:।
सप्‍तमों वत्‍स नामावै शाण्डिल्‍यश्‍चाष्‍टम: स्‍मृत:।।

भार्गवों नवमो नाम मुद्गलो दशम: स्‍मुत:।
एकादशों गौतमश्‍च द्वादश: कौत्‍सनामक:।।

अध्‍यापयञ्छि‍ष्‍यगणान् व्‍यास: पौत्रांश्‍च वीर्यवान्।
उवास हिमवस्‍पृष्‍ठे पारार्श्‍यो महामुनि:।।

कीर्तिमती नाम की कन्‍या योग विद्या की ज्ञाता और पतिव्रता धर्म को धारण करने वाली थी। इसका विवाह अणुह नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जिसके ब्रह्मदत्त नाम का योगविद्या का ज्ञाता पुत्र हुआ। पितृकन्‍या पीवरी से शुकदेव क पूर्वोक्‍त द्वादश पुत्र हुए। इनके गुरुओं ने इनके जो दूसरे नाम रखे वे इस प्रकार हैं-

(1) भरद्वाज (2) पराशर (3) कश्‍यप (4) कौशिक (5) गर्ग (6) उपमन्‍यू (7) वत्‍स (8) शाण्डिल्‍य (9) भार्गव (10) मुद्गल (11) गौतम (12) और कौत्‍स।

शुकदेव जी ने गुहस्‍थाश्रम में रहकर चारों ऋणों से मुक्ति प्राप्‍त की तथा पिताजी की आज्ञा से सुमेरू पर्वत पर गये जहां जप, ध्‍यान करते हुए मोक्ष को प्राप्‍त हुए।
इस प्रकार उपरोक्‍त प्रमाणों से सिद्ध है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र एवं कन्‍या हुई।
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31/03/2026

आप देख रहे हैं परम पूज्य श्री त्याजी जी महाराज के कृपापात्र शिष्य आचार्य सतीश जी महाराज के श्रीमुख से संगीतमय श्री...

13/03/2026

"यदन्तरस्य देहस्य बहि: स्याच्च तदेव चेत्।
दण्डग्रहा वारयेयु: शुन: काकांश्च मानवा:।।"

धर्मशास्त्रकारों ने कहा है कि हमारे शरीर में जो कुछ है, उसके पैकिंग के लिए यह चमडी का पैकेट न होता अर्थात् जो कुछ इस पतले से चमडी के भीतर ढका हुआ है, वही सब वस्तुएं चमडी के बाहर होता तो मनुष्य को दिन भर हाथ में डंडा लेकर कुत्ते और कौवों को भगाते रहना पड़ता। नीचे जमीन में कुत्ते उसे खाने को आते और ऊपर आसमान से कौवे।

23/02/2026

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11/02/2026

पूजन अनुष्ठान, हवन, यज्ञ आदि में पति पत्नी के बैठने का क्रम क्या होना चाहिए??

धर्मसिन्धु (३/५१६) के श्लोक के अनुसार निर्णय किया है, उसमें विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्कारों के अवसर पर पत्नी तथा कर्ता (पुरुष या स्त्री) की स्थान-व्यवस्था (दक्षिण, उत्तर, वाम इत्यादि) बताई गई है। इसका अर्थ इस प्रकार है —

।। मूल श्लोक ।।

व्रतबन्धे विवाहे च चतुर्थ्यां सहभोजने।
व्रते दाने मखे श्राद्धे पत्नी तिष्ठति दक्षिणे।
सर्वेषु धर्मकार्येषु पत्नी दक्षिणतः शुभा।
अभिषेके विप्रपादप्रक्षालने चैव वामतः॥

भावार्थ :-
(अर्थ-स्पष्टीकरण)
व्रतबन्ध (उपनयन), विवाह, चतुर्थी व्रत पर सहभोजन, अन्य व्रत, दान, यज्ञ (मख), श्राद्ध आदि – इन सबमें पत्नी पति के दक्षिण भाग में बैठती है।
धर्मकर्मों में पत्नी का दक्षिण भाग में होना शुभ माना गया है।
अभिषेक (स्नपन) अथवा ब्राह्मणों के चरण प्रक्षालन (पैर धोने) के समय पत्नी पति के वाम भाग में बैठती है।

अपि च संस्कार्यः पुरुषो वा स्त्री वा दक्षिणतः सदा।
संस्कारकर्ता सर्वत्र तिष्ठेदुत्तरतः सदा॥

अर्थ
यदि संस्कार (उपनयन, विवाह, जातकर्म, आदि) किसी पुरुष या स्त्री का हो, तो वह (संस्कार्य) दक्षिण दिशा में स्थित होता है।
और जो संस्कारकर्ता (आचार्य, पुरोहित, पिता आदि) होता है, वह हमेशा उत्तर दिशा की ओर स्थित होता है।

संक्षेप में व्यवस्था
● पत्नी → अधिकांश धर्मकर्मों में पति के दक्षिण भाग में।
● पत्नी → केवल अभिषेक एवं पादप्रक्षालन में वाम भाग में।
● संस्कार्य (जिसका संस्कार हो रहा है) → दक्षिण में।
● संस्कारकर्ता (जो संस्कार कराता है) → उत्तर में।

।। जय श्री नारायण ।। राधे कृष्णा ।। राधे राधे।।

26/01/2026

राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया।

तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया।

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।

अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।

माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था।

वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...!

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।

कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।

तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।

अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था। पूरा राम दल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।

अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे। हनुमान जी का, सब मिलके और लगवा दो।

और दूसरी बात ये कि...!

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।

अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।

सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।

अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े..

मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए।

जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार...

माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि...!

प्रति उपकार करौं का तोरा।

सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !

राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो..

सनमुख होइ न सकत मन मोरा

देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है।

क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।

पहले हनुमान विवाह करें,

लंकेश हरें इनकी जब नारी।

मुंदरी लै रघुनाथ चले,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।

आयि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।।

तब रघुनाथ चुकायि सकें,

ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।

देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं

मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें।

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।

राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया।

विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?

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हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना

तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?

सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं।

राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा।

हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।

तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?

हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी

नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।

जय बजरंग बली 🙏🏻

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