Acharya Satish Mishra

Acharya Satish Mishra Ram Katha and Srimad Bagvat Katha

26/01/2026

राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया।

तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया।

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।

अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।

माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था।

वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...!

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।

कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।

तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।

अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था। पूरा राम दल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।

अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे। हनुमान जी का, सब मिलके और लगवा दो।

और दूसरी बात ये कि...!

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।

अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।

सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।

अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े..

मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए।

जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार...

माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि...!

प्रति उपकार करौं का तोरा।

सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !

राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो..

सनमुख होइ न सकत मन मोरा

देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है।

क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।

पहले हनुमान विवाह करें,

लंकेश हरें इनकी जब नारी।

मुंदरी लै रघुनाथ चले,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।

आयि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।।

तब रघुनाथ चुकायि सकें,

ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।

देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं

मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें।

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।

राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया।

विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?

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हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना

तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?

सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं।

राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा।

हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।

तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?

हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी

नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।

जय बजरंग बली 🙏🏻

26/01/2026

यह कहानी भगवान कृष्ण के बाल्य काल की है. बचपन में श्रीकृष्ण बडे ही शरारती थे. आये दिन कृष्ण भगवान के नए-नए उलाहने रोज यशोदा मैया के पास आते रहते थे. इन्हीं उलाहनो से तंग आकर एक दिन यशोदा मैया छड़ी लेकर कृष्ण भगवान के पीछे दौड़ी थी.
और मैया से भगाते-भगाते गोविंदा एक कुम्हार के घर घुस गए. उस वक्त कुम्हार अपने काम में व्यस्त था. पर जब कुम्हार की दृष्टि भगवान पर पडी. तब वह बडा ही प्रसन्न हो उठा. कृष्ण बोले कुम्हारजी कुम्हारजी मेरी मैया बहुत क्रोधित है और छड़ी लेकर मुझे ढूंढ रही है.
कुछ समय के लिए. मुझे कही छुपा लीजिये. कुम्हार भगवान श्री कृष्ण के अवतार स्वरुप से ज्ञात था. उसने तुरंत कृष्णजी को एक बडे से मिटटी के घड़े के नीचे छुपा दिया.
कुछ समय पश्चात जब यशोदा मैया ने वहां आकर पूछा. क्यों रे कुम्हार! क्या तूने मेरे कान्हा को देखा है? . तो कुम्हार ने जवाब दिया नहीं मैया मैंने नहीं देखा.
कुम्हार और यशोदा मैया के बीच हो रहा सवांद भगवान श्रीकृष्ण गौर से सुन रहे थे. फिर जब माता यशोदा वहां से चली गई. तब कान्हा बोले कुम्हार जी मेरी माता यदि चली गई हो. तो मुझे इस घडे से बाहर निकालिए.
कुम्हार बोला एसे नहीं भगवान पहले आपको मुझे वचन देना होगा. कि आप मुझे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त कर देंगे. कुम्हार की बात सुनकर कान्हाजी मुस्कुराये और बोले ठीक कुम्हार मैं वचन देता हूं. कि मैं तुम्हे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्ति दे दूंगा.
अब तो मुझे बाहर निकालो. कुम्हार बोला मुझे अकेले को नहीं महाप्रभु मेरे पूरे परिवार को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये. तो ही मैं आपको घडे से बाहर निकालूंगा.
इस पर श्रीकृष्ण बोले ठीक है भैया. मैं उन्हें भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन देता हूं. अब तो बाहर निकाल दो.
अब कुम्हार बोला बस प्रभुजी एक विनती और है. उसे पूरा करने का वचन देते है. तो मैं आपको घडे से बाहर निकाल लूंगा . श्रीकृष्ण बोले अब वह भी बता दो. कुम्हार ने कहा हे प्रभुजी जिस घडे के नीचे आप छुपे है. उस घडे को बनाने के लिए लाई गई मिटटी मेरे बैलों पर लाद कर लाई है. आप मेरे उन बैलो को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये. श्रीकृष्ण भगवान ने कुम्हार का प्राणी प्रेम देखकर उन बैलों को भी मोक्ष देने का वचन दिया.
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कान्हा बोले लो तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी हो गई है. अब तो इस घडे से मुझे बाहर निकल लो. इस बार कुम्हार बोला अभी नहीं भगवान. बस एक अंतिम इच्छा शेष रह गई है और वह यह है कि जो भी जीव हम दोनों के बीच हुए इस सवांद को सुनेगा. उसे भी आप इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देंगे.
बस यह वचन भी दे दीजिये. तभी मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा. कुम्हार की सच्ची प्रेमभावना देखकर श्रीकृष्ण अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कुम्हार को तथास्तु कह दिया . फिर जाकर कुम्हार ने बाल कृष्ण को घडे से बाहर निकाला.
उनको साष्टांग प्रणाम करके उसने उनके चरण धोये और वह चरण अमृत प्राशन करके. अपने पूरे घर में उसका छिडकाव किया. अंत में कुम्हार प्रभु श्रीकृष्ण के गले लगकर इतना रोया इतना रोया की उनमे ही विलीन हो गया ।

26/01/2026

ब्राह्मण :--
आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को उपदेश देते है और कर्मणा कर्मणा चिल्लाते है ये पोस्ट उन्हीं के लिए है जिन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है न ही प्रमाण मालूम है समस्त प्रमाण इसीलिए यहां पर डाल दिये गए है जो ब्राह्मण द्रोही और वर्णसंकरता का समर्थक होगा वही शास्त्र प्रमाण कदापि नही मानेगा ।

वर्ण और जाति अलग अलग नहीं हैं। जैसे आपका शरीर समाज का हिस्सा है, और आपके आंख, कान आदि शरीर के अंग। उसमें भी कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी उपांग हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं।

जैसे घर में अलग अलग कमरे, और कमरों में भी अलग अलग अलमारियों की व्यवस्था है और उनमें भी अलग अलह सांचे बने हैं, वैसे ही समाज रूपी घर में वर्णरूपी कमरे और जातिरूपी अलमारियों की सांचे रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। कुछ लोग जाति शब्द को संस्कृत का न मानकर यवनों के ‘अल-जात’ शब्द से उसका सम्बन्ध जोड़ देते हैं, उनके भ्रम का निराकरण भी यहीं हो जाएगा।

ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह ।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
जन्म से ही ब्राह्मण सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है।

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्य: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्॥
(महाभारत)
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है और सभी प्राणियों के द्वारा पूजनीय है।

बालयोरनयोर्नॄणां जन्मना ब्राह्मणो गुरुः।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही सभी मनुष्यों का गुरु है।

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते ॥
(स्कन्दपुराण)

यहाँ जन्म से शूद्र इसीलिए कहा क्योंकि असंस्कृत व्यक्ति की शूद्रवत् संज्ञा है। जैसे शूद्र को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं, वैसे ही अनुपवीती ब्राह्मण को भी नहीं।

इसीलिए उसी स्कन्दपुराण में फिर कहा :-
ब्राह्मणो हि महद्भूतं जन्मना सह जायते ॥
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है।

ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण है, यह बात सत्य है लेकिन उससे पहले ब्राह्मण माता पिता और गुरु की भी आवश्यकता है। तब वह ब्रह्म को जान पाता है। यहां कॉलेज का सिलेबस खत्म कर नहीं पाते, चले हैं ब्रह्मज्ञान भांजने।

अपि च,

स्त्रीशूद्रबीजबंधूनां न वेदश्रवणं स्मृतम्।
तेषामेवहितार्थाय पुराणानि कृतानि वै।
(औशनस उपपुराण)

स्त्री और शूद्र हेतु वेदश्रवण का निषेध ऊपर के वाक्य से और नीचे के भी प्रमाणों से मिलता है। इसीलिए उनके कल्याण के लिए पुराणों का प्रणयन किया गया।

प्रणवं वैदिकं चैव शूद्रे नोपदिशेच्छिवे।
(परमानन्द तंत्र, त्रयोदश उल्लास)

शूद्राणां वेदमंत्रेषु नाधिकार: कदाचन।
स्थाने वैदिकमंत्रस्य मूलमंत्रं विनिर्दिशेत्॥
(योगिनी तंत्र)

इसीलिए पुनः कहा :-

जन्मना लब्धजातिस्तु
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण)
जाति की प्राप्ति जन्म से ही है।

जन्मना चोत्तमोऽयं च सर्वार्चा ब्राह्मणोऽर्हति॥
(भविष्य पुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही उत्तम है, और सबों के द्वारा सम्माननीय है।

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रियलक्षणम्॥
(पद्मपुराण, अत्रि संहिता)

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः
(पराशर उपपुराण, वैखानस कल्पसूत्र)
जन्म से ब्राह्मण, संस्कार से द्विज, विद्या से विप्र और तीनों से श्रोत्रिय होता है।

क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा कल्पकोटिशतेन च ॥
तपसा ब्राह्मणत्वं च न प्राप्नोति श्रुतौ श्रुतम् ।
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण)
क्षत्रिय और वैश्य भी करोड़ों कल्पों तक तपस्या करके भी केवल तपस्या के दम पर ब्राह्मण नहीं बन सकते।

जो लोग विश्वामित्र का उदाहरण देते हैं, वो भी स्मरण रखें कि उन्होंने भी एक जन्म में ब्रह्मत्व प्राप्त नहीं किया। कई बार उनका शरीर बदला, पूरा शरीर नष्ट हो जाता तब केवल तेजरूप में बचते थे, ब्रह्मा जी नया शरीर देते थे। बीच में पक्षी की योनि भी मिली थी उन्हें। तब जाकर ब्राह्मण बने। उसमें भी उन्हें अनेक जन्मों में भी सफलता इसीलिए मिली क्योंकि उनका जन्म जिस चरु के कारण हुआ था वह ब्रह्मवक्तव्य से प्रेरित था।

शुक्लयजुर्वेद की काण्व शाखा के शतपथब्राह्मण में है बृहदारण्यकोपनिषद् , उसका वचन है :-

ब्रह्म वा इदमग्रआसीदेकमेव सृजत क्षत्रं यान्येतानि स नैव व्यभवत् स विशमसृजति स नैव व्यभवत्स शौद्रंवर्णमसृजत्।

अर्थात् सबसे पहले ब्राह्मण वर्ण ही था । उसने क्षत्रिय वर्णका सृजन किया । वह ब्राह्मण क्षत्रिय का सृजन करने के बाद भी अपनी वृद्धिमें सक्षम नही हुआ, तब उसने वैश्य वर्ण का सृजन किया ।

इसके अनन्तर (अर्थात् क्षत्रिय और वैश्यकी रचनाके बाद )भी वह ब्रह्म प्रवृद्ध न हो सका ,तब उसने शूद्र वर्णकी रचना की।

ये तो सिद्ध ही है सभी वर्ण भगवान् से उत्पन्न हुए अब इन वर्णों का विभाग सुनिए ! इन वर्णोंमें जन्म कैसे होता है इस विषय में भगवान् गीता में कहते हैं –
गुणकर्मविभागशः।

अर्थात्, जन्मांतर में किये गए कर्मों और सञ्चित गुणोंके द्वारा विभाग करके ही भगवान् चारों वर्णोंमें जन्म देते हैं !

वर्णाश्रमाश्चस्वकर्मनिष्ठा: प्रेत्य कर्मफलमनुभूय तत: शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायु: श्रुतिवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते।
(स्मृतिसन्दर्भ)

अर्थात् अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर, परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर, बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश, काल, जाति, कुल, धर्म, आयु, विद्या, आचार, धन, सुख और मेधा आदिसे युक्त, जन्म ग्रहण करते हैं।

कारणं गुणसंगोस्य सदद्योनिजन्मसु ।
(श्रीमद्भगवद्गीता)

गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुष के अच्छी -बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है ।

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत् द्विजः।
वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है।
संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है।
इसके आधार पर कहते हैं वर्ण कर्म के द्वारा कोई भी बदल सकता है । किन्तु इस श्लोक का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है । जन्मना जायते शूद्र: से ये नहीं हो जाता कि जन्म से सभी शूद्र हैं; इसका अर्थ है जन्म से सभी शूद्रवत् हैं ,अर्थात् वेद के अनधिकारी हैं किन्तु संस्कार होने से द्विज वेद का अधिकारी होता है ।

ब्राह्मण: सम्भवेनैव देवानामपि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्मात्रेव हि कारणम् ॥
(मनुस्मृति)

अर्थात्, जन्मसे ही ब्राह्मण देवताओंका भी देवता होता है और लोक में उसका प्रमाण माना जाता है इसमें वेद ही कारण हैं ।

तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणककारणम् ।
(महाभाष्य)

जो ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न और उपनयनपूर्वक वेदाध्ययन ,तप, विद्यादिसे युक्त होता है ,वही मुख्य ब्राह्मण होता है !

मेरु तन्त्र और पराशर पुराण भी ब्रह्मक्षेत्रं ब्रह्मबीजं आदि श्लोकों से जन्मना महत्व का प्रतिपादन करते हैं।

तप: श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:
(महाभाष्य)

जो तप और विद्यासे हीन है वह केवल जाति से ब्राह्मण होता है ।

विदुरजी व्यासजीके पुत्र थे जो ब्राह्मण हैं और सर्वज्ञ वैष्णवावतार हैं, फिर भी शूद्र योनि में जन्म होने से शूद्र ही रहे । महाभारत में विदुर स्वयं को ब्रह्मविद्याका अनधिकारी बताते हैं जिसके कारण उन्होंने सनत्सुजात जी को ब्रह्मविद्या के लिए बुलाया था ।

विदुर जी कहते हैं
शूद्रयोनावहं जातो नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
कुमारस्य तु या बुद्धिर्वेद तां शाश्वतीमहम् ॥
(महाभारत)

अर्थात्, मेरा जन्म शूद्रयोनि में हुआ है अतः मैं (ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं होने से ) इसके अतिरिक्त और कोई उपदेश देने का मैं साहस नहीं कर सकता, किन्तु कुमार सनत्सुजात की बुद्धि सनातन है, मैं उन्हें जानता हूँ ।

महर्षि आपस्तम्ब ने धर्मसूत्रों में यह बात कही :-

धर्मचर्य्या जघन्यो वर्णः पूर्वंपूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ।
अधर्मचर्य्यया पूर्वोवर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥

धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने वर्ण से उत्तम वर्ण में जन्म लेता है। अधर्माचरण से पूर्व वर्ण अर्थात् उत्तम वर्ण भी निम्न वर्ण में जन्म लेता है ।

तद्य इह रमणीयचरणाभ्यासो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणाभ्यासो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरनश्वयोनिं वा शूकर योनिं वा चाण्डालयोनिं वा।
(छान्दोग्योपनिषत्)

अर्थात्, उन में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तमयोनि को प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा अशुभ आचरण वाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्ते की योनि, सूकर की योनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं।

उपरोक्त मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कर्म के द्वारा ही अलग अलग योनियों में अथवा वर्ण में जन्म होता है।

यहां कोई अधिकार के हनन की बात नहीं है। जैसे कि अपनी पत्नी को वस्त्रहीन अवस्था में देख सकते हैं, लेकिन माता को नहीं। यहाँ पुत्र यदि कहे कि यह हमारे अधिकार का हनन है, तो मार खायेगा। वह उसका काम ही नहीं है। और यह ब्राह्मण जन्म ऐसे ही आरक्षण में नहीं मिल गया। ब्राह्मण का काम शूद्र करेगा तो उसे दोष लगेगा, वैसे ही शूद्र का काम ब्राह्मण के लिए वर्जित है।

तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति।
स जायते पुल्कसो वा चाण्डालो वाऽप्यसंशयः॥

पशुयोनि का जीव जब पहली बार मनुष्य बनता है तो म्लेच्छ या चांडाल बनता है।

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते।
स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते॥

हे मतङ्ग !! फिर वह उसी म्लेच्छ योनि में बहुत जन्मों तक बना रहता है।

ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि।
शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते॥

फिर हज़ार जन्मों के काल के बराबर समय बिताकर उसे शूद्रयोनि मिलती हैं जहां फिर वह बहुत से जन्म लेता है।

ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि।
वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते॥

वहां तीस जन्म बिताकर (यदि वह अपने वर्णगत धर्म का पालन करता रहा, तो) वैश्य वर्ण में जन्म लेता है और पुनः कई जन्मों तक वैश्य ही रहता है।

ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते।
ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम्॥

वहां साठ जन्म बिताकर वह क्षत्रिय कुल में जन्म लेता है और फिर साठ जन्मों तक क्षत्रिय रहकर ब्राह्मण कुल में जन्म लेता है। यहां केवल वह ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में रहता है, यानि जन्म मिला है, कर्म ब्राह्मण के नहीं हैं।

ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते।
ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम्॥

ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में जब दो सौ जन्म बीतते हैं तब उसका जन्म वेदज्ञानी ब्राह्मण कुल में होता है।

काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि॥

ऐसे कुल में तीन सौ जन्म लेने के बाद वह ब्राह्मण के आचरण और गायत्री आदि के संस्कार से भी युक्त हो जाता है।

तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते॥
(महाभारत)

इस प्रकार से जन्मना ब्राह्मण होकर कर्मणा भी जब वह ब्राह्मण बनता है, तो ऐसे स्तर के चार सौ जन्मों के बाद इसे ब्रह्मबोध होता है।

यानि जन्मना ब्राह्मण बनने के नौ सौ जन्मों के बाद वह कर्मणा भी ब्राह्मण बन पाता है। ऐसे घूमते फिरते नहीं, कि जब मन किया इसी शरीर से बन गए।

वर्ण देहाश्रित है। देह जन्माश्रित है। वर्ण कर्माश्रित नहीं है क्योंकि कर्म देह की अपेक्षा चिरस्थाई नहीं। वर्ण भौतिक अस्तित्व का परिचायक है और कर्म का आधार। इसीलिए कर्म वर्णाश्रित है, न कि वर्ण कर्माश्रित। कर्म बदलने से यदि वर्ण बदलेगा तो पूजा कराने वाला ब्राह्मण यदि धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाये तो उसकी क्षत्रिय संज्ञा हो जाती, तो उसे अपनी पत्नी से ही ब्राह्मणीगमन का पाप लग जाता। कर्म वर्ण के ऊपर आश्रित है इसीलिए द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर का कर्म उनके वर्ण पर प्रभाव न डाल सका।

यदि इच्छानुसार कर्म बदलने से वर्ण बदलने की स्वतंत्रता होती तो भगवान गीता में क्यों कहते ?
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
अपने अपने कर्म में लगे रहकर ही मनुष्य का कल्याण सम्भव है। इसीलिए महाभारत में जाबालि, बृहद्धर्म उपपुराण और पद्मपुराण आदि में कौशिक और नरोत्तम ब्राह्मण आदि को धर्मव्याध नामक कसाई, तुलाधार वैश्य और शुभा नामक स्त्री आदि धर्म का बोध कराते हैं। उनका कल्याण भी अपने अपने कर्म में रहकर ही हुआ।

पहले वर्ण मिलता है, तब उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार।
कोई भी कर्म करके उसके अनुरूप वर्ण चयन करने का अधिकार नहीं है।

उदाहरण :- पहले व्यक्ति आरबीआई का गवर्नर बनेगा फिर नोट छापेगा। पहले पद तब अधिकार। कोई भी व्यक्ति नोट छाप कर ये नहीं कह सकता है कि चूंकि मैं आरबीआई के गवर्नर का काम कर रहा हूँ तो मुझे वही पद दे दो। इसी प्रकार पूर्वजन्म की योग्यता के आधार पर इस जन्म का वर्ण मिलता है, फिर उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कर्म चुनने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भिक्षाटन करने (ब्रह्मवृत्ति) के लिए उत्सुक अर्जुन को भगवान नहीं रोकते।

इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥
( श्रीमद्भागवत 7-11-13)

कुछ लोग सूत जी का उदाहरण देते हैं। सूत जी अयोनिज हैं। पृथु जी के यज्ञ में बृहस्पति और इंद्र जी का भाग मिल जाने से यज्ञ कुण्ड से सूत जी की उत्पत्ति हुई।
सूत जी ब्राह्मण ही हैं, सूत उनकी संज्ञा है, न कि सूत जाति। पद्मपुराण और वायुपुराण में उनके प्रादुर्भाव की कथा है।अग्निकुण्डसमुद्भूत: सूतो विमलमानसः। लेकिन उनका पालन पोषण सन्तानहीन सूत परिवार ने किया अतः वे भी उसी से पुकारे गए। जैसे राजा उपरिचर तथा अद्रिका अप्सरा की कन्या सत्यवती तथा ब्राह्मण शक्तिपुत्र पराशर के सहयोग से उत्पन्न व्यास जी ब्राह्मण थे। कैवर्त के द्वारा लालन पालन होने से सत्यवती दाशकन्या नहीं बन गयी। ऋषि कण्व के द्वारा पालन पोषण करने मात्र से शकुंतला ब्राह्मणी नहीं बन गयी।

जैसे सूत रथी के रथ का कुशलता से संचालन करके उसके मार्ग को प्रशस्त करता है, जैसे गुरु शिष्य को मार्गदर्शन देकर उसका मार्ग प्रशस्त करता है, वैसे ही सूत जी ने मार्गदर्शन के माध्यम से ऋषियों का कल्याण किया, इसीलिए उन्हें सूत कहा गया।

वैसे कर्म देखें तो द्रोणाचार्य ने जीवन भर शस्त्र की ही कमाई खाई। लेकिन उन्हें कभी भी कहीं भी क्षत्रिय नहीं कहा गया। विदुर जी ने जीवन भर शास्त्रोपदेश ही किया लेकिन उन्हें किसी ने कभी भी ब्राह्मण नहीं कहा। कृष्ण जी ने अनेकों बार अर्जुन का रथ संचालन किया लेकिन उन्हें कभी किसी ने सूत नहीं कहा।

महर्षि रोमहर्षण जी को ऋषियों ने अपना सूत यानि मार्ग दर्शक स्वीकार किया और बाद में इन्हीं को सूत जी महाराज कहा गया, अल्पज्ञानी लोग सूत जी को सूत जाति से सम्बन्धित कर देते हैं, परन्तु सूत जी का जन्म अग्निकुण्ड से ऋषियों द्वारा यज्ञ के दौरान हुआ, जिनके दर्शन से ऋषियों के रोंगटे खड़े हो गये क्योंकि इनके ललाट पर इतना तेज था। इनका प्रथम नाम रोमहर्षण हुआ । महर्षि श्री सूत जी साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे तभी तो शौनकादि ऋषियों ने इन्हें अज्ञानान्धकार का नाश करने वाला सूर्य कहा।
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ।
सूताख्याहि कथासारं मम कर्ण रसायनम् ।।

कबीर दास ने कहा :- गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है …
तो इसका अर्थ यह नहीं कि सभी गुरु कुम्हार हैं, या सभी कुम्हार गुरु हैं।अपितु यह है कि जैसे अपरिपक्व मिट्टी से कुम्हार अपने मार्गदर्शन से, कभी मार कर, कभी सहलाकर परिपक्व घड़ा बनाता है, वैसे ही अपरिपक्व शिष्य को अपने मार्गदर्शन से गुरु परिपक्व बनाता है। इसीलिए गुरु का कुम्हार के समान होना बताया गया है। जैसे रोमहर्षण जी का सूत के समान वर्णन मिलता है।

कर्म से जाति का निर्धारण होता है, यह निःसंदेह सत्य है | पर क्या आप ६ वर्ष के बालक को देख कर कैसे कह सकते हैं कि वह ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र में क्या बनेगा ? क्योंकि अभी तो उसने तदनुरूप कर्म किया ही नहीं !!

जहां कर्म से जाति का निर्धारण होने की बात है, तो वहाँ पिछले जन्म के कर्मों का संकेत है। पिछले जन्म के कर्म इस जन्म की जाति निर्धारित करते हैं, और इस जन्म के कर्म अगले जन्म की योनि या जाति का निर्धारण करते हैं | यदि ऐसा न होता, तो ब्राह्मणों के समान जीवन जीने वाली माता शबरी को ब्राहमण क्यों नहीं माना गया, और क्षत्रिय के जैसे कर्म करने वाले परशुराम को ब्राह्मण क्यों कहा गया ?

यह बहुत बड़ा भ्रमजाल है | यदि कर्म के आधार पर जाति होती तो फिर संसार में कर्मों का सम्मिश्रण नहीं होता। जैसे पानी पीने के कर्म को करने वाले एक श्रेणी में आते, और खाना खाने वाले दूसरी में। खाने वाले लोग पीते नहीं, और पीने वाले खाते नहीं। ये नियम शाश्वत होता .. लेकिन यह तो विरोधाभास है, क्योंकि यहाँ तो कर्म सम्मिश्रित है …भगवान श्रीकृष्ण जब गाय चराते थे, तो उन्हें क्षत्रिय क्यों कहा गया, वैश्य क्यों नहीं? और भला विदुर जैसे महाज्ञानी तपस्वी को और संजय जैसे साधक को ब्राह्मण क्यों नहीं कहा गया ?

इस जन्म की जाति का निर्धारण पिछले कर्मों से होता है.. इस जन्म में यदि शूद्र धर्माचरण की मर्यादा में रहे, तो उसे अगली योनि में वर्ण में उन्नति मिलेगी, वह वैश्य बनेगा, अन्यथा नीचे गिर कर म्लेच्छ बन जायेगा | इसी प्रकार यदि क्षत्रिय मर्यादानुसार धर्माचरण करे, तो अगले जन्म में इस जन्म के कर्म फल के तौर पर ब्राह्मण बनेगा, और यदि ऐसा नहीं किया, तो अगली योनि में विषय या शूद्र या म्लेच्छ और यहां तक कि पशु भी बन सकता है।

विराट पुरुष के अंगों से जहां वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है, वहां भी अजायत शब्द है, यानि जन्म लिया। ये नहीं कहा कि सभी मनुष्यों को उत्पन्न किया और उसमें जिसने अमुक कर्म को अपनाया उसे ये कहा गया।

और कर्म तो शाश्वत नहीं हैं। मैं यदि साधना कर रहा हूँ, तो मैं अभी ब्राह्मण हूँ। किसी म्लेच्छ का संहार करने समय मैं तो क्षत्रिय बन जाऊँगा, और कृषि करते समय वैश्य और समाज सेवा करते समय शूद्र बन जाऊँगा.. एक ही दिन में मैं कई बार सभी जातियों में घूम जाऊँगा . तो बताईये कि मेरी जाति क्या है ? मैं किस वर्ण की कन्या से विवाह करूंगा ? मैं क्या कहलाऊंगा ?

मनुष्य और कुत्ता दोनों रोटी खाएं तो क्या कुत्ते को मनुष्य और मनुष्य को कुत्ता कहा जा सकता है ? यदि मछली और बतख दोनों जल में तैरें, तो मछली को बतख और बतख को मछली कहा जा सकता है ? पिछले जन्म के कर्म इस जीवन की जाति तय करते हैं…. इस जीवन के कर्म जाति तय नहीं करते। वे अगले जन्म की जाति या योनि तय करते हैं | अतएव जन्मना जाति वर्ण ही वास्तविक है।

16/01/2026

#धर्म_के_लक्षण

मनुस्मृति-मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं:
धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है । साधारण लोग इसे नही समझ पाते । इसलिए शास्त्र और सन्त जो बतलावे उसे ही ठीक रास्ता समझना चाहिए । भिन्न भिन्न देश और जातियों मे जो जो महात्मा हो गए है उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर रचे हुये अपने ग्रंथों मे जो जो बातें बताये है उन्हीं का हमें यथायोग्य पालन करना चाहिए । धर्म क्या ही अधर्म क्या है इस बात का फैसला वेद करते है । समस्त स्मृतियोंमे मनुस्मृति सबसे प्राचीन और अधिक प्रामाणिक मानी जाती है । उसमें मनुजीने धर्म के दस मुख्य अंग बताये है । वे कहते है -

धृति ,क्षमा ,दम ,अस्तेय ,शौच ,इन्द्रियनिग्रह ,धी, विद्या, सत्य, और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है ।

धृति =
धैर्य धारण संतोष अथवा सहनशीलताका नाम धृति है । धैर्यकी ही धर्म नींव है । जिसे धैर्य नही वह धर्म का आचरण कैसे कर सकेगा ? बिना नींव का मकान नहीं होता । इसी प्रकार बिना धैर्य के धर्म नही होता । तुम एकांत मे बैठकर भगवान से प्राथना करो कि हमारी चाहे जो भी दशा हो जाए परन्तु धैर्य न छूटे ।

क्षमा-
दूसरा धर्म क्षमा है । अपनेमे पूरी शक्ति होनेपर भी अपना अपकार करनेवालेसे किसी प्रकार का बदला न लेना तथा उस अपकारको प्रसन्नता से सहन करना क्षमा कहलाता है । इसलिए इस जीवन संग्राममे हमें सर्वदा क्षमा का कवच पहने हुए ही सारे काम करने चाहिए ।

दम-
तीसरा धर्म दम है । दमका साधारण अर्थ तो इन्द्रियनिग्रह है परंतु यहां दम का अर्थ मनको वश मे करना है । मन को वशमे कर लेने पर सभी इन्द्रियनिग्रह अपने अधिन हो जाती है ।

अस्तेय-
अस्तेय चोरी न करनेका नाम ही है । इसका अर्थ बहुत व्यापक है । साधारणतः दुसरेकी चीज को बिना पुछे ले लेना ही चोरी समझी जाती है ।

शौच-
अब शौचके विषयमे सुनो । शौचका अर्थ है सफाई या पवित्रता । यह दो प्रकार की होती है बाहरी और भीतरी । आजकल इस बाहरी सफाई के विषय मे बड़ा भ्रम फैला हुआ है l

इन्द्रियनिग्रह-
अच्छा अब इन्द्रियनिग्रह पर आता हू । जीवकी सारी अशान्तिका कारण इन्द्रियोका असंयम ही है । इस शरीर रुप रथका रथी जीव है । बुध्दि सारथी है और मन लगाम है और इन्द्रिया घोड़े है ।जिसके इन्द्रियरुप घोड़े बुद्धि रुप सारथी के अधीन होते है । वही सुख पूर्वक अपने लक्ष्य तक जा सकता है ।

धी-
धी बुद्धि को कहते है । मनुष्य के सारे आचार और विचार का रास्ता बुद्धि ही बतलाती है । बुद्धि जिस ओर ले जाती है उसी ओर पुरुष को जाना होता है । जैसा करना चाहती है वैसा ही करता है । इसलिए जीवन मे सफलता प्राप्त करने के लिए सद् बुद्धिकी बहुत बड़ी आवश्यकता है ।

विद्या-
विद्या का अर्थ knowledge है । किन्तु सभी प्रकार का knowledge धर्म की कोटि मे नही आ सकता । इसलिए इसे अध्यात्म विद्या ही समझना चाहिएl

सत्य-
सत्य के साधारण स्वरूपसे सभी परिचित है । यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है । धर्म का ही नही यदि सूक्ष्मतासे विचारा जाय तो यही स्वयं भगवान का स्वरूप है । वास्तव मे सत्य ही भगवान है ।

अक्रोध-
मनुष्यसे जितने पाप बनते है । उनमें से अधिकांश परिणाममे दूषित संस्कार पैदा करने वाले होनेसे भी हेय है । किन्तु यह क्रोध तो आरम्भमे ही उद्वेग पैदा कर देता है । यह पहले जलन पैदा करता है । और पहले उसीको जलाता है जिसे होता है ।

याज्ञवल्क्य-याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं:
अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।।
(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति)

श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में सनातन धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं :

सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:।
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।।
संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:।
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।।
अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:। तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।।
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।।
नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:।
त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।।

महात्मा विदुर-महाभारत के महान यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं -
इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ।
उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है।

तुलसीदास द्वारा वर्णित धर्मरथ
सुनहु सखा, कह कृपानिधाना,
जेहिं जय होई सो स्यन्दन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका,
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।
बल बिबेक दम पर-हित घोरे,
छमा कृपा समता रजु जोरे।
ईस भजनु सारथी सुजाना,
बिरति चर्म संतोष कृपाना।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा,
बर बिग्यान कठिन कोदंडा।
अमल अचल मन त्रोन सामना,
सम जम नियम सिलीमुख नाना।
कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा,
एहि सम बिजय उपाय न दूजा।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें,
जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें।
महा अजय संसार रिपु,
जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होई दृढ़,
सुनहु सखा मति-धीर।। (लंकाकांड)

पद्मपुराण-ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते।
दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।।
अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते।
एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।।

अर्थात ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है।

धर्मसर्वस्वम् -जिस नैतिक नियम को आजकल 'गोल्डेन रूल' या 'एथिक आफ रेसिप्रोसिटी' कहते हैं उसे भारत में प्राचीन काल से मान्यता है। सनातन धर्म में इसे 'धर्मसर्वस्वम्" (धर्म का सब कुछ) कहा गया है:

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
--- पद्मपुराण, शृष्टि 19/357-358

अर्थ: धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।
वेदादि ज्योतिष कर्मकाण्ड शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र

16/01/2026

मंदिर के बाहर लिखा हुआ एक खुबसुरत सच......
"अगर उपवास करके भगवान खुश होते,
तो इस दुनिया में बहुत दिनो तक खाली पेट
रहनेवाला भिखारी सबसे सुखी इन्सान होता..
उपवास अन का नही विचारों का करे....
इंसान खुद की नजर में सही होना चाहिए, दुनिया तो भगवान से भी दुखी है!

आज का विचार:
चिड़िया जब जीवित रहती है
तब वो चिंटी🐜 को खाती है
चिड़िया जब मर जाती है तब
चींटिया उसको खा जाती है।
इसलिए इस बात का ध्यान रखो की समय और स्तिथि कभी भी बदल सकते है.
इसलिए कभी किसी का अपमान मत करो
कभी किसी को कम मत आंको।
तुम शक्तिशाली हो सकते हो पर समय तुमसे भी शक्तिशाली है।
एक पेड़ से लाखो माचिस की तीलिया बनाई जा सकती है
पर एक माचिस की तिल्ली से लाखो पेड़ भी जल सकते है।
कोई चाहे कितना भी महान क्यों ना हो जाए, पर कुदरत कभी भी किसी को महान बनने का मौका नहीं देती।
कंठ दिया कोयल को, तो रूप छीन लिया ।
रूप दिया मोर को, तो ईच्छा छीन ली ।
दी ईच्छा इन्सान को, तो संतोष छीन लिया ।
दिया संतोष संत को, तो संसार छीन लिया ।
दिया संसार चलाने देवी-देवताओं को, तो उनसे भी मोक्ष छीन लिया ।
मत करना कभी भी ग़ुरूर अपने आप पर 'ऐ इंसान'
भगवान ने तेरे और मेरे जैसे कितनो को मिट्टी से बना के, मिट्टी में मिला दिए ।

इंसान दुनिया में तीन चीज़ो के लिए मेहनत करता है
1-मेरा नाम ऊँचा हो .
२ -मेरा लिबास अच्छा हो .
3-मेरा मकान खूबसूरत हो ..
लेकिन इंसान के मरते ही भगवान उसकी तीनों चीज़े
सबसे पहले बदल देता है
१- नाम = (स्वर्गीय )
२- लिबास = (कफन )
३-मकान = ( श्मशान )
जीवन की कड़वी सच्चाई जिसे हम समझना नहीं चाहते
ये चन्द पंक्तियाँ
जिसने भी लिखी है
खूब लिखी है
एक पथ्थर सिर्फ एक बार मंदिर जाता है और भगवान बन जाता है ..
इंसान हर रोज़ मंदिर जाते है फिर भी पथ्थर ही रहते है ..!!
NICE LINE
एक औरत बेटे को जन्म देने के लिये अपनी सुन्दरता त्याग देती है.......
और
वही बेटा एक सुन्दर बीवी के लिए अपनी माँ को त्याग देता है
********[**********]*****
जीवन में हर जगह
हम "जीत" चाहते हैं...
सिर्फ फूलवाले की दूकान ऐसी है
जहाँ हम कहते हैं कि
"हार" चाहिए।
क्योंकि
हम भगवान से
"जीत" नहीं सकते।
➖➖➖➖➖
धीमें से पढ़े बहुत ही
अर्थपूर्ण है यह मेसेज...
हम और हमारे ईश्वर,
दोनों एक जैसे हैं।
जो रोज़ भूल जाते हैं...
वो हमारी गलतियों को,
हम उसकी मेहरबानियों को।
➖➖➖➖➖
एक सुविचार
वक़्त का पता नहीं चलता अपनों के साथ.....
पर अपनों का पता चलता है,
वक़्त के साथ...
वक़्त नहीं बदलता अपनों के साथ,
पर अपने ज़रूर बदल जाते हैं वक़्त के साथ...!!!
➖➖➖➖ ➖
💯%✔
ज़िन्दगी पल-पल ढलती है,
जैसे रेत मुट्ठी से फिसलती है... Ni
शिकवे कितने भी हो हर पल,
फिर भी हँसते रहना...
क्योंकि ये ज़िन्दगी जैसी भी है,
बस एक ही बार मिलती है।
ये SMS जरुर सबको भेजना ..

03/01/2026

सुदामा के साथ बातें करते हुए कब कृष्ण उनके पाँव दबाने लगे ये

सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु कृष्ण अपनी ही सोंचों में मगन उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।

कृष्ण ने चौंक कर पहले उन्हे देखा और फिर सुदामा को, फिर उनका आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये।

कृष्ण की ऐसी मगन अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, "स्वामी आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है।

आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वो अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविव्हल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए।

आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी नही रोये,

वे अपने मित्र के जीर्ण शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया।

कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने मगन हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे।"

कृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, "वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।"

"परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे? अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?", सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी।

कृष्ण मुस्कुराये, " सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा, कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। वो चने उसने इसलिए नही खाये थे कि उसे भूँख लगी थी बल्कि उसने इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे।

उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा।

सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ। वो मुझसे ईश्वर का कोई अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी। सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वय का दरिद्र होना स्वीकार किया।"

"इतना बड़ा त्याग!", रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।

" मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी ही होते हैं। उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है। इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं।

अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए ह्रदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये? गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया तो प्राण ही छोड़ देती। परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनमें ऐसे घावों

को देखकर मेरा ह्रदय भर आया रुक्मिणी। उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था।

पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा। लोग बाग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं। बस सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं।

ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम होगा।", कृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले।

इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं।

🙏जय श्री कृष्ण जी 🙏

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