03/03/2016
महाशिवरात्रि साधक को आध्यात्मिक शिखर पर ले जा सकती है, अगर वह इस दिन प्र्रकृति से सही तादात्म्य बना ले। इस दिन साधक में सहज रूप से ही ऐसी ऊर्जा निर्मित होती है, जो उसे शिव के तीसरे नेत्र के समान एक नई आध्यात्मिक दृष्टि देने में सक्षम है।
द्रमास के कृष्णपक्ष का 14वां या अमावस्या से पहले वाला दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक पंचांग वर्ष की सभी बारह शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इस रात पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में सहज रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है। यह एक ऐसा दिन होता है, जब प्रकृति इनसान को उसके आध्यात्मिक शिखर की ओर ढकेल रही होती है। इस घटना का उपयोग करने हेतु हमारी परंपरा में यह खास त्योहार बनाया गया है। इसे पूरी रात मनाने का मूल उद्देश्य यह तय करना है कि ऊर्जा का यह प्राकृतिक चढ़ाव अपना रास्ता पा सके। महाशिवरात्रि की पूरी रात आपको अपना मेरुदंड सीधा रखना चाहिए और जगे रहना चाहिए।
जो अध्यात्म मार्ग पर हैं, उनके लिए महाशिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण है। जो पारिवारिक जिंदगी जी रहे हैं, उनके लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है। महत्वाकांक्षी इनसानों के लिए भी यह एक अहम दिन है। पारिवारिक जिंदगी जी रहे लोग महाशिवरात्रि को शिव की शादी की सालगिरह के रूप में मनाते हैं। शिव ने इस दिन अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी, सांसारिक महत्वाकांक्षा वाले लोग इसे उस रूप में मनाते हैं। लेकिन तपस्वियों के लिए यह वह दिन है, जब शिव कैलाश के साथ एक हो गए थे, जब वे पर्वत की तरह निश्चल और पूरी तरह शांत हो गए थे।
पूर्व के ऋषियों और मनीषियों ने इसे पहचाना, इसलिए उन्होंने इसका उपयोग एक साधना दिवस के रूप में किया। आध्यात्मिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे परंपरा का एक हिस्सा बना दिया। इसके अलावा शिव का वर्णन हमेशा से त्रिअंबक के रूप में किया जाता है- जिनकी तीन आंखें हैं। तीसरी आंख वह आंख है, जिससे दर्शन होता है। आपकी दो आंखें हैं, ये मन को सभी तरह की अनर्गल चीजें पहुंचाती हैं। ये दो आंखें सत्य को देख नहीं पाती हैं, अत: एक तीसरी आंख, एक गहरी भेदन शक्ति वाली आंख को खोलना होगा।
आज के लिए नुस्खा यह है कि आप समानांतर या क्षैतिज अवस्थाओं में न लेटें, हमेशा मेरुदंड सीधा रखें। केवल सीधा रखना ही काफी नहीं है, हमें एक ऐसी अवस्था में रहना होगा जहां हम, हम नहीं रह जाते।
शिव का अर्थ है- 'वह जो नहीं है'। आज की रात इसे अपने साथ होने दें, स्वयं को खो दें। फिर जीवन में एक नई दृष्टि खुलने की संभावना पैदा होगी, जिससे आप जीवन को वैसे देख पाएंगे, जैसा यह है।
महादेव शिव की रात
अध्यात्म की राह पर चलने वाले साधकों की यात्रा बड़ी दुरूह मानी जाती है। अनजानी राह की भटकन, शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक सीमाएं, मुश्किल हालातों में मंसूबे का डगमगा जाना- राह में न जाने कितनी उलझनें आती हैं। पर अगर किसी सद्गुरु का मार्गदर्शन और कृपा का सान्निध्य मिल जाए तो यात्रा सुगम और सहज हो सकती है। परम प्राप्ति की चाह रखने वाला साधक हर उस कुदरती घटना को, हर उस अवसर को, अपनी यात्रा का सोपान बना लेता है, जो उसे आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है और परम के करीब ले जाती है। एक ऐसा ही अवसर है महाशिवरात्रि।
महाशिवरात्रि का सीधा संबंध शिव से है, जो न केवल आदि योगी हैं, बल्कि अलौकिक आनंद के आदि-स्रोत भी हैं। अगर महाशिवरात्रि के महत्व को समझना है तो शिव को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।