Radhasoami Satsang Aligarh

Radhasoami Satsang Aligarh RS Satsang Aligarh founded by PPPD Soamiji Maharaj Pt Vishnu Dutt Mishra ji disciple of PPPD Baba Garib DasMaharaj disciple of PPPD Hazur Radha Soami Dayal

संत रज्जब अली खानभक्तिकाल के संत विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली- पठान संत रज्जब – रज्जब तै गज्जब ...
07/09/2022

संत रज्जब अली खान

भक्तिकाल के संत विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली- पठान संत रज्जब – रज्जब तै गज्जब किया

संत रज्जब अली खान मुसलमान पठान थे। आमेर की सेना के मुख्य सेनापति के पुत्र थे। वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करने के लिए एक बड़ी बारात के साथ सांगानेर से आमेर जा रहे थे।

युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ गया। बारात सजी। बारात चली। रज्जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा है इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष रह गये थे। प्रेयसी से मिलने जा रहे थे। प्रेम तो तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की बात थी।

अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई फक्कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर से रज्जब को देखा।

आँख से आँख मिली। वे चार आंखें संयुक्त हो गयी। उस क्षण में क्रांति घटी। वह आदमी रज्जब के होने वाले गुरु थे—दादू दयाल जी। और जो कहा दादू दयाल जी ने वे शब्द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से शब्दों में सारी क्रांति छिपी है। दादू दयाल ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा, आँख मिली ओर दादू जी ने कहा—

"रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर
आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर"

बस इतनी सी बात। देर न लगी, रज्जब घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक दिया, दादू के पैर पकड़ लिए। और कहा कि चेता दिया समय पर चेता दिया.... और सदा के लिए दादू के हो गये छाया की तरह दादू दयाल के साथ रहे रज्जब, उनकी सेवा में !!वे चरण उसके लिए सब कुछ हो गये। उन चरणों में उसने सब पा लिया। अद्भुत प्रेमी रज्जब।

जब दादू दयाल अंतर्धान हो गये।जब उन्होंने शरीर छोड़ा, तो तुम चकित हो जाओगे…..शिष्य हो तो ऐसा हो।

रज्जब ने आँख बंद कर लीं। तो फिर कभी आँख नहीं खोली।कई वर्षों तक रज्जब जिंदारहे , दादू दयाल के मरने के बाद। लेकिन कभी आँख नहीं खोली।लोगों ने लाख समझाया ये बात ठीक नहीं है।लोग कहते कि आंखे क्यों नहीं खोलते ?तो रज्जब कहते देखने योग्य जो था उसे देख लिया, अब देखने को क्या है ? जो दर्शनीय था, उसका दर्शन कर लिया। उन आंखें में पूर्णता का सौंदर्य देख लिया। अब देखने योग्य क्या है इस संसार में !

संत दादू दयाल की एक दृष्टि मात्र से रज्जब आगे चलकर महान संत बन गए आमेर नरेश मानसिंह प्रथम के गुरु संत दादूदयालजी के शागिर्द बने रजब अली खां अंतिम समय तक दूल्हे की पोशाक पहने ही भक्ति करते रहे। सांगानेर निवासी रजब की सगाई आमेर के पठान खानदान में हुई थी। विवाह के लिए रजब बारात सजाकर आमेर आए थे। जब भी शेरवानी पुरानी होकर फटने लगे, तभी कोई शिष्य नई शेरवानी सिलवा देता।

संत दादू दयाल के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके उत्तराधिकारी गरीबदास ने एक बार रज्जब को शेरवानी उतारकर दूसरे कपड़े पहनने को कहा, लेकिन रज्जब ने पोशाक नहीं उतारी। लगभग 122 वर्ष की उम्र तक रज्जब भक्ति भाव में लीन रहे।

राम चरण दास जी ने रज्जब के बारे में दोहा लिखा है- दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रजब सा जाण। एक शब्द में उधड़ गया, रही नहीं खेंचा ताण।

संवत् 1644 के आस पास इन्होंने दादू साहब के उपदेश से विवाह का विचार त्याग दिया और विरक्त संत हो गए। इनकी तीन रचनाएँ मिलती हैं- अंग बंधू, सवंगी और वाणी। अंगबंधू में दादू जी की रचनाएँ है। इनकी वाणियों का संग्रह जो बंबई से प्रकाशित हुआ है- उसमें 5427 साखियाँ, 218 पद, 116 सवैया, 73 अरिल्ल, 79 छप्पय और फुटकल छंद है l

हाथ घड़े कूं‍‌‌ पूजता, मोल लिए का मान।
रज्जब अघड़ अमोल की, खलक खबर नहि जान॥1॥

रज़्ज़ब जाकी चाल सों, दिल न दुखाया जाय।
जहाँ खलक खिदमत करे, उत है खुसी खुदाय॥2॥

निराकार-निर्गुण भजै, दोहा खोजे राम।
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम ॥3॥

बावन अक्षर सप्त स्वर, गल भाषा छत्तीस.।
इतने ऊपर हरि-भजन, अनअक्षर जगदीश ॥4॥

रज्जब की अरदास यह, और कहै कछु नाहिं।
यो मन लीजै हेरि, मिले न माया माहिं ॥5॥

राधास्वामी 🙏

शेख सादी [११७२-१२७४]`````````````शेखसादी का जन्म ईरान के प्रसिद्ध नगर शीराज में हुआ था। उनके पिता शेख अब्दुल्ला का वहां ...
01/09/2022

शेख सादी [११७२-१२७४]
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शेखसादी का जन्म ईरान के प्रसिद्ध नगर शीराज में हुआ था। उनके पिता शेख अब्दुल्ला का वहां के सम्राट के यहां सम्मान था, वे स्वयं बडे विद्वान और सज्जन थे।

शेख़ सादी (शेख मुसलिदुद्दीन सादी), 13वीं शताब्दी का सुप्रसिद्ध साहित्यकार। ईरान के दक्षिणी प्रांत में स्थित शीराज नगर में 1185 या 1186 में पैदा हुआ था। उसकी प्रारंभिक शिक्षा शीराज़ में ही हुई। बाद में उच्च शिक्षा के लिए उसने बगदाद के निज़ामिया कालेज में प्रवेश किया। अध्ययन समाप्त होने पर उसने इसलामी दुनिया के कई भागों की लंबी यात्रा पर प्रस्थान किया - अरब, सीरिया, तुर्की, मिस्र, मोरक्को, मध्य एशिया और संभवत: भारत भी, जहाँ उसने सोमनाथ का प्रसिद्ध मंदिर देखने की चर्चा की है।

दूसरों की निन्दा करने को वे बहुत बुरा मानते थे। बचपन में शेखसादी अपने पिता के साथ मक्का जा रहे थे- पिता-पुत्र के साथ कुछ अन्य लोग भी थे, वे सभी आधी रात को उठ कर प्रार्थना करते थे। एक दिन आधी रात के समय सादी और उनके पिता ने प्रार्थना की, किन्तु अन्य लोग काफी गहरी निद्रा में सो रहे थे, अन्य लोगों को सोते देख सादी अपने पिता से बोले, 'ये लोग कितने आलसी हैं, न उठते हैं, न प्रार्थना करते हैं।

इस पर उनके पिता ने सादी को काफी कड़े स्वर में कहा, 'अरे सादी बेटा, तू न उठता तो ठीक होता, दूसरों की निंदा करने से तो न उठना ही अच्छा थाl
किन्तु पिता के आकस्मिक निधन के कारण शेख सादी का जीवन कष्टमय बन गया।

उनके कष्ट का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि शेखसादी नमाज पढ़ने जा रहे थे। जूते न होने के कारण उनके पाँव में कांटे लगे थे। तभी उन्हें एक साहूकार दिखाई दिया जिसके पाँवों में चमचमाती जूतियाँ थी। शेखसादी के मन में आया कि अल्लाह कितना पक्षपाती है, एक को तो चमचमाते जूते और मुझे फटे पुराने भी नहीं। शेख अभी यही सोच रहे थे कि पीछे खटखट की आवाज सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो एक अपंग बैसाखी के सहारे चला आ रहा था। शेख ने अपने को एक तमाचा लगाया और कहा -या परवरदिगार !! यह क्या कम है कि तूने मुझे पैर तो दिये।

शेख सादी प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ थे। उन्होंने ईराक ,ईरान ,तुर्किस्तान, आर्मीनिया, फिलिस्तीन, कुर्दिस्तान के साथ भारत की भी यात्रा की थी। उन्होंने अपने अनुभव और संस्मरण लिखे हैं-

एक बार दमिश्क में अकाल पड़ा। नदियां सूख गईं। इन्हीं दिनों मेरा एक मित्र मुझसे मिलने आया। वह बहुत कमजोर हो गया था । हड्डियां ही हड्डियां दिख रही थीं । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह बड़ा धनवान और अमीर आदमी था।

उसके पास सवारी के लिए बीसों घोड़े और रहने के लिए आलीशान हवेलियां थीं। पचासों नौकर थे। मैंने उससे पूछा, "तुम्हारी यह हालत कैसे हो गई?" वह बोला, "आपको क्या इस देश का हाल मालूम नहीं है?" कितनी मुसीबतें और आफतें आई हुई हैं। कितना भयंकर अकाल पड़ा हुआ है। हजारों आदमी भूख से मर गए हैं। मैंने कहा, "तुमको इस मुसीबत से क्या मतलब?" तुम इतने अमीर हो कि अगर ऐसे सैकड़ों अकाल भी पड़ें तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। "वह बोला, "आपका कहना सच है, मगर इंसान वहीं है, जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझे। जब मैं लोगों को फाका करते देखता था, तो मेरे मुंह में खाने का एक टुकड़ा नहीं उतरता था। इसलिए मैंने अपनी सारी जायदाद और सामान बेचकर गरीबों और फकीरों में बांट दिया।

शेख सादी, इस बात को याद रखो कि>>>> उस तंदुरुस्त आदमी का सुख नष्ट हो जाता है, जिसके पास बीमार बैठा हो।"

मदरस-ए-निजामिया उस समय ईरान का बहुत प्रसिद्ध विद्यापीठ था, जिसमें शेखसादी ने विद्याध्ययन किया । उनके साहित्य ने सामान्य जनता से लेकर सम्राटों के मन में भी स्थान बनाया था।

शेख सादी विश्व-प्रसिद्ध मनीषी और चिन्तक थे। उनके कथन लोकोक्ति का दर्जा पा चुके हैं- उनकी पुस्तकें गुलिस्तां और बोस्ता संसार में प्रसिद्ध हैं। शेख सादी की कृति गुलिस्ताँ की पाण्डुलिपि को भारत के एक महाराजा ने चित्रकारों से चित्रित करवाया था।

सीरिया में धर्मयुद्ध में हिस्सा लेनेवाले यात्रियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया, जहाँ से उसके एक पुराने साथी ने सोने के दस सिक्के (दीनार) मुक्तिधन के रूप में देकर उसका उद्धार किया। उसी ने 100 दीनार दहेज में देकर अपनी लड़की का विवाह भी सादी से कर दिया। यह लड़की बड़ी उद्दंड और दुष्ट स्वभाव की थी। वह अपने पिता द्वारा धन देकर छुड़ाए जाने की चर्चा कर सादी को खिजाया करती थी। ऐसे ही एक अवसर पर सादी ने उसके व्यंग्य का उत्तर देते हुए जवाब दिया 'हाँ, तुम्हारे पिता ने दस दीनार देकर जरूर मुझे आजाद कराया था लेकिन फिर सौ दीनार के बदले उसने मुझे पुन: दासता के बंधन में बाँध दिया।'

आज घड़ी अति पावन भावन राधास्वामी आयें जगत चितावन परम पुरुष पूरण धनी कुल मालिक दीन दयाल बंदीछोड़ परम संत सतगुरु समद राधास...
19/08/2022

आज घड़ी अति पावन भावन राधास्वामी आयें जगत चितावन

परम पुरुष पूरण धनी कुल मालिक दीन दयाल बंदीछोड़ परम संत सतगुरु समद राधास्वामी दयाल-स्वामीजी महाराज ने अनामी धाम से इस जगत में देह स्वरूप में प्रकट होने की मौज फरमाई आज इस 204 वीं पावन दयाल अष्टमी के महा चैतन्य प्रकाट्योत्सव पर्व पर कोटि-कोटि वंदना अरब खरब दंडोत।

सतगुरु के चरणकमलों में कातर हृदय से कोटि-कोटि फरियाद और पुकार -

नाम दान अब सतगुरु दीजे।
काल सतावे स्वांसा छीजे॥

दुख पावत मैं निस दिन भारी।
गही आय अब ओट तुम्हारी॥

तुम समान कोई और न दाता।
मैं बालक तुम पित और माता॥

मो को दुखी आप कस देखो।
यह अचरज मोहिं होत परेखों॥

मैं हूँ पापी अधम विकारी।
भूला चूका छिन छिन भारी॥

औगुन अपने कहँ लग बनूं।
मेरी बुधि समझे नहिं मरमूं॥

तुम्हरी गति मति नेक न जानूं।
अपनी मति अनुसार बखानूं॥

तुम समरथ और अंतरजामी।
क्या क्या कहूँ मैं सतगुरु स्वामी॥

मौज करो दुख अंतर हरो।
दया दृष्टि अब मो पै धरो॥

माँगूं नाम, न माँगूं मान।
जस जानो तस देव मोहिं दान॥

मैं अति दीन भिखारी भूखा।
प्रेम भाव नहिं सब विधि रूखा॥

कैसे दोगे नाम अमोला।
मैं अपने को बहु विधि तोला॥

होय निरास सबर कर बैठा।
पर मन धीरज धरे न नेका॥

शायद कभी मेहर हो जावे।
तो कहुँ नाम नेक मिल जावे॥

बिना मेहर कोइ जतन न सूझे।
बख़शिश होय तभी कुछ बूझे॥

किनका नाम करे मेरा काज।
हे सतगुरु मेरी तुमको लाज॥

अब तो मन कर चुका पुकार।
राधास्वामी करो उधार॥

मुझ अधम की सतगुरु के चरणकमलों में कोटि-कोटि फरियाद और प्रार्थना

राधास्वामी

किसी का गुरू स्वरूप में प्यार और भाव कम है या नहीं है और न शब्द में अभी कुछ रस आया है अलबत्ता उसके चाहिये कि जब कोई तरंग...
18/08/2022

किसी का गुरू स्वरूप में प्यार और भाव कम है या नहीं है और न शब्द में अभी कुछ रस आया है अलबत्ता उसके चाहिये कि जब कोई तरंग ना-किस मन में उठे तो उसको अपने भजन और ध्यान की हानि और नरकोंँ और चेरासी के दुक्खाँ का डर दिखला कर रोके l

जे इस बात की संते के बचन के मुवाफिक थेड़ी बहुत परतीत है तो भी मन और इंद्रिय डर के सबब से रुक जाबेंगी और तरंग भी हट जावेगी॥

करूँ विनती दोउ कर जोरी, अर्ज सुनो राधास्वामी मोर

सत पुरुष तुम सतगुरु दाता, सब जीवन के पितु और माता
दया धार अपना कर लीजे, काल जाल से न्यारा कीजे

सतयुग त्रेता द्वापर बिता, काहू न जानी शब्द की रीता
कलजुग में स्वामी दया विचारी, परगट करके शब्द पुकारी

जिव काज स्वामी जग में आये, भौ सागर से पार लगाये
करूँविनती दोउ कर जोरी, अर्ज सुनो राधास्वामी मोरी

तीन छोड़ चौथा पद दीन्हा, सतनाम सतगुरु गत चिन्हा
जगमग जोत होत उजियारा, गगन सोत पर चन्द्र निहारा

सेत सिंहासन छत्र बिराजे, अनहद शब्द गैब धुन गाजे
क्षर अक्षर निःअक्षर पारा, बिनती करे जहां दास तुम्हारा

लोक अलोक पाऊं सुख धामा, चरन सरन दीजे बिसरामा
करूँ विनती दोउ कर जोरी, अर्ज सुनो राधास्वामी मोरी

रक्षाबंधनएक समर्थ पुरुष कुल मालिक दीन दयाल बंदीछोड़ परम संत सतगुरु समद राधास्वामी दयाल-स्वामीजी के अलावा कोई नहीं जो रक्...
12/08/2022

रक्षाबंधन

एक समर्थ पुरुष कुल मालिक दीन दयाल बंदीछोड़ परम संत सतगुरु समद राधास्वामी दयाल-स्वामीजी के अलावा कोई नहीं जो रक्षा कर सकें! रक्षाबंधन उनका सफल है जो नाम की डोर से बंधे हैं इस काल की रक्षाबंधन से जीव अपनी रक्षा नहीं कर सकता है वह अपने नाते रिश्ते की क्या रक्षा करेगा।

गुरु रक्षा हर दम संग
बैरी जल जल मरें।

राखी उस की जिसने राख कर दिया हो काल अंग को वह कर सकता है रक्षा!

मन कपास सूरत कर रूई ।
काम बिनौले डाले खोई॥
हुई साफ धुन की सुधि पाई
नाम धुना ले गगन चढ़ाई॥
घर में धसे मात पितु हरखे
प्रेम मगन मानो बादल बरखे॥
मोती हीरे लाल जवाहिर।
बुआ बहिन मिल किये निछावर॥
राधास्वामी रलियाँ मन्नी
मगन हुए भैया और बहिनी॥

राधास्वामी सत्संग में आकर भी काल से रक्षा की भीख!
विचार करों

मालिक दया करें।

राधास्वामी

संत गरीब दास (1717-1778) भक्ति और काव्य के लिए जाने जाते हैं। गरीब दास ने एक विशाल संग्रह की रचना की जो सदग्रंथ साहिब के...
11/08/2022

संत गरीब दास
(1717-1778)

भक्ति और काव्य के लिए जाने जाते हैं। गरीब दास ने एक विशाल संग्रह की रचना की जो सदग्रंथ साहिब के नाम से प्रसिद्ध है।

गरीब दास साहेब ने सद्गुरु कबीर साहेब की अमृतवाणी का विवरण किया जिसे रत्न सागर भी कहते हैं। अच. ऐ. रोज के अनुसार गरीबदास की ग्रन्थ साहिब पुस्तक में ७००० कबीर के पद लिए गए थे और १७००० स्वयं गरीब दास ने रचे थे।

गरीबदास का दर्शन था कि राम में और रहीम में कोई अन्तर नहीं है। बाबा गरीबदास की समाधि स्थल गाँव छुडानी, हरियाणा और जिला सहारनपुर उत्तर प्रदेश में आज भी सुरक्षित है। संत गरीब दास जी को 13 वर्ष की आयु में कबीर परमात्मा स्वयं आकर मिले थे, उनको अपना ज्ञान बताया।

संत गरीबदास जी महाराज जी अपने खेतों में गायों को चरा रहे थे, तब कबीर साहिब जी सतलोक से शरीर आए जिंदा महात्मा के रूप में और गरीब दास जी के पास पहुंचे। गरीब दास जी तथा अन्य ग्वालों ने कबीर साहिब जी को कुछ खिलाने पिलाने के लिए कहा तब कबीर साहिब जी ने कहा, मैं कुंवारी गाय का दूध पीता हूं तब गरीब दास जी एक छोटी बछिया लेकर आए उसके ऊपर कबीर साहिब जी ने आशीर्वाद भरा हाथ रखा तो कुंवारी गाय दूध देने लगी और वह दूध कबीर साहिब जी ने पिया तथा गरीब दास जी महाराज ने भी प्रसाद के रूप में वह दूध पिया।

उसके बाद गरीब दास जी महाराज को कबीर साहिब जी ने प्रथम मंत्र दिया तथा सतलोक की सैर कराई। गरीब दास जी के शरीर को मृत जानकर गांव वालों ने उनकी चिता जलाने की तैयारी करने लगे अचानक चिता की लकड़ियां टूट गई और गरीब दास जी शरीर में आए और उन्होंने फिर कबीर परमात्मा का ज्ञान अपने मुख कमल से वाणियों के माध्यम से उच्चारित किया।

गरीब, अलल पंख अनुराग है, सुन्न मण्डल रहै थीर।
दास गरीब उधारिया, सतगुरु मिले कबीर।।
गरीब, सुन्न बेसुन्न सैं अगम है, पिण्ड ब्रह्मण्ड सैं न्यार।
शब्द समाना शब्द में, अवगत वार न पार।।
गरीब, बंक नाल के अंतरे, त्रिवैणी के तीर।
जहां हम सतगुरु ले गया, बन्दी छोड़ कबीर।।

फाल्गुन शुुक्ला द्वादशी सम्वत् १७८४ सन् १७२७ के दिन गरीबदास जी को कबीर परमात्मा मिले तथा ऊपर के सभी लोकों को दिखाया तथा फिर से शरीर में छोड़ दिया।

तभी से वे उसी ज्ञान के पद गाने लगे जो ज्ञान कबीर साहेब ने दिया था तथा कबीर सागर में लिपिबद्ध है। और इस दिन को गरीबदास जी का बोध दिवस के रूप मे मनाया जाता है।

कैसे हिंदू तुरक कहाया । सबही एकै द्वारे आया ।। कैसे ब्रह्मन कैसे सूद्र । एकै हाड़ चाम तन गूंद ।। एकै बिंद एक भग द्वारा ।...
11/08/2022

कैसे हिंदू तुरक कहाया ।
सबही एकै द्वारे आया ।।

कैसे ब्रह्मन कैसे सूद्र ।
एकै हाड़ चाम तन गूंद ।।

एकै बिंद एक भग द्वारा ।
एकै सब घट बोलनहारा ।।

कौम छतीस एकही जाती ।
ब्रह्म बीज सबकी उतपाती ।।

एकै कुल एकै परिवारा ।
ब्रह्म बीज का सकल पसारा ।।

ऊँच नीच इस बिध है लोई ।
कर्म कुकर्म कहावै दोई ।।

गरीबदास जिन नाम पिछाना ।
ऊँछ नीच पद ये परनामा ।।

- गरीब दास

गरीबदास साहेबगरीबदास साहेब जी का आर्विभाव सन् 1717 में हुआ तथा कबीर साहेब जी के दर्शन दस वर्ष की आयु में सन् 1727 में नल...
11/08/2022

गरीबदास साहेब

गरीबदास साहेब जी का आर्विभाव सन् 1717 में हुआ तथा कबीर साहेब जी के दर्शन दस वर्ष की आयु में सन् 1727 में नला नामक खेत में हुए तथा सतलोक वास सन् 1778 में हुआ।

गरीबदास साहेब जी को भी परमात्मा कबीर साहेब जी सशरीर जिंदा रूप में मिले। आदरणीय गरीबदास साहेब जी अपने नला नामक खेतों में अन्य साथी ग्वालों के साथ गाय चरा रहे थे। जो खेत कबलाना गाँव की सीमा से सटा है। ग्वालों ने जिन्दा महात्मा के रूप में प्रकट कबीर परमेश्वर से आग्रह किया कि आप खाना नहीं खाते हो तो दूध ग्रहण करो क्योंकि परमात्मा ने कहा था कि मैं अपने सतलोक गाँव से खाना खाकर आया हूँ। तब परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि मैं कुँआरी गाय का दूध पीता हूँ। बालक गरीबदास जी ने एक कुँआरी गाय को परमेश्वर कबीर जी के पास लाकर कहा कि बाबा जी यह बिना ब्याई (कुँआरी) गाय कैसे दूध दे सकती है ? तब कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने कुँआरी गाय अर्थात् बच्छिया की कमर पर हाथ रखा, अपने आप कुँआरी गाय (अध्नया धेनु) के थनों से दूध निकलने लगा। पात्र भरने पर रूक गया। वह दूध परमेश्वर कबीर जी ने पीया तथा प्रसाद रूप में कुछ अपने बच्चे गरीबदास जी को पिलाया तथा सतलोक के दर्शन कराये। सतलोक में अपने दो रूप दिखाकर फिर जिंदा वाले रूप में कुल मालिक रूप में सिंहासन पर विराजमान हो गए तथा कहा कि मैं ही 120 वर्ष तक काशी में धाणक (जुलाहा) रूप में रहकर आया हूँ।

मैं पहले भी हजरत मुहम्मद जी को भी मिला था। पवित्र कुरान शरीफ में जो कबीरा, कबीरन्, खबीरा, खबीरन्, अल्लाहु अक्बर आदि शब्द हैं वे मेरा ही बोध कराते हैं तथा मैं ही श्री नानक जी को बेई नदी पर जिंदा महात्मा के रूप में ही मिला था {मुस्लमानों में जिंदा महात्मा होते हैं, वे काला चैगा (ओवर कोट जैसा) घुटनों से नीचे तक तथा सिर पर चोटे वाला काला टोप पहनते हैं} तथा मैं ही बलख शहर में नरेश श्री अब्राहीम सुलतान अधम जी तथा श्री दादू जी को मिला था तथा चारों पवित्र वेदों में जो कविर अग्नि, कविर्देव (कविरंघारिः) आदि नाम हैं वह मेरा ही बोध है।

(गाँव छुड़ानी जि. झज्जर (हरियाणा) में आज भी उस जंगल में जहाँ पूर्ण परमात्मा, का सन्त गरीबदास जी को मानव शरीर में साक्षात्कार हुआ था, एक यादगार विद्यमान है।) आदरणीय गरीबदास जी की आत्मा अपने परमात्मा कबीर बन्दी छोड़ के साथ चले जाने के बाद उन्हें मृत जान कर चिता पर रख कर जलाने की तैयारी करने लगे, उसी समय आदरणीय गरीबदास साहेब जी की आत्मा को पूर्ण परमेश्वर ने शरीर में प्रवेश कर दिया। दस वर्षीय बालक गरीब दास जीवित हो गए। उसके बाद उस पूर्ण परमात्मा का आँखों देखा विवरण अपनी अमृत वाणी में “सद्ग्रन्थ” नाम से ग्रन्थ की रचना की। जिसमें गरीबदास जी महाराज अपनी वाणी में कह रहे हैं कि :-

यही काशी वाला धाणक ही (सतपुरुष) पूर्ण ब्रह्म है।

परमेश्वर कबीर ही सतलोक से जिन्दा महात्मा के रूप में आकर मुझे अजब नगर (अद्धभुत नगर सतलोक) में लेकर गए। जहाँ पर आनन्द ही आनन्द है, कोई चिन्ता नहीं, जन्म-मृत्यु, अन्य प्राणियों के शरीर में कष्ट आदि का शोक नहीं है।

इसी काशी में धाणक रूप में आए सतपुरुष ने भिन्न-भिन्न समय में प्रकट होकर आदरणीय श्री अब्राहीम सुल्तान अधम साहेब जी तथा आदरणीय दादू साहेब जी व आदरणीय नानक साहेब जी को भी सतनाम देकर पार किया। वही कविर्देव जिसके एक रोम कूप में करोड़ो सूर्यों जैसा प्रकाश है तथा मानव सदृश है, अति तेजोमय अपने वास्तविक शरीर के ऊपर हल्के तेजपुंज का चोला (भद्रा वस्त्र अर्थात् तेजपुंज का शरीर) डाल कर हमें मृत्य लोक (मनुष्य लोक) में मिलता है। क्योंकि उस परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप के प्रकाश को चर्म दृष्टि सहन नहीं कर सकती।

गरीबदास साहेब जी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है

“सर्व कला सतगुरु साहेब की, हरि आए हरियाणे नुँ”।

भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा कविर हरि (कविर्देव) जिस क्षेत्र में आए उसका नाम हरयाणा अर्थात् परमात्मा के आने वाला पवित्र स्थल, जिस के कारण आस-पास के क्षेत्र को हरिआना (हरयाणा) कहने लगे। सन् 1966 को पंजाब प्रान्त के विभाजन होने पर इस क्षेत्र का नाम हरिआणा (हरयाणा) पड़ा।

लगभग 236 वर्ष पूर्व कही वाणी 1966 में सिद्ध हुई कि समय आने पर यह क्षेत्र हरयाणा प्रान्त नाम से विख्यात होगा। जो आज प्रत्यक्ष प्रमाण है।

गरीब दासजन्म :झज्जर, हरियाणामौजा छुड़ानी, तहसील झज्झर, जिला रोहतक (हरियाणा) में सन् 1717 ई. में जन्म। पेशा जमींदारी था। ...
11/08/2022

गरीब दास
जन्म :झज्जर, हरियाणा

मौजा छुड़ानी, तहसील झज्झर, जिला रोहतक (हरियाणा) में सन् 1717 ई. में जन्म। पेशा जमींदारी था। अपने घर मौजा छुड़ानी में ही सत्संग खड़ा करके लोगों को चेताते रहे और सारी उम्र गृहस्थ रहकर 61 वर्ष की उम्र में सन् 1878 ई. में इनका देहाँत हुआ।

इनकी दो लड़कियाँ और चार लड़के थे। कुछ लोगों का मानना है कि उनके बेटों में से ही एक गद्दी पर बैठा। जबकि कुछ लोगों का मत है कि उनके गुरुमुख शिष्य सलोत जी ने गद्दी पायी। जो भी हो, इस समय तो यही रिवाज है कि औलाद को ही महन्ती मिलती है और वह गृहस्थ ही रहा करते हैं।

महात्मा जी के पहनने का जामा, पगड़ी, पलंग और अन्य उपयोग की वस्तुएँ आज भी मौजा छुड़ानी में इनकी समाधि पर मौजूद है।

चेत सकै तो चेतिये कूकै संत सुमेर ।
चौरासी कूँ जात है फेर सकै तो फेर ।।

गगन मँडल में रम रहा तेरा संगी सोय ।
बाहर भरमे हानि है अंतर दीपक जोय ।।

निरबानी के नाम से हिल मिल रहना हंस ।
उर में करिये आरती कधी न बूड़ै बंस ।।

मात हिता सुत बंधवा देखे कुल के लोग ।
रे नर देखत फूँकिये करते हैं सब सोग ।।

रंचक नाम सँभारिये परपंची कूँ खोय ।
अंत समय आनंद है अटल भगति देउँ तोय ।।

- गरीब दास

गुलाल साहब जन्म :गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेशनिधन :उत्तर प्रदेश, भारत'गुलाल साहब बुल्ला साहब के शिष्य थे। शिष्यत्व ग्रहण करने ...
10/08/2022

गुलाल साहब

जन्म :गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
निधन :उत्तर प्रदेश, भारत

'गुलाल साहब बुल्ला साहब के शिष्य थे। शिष्यत्व ग्रहण करने से पूर्व गाजीपुर में जमींदार थे। संत गुलाल साहब का जन्म सत्रहवीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के भुरकुड़ा गांव में हुआ था।संत गुलाल साहब सतनामी संत थे।

उन्होंने जनमानस को सहृदयता, शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाया। उस समय देश में औरंगजेब का शासन था। चारों ओर उथल-पुथल थी। ऐसे में गुलाल साहब का प्राकट्य समाज में एक नई ऊर्जा संचार में सहयोगी बना। उन्होंने ध्यान, भक्ति चिंतन से आम आदमी को अध्यात्म-पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा दी। उनका उद्घोष है कि

‘हरि भजन के बिना भवसागर के पार उतरना कठिन है।
सुर, नर, मुनि, नाग सबके लिए भजन जरूरी है।’

इन्होंने बुल्ला साहेब का शिष्यत्व ग्रहण किया और बुल्ला साहेब की महाप्रयाण के बाद उनकी धारा को आगे बढ़ाया। 1760 ई.में आप भूलोक से सतलोक को महाप्रयाण कर गए।

गूदर धागा नाम का सूई पवन चलाय
मन मानिक मनि गन लग्यो पहिर 'गुलाल' बनाय

गुलाल ताखी तत्त दियो प्रेम सेल्हि हिये नाय
सुमिरिनी मन महँ फिरयो आठ पहर लौ लाय

'गुलाल' माला नाम का राखो गर में नाय
कोटि जतन छूटे नहीं रहो जोति लपटाय

माला जपों न मंतर पढ़ों मन मानिक को प्रेम
कंथ गूदरि पहिरौं नहीं कह 'गुलाल' मेरे नेम

-गुलाल साहब

नैना निहारि के देख ले रे तेरा कौन सा यार कहावता है जिन तन मन और बदन किया सोई यार का प्यार भुलावता है 'तुलसी' तलास करतार ...
10/08/2022

नैना निहारि के देख ले रे तेरा कौन सा यार कहावता है
जिन तन मन और बदन किया सोई यार का प्यार भुलावता है
'तुलसी' तलास करतार है रे जूतियाँ जब जम ले मारता है l

घट घट में रचना होय रही स्रुति सैल से संत निहारते हैं
सत मत का अंत लखाव लखै सो पकाय के पार सुनावते हैं
'तुलसी' जो दास का दास कहिये गुर बैन के चैन से पावते हैं l

- तुलसी साहिब हाथरस वाले

संत मता है सार और सब जाल पसारा, परम हंस जग भेष बहे सब मन की लारासंत बिना नहिं घाट बाट एको नहिँ पावै अरे हाँ रे 'तुलसी' भ...
10/08/2022

संत मता है सार और सब जाल पसारा,
परम हंस जग भेष बहे सब मन की लारा

संत बिना नहिं घाट बाट एको नहिँ पावै
अरे हाँ रे 'तुलसी' भटकि भटकि भ्रमखान संत बिन भव में आवै

निर्गुन कहिये ब्रह्म बेद परमातम गावा
पाँच तत्त गुन बँधा जीव आत्मा कहावा

आतम इंद्री बास फाँस बिच रहा फँसाई
अरे हाँ रे 'तुलसी' जड़ चेतन की गाँठ ठाठ मन जग उपजाई

_ तुलसी साहिब हाथरस वाले

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