07/09/2022
संत रज्जब अली खान
भक्तिकाल के संत विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली- पठान संत रज्जब – रज्जब तै गज्जब किया
संत रज्जब अली खान मुसलमान पठान थे। आमेर की सेना के मुख्य सेनापति के पुत्र थे। वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करने के लिए एक बड़ी बारात के साथ सांगानेर से आमेर जा रहे थे।
युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ गया। बारात सजी। बारात चली। रज्जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा है इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष रह गये थे। प्रेयसी से मिलने जा रहे थे। प्रेम तो तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की बात थी।
अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई फक्कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर से रज्जब को देखा।
आँख से आँख मिली। वे चार आंखें संयुक्त हो गयी। उस क्षण में क्रांति घटी। वह आदमी रज्जब के होने वाले गुरु थे—दादू दयाल जी। और जो कहा दादू दयाल जी ने वे शब्द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से शब्दों में सारी क्रांति छिपी है। दादू दयाल ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा, आँख मिली ओर दादू जी ने कहा—
"रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर
आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर"
बस इतनी सी बात। देर न लगी, रज्जब घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक दिया, दादू के पैर पकड़ लिए। और कहा कि चेता दिया समय पर चेता दिया.... और सदा के लिए दादू के हो गये छाया की तरह दादू दयाल के साथ रहे रज्जब, उनकी सेवा में !!वे चरण उसके लिए सब कुछ हो गये। उन चरणों में उसने सब पा लिया। अद्भुत प्रेमी रज्जब।
जब दादू दयाल अंतर्धान हो गये।जब उन्होंने शरीर छोड़ा, तो तुम चकित हो जाओगे…..शिष्य हो तो ऐसा हो।
रज्जब ने आँख बंद कर लीं। तो फिर कभी आँख नहीं खोली।कई वर्षों तक रज्जब जिंदारहे , दादू दयाल के मरने के बाद। लेकिन कभी आँख नहीं खोली।लोगों ने लाख समझाया ये बात ठीक नहीं है।लोग कहते कि आंखे क्यों नहीं खोलते ?तो रज्जब कहते देखने योग्य जो था उसे देख लिया, अब देखने को क्या है ? जो दर्शनीय था, उसका दर्शन कर लिया। उन आंखें में पूर्णता का सौंदर्य देख लिया। अब देखने योग्य क्या है इस संसार में !
संत दादू दयाल की एक दृष्टि मात्र से रज्जब आगे चलकर महान संत बन गए आमेर नरेश मानसिंह प्रथम के गुरु संत दादूदयालजी के शागिर्द बने रजब अली खां अंतिम समय तक दूल्हे की पोशाक पहने ही भक्ति करते रहे। सांगानेर निवासी रजब की सगाई आमेर के पठान खानदान में हुई थी। विवाह के लिए रजब बारात सजाकर आमेर आए थे। जब भी शेरवानी पुरानी होकर फटने लगे, तभी कोई शिष्य नई शेरवानी सिलवा देता।
संत दादू दयाल के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके उत्तराधिकारी गरीबदास ने एक बार रज्जब को शेरवानी उतारकर दूसरे कपड़े पहनने को कहा, लेकिन रज्जब ने पोशाक नहीं उतारी। लगभग 122 वर्ष की उम्र तक रज्जब भक्ति भाव में लीन रहे।
राम चरण दास जी ने रज्जब के बारे में दोहा लिखा है- दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रजब सा जाण। एक शब्द में उधड़ गया, रही नहीं खेंचा ताण।
संवत् 1644 के आस पास इन्होंने दादू साहब के उपदेश से विवाह का विचार त्याग दिया और विरक्त संत हो गए। इनकी तीन रचनाएँ मिलती हैं- अंग बंधू, सवंगी और वाणी। अंगबंधू में दादू जी की रचनाएँ है। इनकी वाणियों का संग्रह जो बंबई से प्रकाशित हुआ है- उसमें 5427 साखियाँ, 218 पद, 116 सवैया, 73 अरिल्ल, 79 छप्पय और फुटकल छंद है l
हाथ घड़े कूं पूजता, मोल लिए का मान।
रज्जब अघड़ अमोल की, खलक खबर नहि जान॥1॥
रज़्ज़ब जाकी चाल सों, दिल न दुखाया जाय।
जहाँ खलक खिदमत करे, उत है खुसी खुदाय॥2॥
निराकार-निर्गुण भजै, दोहा खोजे राम।
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम ॥3॥
बावन अक्षर सप्त स्वर, गल भाषा छत्तीस.।
इतने ऊपर हरि-भजन, अनअक्षर जगदीश ॥4॥
रज्जब की अरदास यह, और कहै कछु नाहिं।
यो मन लीजै हेरि, मिले न माया माहिं ॥5॥
राधास्वामी 🙏