सत्य सनातन संघ

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‎जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, तो उनकी ऊंचाई 75,000 किलोमीटर और चौड़ाई 40,000 किलोमीटर थी। पृथ्वी के आकार के हि...
25/08/2025

‎जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, तो उनकी ऊंचाई 75,000 किलोमीटर और चौड़ाई 40,000 किलोमीटर थी। पृथ्वी के आकार के हिसाब इतना कद होना जरूरी था।

‎ऐसी पौराणिक मान्यता है कि वराह अवतार में उन्होंने पृथ्वी को ब्रह्माण्ड के एक गर्भोदक नाम के सागर से उठाया था, जिसे काज्मिक ओसियन भी कहा जाता है, जिसे एक करोड़ योजन चौड़ा बताया गया है।

‎इसका अर्थ यह है कि यह सागर 1.5 करोड़ किमी चौड़ा है। इस तरह इस सागर में 1 हजार पृथ्वी समा सकती थीं। इतना विशाल महासागर है यह, हम तो केवल कल्पना कर सकते हैं।

‎इसके अलावा सवाल यह भी है कि भगवान ने वराह का ही रूप क्यों बनाया? किसी और जानवर का भी तो रूप बना सकते थे? वह क्यों नहीं?

‎इसका भी कारण था। क्योंकि वराह जंगली सूअर से मिलता जुलता प्राणी है। यह प्राणी अक्सर कीचड़ में रहता है और इसे अन्दर तक मिट्टी खोदने की आदत होती है। वह मिट्टी या पानी के अंदर की चीजों को अपनी थूथनी से खोदकर उसे ढूंढ सकता है।

‎यही कारण था, कि वे #वराह ही बने और सागर की चट्टानों के नीचे तलहटी में छुपे #हिरण्याक्ष को उन चट्टानों को खोदकर खोज निकाला और पृथ्वी को मुक्त किया।

‎भूगोल यानि जियोग्राफी को तब भी भारत में भूगोल ही कहा जाता था, जिसका अर्थ भू यानी पृथ्वी और गोल का अर्थ गोल ही होता है। यानि भारत को पहले ही पता था कि पृथ्वी गोल है।

‎दक्षिण भारत में कई ऐसे हजारों वर्ष पुराने मंदिर हैं, जहां वराह देव की मूर्ति है। उसमें पृथ्वी गोल ही है। वहीं 16 वीं शताब्दी में तो पश्चिम के रोमन कैथोलिक चर्च ने गैलीलियो को इसलिए कैद दे दी कि उन्होंने इस सिद्धांत का समर्थन किया कि पृथ्वी गोल है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।

‎खैर
‎आज वराह जयंती है। उसकी शुभकामनाएं।
‎ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः..

🪱 कैसे हुई नागों की उत्पत्ति ??〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️🚩 हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष...
29/07/2025

🪱 कैसे हुई नागों की उत्पत्ति ??
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🚩 हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग आदि नागो का वर्णन मिलता है। आज हम आपको इस लेख में इन सभी नागो के बारे में विस्तार से बताएंगे। लेकिन सबसे पहले हम आपको इन पराकर्मी नागों के पृथ्वी पर जन्म लेने से सम्बंधित पौराणिक कहानी सुनाते है।

इन नागो से सम्बंधित यह कथा पृथ्वी के आदि काल से सम्बंधित है। इसका वर्णन वेदव्यास जी ने भी महाभारत के आदि पर्व में किया है। महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन होने के कारण लोग इसे महाभारत काल की घटना समझते है, लेकिन ऐसा नहीं है। महाभारत के आदि काल में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है जो की महाभारत काल से बहुत पहले घटी थी लेकिन उन घटनाओ का संबंध किसी न किसी तरीके से महाभारत से जुड़ता है, इसलिए उनका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में किया गया है।

नागो की उत्पत्ति कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ।

पुराणों में कई नागो खासकर वासुकी, शेष, पद्म, कंबल, कार कोटक, नागेश्वर, धृतराष्ट्र, शंख पाल, कालाख्य, तक्षक, पिंगल, महा नाग आदि का काफी वर्णन मिलता है।

शेषनाग कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे। इनका एक नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी।

ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए। इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया। क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे।

वासुकि नाग धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। ये भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है। इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है। जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए। तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा।

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया। समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया। आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी। त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।

तक्षक नाग धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया।

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए। ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है।

कर्कोटक नाग कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

धृतराष्ट्र नाग धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया। ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला।

वह मणि शेषनाग के पास थी। उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था। ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया। तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली। इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए।

कालिया नाग श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ।

अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया।
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29/11/2024
⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳       *_💐🌹माँ सिद्धिदात्री🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳_⛳✍🏼नवरात्र का नौवा...
12/10/2024

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*_💐🌹शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*
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*_💐🌹माँ सिद्धिदात्री🌹💐_*
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_⛳✍🏼नवरात्र का नौवां दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है , माँ सिद्धिदात्री सुर और असुर दोनों के लिए पूजनीय हैं. जैसा कि मां के नाम से ही प्रतीत होता है मां सभी इच्छाओं और मांगों को पूरा करती हैं. ऐसा माना जाता है कि देवी का यह रूप यदि भक्तों पर प्रसन्न हो जाता है, तो उसे 26 वरदान मिलते हैं._
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*_💐🌹माँ सिद्धिदात्री 🌹💐_*
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_⛳💐नौ दिनों तक चलने वाले इस व्रत में हर तरह भक्तिमय माहौल रहा. नवरात्र नवमी के दिन सिद्धिदात्री के पूजन के साथ सफल होता है. नवमी के दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है. मां दुर्गा अपने नौवें स्वरूप में सिद्धिदात्रीके नाम से जानी जाती हैं. आदि शक्ति भगवती का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिनकी चार भुजाएं हैं. उनका आसन कमल है. दाहिनी ओर नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई ओर से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है._
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*_💐🌹कन्या पूजन 🌹💐_*
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_⛳💐 आज के दिन कन्या पूजन का विशेष विधान है.आज के दिन नौ कन्याओं को विधिवत तरीके से भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा देकर आशिर्वाद मांगा जाता है. इसके पूजन से दुख और दरिद्रता समाप्त हो जाती है. तीन कल्याणी की पूजा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.तथा लोक-परलोक में सब सुख प्राप्त होते हैं._
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*_💐🌹पूजन की विधि 🌹💐_*
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_⛳💐यूं तो सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान से करनी चाहिए लेकिन अगर ऐसा संभव ना हो सके तो आप कुछ आसान तरीकों से मां को प्रसन्न कर सकते हैं. सिद्धिदात्री की पूजा करने के लिए नवान्न का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करना चाहिए. इस प्रकार नवरात्र का समापन करने से इस संसार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है._
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*_💐🌹 देवी माँ का स्तुति मंत्र 🌹💐_*
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*_🌼🌻या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेणसंस्थिता। 🌻🌼_*
*_🌼🌻नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ 🌻🌼_*
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*_💐🌹स्तोत्र मंत्र 🌹💐_*
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*_🌸🌺कंचनाभा शंखचक्रगदामधरामुकुटोज्वलां। 🌺🌸_*
*_🌸🌺स्मेरमुखीशिवपत्नीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥ 🌺🌸_*
*_🌸🌺पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां। 🌺🌸_*
*_🌸🌺नलिनस्थितांपलिनाक्षींसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥ 🌺🌸_*
*_🌸🌺परमानंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा। 🌺🌸_*
*_🌸🌺परमशक्ति,परमभक्तिसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥ 🌺🌸_*
*_🌸🌺विश्वकतींविश्वभर्तीविश्वहतींविश्वप्रीता। 🌺🌸_*
*_🌸🌺विश्वíचताविश्वतीतासिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥ 🌺🌸_*
*_🌸🌺भुक्तिमुक्तिकारणीभक्तकष्टनिवारिणी। 🌺🌸_*
*_🌸🌺भवसागर तारिणी सिद्धिदात्रीनमोअस्तुते।। 🌺🌸_*
*_🌸🌺धर्माथकामप्रदायिनीमहामोह विनाशिनी। 🌺🌸_*
*_🌸🌺मोक्षदायिनीसिद्धिदात्रीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥ 🌺🌸_*

* #भगवा_ए_हिन्द*

⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳           *_🌼🌻शारदीय नवरात्रि विशेष 🌻🌼_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🌺🌸🌷🌺🌸🌷🌺🌸🌷🌺🌸*_🌼🌻महागौरीति चाष्टमम्🌻🌼_*🌺🌸🌷🌺🌸🌷🌺🌸🌷🌺🌸*_⛳✍🏼आदिश...
11/10/2024

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*_🌼🌻शारदीय नवरात्रि विशेष 🌻🌼_*
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*_🌼🌻महागौरीति चाष्टमम्🌻🌼_*
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*_⛳✍🏼आदिशक्ति श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। हिमालय मे तपस्या करते समय गौरी का शरीर धूल- मिट्टी से ढककर मलिन हो गया था जिसे शिवजी ने गंगा जल से मलकर धोया, तब गौरवर्ण प्राप्त हुआ था, इसीलये वे विश्व मे "महागौरी" नाम से प्रसिद्ध हुई |_

_⛳🙏मान्यता के अनुसार अपनी कठिन तपस्या से मां ने गौर वर्ण प्राप्त किया था। तभी से इन्हें उज्जवला स्वरूपा महागौरी, धन ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी त्रैलोक्य पूज्य मंगला, शारीरिक मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी का नाम दिया गया।_
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*_🌼🌻माता का स्वरूप 🌻🌼_*
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_⛳🙏देवी महागौरी के वस्त्र एवं आभूषण श्वेत है, इनकी चार भुजाए, वाहन वृषभ है | दाहिना हाथ अभय मुद्रा ओर दूसरे हाथ मे त्रिशूल है | बाए हाथ मे डमरू ओर नीचे का बाया हाथ वर मुद्रा मे है | ये सुवसानी, शांत मूर्ति ओर शांत मुद्रा है |_
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*_🌼🌻साधना 🌻🌼_*
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_⛳🙏नवरात्रि का आठवां दिन हमारे शरीर का सोमचक्रजागृत करने का दिन है। सोमचक्र उध्र्व ललाट में स्थित होता है। आठवें दिन साधना करते हुए अपना ध्यान इसी चक्रपर लगाना चाहिए।_

_⛳🙏श्री महागौरी की आराधना से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती है। मां महागौरी के प्रसन्न होने पर भक्तों को सभी सुख स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही इनकी भक्ति से हमें मन की शांति भी मिलती है।_

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*_🌼🌻ध्यान मंत्र 🌻🌼_*
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*_💐🌹श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:।🌹💐_*
*_💐🌹महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥ 🌹💐_*
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*_💐🌹माता महागौरी का ध्यान मन्त्र 🌹💐_*
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*_🌼🌻वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। 🌻🌼_*
*_🌼🌻सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥ 🌻🌼_*

*_🌼🌻पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। 🌻🌼_*
*_🌼🌻वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥ 🌻🌼_*

*_🌼🌻पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। 🌻🌼_*
*_🌼🌻मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ 🌻🌼_*

*_🌼🌻प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्। 🌻🌼_*
*_🌼🌻कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥ 🌻🌼_*
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*_💐🌹महागौरी की स्तोत्र पाठ 🌹💐_*
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*_🌸🌷सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्। 🌷🌸_*
*_🌸🌷ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥ 🌷🌸_*

*_🌸🌷सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्। 🌷🌸_*
*_🌸🌷डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥ 🌷🌸_*

*_🌸🌷त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्। 🌷🌸_*
*_🌸🌷वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥ 🌷🌸_*
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*_💐🌹माता महागौरी की कवच 🌹💐_*
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*_⛳🕉ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो। 🕉⛳_*
*_⛳🕉क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥ 🕉⛳_*

*_⛳🕉ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो। 🕉⛳_*
*_⛳🕉कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥ 🕉⛳_*

*_⛳🙏देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए. 🙏⛳*
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*_💐🌹महागौरी कथा 🌹💐_*
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_⛳💐देवी पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं._
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_⛳💐इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौरवर्ण का वरदान देते हैं._
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_⛳💐एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा.महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं._
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_⛳💐देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वहकाफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस परबहुत दया आती है, और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं._

* #भगवा_ए_हिन्द*

⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹माँ कालरात्रि 🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳_⛳✍🏼नवरात्र के सातव...
10/10/2024

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*_💐🌹शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*
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*_💐🌹माँ कालरात्रि 🌹💐_*
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_⛳✍🏼नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि रूप की पूजा की जाती है._

_⛳🙏शास्‍त्रों के अनुसार बुरी शक्तियों से पृथ्‍वी को बचाने और पाप को फैलने से रोकने के लिए मां ने अपने तेज से इस रूप को उत्‍पन्‍न किया था._

_⛳🙏माँ दुर्गा जी का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि है. इनका रंग काला होने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहा गया और असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था. इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें 'शुभंकारी' भी कहते हैं._

_⛳🙏मान्यता है कि माता कालरात्रि की पूजा करने से मनुष्य समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है. माता कालरात्रि पराशक्तियों (काला जादू) की साधना करने वाले जातकों के बीच बेहद प्रसिद्ध हैं. मां की भक्ति से दुष्टों का नाश होता है और ग्रह बाधाएं दूर हो जाती हैं._
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*_⛳🙏असुरों को वध करने के लिए दुर्गा मां बनी कालरात्रि ~_*
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_⛳💐देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है इनके बाल बिखरे हुए हैं और इनके गले में विधुत की माला है. इनके चार हाथ हैं जिसमें इन्होंने एक हाथ में कटार और एक हाथ में लोहे का कांटा धारण किया हुआ है. इसके अलावा इनके दो हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है. इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है. कालरात्रि का वाहन गर्दभ(गधा) है._
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*_⛳🙏मां कालरात्रि की उत्पत्ति की कथा 🙏⛳_*
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_⛳💐कथा के अनुसार दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था. इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए._

_⛳💐 शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा. शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया. परंतु जैसे ही दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए._

_⛳💐 इसे देख दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया. इसके बाद जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया_
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*_⛳🕉ॐ श्री गणेशाय नम: 🕉⛳_*

*_🌺ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।🌺_*
*_🌺दुर्गा क्षमा शिवा। धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते॥ 🌺_*

*_🌺जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि । 🌺_*
*_🌺जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते ॥ 🌺_*

*_🌺धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी 🌺_*
*_🌺 क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥ 🌺_*

*_🌺 या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता 🌺_*
*_🌺नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 🌺_*
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*_💐🌹बीज मंत्र 🌹💐_*
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*_🌷ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।🌷_*
_( तीन, सात या ग्यारह माला करें)_
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*_💐🌹माँ कालरात्रि 🌹💐_*
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*_🌻एकवेणी जपाकर्णपुरा नग्ना खरास्थिता। 🌻_*
*_🌻लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यशरीरिणी॥ 🌻_*
*_🌻वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। 🌻_*
*_🌻वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिभर्यङ्करी ॥ 🌻_*
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*_💐🌹 ध्यान 🌹💐_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺
*_🌼करालवदनां घोरांमुक्तकेशींचतुर्भुजाम्।। 🌼_*
*_🌼कालरात्रिंकरालिंकादिव्यांविद्युत्मालाविभूषिताम्॥ 🌼_*
*_🌼दिव्य लौहवज्रखड्ग वामाघो‌र्ध्वकराम्बुजाम्। 🌼_*
*_🌼अभयंवरदांचैवदक्षिणोध्र्वाघ:पाणिकाम्॥ 🌼_*
*_🌼महामेघप्रभांश्यामांतथा चैपगर्दभारूढां। 🌼_*
*_🌼घोरदंष्टाकारालास्यांपीनोन्नतपयोधराम्॥ 🌼_*
*_🌼सुख प्रसन्न वदनास्मेरानसरोरूहाम्। 🌼_*

*_(एवं )_*

*_🌼संचियन्तयेत्कालरात्रिंसर्वकामसमृद्धिधदाम्॥ 🌼_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺
*_💐🌹स्तोत्र 🌹💐_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺
*_🌸हीं कालरात्रि श्रींकराली चक्लींकल्याणी कलावती। 🌸_*
*_🌸कालमाताकलिदर्पध्नीकमदींशकृपन्विता॥ 🌸_*
*_🌸कामबीजजपान्दाकमबीजस्वरूपिणी। 🌸_*
*_🌸कुमतिघनी कुलीनार्तिनशिनीकुल कामिनी॥ 🌸_*
*_🌸क्लींहीं श्रींमंत्रवर्णेनकालकण्टकघातिनी। 🌸_*
*_🌸कृपामयीकृपाधाराकृपापाराकृपागमा॥ 🌸_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺
*_💐🌹कवच 🌹💐_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺
*_🌼🌻ॐ क्लींमें हदयंपातुपादौश्रींकालरात्रि। 🌻🌼_*
*_🌼🌻ललाटेसततंपातुदुष्टग्रहनिवारिणी॥🌼🌻_*
*_🌼🌻रसनांपातुकौमारी भैरवी चक्षुणोर्मम🌻🌼_*
*_🌼🌻कहौपृष्ठेमहेशानीकर्णोशंकरभामिनी।🌻🌼_*
*_🌼🌻वíजतानितुस्थानाभियानिचकवचेनहि।🌻🌼_*
*_🌼🌻तानिसर्वाणिमें देवी सततंपातुस्तम्भिनी॥🌻🌼_*
🌺🌸🌼🌻💐🌺🌼🌻🌸💐🌺

* #भगवा_ए_हिन्द

⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹माता कात्यायनी 🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳_⛳✍🏼 माँ दुर्गा क...
08/10/2024

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*_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*
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*_💐🌹माता कात्यायनी 🌹💐_*
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_⛳✍🏼 माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है._

_⛳🙏महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं. महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया._

_⛳🙏देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं._

_⛳🙏 देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है._

*_💐🌹माता का स्वरूप 🌹💐_*

_⛳🙏माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है.यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं. इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है._

*_💐🌹माँ कात्यायनी की पूजा विधि 🌹💐_*

_⛳🙏जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के छठे दिन माँ कात्यायनी जी की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए. माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है._

_⛳🙏दुर्गा पूजा के छठे दिन भी सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है. पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है ||_

*_💐🌹देवी कात्यायनी के मंत्र 🌹💐_*

*_⛳🕉चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना। 🕉⛳_*
*_⛳🕉कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।। 🕉⛳_*

*_⛳🕉या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। 🕉⛳_*
*_⛳🕉नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 🕉⛳_*

*_💐🌹माता कात्यायनी की ध्यान 🌹💐_*

*_⛳🕉वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।_*
*_सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥_*

*_स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।_*
*_वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥_*

*_पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।_*
*_मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥_*

*_प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।_*
*_कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥_*

*_💐🌹माता कात्यायनी की स्तोत्र पाठ 🌹💐_*

*_कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।_*
*_स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥_*

*_पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।_*
*_सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥_*

*_परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।_*
*_परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥_*

*_💐🌹देवी कात्यायनी की कवच 🌹💐_*

*_कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।_*
*_ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥_*
*_कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥_*
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* #भगवा_ए_हिन्द*

⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳          *_💐🌹जय माँ कूष्माण्डा🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳_⛳शारदीय नवरात...
06/10/2024

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*_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*
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*_💐🌹जय माँ कूष्माण्डा🌹💐_*
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_⛳शारदीय नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कुष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है।_

_⛳ इस दिन साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और चंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।_

_⛳जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।_

_⛳इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।_
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*_💐🌹🌸 श्लोक 🌸🌹💐_*
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*_🌹सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।🌹_*
*_🌹दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥ 🌹_*
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*_💐🌸🌹महिमा🌹🌸💐_*
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_⛳माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।_

_⛳विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।_

_⛳माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।_
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*_💐🌸🌹उपासना 🌹🌸💐_*
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_⛳चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है।प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।_
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*_🌼🌻या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।_*
*_नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।'🌻🌼_*
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_⛳हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।_

_⛳अपनी मंद, हल्की हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी माँ कूष्माण्डा कहलाती हैं।_
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*_⛳🌹पूजन 🌹⛳_*
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_⛳इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।_
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जय माता दी

अखण्ड हिन्दू राष्ट्रम

⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳         *_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳           *_⛳🕉 माँ चंद्रघंटा 🕉⛳_*⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳_⛳✍🏼शारदीय नवरा...
05/10/2024

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*_💐🌹 शारदीय नवरात्र विशेष🌹💐_*
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*_⛳🕉 माँ चंद्रघंटा 🕉⛳_*
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_⛳✍🏼शारदीय नवरात्र पर्व के तीसरे दिन आज माँ चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जा रही है।_
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*_🌹💐पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।_*
*_प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥💐🌹_*
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_⛳🙏देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳🙏सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳🙏 नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳🙏 इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए।इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। यह देवी कल्याणकारी है।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳🙏 इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं।_
🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺
_⛳🙏नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है।

जय माता दी

जयतु हिन्दू राष्ट्रम

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