17/01/2026
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐रेत का कण और पर्वत💐💐*
एक बार की बात है।
रेगिस्तान में खड़ा था एक विशाल, अडिग पर्वत। सदियों से वह धूप, आँधी और बारिश झेलता आ रहा था। उसके चरणों में असंख्य रेत के कण बिखरे पड़े थे।
एक दिन हवा के साथ उड़ता हुआ रेत का एक छोटा-सा कण आकर पर्वत की चोटी पर टिक गया।
उसे लगा मानो उसने कोई महान उपलब्धि पा ली हो।
रेत का कण अकड़कर बोला—
“पर्वत जी! अगर मेरे बैठने से आपको ज़रा भी बोझ महसूस हो तो बताइएगा, मैं हट जाऊँगा।”
पर्वत मौन रहा।
रेत का कण समझा— शायद पर्वत मेरी महानता से अभिभूत है।
थोड़ी देर बाद तेज़ आँधी चली।
रेत का कण डर गया और बोला—
“देखिए! हम दोनों यहाँ खड़े हैं, कहीं आप गिर न जाएँ।
अगर संकट आए तो मुझे बता देना, मैं उड़कर सुरक्षित जगह चला जाऊँगा।”
पर्वत अब भी शांत था।
न कोई उत्तर, न कोई प्रतिक्रिया।
कुछ समय बाद हवा थम गई।
रेत के कण के जाने का समय आ गया।
वह बोला—
“पर्वत जी! आपके साथ समय बिताकर बड़ा आनंद आया।
हम दोनों की मित्रता यादगार रहेगी।
कभी ज़रूरत हो तो याद करिएगा।”
इस बार पर्वत ने धीरे से कहा—
“क्षमा करना,
तुम कौन हो—मुझे पता ही नहीं चला।
कब आए, कब ठहरे, कब उड़ गए—
इसका मुझे कोई आभास तक नहीं हुआ।”
रेत का कण हवा में विलीन हो गया।
तभी एक साधु वहाँ से गुज़रे और बोले—
“मनुष्य भी ऐसा ही है।
इस विशाल ब्रह्मांड में अपने अस्तित्व को लेकर
वह उतना ही शोर करता है,
जितना वह वास्तव में है ही नहीं।”
हम चाहते हैं कि कोई हमें देखे,
माने, सराहे, स्वीकार करे।
इसी चाह में अहंकार जन्म लेता है।
जबकि सत्य यह है—
हम मिट्टी से बने हैं
और मिट्टी में ही मिल जाने वाले हैं।
जिस दिन यह समझ आ जाए
कि परमात्मा का अंश आत्मा ही वास्तविक है,
उस दिन झूठा अहंकार स्वतः गिर जाता है
और जीवन में विनम्रता, शांति और सम्मान बस जाता है।
*💐शिक्षा💐*
जो स्वयं में संतुष्ट है, उसे प्रमाण की ज़रूरत नहीं।
अहंकार ध्यान चाहता है,
लेकिन आत्मा मौन में ही पूर्ण है।
जो प्राप्त है—वही पर्याप्त है।