03/02/2026
"आस्था का दुरुपयोग - इंसान के टूटने का सबसे बड़ा कारण"
कई लोग समाधान की तलाश में
आस्था के सहारे आगे बढ़ते हैं,
और अज्ञानता के चक्र में फँसकर
"पैसा, समय और विश्वास-तीनों" खो बैठते हैं।
सबसे पीड़ा की बात यह नहीं कि
पैसा बर्बाद हो गया,
बड़ी पीड़ा की बात यह है कि
उसके बाद "समस्याएँ और बढ़ जाती हैं"।
अधूरी जानकारी में किए गए
आधे-अधूरे उपाय,
गलत मार्गदर्शन में की गई क्रियाएँ-
समस्या को सुलझाती नहीं,
उसे "जटिल रूप" दे देती हैं।
ऐसे समय घबराना नहीं चाहिए।
क्योंकि जब तक गलत सामने नहीं आता,
"सही की पहचान भी नहीं होती"।
सही और गलत का भेद
सुनकर नहीं,
समझ विकसित होने पर होता है।
और समझ तभी आती है
जब देखने की क्षमता हो,
विवेक हो,
और "पूर्ण ज्ञान की दिशा में चलने का साहस" हो।
याद रखिए-
आस्था का अर्थ समर्पण है,
पर विवेक त्याग देना
आस्था नहीं होती।
यहीं से फर्क शुरू होता है।
जहाँ व्यक्ति डर से नहीं,
"समझ से निर्णय लेना सीखता है।"
जब गलत सामने आता है तभी समझ जन्म लेती है,
और समझ आ जाए…
तो फिर सही आपको ढूँढना नहीं पड़ता,
सही खुद चलकर आता है।
🙏 "जय माता जी की" 🙏
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नोट: ऑनलाइन शक्ति-स्थानांतरण, वशीकरण, मारण, उच्चाटन जैसे नकारात्मक कर्म नहीं किए जाते। ऐसी अपेक्षा रखकर अपना व हमारा समय व्यर्थ न करें। विश्वास के बिना कोई भी कार्य फलित नहीं होता अतः जो भी करें, पूर्ण विश्वास के साथ करें।
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