Shri LaxmiNarayan Devsthan - Ahilyanagar

Shri LaxmiNarayan Devsthan - Ahilyanagar उत्तर अहोबिल श्री झालरिया मठ, डीडवाना (राजस्थान) का महाराष्ट्र प्रांत का प्रमुख प्राचीन देवस्थान
(1)

महिमा भारी तिलक की, को कर सके बखान ।आप तिलक को मानिये, स्वयं श्रीमन्नारायण भगवान् ॥जिसके माथे पर तिलक, की होतीं हैं छाप ...
14/04/2023

महिमा भारी तिलक की, को कर सके बखान ।
आप तिलक को मानिये, स्वयं श्रीमन्नारायण भगवान् ॥

जिसके माथे पर तिलक, की होतीं हैं छाप ।
भूत प्रेत ही दूर से, भाग जाते चुपचाप ॥

माथे की शोभा तिलक, तिलक हमारी शान ।
बिना तिलक माथा लगे, बिल्कुल ही सुनसान ॥

तिलक करें परिवार को, शक्ति और शांति प्रदान ।
आप स्वयं लगाकर देखिये, हो जाये कल्याण ॥

तन मन को शीतल करें, ये चंदन की छाप ।
कट जाते हैं लगाते, जन्म-जन्म के पाप ॥

तिलक लगाने से मिलें, बुद्धि ज्ञान सम्मान ।
तिलक हमारे धर्म की, होतीं हैं पहचान ॥

श्री वैष्णव जन के तिलक में, साक्षात श्री लक्ष्मीनारायण का निवास ।
इसीलिये हैं तिलक की, महिमा सबसे खास ॥

बिना तिलक होता नहीं, कोई पूजा पाठ ।
तिलक लगायें आप सब, सदा रहेंगा ठाठ ॥

धनुर्मास उत्सव प्रतिवर्ष 16/17 दिसम्बर से 14/15 जनवरी तक 30 दिनों तक बड़े हीं धूमधाम से मनाया जाता हैं और 27 वें दिवस पर...
11/01/2023

धनुर्मास उत्सव प्रतिवर्ष 16/17 दिसम्बर से 14/15 जनवरी तक 30 दिनों तक बड़े हीं धूमधाम से मनाया जाता हैं और 27 वें दिवस पर श्री गोदाम्बा देवी जी का कल्याणोत्सव होता हैं। श्री गोदाम्बा जी का कल्याणोत्सव (विवाहोत्सव) दाक्षिणात्य तथा उत्तर भारतीय श्री रामानुज संप्रदाय के दिव्यदेश (मंदिर/देवालय) में बहुत ही भव्यता से ५ दिनों तक मनाया जाता हैं। पाँचवे दिन उनका विवाह श्री कृष्ण रूपी भगवान् श्री रंगनाथ के साथ होता हैं। भगवान् श्री कृष्ण को प्राप्त करने हेतु श्री गोदा जी एक महीने का धनुर्मास व्रत रखती हैं जिसमें वह अपनी सब सखियों के साथ प्रण करतीं हैं की वे सब सुबह सुबह स्नान करेंगी, दूध दही, घी का वर्जन करेंगी, वेणी में पुष्प नहीं गूंथेंगी, काजल नहीं लगाएँगी, दुर्वचन नहीं कहेंगी, अकृत्य नहीं करेंगी, एक माह के अंतिम पाँच दिन प्रति दिन वह श्री वटपत्रशायी भगवान् से प्रार्थना करतीं हैं कि, हे मेघश्याम भगवान् इस व्रत के फलस्वरूप जो विवाह की कामना मैंने की हैं उसे पूर्ण करें और उसके लिए मुझे अपना पाँचजन्य शंख, आपकी स्तुति के लिए मंगल वाद्य, वेदपाठी ब्राह्मण, मंगल दीपक और मंडप में बांधने वाला वितान प्रदान करें भगवान् श्री कृष्ण उनकी सारी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं और विवाह के मंगल सूचक पाँचजन्य शंख , हल्दी, चंदन, पान सुपारी, माला, आभूषण इत्यादि भेंट करते हैं । सब मंगल सूचक संसाधनों को लेकर गोदाम्बा जी भगवान् की स्तुति करती हुई परिक्रमा करती हैं और मंडप में उन पर हल्दी चढ़ाई जातीं हैं, सुवासित केश तेल, चंदन, फूल इत्यादि के साथ विभिन्न तरह के केश विन्यास सजाए जातें हैं और उनका तिरुमंजन (अभिषेक) होता हैं। पाँचवें दिन उनका विवाह बहुत धूम धाम के साथ माला की अदला-बदली और वैदिक मंत्रों के साथ अग्नि को साक्षी बनाकर सात फेरे लेकर श्री कृष्ण स्वरूप भगवान् श्री रंगमन्नार के साथ में होता हैं, इस वर्ष कल्याणोत्सव (विवाहोत्सव) 12 जनवरी 2023 को हैं ।

गुरु कृपा ही केवलं 🙏
14/06/2022

गुरु कृपा ही केवलं 🙏

झालरों के स्वत: बजने से मंदिर का नाम हुआ श्री झालरिया मठ :-राजस्थान में उपकाशी के नाम से विख्यात डीडवाना वैसे तो तपस्वी ...
03/05/2022

झालरों के स्वत: बजने से मंदिर का नाम हुआ श्री झालरिया मठ :-

राजस्थान में उपकाशी के नाम से विख्यात डीडवाना वैसे तो तपस्वी एवं सिद्ध पुरुषों का स्थान माना जाता है। साथ ही यहां के मठों की गुरु परंपरा की कीर्ति भी चारों ओर फैली हुई हैं। गुरु परंपरा की दृष्टि से नगर का श्री झालरिया मठ सर्वश्रेष्ठ हैं। यह मठ उन बिरले स्थानों में से एक हैं जहां माता सीता भगवान् राम के बाएं भाग की ओर होकर दाहिने भाग में विराजमान हैं। इस मठ के शिष्य भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैले हुए है।

गुरु परंपरा से युक्त है मठ का इतिहास :-

श्री रामानुज संप्रदाय से संबंधित इस मठ का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना हैं, जिसका सहस्त्राब्दी दिवस सन 2016 में मनाया गया। प्राचीन समय में इसे बड़ा श्री जानकीनाथ का मंदिर के नाम से जाना जाता था। सन 1991 में इस मठ का सहस्त्राब्दी महोत्सव मनाया गया। इस मंदिर में भगवान् श्री जानकीवल्लभ के अर्चावतार विग्रह की स्थापना संवत 1253 में हुई थी एवं संवत 1603 में वशिष्ट गोत्रीय आचार्य हरिरामाचार्य महाराज ने “अक्षय तृतीया” के दिन आचार्य गद्दी पीठ की स्थापना की। हरिरामाचार्य महाराज के 152 वर्ष की अवस्था में वैंकुण्ठवास के पश्चात गुरु परंपरा में तुलसीरामाचार्य, कुलशेखराचार्य, सुन्दरामाचार्य, शठकोपाचार्य, नृसिंहचार्य महाराज जैसे तपस्वी मठाधीश्वर हुए। हरिरामाचार्य महाराज के बाद इस स्थान का पूरे देश में प्रसार घनश्यामाचार्य महाराज (प्रथम) के समय में हुआ। उन्होंने इस मठ की शाखा के रूप में ग्वालियर, अयोध्या, उज्जैन आदि स्थानों पर मंदिरों का निर्माण करवाया। जानकारी अनुसार संवत 1956 में बालमुकन्दाचार्य महाराज गद्दी पर विराजमान हुए। इनके उत्तराधिकारी आचार्य वीरराघवाचार्य महाराज थे। इनके बाद गद्दी पर स्वामी श्रीधराचार्य विराजे। वर्तमान में घनश्यामाचार्य महाराज इस मठ की गद्दी पर विराजमान है।

द्वार पर मत्था टेक फतेहपुर लोट गया था नवाब :-

संवत 1603 में मुगल शासन के समय यहां के मंदिरों में घंटा-घड़ियाल बजाने पर पाबंदी थी। उस समय हरिरामाचार्य महाराज मठाधीश्वर थे। उनकी तपस्या के कारण शाम की आरती के समय स्वत: ही घंटा-घड़ियाल बजने लग जाते थे। आदेशों के उल्लंघन को देख फतेहपुर शेखावाटी का नवाब डीडवाना आए जैसे ही श्री जानकीनाथ के मंदिर के द्वार पर पहुंचे। उसी समय द्वार पर ही उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गई। इधर मंदिर में अपने आप ही झालरे स्वयं बजने लगी। इस चमत्कार को देख नवाब आश्चर्यचकित रहे एवं द्वार पर ही मत्था टेककर फतेहपुर रवाना हो गए। तब से बड़े श्री जानकीनाथ के मंदिर को झालरिया मठ के नाम से जाना जाने लगा।

श्री उत्तर अहोबिल झालरिया मठ (बड़ा स्थान) डीडवाना के परम्परा अनुसरण करने वाले शाखा स्थान :-

१) श्री सीताराम मन्दिर (झालरिया वाला), ग्वालियर
२) श्री लक्ष्मीनारायण देवस्थान, अहमदनगर
३) श्री वैकुण्ठनाथ देवस्थान, कोलकाता
४) श्री वैंकटेश मन्दिर, इचलकरंजी
५) श्री गोपालकृष्ण मन्दिर, भिवण्डी
६) श्री महालक्ष्मी मन्दिर, पूना
७) श्री वैंकटेश बालाजी मन्दिर, राहुरी
८) श्री बालाजी मन्दिर, लासलगांव
९) श्री बालाजी मन्दिर, मालेगाँव
१०) श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर, पूना
११) श्री वैंकटेश देवस्थान, नागपुर
१२) श्री लक्ष्मी वैंकटेश मन्दिर, वरंगल
१३) श्री मारवाड़ी हनुमान मन्दिर, करीमनगर
१४) श्री वैंकटेश मन्दिर, जीरापुर
१५) श्री सिद्धि वैंकटेश मन्दिर, जलगाँव
१६) श्री तिरुपति बालाजी वैंकटेश देवस्थान, इंदौर
१७) श्री सीताराम मन्दिर, सीलनबाद
१८) श्री रमा वैकुण्ठ मन्दिर, पुष्कर
१९) श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर, कोटपूतली
२०) श्री संकटमोचन हनुमान मन्दिर, कोटपूतली
२१) श्री दास हनुमान देवस्थान, चित्रकूट धाम
२२) श्री वैंकटेश मन्दिर, अयोध्या धाम
२३) श्री बालमुकुन्द आश्रम, नैमिषारण्य
२४) श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर, चन्द्रावती गंज
२५) श्री वैंकटेश मन्दिर, डेगाना
२६) श्री स्वयं वयक्त विष्णु मन्दिर, रुपनगर (नेपाल)
२७) श्री हनुमान मन्दिर, राजविराज (नेपाल)
२८) श्री वैंकटेश मन्दिर, हरिद्वार
२९) श्री राम जानकी मन्दिर, कोलारस
३०) श्री वैंकटेश देवस्थान, बैल्लारी
३१) बालमुकुन्द आश्रम (झालरिया मठ), उज्जैन
३२) श्री लक्ष्मणबाग देवस्थान, पंढरपुर
३३) श्री सीताराम मन्दिर, शाजापुर
३४) श्री सीताराम मन्दिर, बरेली

सादर जय श्रीमन्नारायण 🙏भगवान् वेंकटेशजी को समर्पित होने वाले नैवैद्य।  सनातन वैदिक शास्त्रानुसार प्राण प्रतिष्ठित भगवान ...
17/07/2021

सादर जय श्रीमन्नारायण 🙏
भगवान् वेंकटेशजी को समर्पित होने वाले नैवैद्य।
सनातन वैदिक शास्त्रानुसार प्राण प्रतिष्ठित भगवान के श्रीविग्रह को जीवित इकाई माना जाता है। उनके विविध प्रकार से उपचार संपन्न किये जाते है । नैवैद्य समर्पण उन्ही उपचारों में एक है। नैवैद्य संस्कृत शब्द है, और भगवान् को समर्पित विविध प्रसाद नैवैद्य कहलाते है।
भगवान तिरुमलेश के यहाँ वैखानस आगमानुसार सारे उपचार याने पूजा, अर्चन, तिरुमंजन , उत्सव और नैवैद्य समर्पित किये जाते है।
अनादि काल से चली आ रही ,आगम सिद्धांतो अनुसार व्यवस्था , आज भी भगवान् के उपचार और नैवैद्य समर्पण, बिना कोई बदलाव के वैखानस आगमानुसार निर्वहन किये जाते है।
वैखानस आगम अनुसार, नैवैद्य बनाने के लिये नियम और समय का पालन अति आवश्यक है।
वैखानस आगमानुसार नैवैद्य बनाने के लिये , स्वर्ण , रजत या माटी के बर्तन की आवश्यकता जरुरी है, यह बनाने के लिये लकड़ी आम की , पीपल की या पलाश की होनी चाहिये। भगवान के इस चूल्हे में अग्नि यज्ञशाला से आनी चाहिये।
पर वर्तमान में कालांतर में आये बदलाव को देखते इन नियमो में भी बदलाव आया है। इन्हें भी कुछ सुगम बनाये है।
नित्य प्रातः वैदिक मन्त्रों से उत्थापन (मन्त्रासनम) , पश्चात स्नान (स्नानासनम) , पश्चात भगवान का कोलुवु (यात्रासनम) उपचार ( जो प्रातः की अर्चना के अंग है) संपन्न होने के बाद प्रातः का नैवैद्य समर्पित होता है, जिसे भोजयासन कहते है। भगवान् की यह पाकशाला रात्रि शयन प्रसाद के बाद बंद हो जाती है , और प्रातः खुलती है । भगवान् तिरुमलेश के अर्चन के बाद रसोइये पाकशाला में आते है, और नैवैद्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भगवान् को नैवैद्य समर्पण के पहले गर्भगृह की सफाई कर शुद्धि की जाती है ।
प्रातः बने नैवैद्य समर्पण के पहले अर्चक भगवान को विष्णु गायत्री मंत्र निवेदन करते है ।
भगवान् तिरुवेंगड़म को मुख्य निवेदित भोग -
१ बालभोग , २. राज भोग और ३. शयन भोग है। नित्य के इन तीन भोगों के साथ विशेष अवसरों पर , विशेष नवैद्य भी निवेदित किये जाते है।

नित्य तिरुमलेश की सुप्रभात सेवा में, भगवान को ताजा केसर इलाची युक्त, गाय का गुनगुना गर्म दूध , मक्खन (नवनीत) जिसे "दर्शन गौ क्षीरम" कहते है निवेदित किया जाता है । इसके बाद तोमाल सेवा होती है ।
तोमाल सेवा के बाद भोग श्रीनिवास विग्रह के सामने "कोलुवु" ( यात्रासनम) सेवा संपन्न होती है, जिसमे भगवान श्रीनिवास को पंचांग, और दिन भर में होने वाले उत्सवों की जानकारी पढ़कर सुनाई जाती है, साथ ही पिछले दिन की आवक भी बतलायी जाती है, (यह सेवा मंदिर की एकांतिक सेवा है), इस सेवा के बाद भगवान को , गुड़ , काळा तिल और सुखी अदरक का भोग निवेदन किया जाता है ।
इसके बाद सहस्त्रनाम अर्चना सेवा होती है, पश्चात बाल भोग निवेदित होता है। इसके साथ ही प्रातः काल की आराधना संपन्न हो जाती है ।
सुबह के सर्व दर्शन के बाद भगवान को राज भोग अष्टोत्तर शतनाम अर्चना के साथ निवेदित होता है । सायंकालीन आराधना के पहले फिर से गर्भगृह की सफाई की जाती है , भगवान श्रीनिवासजी का ताजे फूलों से श्रृंगार किया जाता है । शयन भोग के बाद भगवान को मध्य रात्रि का नैवैद्य निवेदित किया जाता है , जिसे ‘तिरुवीसम ’ कहते है । इस तिरुवीसम में नैवैद्य सफ़ेद सादे चांवल, और गुड़ के चांवल का भोग होता है ।
इसके बाद एकांत सेवा में भगवान वेंकटेशजी को ताजा केसर इलाची युक्त, गाय का निवाया गर्म दूध,फल और घी में सेके हुये सूखे मेवे का भोग लगता है ।
भगवान तिरुमलेश के बाल भोग, राज भोग और शयन भोग में नाना प्रकार के अन्नप्रासद निवेदित किये जाते है ।
हर भोग के पहले मंदिर में विशेष प्रकार से घंटा वादन होता है , जो तिरुमलै में, भगवान को भोग निवेदन की स्पष्ट सुचना होती है ।
पहले घंटा वादन के बाद ,भगवान् को बाल भोग में ,यह अन्नप्रासद निवेदित होते है १. मात्राअन्नम, , २. मुद्गाअन्नम (घी पोंगल), ३.तिंत्रिणिरसअन्नम (इमली के चांवल / पुलिहोरा), ४. दध्योदनं (दही के चांवल ), ५. गुड़अन्नम (गुड़ के चांवल ,शकरा पोंगल), ६. शाकअन्नम (कदम्ब भात), और ७. शक्करअन्नम (रावकेसरी )। इनके साथ ही भगवान को ४ अन्य प्रसाद और एक विशेष प्रसाद भी निवेदित किया जाता है १. पन्यारमुलु ( सुगन्धित स्वादिष्ट व्यंजन , १. माशअप्पम (वड़ा), २. लड्डू ४ .गुडप्पम (अप्पम ), और ४.चकरप्पम (डोसा)।.
दूसरे घंटा वादन के बाद राज भोग में निवेदित अन्नप्रासद यह है १. शुद्धअन्नम (सादे सफ़ेद चांवल ), २. पुलिहोरा , ३. गुड़अन्नम , ४.दध्योदनं ,और ५.सीरा या सक्कारभात। .
तीसरे घंटा वादन के बाद शयन भोग में यह अन्नप्रासद रहते है १. मरीच्यांणम ( कालीमिर्च के चांवल ) २.चकरप्पम , ३.डोसा , ४.लड्डू ५. मशापपं , और ६. शक्करअन्नम ।
सप्ताह की विशेष पूजा के समय भगवान को विशेष भोग निवेदित होते है।
सोमवार विशेष पूजा को देखते हुये १. ५१ बडे दोसे, २. ५१ छोटे दोसे, ३. ५१ बड़े अप्पम और ४. १०२ छोटे अप्पम नित्य नैवेद्य के साथ निवेदित होते है।
मंगलवार को अष्टदलपादपद्मार्धना जो प्रातः ही होती है नित्य नैवेद्य के साथ मात्राअन्नम निवेदित होते है।
बुधवार को सहस्त्रकालशाभिषेक सेवा होती है, विशेषतः नित्य नैवेद्य के साथ १. पायसम (रायता) और २. मूंग दाल निवेदित होती है।
गुरुवार को तिरुप्पा वडा सेवा होती है, नित्य नैवेद्य के साथ विशेषतः १. जलेबी , २. मुरुकुल और ३. पायसम (रायता) निवेदित होता है।
शुक्रवार को भगवान के मूल विग्रह का अभिषेक होता है, नित्य नैवेद्य के साथ विशेषतः भगवान को पोली निवेदित होती है।
शनिवार और रविवार को नित्य नैवेद्य निवेदित होते है।

भगवान् वेंकटेशजी को निवेदित होने वाले सरे नैवैद्य मंदिर परिसर के अंदर बानी पाकशाला में ही बनते है।
यहाँ प्रसाद के रूप में वितरित होने वाले लड्डू ३ प्रकार के बनते है:
लड्डू बनाने में प्रयोग लाये जाने वाले सामान और उनकी मात्रा की सूचि को "डिट्टम" कहते है। लड्डू की बढ़ती खपत को देखते हुJये, इस सूचि को अब तक के इतिहास में ६ बार संशोघन किया गया है।वर्तमान में इस "डिट्टम" के अनुसार जो सामान है वह इस प्रकार है , १ बेसन , २ काजू, ३. इलाइची , ४. घी , ५. शक्कर, ६. मोटी मिश्री , और ७. किशमिश ।
नित्य लगभग अंदाजन ५ टन याने ५ x १००० - ५००० किलो १. बेसन , २. ५००० किलो शक्कर , ३. ७०० किलो काजू , ४. १५० किलो इलाइची , ५. ५०० किलो घी, ६. ५०० किलो मोटी मिश्री और ७. ७५० किलो किशमिश।
लड्डू बनाने की जगह को लड्डू पोट्टु कहते है , यह पहले मंदिर परिसर के अंदर संपंगी प्रदक्षिणा में थी , अब मंदिर परिसर के बहार भी एक इकाई है।
इस लड्डू पोट्टु में लगभग ६२० रसोइये कार्य करते है। इनमे २४७ मुख्य रसोइये है।
१. प्रोक्तम लड्डू , यह लड्डू छोटे होते है , इनका वजन १७५ ग्राम का होता है। यह लड्डू, यहाँ आकर भगवान के दर्शन के बाद टोकन पर शुल्कानुसार सभी भक्तों को दिए जाते है।
२. अस्थानम लड्डू , यह लड्डू विशेष उत्सवों और पर्व पर ही बनाये जाते है , इनमे काजू कुछ अधिक मात्रा में होते है , साथ ही इनमे बादाम , और केसर की पंखुड़ियां भी होती है, इन लड्डुओं का वजन ७५० ग्राम होता है।
३. कल्याण उत्सव लड्डू , यह लड्डू भगवान् के कल्याण उत्सव और कुछ अन्य विशेष उत्सवों के यजमनो को दिये जाते है । यह लड्डू १५ दिन तक ख़राब नहीं होते।

इस संकलित लेख में दी गयी / प्रेषित जानकारी में कोई त्रुटि हो तो लेखक क्षमा प्रार्थी है।

गुरु के अनमोल वचन -क्या कभी हमने सोचा हम कहाँ से आये, क्या माँ के पेट से ?? तो बताइये, वहाँ कौन लाया, वहाँ पोषण किसने कि...
09/12/2020

गुरु के अनमोल वचन -

क्या कभी हमने सोचा हम कहाँ से आये, क्या माँ के पेट से ?? तो बताइये, वहाँ कौन लाया, वहाँ पोषण किसने किया, वहाँ सम्भाल किसने की ? हर पल श्वासें किस ने दीं ??

माँ के पेट से बाहर आते ही हम भगवान् को तो भूल गए, हमने यहीं सारे रिश्ते बना लिए, संसार को अपना मान लिया, अपने आप को कर्ता मान लिया और फँस गए, तभी तो रोते हैं ।

कभी विचार किया, रात में कौन हमें सुख की नींद सुलाता हैं ? हर दिन एक नया सवेरा कौन दे देता हैं ? भोजन कौन दे रहा हैं ? कौन पचा रहा हैं ? हर अंग के संग कौन हैं ?

गुरु याद दिलाते हैं कि हम भगवान् से आये हैं । भगवान् ही हमारे अपने हैं तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम भगवान् से जुड़ें । जब तक फ़िर से उनसे नहीं जुड़ेंगे, चैन नहीं आयेगा । भगवान् के श्री चरणों की शरण हो जायें और अपनी अहमता बदल दें । मैं भगवान् का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं ।

हम तो यह सत्य रोज़ रोज़ भूल जाते हैं परंतु भगवान् कभी नहीं भूलते । कैसे कृतघ्न हैं हम, परंतु तब भी, कितने कृपालु हैं भगवान्, जो हमारे प्रति अपने स्नेह को, अपने प्रेम को रोक नहीं पाते । हर पल कृपा करते हैं ।

सच्चे गुरु ही हमारा सच का सौदा कराते हैं, बताते हैं कि हम भगवान से ही आये, वहीं वापिस जाना हैं तो भगवान् से अपने रिश्ते को मज़बूत बनाएं । वे ही हैं अपने और कोई साथ नहीं देगा । गुरु कृपा से ही हमारा भगवान् से प्रेम बढ़ता हैं, हमारा जीवन उन्नत हो पाता हैं, हम सत्संग में आ पाते हैं । ऐसे गुरु पर बलि बलि जाइये ।

सादर जय श्रीमन्नारायण 🙏दिपमालिका पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।🪔🔥💥
14/11/2020

सादर जय श्रीमन्नारायण 🙏
दिपमालिका पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।🪔🔥💥

कैंकर्यलक्षण विलक्षण मोक्षभाजोआज कल के श्री वैष्णवों में भगवान् की सेवा को लेकर लज्जा का अनुभव होते देखा जाता हैं कि अरे...
17/09/2020

कैंकर्यलक्षण विलक्षण मोक्षभाजो
आज कल के श्री वैष्णवों में भगवान् की सेवा को लेकर लज्जा का अनुभव होते देखा जाता हैं कि अरे हम चँवर करेंगें ? हम पालकी में लगेंगे ? हम मंदिर की सफाई करें ? इत्यादि और भी बहुत सी बातें । लेकिन प्रपन्न वैष्णव को प्रभु सर्वविध सेवा करनी चाहिये इसमें किसी प्रकार का कोई संकोच कभी न करें । अखिलकोटि ब्रह्माण्ड नायक, नित्य मंगलमय, करुणानिधान भगवान् प्रभु की सेवा में कैसा संकोच । बड़े बड़े महानुभाव जब भगवान् की सेवा करते हैं तो हम क्यों न करें ये विचार सदा मन में रखना चाहिये तभी कल्याण होंगा ।

दक्षिण भारत की मीरा - आण्डल🙏दक्षिण भारत में श्री विल्लीपुत्तूर नामक एक प्रसिद्धतीर्थ हैं । वह राज्य के रामनाद जिले में ह...
23/07/2020

दक्षिण भारत की मीरा - आण्डल🙏

दक्षिण भारत में श्री विल्लीपुत्तूर नामक एक प्रसिद्ध
तीर्थ हैं । वह राज्य के रामनाद जिले में हैं, वहां भगवान् श्री हरि विष्णु का एक पुराना मंदिर हैं, लेकिन लोग उस मंदिर को ही देखने के लिए वहां नहीं जाते हैं।

श्री विल्लीपुत्तूर का नाम इसलिए प्रसिद्ध हुआ है कि वह दक्षिण की एक महान भक्त-कवयित्री आण्डल की जन्मभूमि हैं । उत्तर भारत में जिस तरह मीरा के पदों का प्रचार हैं, उसी तरह दक्षिण भारत में आण्डल के पद घर-घर गाये जाते हैं दक्षिण के हर श्रीहरि विष्णु के मंदिर में उसकी मूर्ति प्रतिष्ठित हैं और लोग श्रद्धा से उसकी पूजा करते हैं।

पुराने समय में श्री विल्लीपुत्तुर के आसपास का प्रदेश
जंगलों में घिरा था। वहां पहले आदिवासी लोग रहा करते थे। उन आदिवासियों में 'मल्लि' नाम की कोई नामी महिला हुई थी, जिसके कारण वह इलाका 'मल्लिनाहु' कहलाता था। मल्लि के लड़के का नाम 'विल्ली' था। वह भी बड़ा प्रभावशाली निकला। उसने एक बार आसपास के जंगलों को साफ करना शुरू किया। जंगल साफ करते-करते अचानक उसे एक बहुत ही पुराना श्री हरि विष्णु का मंदिर मिला। उसने उस मंदिर का उद्धार किया ओर उसके चारों ओर एक गांव बसाया। विल्ली के नाम पर ही यह गांव 'श्रीविल्लीपुत्तुर' कहलाया। यह अब दक्षिण का एक महान पुण्यक्षेत्र बन गया हैं ।

आज से कोई तेरह सौ साल पहले श्री विल्लीपुत्तूर में
एक आलवार भक्त रहते थे। उनका असली नाम वैसे विष्णुचित्त था,किन्तु लोग उनको पेरियालवार कहते थे। आलवार दक्षिण के प्राचीन श्री वैष्णव भक्तों को कहते हैं,जिनकी संख्या बारह हैं । बारहों आलवारों में पेरियालवार का बहुत ऊंचा स्थान हैं । पेरियालवार शब्द का अर्थ ही होता हैं - महान आलवार। आण्डल
उन्हीं की पालिता कन्या थी। पेरियालवार बड़ें ही ज्ञानी और भावुक भक्त थे। अपनी कुटिया के आगे उन्होंने एक फुलवारी लगा रखी थी। रंग-बिरंगे फूल उसमें खिला करते थे। फूलों को खिलते देखकर उनको लगता, जैसे भगवान् ही प्रसन्न होकर मुस्करा रहे हैं। रोज बड़े तड़के वे उठते और फुलवारी में जाकर ताजे फूल तोड़ते।
भगवान् के लिए उन फूलों को माला वह अपने-आप तैयार करते थे। भगवान की पूजा-अर्चना करना और
उनकी महिमा गाना ही उनका रोज का काम था।
सदा की तरह एक दिन पेरियालवार बड़े सवेरे उठे।
फुलवारी में उस दिन बहुत सारे फूल खिले थे। सुबह
की ठंडी हवा और फूलों की मधुर गंध ने उनके मन को पुलकित कर दिया था। फूल तोड़ते समय वह भावों में डूबकर भगवान् की महिमा का गान करने लगे। फूलों की डलिया भर चली थी कि अचानक उन्होंने एक
तुलसी के पौधे के नीचे किसी चीज को हिलते-डुलते देखा। उनको बड़ा कौतूहल हुआ। पास जाने पर उन्होंने देखा तो उनके अचरज का ठिकाना न रहा। वहां एक नवजात बालिका पड़ी हुई थी। फूल की तरह उस कोमल बच्ची को उन्होंने पुलकित हो तुरंत गोद में उठा लिया।
वह भागे-भागे मंदिर में गये और भगवान् की मूर्ति के सामने उस बच्ची को रखकर कहने लगे - "हे प्रभो, मैं आज एक अनूठा फूल तुम्हारे लिए लाया हूं। यह
बच्ची तुमने दी हैं तुमको ही भेंट करता हूं।"
कहते हैं, पेरियालवार को उसी समय आकाशवाणी सुनाई दी, "इसका नाम गोदा रखना और अपनी बेटी की तरह इसका पालन-पोषण करना।"
तमिल में 'गोदा' शब्द का अर्थ होता है-'फूलों की माला-
सी सुन्दर'। गोदा वास्तव में वैसी ही सुन्दर थी।
भक्तराज की पुत्री होने के कारण गोदा के मन पर
भक्ति के संस्कार शुरू से ही जमते गये। फूल तोड़ना, माला गूंथना,पूजा की सामग्री जुटाना आदि सब कामों में वह अपने पिता की मदद करती। पिता जब गाते, तब वह भी उनके साथ गाती।

भगवान् की आराधना के सिवा पिता पुत्री को और कोई अन्य काम नहीं था। इस सबका असर धीरे-धीरे गोदा पर यह पड़ा कि उसने मान लिया, उसका जीवन केवल भगवान् के लिए हैं । वह दिन-रात भगवान् के ही बारे में सोचा करती। उनको कौन-सा फूल पसंद आयेगा, कैसी माला पहनकर वे प्रसन्न होंगे इसी तरह की बातों पर वह घंटों विचार किया करती थी।

एक दिन मंदिर के पुजारी ने पेरियालवार से कहा, "आपको माला भगवान की पूजा के योग्य नहीं है, क्योंकि किसी ने उसे पहनकर अपवित्र कर दिया हैं ।" पेरियालवार को इस पर सहसा विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं। ताजे फूलों की दूसरी माला तैयार की और भगवान को चढ़ाई। लेकिन दूसरे दिन भी वही बात हुई। जो माला वह घर से पूजा के लिए ले गये थे, उसे लेने से पुजारी ने फिर इन्कार कर दिया। यही नहीं, उसने माला में से एक बाल निकालकर दिखाते हुए कहा, "आप स्वयं देख लीजिये। इस माला को किसी ने पहना है। कई फूलों की पंखुड़ियां भी मसली हुई-
सी लगती हैं।" पेरियालवार यह सुनकर चिंता में पड़ गये। भगवान् को चढ़ाई जानेवाली माला कौन पहन सकता हैं ! माला तो गोदा तैयार करती हैं । वह पहन लेगी, ऐसा सोच भी नहीं जा सकता। फिर बात क्या है? प्रभु की यह कैसी माया हैं ! इस तरह के विचारों में काफी देर तक खोये रहे।
दूसरे दिन पेरियालवर जरा पहले ही नहा-धोकर मंदिर जाने के लिए तैयार हो गये। गोदा कुटिया के अन्दर थी। उन्होंने आवाज दी,"बेटी, माला तैयार हो गई क्या ?"
लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। पेरियालवार ने झांककर देखा तो स्तब्ध रह गये। पुजारी के कथन की सचाई
उनकी आंखों के आगे थी। गोदा शीशे के सामने बैठी थी। भगवान के लिए जो माला उसने तैयार की थी, वह उसके गले में झूल रही थीं वह उस माला को देखती,
उसकी शोभा को निहारती, धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाती जा रही थी।
पेरियालवार ने झुँझलाकर कहा, "अरी नासमझ! तू यह क्या कर रही हैं ?"
गोदा का ध्यान भंग हुआ। वह चौंकी, फिर पिता को देखकर तुरन्त संभल गई। गले से माला निकालते हुए वह बोली, "कुछ नहीं पिताजी, देखिये, आज मैंने
कितनी सुन्दर माला बनाई हैं !"
भोली गोदा का यह उत्तर पिता के नहीं भाया।
जीवन में पहली और शायद आखिरी बार
उन्हें क्रोध आया था। वह गरज उठे, "तूने सर्वनाश कर डाला! भगवान् की माला पहनकर अपवित्र कर दी।
ऐसी मूर्खता आखिर तूने कैसे की ?"

गोदा इतनी भोली थी कि पिता के क्रोध से डरने के बदले खिल-खिलाकर हंस पड़ी। बोली,"पिताजी, आप इतने नाराज क्यों होते हैं ? आज यह कोई नई बात तो नहीं हैं । मैं तो रोज ही माला गूंथती हूं और पहनकर देख लेती हूं कि अच्छी बनी या नहीं। जो माला मुझे ही नहीं जंचेगी, वह भला उन्हें कैसे पसंद आयेंगी ?"
पेरियालवार ने गोदा का यह उत्तर सुनकर अपना सिर पीट लिया—"इस मूरख से बात करना व्यर्थ हैं । भगवान् मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे। महिनों से मैं
अपवित्र माला ही उनको चढ़ाता रहा हूं। आखिर दोष
मेरा ही हैं । प्रभु के लिए माला तो मुझे स्वयं अपने हाथों से गूंथनी थी!" इतना कहते-कहते वह बहुत अशान्त
हो उठे और जल्दी-जल्दी दूसरी माला गूंथने लगे, क्योंकि पूजा का समय पास ही था।
पिता का ऐसा रंग-ढंग देखकर गोदा को लगा कि कोई बड़ी बात हो गई हैं ।वह पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी-
की-खड़ी रह गई। उसके हाथ से वह माला छूटकर
नीचे जा गिरी, जिसे उसने बड़े जतन से तैयार किया था।इतनी सुन्दर माला इससे पहले वह कभी नहीं गूंथ पाई थी। भगवान इसे पाकर कितने प्रसन्न होंगे, यही सोचकर वह मगन थी, लेकिन यह क्या हो गया अचानक! उसके माला पहन लेने मात्र से भगवान क्यों नाराज होने लगे! यह सोचते सोचते वह विचलित हो उठी।इसी बीच पेरियालवार ने दूसरी माला तैयार कर ली। वह गोदा से कुछ बोले बिना ही मंदिर चले गये। उसको साथ चलने के लिए भी नहीं कहा। यह देखकर उसकी आंखों में आंसू उमड़ आये। बड़ी देर तक वह सामने पड़ी हुई माला को अपने आंसुओं से भिगोती रही। पेरियालवार उस दिन-भर बहुत ही उदास रहे, कुछ खाया-पिया भी नहीं। रात में बड़ी देर तक उनको नींद नहीं आई। आधी रात बीते जब उनकी आंख लगी तो उन्होंने एक सपना देखा। श्रीरंगम के शेषशायी भगवान् श्री रंगनाथ कह रहे थे, "भक्तराज, व्यर्थ क्यों दुखी होते हो! तुमने कोई अपराध नहीं किया है। मैं गोदा के प्रेम के वश में हूं। उसकी पहनी हुई माला मुझे बहुत प्रिय है। आगे से मुझे वही भेंट करना!"
विष्णुभक्त पेरियालवार मारे आनन्द के गदगद् हो उठे। भगवान् के चरणों में गिरने को उन्होंने जो चेष्टा की, तो सहसा उनकी आंख खुल गई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठे। उन्होंने उसी समय गोदा की ओर देखा। वह एक कोने में चटाई पर पड़ी सो रही थी। चेहरा देखने से ऐसा लगता था, मानो वह काफी रात गये तक जागती और आंखू बहाती रही हैं । पेरियालवार दीपक के मंद प्रकाश में एकटक उसको देखते रहे। उन्हें सहसा ख्याल आया कि इसने भी आज दिन-भर कुछ खाया-पिया नहीं होंगा । स्नेह और करुणा का सागर उनके हृदय में लहराने लगा। तुरंत उन्होंने गोदा को जगाया और आनंद के आंसू बरसाते हुए बोले, "बेटी, तू धन्य हैं ! तेरे कारण आज मैं भी धन्य हो गया। अभी स्वयं भगवान् ने मुझे दर्शन दिये हैं। अब मैं जान पाया कि तूने उन्हें अपने प्रेम के वश में कर लिया है। गोदा की जगह आज से मैं तुझे आंडाल कहूंगा।" बस, गोदा उसी समय से आंडाल के नाम से प्रसिद्ध हुई। 'आण्डाल' शब्द का अर्थ होता है—'अपने प्रेम से दूसरे को वश में करनेवाली'।

संयोग की बात कि उसी रात भगवान् ने मंदिर के
पुजारी को भी सपने में आदेश दिया कि आगे से
गोदा की पहनी हुई माला को लेने से इन्कार न करें ।
आण्डल अब सयानी हो गई। भगवान् के प्रति उसका प्रेम-भाव इतना गहरा हो गया था कि वह कुमारी कन्या की तरह भगवान् के साथ अपने ब्याह की कल्पना करने लगी।वह रहती थी श्रीविल्लीपुत्तूर में, लेकिन उसका मन सदा गोकुल की गलियों और वृन्दावन के कुंजों में विहार करता था। वह सोचा करती कि भगवान् श्री कृष्ण ही मेरे पति हैं और उन्हीं के साथ मेरा ब्याह होंगा । भावविभोर होकर वह भगवान् श्री कृष्ण की लीलाओं का गान करने लगती। उस समय उसके मुंह से अपने-आप नये-नये पद निकलने लगते। ये मधुर पद ही आगे 'तिरुप्पावै' और 'नाच्चियार तिरुमोलि' के पद कहलाये।

एक रात आण्डल ने सपना देखा कि भगवान् श्री कृष्ण के साथ उसके ब्याह का समय समीप आ गया हैं । धूमधाम से उसके विवाह की तैयारियां हो रही हैं और मण्डप सजाया जा रहा हैं ।
प्रातः जागने पर उसने यह बात अपनी सखियों से कही। विवाह के अवसर पर जो प्रथाएं उन दिनों प्रचलित थीं, उन पर कई मधुर पर रच डाले। आज भी तामिलनाडु में विवाह के मंगल अवसर पर वे पद गाये जाते हैं।पेरियालवार को अब आण्डल के विवाह की चिंता सताने लगी।
एक रात भगवान् ने फिर स्वप्न में उन्हें दर्शन दिये और कहा, "भक्तराज, आण्डल अब विवाह-योग्य हो गई हैं । उसको लेकर श्रीरंगम के मन्दिर में आओ। मैं उसका पाणिग्रहण करूंगा।"

पेरियालवार अपने आराध्य का आदेश कैसे टाल सकते थे! भगवान् की धरोहर भगवान को सौंप दी जाय, यह उनके लिए बड़ी प्रसन्नता की बात थी। उन्होंने यात्रा की तैयारियां शुरू कर दीं। मदुरै में उन दिनों पांड्य राजा राज करते थे। एक रात उन्हें भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि वह आण्डल को श्रीविल्लीपुत्तूर से श्रीरंग ले आयें। इसी तरह का स्वप्न श्रीरंगम के मंदिर के पुजारियों को भी आया फिर क्या था,सब-से-सब श्रीविल्लीपुत्तूर आ धमकें विष्णुप्रिया आण्डल चरणों की धूल सबने अपने सिर पर ली और राजसी धूमधाम से उसकी सवारी निकली। वह सजी-सजाई दुल्हन की भांति डोली में बैठी थी।

पेरियालवार एक सजे हुए हाथी पर बैठे भगवान् की महिमा गाते जा रहे थे। आगे- पीछे रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की लंबी कतारें थीं। तरह-तरह के
बाजे बज रहे थे। दसों दिशाओं से लोगों की भीड़ उमड़
रही थी। रास्तों के किनारे लोग छतों पर से फूलों की वर्षा कर रहे थे। ऐसा लगता था, मानो कोई राजकुमारी अपने पति के देश जा रही हो।

मीलों की यात्रा करके वह यात्रा श्रीरंगम पहुंची । कावेरी के किनारे पर स्थित भगवान् श्री रंगनाथ के मंदिर के सामने जाकर वह रुकी। आण्डल डोली से उतरी। मंदिर के गर्भ- गृह में उसने प्रवेश किया। शेषशायी भगवान् श्री रंगनाथ की मूर्ति को देखते ही वह रोमांचित हो उठी। धीरे-धीरे वह आगे बढ़ी और भगवान् के श्री चरणों में बैठ गई। लेकिन यह क्या! लोगों ने दूसरे ही क्षण चकित होकर देखा कि आण्डल वहां नहीं हैं ।

वह सबके देखते-देखते अदृश्य हो गई। भगवान् की मूर्ति में समा गई। कहते हैं मीराबाई भी इसी तरह भगवान की मूर्ति में समा गई थीं। भक्ति-भाव की यह चरम सीमा हैं, जब भगवान् और भक्त एकाकार हो जाते हैं।

पेरियालवार का हृदय इस घटना से व्याकुल हो उठा। कुछ भी हो, आखिर उन्होंने आण्डल को अपनी बेटी की तरह पाला था। वह शोक के महासागर में डूब गये। उन्होंने अपने-आपको संभाला और सब भगवान् की लीला हैं ऐसा समझकर संतोष किया।

कहते हैं, उस अवसर पर उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई
दी थी, "भक्तराज, तुमने आण्डल को नहीं पहचाना। उसके रूप में तो स्वयं श्री भूदेवी ने ही जन्म लिया था। तुम व्यर्थ क्यों दु:खी होते हो!

मेरी प्रिया आण्डल मुझसे आ मिली हैं, इससे तो तुमको प्रसन्न होना चाहिए। तुम भी अब जल्दी ही मुझसे आ मिलोगे।" आण्डल के कारण श्रीविल्लीपुत्तूर की महिमा बहुत बढ़ गई। वहां हर वर्ष रंगनाथ की (आण्डल ) और रंगनाथ (भगवान् विष्णु) का विवाहोत्सव आज
भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता हैं ।

रंगनाथ के साथ ही रंगनायकी के रूप में आज आंडाल
की पूजा दक्षिण में सब जगह होती हैं ।
दक्षिण के हर श्री हरि विष्णु के मंदिर में उसकी प्रतिमा मिलती हैं । वहां ऐसा घर शायद ही मिलेंगा,जिसकी दीवार पर उसके चित्र न हों। 'तिरुप्पावै' और'शूडिकोडुत्त नाच्चियार तिरुमोलि' के मधुर पदो के कारण तो वह अमर रहेंगी । 'गोदा' का दूसरा अर्थ 'वाणी की देवी' करें, तो वह भी उस पर ठीक ही उतरेंगा।

उत्तर भारत के चैतन्य, विद्यापति, सूर, तुलसी, कबीर
और मीरा से भी सैकड़ों साल पहले दक्षिण में कई महान् भक्त पैदा हुए। उन भक्तों में शैव भी थे और वैष्णव
भी। शिव के भक्त नायन्मार नाम से प्रसिद्ध हुए। भक्ति-भावना में बेसूध होकर उन भक्तों ने बहुत सारे मूल्यवान प्राचीन भक्ति-साहित्य इन्हीं नायन्मार और आलवार भक्तों की देन है। आलवारों में आंडाल की लोकप्रियता सबसे अधिक हैं । उसके रचे पद 'नालायिर दिव्य प्रबंधम्' के पहले भाग में मिलते हैं। यह उस महान ग्रंथ का नाम है,जिसमें बारहों आलवारों के पदों का संग्रह है। तामिलनाडु में यह पवित्र ग्रंथ दूसरे वेद के समान पूजित है। ग्रंथ के चार भाग हैं। हर भाग में लगभग एक हजार पद हैं।

पदों की संख्या चार हजार होने के कारण ही इसका नाम 'नालायिर' (चार हजार) पड़ा हैं । आण्डल ने कुल मिलाकर १८३ पद रचे। पहले के तीस पद 'तिरुप्पवै' के पद कहलाते हैं और बाकी १५३ पद 'शुडिकोडुत्त नाच्चियार तिरुमोलि' के।

तामिलनाडु में मार्गशीर्ष (अगहन) मास का विशेष महत्व है। यह महीना वहां 'तिरुप्पावै' का महीना माना जाता है।'तिरुप्पावै'शब्द 'तिरु' और 'पावै' शब्दों के मिलने से बना है। तमिल में 'तिरु' का अर्थ'श्री' होता है और 'पावै' का अर्थ है 'व्रत' या 'त्योहार'। अत: 'तिरुप्पावै' को हम 'श्रीव्रत' भी कह सकते हैं।
मार्गशीर्ष महीने में यह त्योहार हर साल बड़े उत्साह
से मनाया जाता हैं । यह त्योहार खासकर महिलाओं के लिए है। विवाहित स्त्रियां सुख- सुहाग के लिए और कुमारियाँ मनचाहे वर के लिए इस व्रत को रखती हैं।
तड़के उठकर वे स्नान के लिए जाती हैं और 'तिरुप्पावै' के पद गाती हैं। जगह-जगह पर कथाएं होती हैं। भगवान की महिमा के साथ ही आण्डल के यश का गान होता हैं । तिरुप्पावै त्योहार से सम्बन्धित होने के कारण आण्डल के तीस पदों को 'तिरुप्पावै' कहा जाता हैं । भागवत में गोपिकाओं के एक व्रत का वर्णन हैं । शायद आण्डल को उसी से प्रेरणा मिली। गोपिकाओं के जीवन से ही मिलता- जुलता उसका अपना जीवन था। गोपिकाओं की तरह ही उसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था अपने प्रियतम कृष्ण को प्रसन्न रखना।

'तिरुप्पावै' के पद 'प्रभाती' या 'जागरण-गीत' जैसे हैं।
उनमें कुछ सखियों द्वारा दूसरी सखियों, कृष्ण और नन्दगोप आदि को जगाने का वर्णन हैं ।
कहते हैं, एक बार गोकुल की गोपिकाओं को कृष्ण से मिलने की मनाही कर दी गई। गाँव के बड़े-बड़े को कृष्ण की हरकतें पसन्द नहीं थीं।लेकिन उन्हीं दिनों अचानक अकाल पड़ा। पानपी न पड़ने से हरियाली सूख गई। पशु मरने लगे। वर्षा बुलाने को यह जरूरी हो गया कि गोकुल के किशोर-किशारियों का दल 'कात्यायनी व्रत' का उत्सव मनाये। भगवान् श्री कृष्ण तो बड़े-बूढ़ों की बात सुनने वाले नहीं थे, इसलिए उनको मनाने के लिए गोपिकाओं को कहा गया। इस तरह गोपिकाओं को कृष्ण से मिलने की छूट देनी ही पड़ी। वे बड़े उछाह से एक-एक कर सखियों को जगाती हुई भगवान् श्री कृष्ण के पास पहुंची और उनको उत्सव की सफलता के लिए राजी किया। आण्डल के 'तिरुप्पावै' के पदों की रचना का मूल-आधार यही पौराणिक कथा हैं ।

'तिरुप्पावै' के सभी पद बड़े सरल, मधुर और गाने योग्य हैं। वे मन को रसमय कर देते हैं। केवल भारत में ही नहीं,बल्कि दूर-दूर के देशों मे भी इनका प्रचार है। दो हजार मील दूर स्याह देश में भी 'तिरुप्पावै' के पद गाये जाते हैं।
'शूडिकोडुत्त' नाच्चियार तिरुमोलि' आँडाल के १५३ फुटकर पदों का संग्रह है।'शूडिकोडुत्त नाच्चियार' का अर्थ है, 'पहले माला पहनने वाली रमणी' और 'तिरुमोलि' का अर्थ है 'दिव्य वाणी'। आण्डल भगवान् से पहले स्वयं माला पहन लेती थी, उसी का संकेत यहाँ पर है। आण्डल की यह दिव्य वाणी सचमुच अनुपम हैं । मीरा की भाँति वह भी कृष्ण को अपना पति मानती थी। उसके मन में जब भी जो भाव उठते थे, उन्हें वह पदों का रूप दे डालती थी। किसी पद में प्रेम की प्रबलता है तो किसी में विरह की व्याकुलत हैं । किसी पद में वह भगवान् श्री कृष्ण के उलाहना देती हैं तो किसी में मिलन का विश्वास प्रकट करती हैं ।

आण्डल और मीरा दोनों ही भगवान् श्री कृष्ण के प्रेम-रस में सराबोर थीं। दोनों ही भगवान् श्री कृष्ण को अपना प्रियतम मानती थी।दोनों उन्हीं की प्रेम-भावना में जीवनभर बेसूध रहीं। दोनों के ही मधुर पद जन-जन के मन में बसे हुए हैं।

श्री गोदा महारानी का मंगल हो । 🙏

किस नाम व रूप वाली हनुमान मूर्ति की पूजा का क्या होता हैं प्रभाव, जानिए  -✍कलिकाल में श्री हनुमान जी, कालिका माता और भैर...
07/07/2020

किस नाम व रूप वाली हनुमान मूर्ति की पूजा का क्या होता हैं प्रभाव, जानिए -✍
कलिकाल में श्री हनुमान जी, कालिका माता और भैरवनाथ सबसे जाग्रत देव माने गए हैं। श्री हनुमानजी की पूजा का चमत्कारिक असर होता हैं । बहुत कम लोग जानते होंगे कि हनुमानजी की किसी मूर्ति की पूजा का क्या फल मिलता हैं । आओ जानते हैं।

1. पूर्वमुखी हनुमान -

पूर्व की तरफ जो मुंह है उसे 'वानर' कहा गया है। जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यो के तेज समान हैं। इनका पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता हैं । इस मुख का पूजन करने से शत्रुओं पर विजय पाई जा सकती हैं ।

2.पश्चिममुखी हनुमान -

पश्चिम की तरफ जो मुंह है उसे 'गरूड़' कहा गया हैं । यह रूप संकटमोचन माना गया हैं । जिस प्रकार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अजर-अमर हैं उसी तरह इनको भी अजर-अमर माना गया हैं ।

3.उत्तरमुखी हनुमान -

उत्तर दिशा देवताओं की मानी जाती हैं । यही कारण हैं कि शुभ और मंगल की कामना उत्तरामुखी हनुमान की उपासना से पूरी होती हैं । उत्तर की तरफ जो मुंह हैं उसे 'शूकर' कहा गया हैं । इनकी उपासना करने से अबाध धन-दौलत, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, लंबी आयु तथा निरोगी काया प्राप्त होती हैं ।

4.दक्षिणमुखी हनुमान -

दक्षिण की तरफ जो मुंह है उसे 'भगवान श्री नृसिंह' कहा गया हैं । यह रूप अपने उपासको को भय, चिंता और परेशानीयों से मुक्त करवाता हैं । दक्षिण दिशा में सभी तरह की बुरी शक्तियों के अलावा यह दिशा काल की दिशा मानी जाती हैं । यदि आप अपने घर में उत्तर की दीवार पर हनुमानजी का चित्र लगाएंगे तो उनका मुख दक्षिण की दिशा में होगा। दक्षिण में उनका मुख होने से वह सभी तरह की बुरी शक्तियों से हमें बचाते हैं। इसलिए दक्षिणामुखी हनुमान की साधना काल, भय, संकट और चिंता का नाश करने वाली होती हैं ।

5.ऊर्ध्वमुख:-

हनुमानजी का ऊर्ध्वमुख रूप 'घोड़े' के समरूप हैं । यह स्वरूप ब्रह्माजी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था। मान्यता हैं कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए थे।

6.पंचमुखी हनुमान :-

राम लक्ष्मण को अहिरावण से मुक्त कराने के लिए हनुमानजी ने पंचमुखी रूप धारण किया था। पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख।

वास्तुविज्ञान के अनुसार पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति जिस घर में होती है वहां उन्नति के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और धन संपत्ति में वृद्घि होती है। पंचमुखी हनुमानजी का उपरोक्त चित्र भी अच्छा हैं । यदि आपको लगता हैं कि आपके घर पर नकारात्मक शक्तियों का असर हैं तो आप पंचमुखी हनुमानजी का चित्र मुख्य द्वारा के ऊपर लगा सकते हैं या ऐसी जगह लगाएं जहां से यह सभी को नजर आए। ऐसा करने से घर में किसी भी तरह की बुरी शक्ति प्रवेश नहीं करेंगी ।

7.एकादश हनुमान :-

श्री हनुमान जी रुद्र यानी शिव के ही ग्यारहवें अवतार माने गए हैं। ग्यारह मुख वाले कालकारमुख नामक एक भयानक बलवान राक्षस का वध करने के लिए श्रीराम की आज्ञा से हनुमानजी ने एकादश मुख रूप ग्रहण करके चैत्र पूर्णिमा (हनमान जयंती) को शनिश्चर के दिन उस राक्षस का उसकी सेना सहित वध कर दिया था। एकादशी और पंचमुखी हनुमान जी पूजा से सभी देवी और देवताओं की उपासना के फल मिलते हैं।

8.वीर हनुमान :-

जैसा की नाम से ही विदित है कि इस नाम से हनुमानजी की प्रतिमा की पूजा जीवन में साहस, बल, पराक्रम और आत्मविश्वास प्रदान कर सभी कार्यों की बाधाओं को दूर करती हैं ।

9.भक्त हनुमान :-

राम की भक्ति करते हुए आपने हनुमानी का चित्र या मूर्ति देखी होगी। इस चित्र या मूर्ति की पूजा से जीवन के लक्ष्य को पाने में आ रहीं अड़चनें दूर होती हैं । साथ ही यह भक्ति जरूरी एकाग्रता और लगन देने वाली होती है। इस मूर्ति या चित्र में हनुमानजी हाथ में करताल लेकर राम की भक्ति करते नजर आएंगे।

10.दास हनुमान :-

हनुमान जी रामजी के दास हैं। सदा रामकाज करने को आतुर रहते हैं। दास हनुमान की आराधना से व्यक्ति के भीतर सेवा और समर्पण की भावना का विकास होता है। धर्म, कार्य और रिश्तों के प्रति समर्पण और सेवा होने से ही सफलता मिलती है। इस मूर्ति या चित्र में हनुमानजी प्रभु श्रीरामजी के चरणों में बैठे हुए हैं।

11.सूर्यमुखी हनुमान :-

शास्त्रों के मुताबिक श्रीहनुमान के गुरु सूर्यदेव हैं। सूर्य पूर्व दिशा से उदय होकर जगत को प्रकाशित करता है। सूर्यमुखी हनुमान की उपासना से ज्ञान, विद्या, ख्याति, उन्नति और सम्मान मिलता है। सूर्यमुखी हनुमान को ही पूर्वमुखी हनुमान कहते हैं।

12. किस दिशा में लगाएं हनुमानजी का चित्र :-

वास्तु के अनुसार हनुमानजी का चित्र हमेशा दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए लगाना चाहिए। यह चित्र बैठी मुद्रा में लाल रंग का होना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हनुमानजी का चित्र इसलिए अधिक शुभ है क्योंकि हनुमान जी ने अपना प्रभाव सर्वाधिक इसी दिशा में दिखाया है। हनुमान जी का चित्र लगाने पर दक्षिण दिशा से आने वाली हर बुरी ताकत हनुमानजी का चित्र देखकर लौट जाती हैं । इससे घर में सुख और समृद्धि बढ़ती हैं ।

॥ श्री हनुमंत लाल जी की जय हो ॥

छायाचित्र साभार - श्री दास हनुमान देवस्थान, चित्रकूट धाम ( मध्यप्रदेश )

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