17/07/2021
सादर जय श्रीमन्नारायण 🙏
भगवान् वेंकटेशजी को समर्पित होने वाले नैवैद्य।
सनातन वैदिक शास्त्रानुसार प्राण प्रतिष्ठित भगवान के श्रीविग्रह को जीवित इकाई माना जाता है। उनके विविध प्रकार से उपचार संपन्न किये जाते है । नैवैद्य समर्पण उन्ही उपचारों में एक है। नैवैद्य संस्कृत शब्द है, और भगवान् को समर्पित विविध प्रसाद नैवैद्य कहलाते है।
भगवान तिरुमलेश के यहाँ वैखानस आगमानुसार सारे उपचार याने पूजा, अर्चन, तिरुमंजन , उत्सव और नैवैद्य समर्पित किये जाते है।
अनादि काल से चली आ रही ,आगम सिद्धांतो अनुसार व्यवस्था , आज भी भगवान् के उपचार और नैवैद्य समर्पण, बिना कोई बदलाव के वैखानस आगमानुसार निर्वहन किये जाते है।
वैखानस आगम अनुसार, नैवैद्य बनाने के लिये नियम और समय का पालन अति आवश्यक है।
वैखानस आगमानुसार नैवैद्य बनाने के लिये , स्वर्ण , रजत या माटी के बर्तन की आवश्यकता जरुरी है, यह बनाने के लिये लकड़ी आम की , पीपल की या पलाश की होनी चाहिये। भगवान के इस चूल्हे में अग्नि यज्ञशाला से आनी चाहिये।
पर वर्तमान में कालांतर में आये बदलाव को देखते इन नियमो में भी बदलाव आया है। इन्हें भी कुछ सुगम बनाये है।
नित्य प्रातः वैदिक मन्त्रों से उत्थापन (मन्त्रासनम) , पश्चात स्नान (स्नानासनम) , पश्चात भगवान का कोलुवु (यात्रासनम) उपचार ( जो प्रातः की अर्चना के अंग है) संपन्न होने के बाद प्रातः का नैवैद्य समर्पित होता है, जिसे भोजयासन कहते है। भगवान् की यह पाकशाला रात्रि शयन प्रसाद के बाद बंद हो जाती है , और प्रातः खुलती है । भगवान् तिरुमलेश के अर्चन के बाद रसोइये पाकशाला में आते है, और नैवैद्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भगवान् को नैवैद्य समर्पण के पहले गर्भगृह की सफाई कर शुद्धि की जाती है ।
प्रातः बने नैवैद्य समर्पण के पहले अर्चक भगवान को विष्णु गायत्री मंत्र निवेदन करते है ।
भगवान् तिरुवेंगड़म को मुख्य निवेदित भोग -
१ बालभोग , २. राज भोग और ३. शयन भोग है। नित्य के इन तीन भोगों के साथ विशेष अवसरों पर , विशेष नवैद्य भी निवेदित किये जाते है।
नित्य तिरुमलेश की सुप्रभात सेवा में, भगवान को ताजा केसर इलाची युक्त, गाय का गुनगुना गर्म दूध , मक्खन (नवनीत) जिसे "दर्शन गौ क्षीरम" कहते है निवेदित किया जाता है । इसके बाद तोमाल सेवा होती है ।
तोमाल सेवा के बाद भोग श्रीनिवास विग्रह के सामने "कोलुवु" ( यात्रासनम) सेवा संपन्न होती है, जिसमे भगवान श्रीनिवास को पंचांग, और दिन भर में होने वाले उत्सवों की जानकारी पढ़कर सुनाई जाती है, साथ ही पिछले दिन की आवक भी बतलायी जाती है, (यह सेवा मंदिर की एकांतिक सेवा है), इस सेवा के बाद भगवान को , गुड़ , काळा तिल और सुखी अदरक का भोग निवेदन किया जाता है ।
इसके बाद सहस्त्रनाम अर्चना सेवा होती है, पश्चात बाल भोग निवेदित होता है। इसके साथ ही प्रातः काल की आराधना संपन्न हो जाती है ।
सुबह के सर्व दर्शन के बाद भगवान को राज भोग अष्टोत्तर शतनाम अर्चना के साथ निवेदित होता है । सायंकालीन आराधना के पहले फिर से गर्भगृह की सफाई की जाती है , भगवान श्रीनिवासजी का ताजे फूलों से श्रृंगार किया जाता है । शयन भोग के बाद भगवान को मध्य रात्रि का नैवैद्य निवेदित किया जाता है , जिसे ‘तिरुवीसम ’ कहते है । इस तिरुवीसम में नैवैद्य सफ़ेद सादे चांवल, और गुड़ के चांवल का भोग होता है ।
इसके बाद एकांत सेवा में भगवान वेंकटेशजी को ताजा केसर इलाची युक्त, गाय का निवाया गर्म दूध,फल और घी में सेके हुये सूखे मेवे का भोग लगता है ।
भगवान तिरुमलेश के बाल भोग, राज भोग और शयन भोग में नाना प्रकार के अन्नप्रासद निवेदित किये जाते है ।
हर भोग के पहले मंदिर में विशेष प्रकार से घंटा वादन होता है , जो तिरुमलै में, भगवान को भोग निवेदन की स्पष्ट सुचना होती है ।
पहले घंटा वादन के बाद ,भगवान् को बाल भोग में ,यह अन्नप्रासद निवेदित होते है १. मात्राअन्नम, , २. मुद्गाअन्नम (घी पोंगल), ३.तिंत्रिणिरसअन्नम (इमली के चांवल / पुलिहोरा), ४. दध्योदनं (दही के चांवल ), ५. गुड़अन्नम (गुड़ के चांवल ,शकरा पोंगल), ६. शाकअन्नम (कदम्ब भात), और ७. शक्करअन्नम (रावकेसरी )। इनके साथ ही भगवान को ४ अन्य प्रसाद और एक विशेष प्रसाद भी निवेदित किया जाता है १. पन्यारमुलु ( सुगन्धित स्वादिष्ट व्यंजन , १. माशअप्पम (वड़ा), २. लड्डू ४ .गुडप्पम (अप्पम ), और ४.चकरप्पम (डोसा)।.
दूसरे घंटा वादन के बाद राज भोग में निवेदित अन्नप्रासद यह है १. शुद्धअन्नम (सादे सफ़ेद चांवल ), २. पुलिहोरा , ३. गुड़अन्नम , ४.दध्योदनं ,और ५.सीरा या सक्कारभात। .
तीसरे घंटा वादन के बाद शयन भोग में यह अन्नप्रासद रहते है १. मरीच्यांणम ( कालीमिर्च के चांवल ) २.चकरप्पम , ३.डोसा , ४.लड्डू ५. मशापपं , और ६. शक्करअन्नम ।
सप्ताह की विशेष पूजा के समय भगवान को विशेष भोग निवेदित होते है।
सोमवार विशेष पूजा को देखते हुये १. ५१ बडे दोसे, २. ५१ छोटे दोसे, ३. ५१ बड़े अप्पम और ४. १०२ छोटे अप्पम नित्य नैवेद्य के साथ निवेदित होते है।
मंगलवार को अष्टदलपादपद्मार्धना जो प्रातः ही होती है नित्य नैवेद्य के साथ मात्राअन्नम निवेदित होते है।
बुधवार को सहस्त्रकालशाभिषेक सेवा होती है, विशेषतः नित्य नैवेद्य के साथ १. पायसम (रायता) और २. मूंग दाल निवेदित होती है।
गुरुवार को तिरुप्पा वडा सेवा होती है, नित्य नैवेद्य के साथ विशेषतः १. जलेबी , २. मुरुकुल और ३. पायसम (रायता) निवेदित होता है।
शुक्रवार को भगवान के मूल विग्रह का अभिषेक होता है, नित्य नैवेद्य के साथ विशेषतः भगवान को पोली निवेदित होती है।
शनिवार और रविवार को नित्य नैवेद्य निवेदित होते है।
भगवान् वेंकटेशजी को निवेदित होने वाले सरे नैवैद्य मंदिर परिसर के अंदर बानी पाकशाला में ही बनते है।
यहाँ प्रसाद के रूप में वितरित होने वाले लड्डू ३ प्रकार के बनते है:
लड्डू बनाने में प्रयोग लाये जाने वाले सामान और उनकी मात्रा की सूचि को "डिट्टम" कहते है। लड्डू की बढ़ती खपत को देखते हुJये, इस सूचि को अब तक के इतिहास में ६ बार संशोघन किया गया है।वर्तमान में इस "डिट्टम" के अनुसार जो सामान है वह इस प्रकार है , १ बेसन , २ काजू, ३. इलाइची , ४. घी , ५. शक्कर, ६. मोटी मिश्री , और ७. किशमिश ।
नित्य लगभग अंदाजन ५ टन याने ५ x १००० - ५००० किलो १. बेसन , २. ५००० किलो शक्कर , ३. ७०० किलो काजू , ४. १५० किलो इलाइची , ५. ५०० किलो घी, ६. ५०० किलो मोटी मिश्री और ७. ७५० किलो किशमिश।
लड्डू बनाने की जगह को लड्डू पोट्टु कहते है , यह पहले मंदिर परिसर के अंदर संपंगी प्रदक्षिणा में थी , अब मंदिर परिसर के बहार भी एक इकाई है।
इस लड्डू पोट्टु में लगभग ६२० रसोइये कार्य करते है। इनमे २४७ मुख्य रसोइये है।
१. प्रोक्तम लड्डू , यह लड्डू छोटे होते है , इनका वजन १७५ ग्राम का होता है। यह लड्डू, यहाँ आकर भगवान के दर्शन के बाद टोकन पर शुल्कानुसार सभी भक्तों को दिए जाते है।
२. अस्थानम लड्डू , यह लड्डू विशेष उत्सवों और पर्व पर ही बनाये जाते है , इनमे काजू कुछ अधिक मात्रा में होते है , साथ ही इनमे बादाम , और केसर की पंखुड़ियां भी होती है, इन लड्डुओं का वजन ७५० ग्राम होता है।
३. कल्याण उत्सव लड्डू , यह लड्डू भगवान् के कल्याण उत्सव और कुछ अन्य विशेष उत्सवों के यजमनो को दिये जाते है । यह लड्डू १५ दिन तक ख़राब नहीं होते।
इस संकलित लेख में दी गयी / प्रेषित जानकारी में कोई त्रुटि हो तो लेखक क्षमा प्रार्थी है।