परम पूज्य आचार्य श्री कुंदकुंदसूरिजी महाराज आदि की शुभ निश्रा में अर्हद्द महापुजन | Arhad Mahapujan with Blessing by Aacharya Shri Kund Kund Suri Ji Maharaj Saheb || श्री मुनिसुव्रत स्वामिने नमः || || श्री धर्मनाथाय नमः || || अनंत लाब्धिनिधानाय श्री गौतम स्वामिने नमः || || नमो नमः श्री गुरु नेमी-अमृत-धर्मधुरंधर सुरिवरेभ्यः ||
परम पू
ज्य आचार्य श्री कुंदकुंदसूरिजी महाराज आदि की शुभ निश्रा में
बिना स्वार्थ के समस्त संसार पर उपकार करनेवाले परमात्माका पूजन मतलब
अर्हद्द महापुजन
अरिहंत के पूजन से टलता है संकट अपार, अरिहंत के अति स्मरण से मिलती है अंत में समाध
अर्हद्द महापुजन
वि. सं. २०६९
मिगसर सूद (प्रथम)-१२
सोमवार, दि. २४-१२-२०१२ से
मिगसर सूद -१३
बुधवार, दि. २६-१२-२०१२
निमंत्रक
दिपक उत्तमचंद भूरालाल गोलिया (जैन) गुड वाले (माधुपुरा)
एच – १०, गोयल प्लाझा, मानसी सर्कल के पास, जजीझ बंगलो रोड, वस्त्रापुर, अहमदाबाद-३८००१५
मोबाइल : +९१-९५५८८१६१८१, फोन: ०७९-२६७६१२४४
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यह अर्हद्द महापूजन १६ वीं शताब्दी की शुरुआत में हुए श्री वर्धमान सूरिजी महाराज, आचार दिनकर नामक ग्रन्थ की रचना में शंतिकाधिकार नाम के ३४ वे अध्याय को अनुसरता है |
यह अर्हद्द महापूजन किसी के जन्म-मृत्यु के निमित से व् स्वर्गारोहण व् प्रसूति के निमित से नहीं करवा शकते | इस बात को ध्यान में रखना चाहिए |
यह महापूजन करवाने से व् शामिल होने से पापों का नाश होता है | रोग वो दोष शांत होते है | दुष्ट देवो, असुरों, व् मनुष्यों रूपी शत्रु दूर होते है | कल्याण और सभी प्रकार की सिद्धि होती है |
युद्ध में १०००० सैनिको पर विजय प्राप्त करना सरल हे , परन्तु राग-द्वेष को जितना , अज्ञानता का विनाश करना, विशिष्ट प्रातिहार्य एवं अतिशयो की सम्पति प्राप्त करना सरल नहीं हे | फिर भी जिनको प्राप्त हुई हे, ऐसे अरिहंत परमात्मा स्वरूप स्वामी ही सच्चे स्वामी हे, और ऐसे स्वामी ही सेवक को स्वामी बनाने के लिये शक्तिमान हे |
जो स्वयं (खुद) पार हो चुके है वो ही दुसरो आत्म ज्ञान (बोध ज्ञान) दिलाने एवं सही रास्ते पे ले जाने में समर्थ व् शक्तिमान बन शकते है | ऐसे श्री अरिहंत परमात्मा का जो सबसे बडा पूजन मतलब जैन दर्शन में अर्हद्द महा पूजन .....
हालाकि जैन दर्शन में ऋषि मंडल पूजन, विशस्थानक पूजन, , श्री सिद्ध चक्र पूजन आदि अनेक विधि अनुष्ठान हे, फिर भी उन सभी में अनोखी व् अद्भुत प्रतिभा वाला पूजन मतलब अर्हद्द महापूजन |
इस पूजन में पहले दिन सुबह अरिहंत परमात्मा की अद्भुत तरीके से भक्ति होती हे एवं दोपहर को २५ कुसुमांजलि विधान होता है |
दूसरे दिन अरिहंत परमात्मा आदि पंच परमेष्ठी, इन्द्र आदि दश दिक्पाल, मेष आदि १२ राशि, अश्विनी आदि २८ नक्षत्र, सूर्य आदि नव ग्रह, रोहिणी आदि १६ विध्या देवीया, गणपति आदि चतुर्निकाय देव, ऐसे सप्त पीठ का हवन के साथ पूजन किया जाता है |
हवन जैन अनुष्ठान में कई जगह होता आया है और वर्तमान समय में कुछ अनुष्ठान में होता है. ज्ञानी पुरुषों के कहे गए वचनों को जो हम मान्य रखते हे तो उनकी टीका के आधार पर पूज्य गुरुदेव के पसाय (उपदेश) से समझे और समझाया जा शकता है , दूसरी बात ये है की कोई भी महापुरूष के बनायी हुइ पूजा विधि का स्वीकार करे तो उसमे से कुछ विधि विधान निकाल देना हमारा कोनसा हक्क या अधिकार है ?
पूजन के तीसरे दिन परमात्मा के ८ और १०८ अभिषेक करने की अद्भुत कार्य आता है, उसके बाद कई तरीके की पूजा होती है और बाद में आभूषण पूजा आती है |
इस पूजा में यथाशक्ति खुद के शरीर पे पहने हुए आभूषण सामने रखे हुए थाल में रखने का एक अनोखा प्रसंग आता है , उस समय का माहौल बहुत ही सुन्दर, अद्भुत व् आनंद मय होता है | घर से कोई सोच के न आया हो फिर भी मूल्यवान चीजे आभुषण पूजा में रखने का मन हो जाता है, उसके बाद १०८ दिये की आरती, मंगल दिया व् अंत में शांति दंडक आता है |
यह शांति दंडक का एक अलग ही महत्व है | यह शांति दंडक मतलब महा पूजन का रहस्य | यह दंडक तीन बार होता है, पहले ३० मिनिट होता हे और वो सही में शांति कारक होता है, सभी भावना पूरी होती है, महा भाग्यशाली होता है वो ही इसमें शामिल होने का या शांति दंडक करने का लाभ ले शकता है| बाद में धारावही होती है और अर्हद्द महापूजन समाप्त होता है |
पहला दिन
श्री आदेश्वर भगवान को सिंहासन में स्थापित करना
श्री शांतिनाथ भगवान को सिंहासन में स्थापित करना
कुंभ स्थापन
अखंड दिपक स्थापन
इन्द्र – इन्द्राणी बन के भगवान की अनेक प्रकार की पूजा
षटरस भोजन के थल रखना
सात कुमारिका द्वारा भगवान के लूण उतारना
दस दिक्पाल पूजन (संक्षिप्त)
नव ग्रह पूजन (संक्षिप्त)
१ से ५ कुसुमांजलि
६ से १० कुसुमांजलि
११ से १५ कुसुमांजलि
१६ से २० कुसुमांजलि
२१ से २५ कुसुमांजलि
आरती – मंगल दिया
दूसरा दिन
पंच परमेष्ठी पूजन
१० दिक्पाल पीठ पूजन
१२ राशि पीठ पूजन
२८ नक्षत्र पीठ पूजन
९ ग्रह पीठ पूजन
१६ विध्या देवी पीठ पूजन
प्रकीर्ण देवो का पीठ पूजन
हवन के आगे बेठ के ऊपर के पीठ के सभी देवो के लिये हवन में आहुति
ऊपर के पीठ के सभी देवो को खीर का बर्तन देना
आरती – मंगल दिया
तीसरा दिन
श्री शांतिनाथ भगवान को ८ अभिषेक (दूध, दही, घी, गन्ने का रस, शुद्ध जल, सह्स्त्र्मुलिका , सत्मुलिका, सर्व औषधि)
श्री शांतिनाथ भगवान को १०८ अभिषेक
श्री शांतिनाथ भगवान की कई तरह की पूजा (यक्ष कर्द्द की पूजा, पुष्प पूजा, अक्षत पूजा, फल पूजा, पुष्पमाल पूजा, आभूषण पूजा, आदि)
श्री शांतिनाथ भगवान की कई तरह की पूजा (नैवेध पूजा, सर्व धान्य पूजा, वेषवाल पूजा पान के बिडे रख के, सर्व औषधि पूजा, सुवर्ण मुद्रा रख के पूजा)
अष्टमंगल पीठ पूजन
१०८ दिये की आरती
मंगल दिया
शान्ति दंडक का घड़ा भरना
रात को शांति धारा (धारावाही) देना
अर्हद्द महापुजन में शामिल होने मात्र से सभी दुखो से व् कष्टों से मुक्ति मिल जाती है व् रुके हुए कार्य पुरे हो जाते हे, मन में अच्छी भावना की बढ़ोतरी होती हे व् पापों का नाश होता है | अर्हद्द महापूजन करने का व् शामिल होने का लाभ भाग्य से ही मिलता है|