Shri Sanatan Dharm Sabha Agra-श्री सनातन धर्म सभा आगरा

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क्यों स्वस्तिक बनाकर शुरू किए काम होते हैं सफल, जानिए ये खास वजहें :-हिन्दू धर्म परंपराओं में हर मांगलिक, धार्मिक कर्म, ...
23/03/2014

क्यों स्वस्तिक बनाकर शुरू किए काम होते हैं सफल, जानिए ये खास वजहें :-

हिन्दू धर्म परंपराओं में हर मांगलिक, धार्मिक कर्म, पूजा, उपासना या कार्य की शुरुआत स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर की जाती है। स्वस्तिक देवशक्तियों, शुभ व मंगल भावों का प्रतीक माना जाता है। वेद-पुराणों में भी स्वस्तिक चिन्ह के कल्याणकारी होने और मंगल कार्यों की शुरुआत में स्वस्तिक बनाने के पीछे ये खास वजहें बताई गई हैं।

शास्त्रों के मुताबिक स्वस्तिक परब्रह्म, विघ्रहर्ता व मंगलमूर्ति भगवान श्रीगणेश का भी साकार रूप है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा 'गं' बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्रीगणेश का स्थान माना जाता है। इसमें जो चार बिन्दियां भी होती है, उनमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है।

इसी तरह वेद भी 'स्वस्तिक' श्रीगणेश का ही स्वरूप होना उजागर करते हैं। देव पूजा-उपासना में बोले जाने वाले वेदों के शांति पाठ मंत्र में भी भगवान श्रीगणेश का 'स्वस्ति' रूप में स्मरण किया गया है। यह शांति पाठ है -

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु।।

माना जाता है कि इस मंत्र में चार बार आए 'स्वस्ति' शब्द के रूप में चार बार कल्याण और शुभ की कामना से श्रीगणेश के साथ इन्द्र, गरूड़, पूषा और बृहस्पति का ध्यान और आवाहन किया गया है।

स्वस्तिक बनाने के धर्म दर्शन में व्यावहारिक नजरिए से संकेत यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम, प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सद्भाव, सौंदर्य व विश्वास होता है, वहां शुभ, मंगल और कल्याण होता है यानी श्री गणेश का वास होता है। उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। चूंकि श्रीगणेश विघ्रहर्ता हैं, इसलिए ऐसी मंगल कामनाओं की सिद्धि में विघ्रों को दूर करने के लिए स्वस्तिक रूप में गणेश स्थापना की जाती है। इसलिए श्रीगणेश को मंगलमूर्ति भी पुकारा जाता है।

रुद्र अवतार श्रीहनुमान का बल, पराक्रम, ऊर्जा, बुद्धि, सेवा व भक्ति के अद्भुत व विलक्षण गुणों से भरा चरित्र सांसारिक जीवन...
23/03/2014

रुद्र अवतार श्रीहनुमान का बल, पराक्रम, ऊर्जा, बुद्धि, सेवा व भक्ति के अद्भुत व विलक्षण गुणों से भरा चरित्र सांसारिक जीवन के लिए आदर्श माना जाता हैं। यही वजह है कि शास्त्रों में श्रीहनुमान को 'सकलगुणनिधान' भी कहा गया है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक श्रीहनुमान 8 चिरंजीवी, सरल शब्दों में कहें तो अमर व दिव्य चरित्रों में एक है।

हनुमान उपासना के महापाठ श्रीहनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि - 'चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।'

इस चौपाई में साफ संकेत है कि श्रीहनुमान ऐसे देवता है, जो हर युग में किसी न किसी रूप, शक्ति और गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहते हैं। हनुमानजी से जुड़ी यही विलक्षण और अद्भुत बात उनके प्रति आस्था और श्रद्धा गहरी करती है। यहां जानिए, श्रीहनुमान किस युग में किस तरह जगत के लिए संकटमोचक बनें और खासतौर पर कलियुग यानी इस युग में श्रीहनुमान कहां बसते हैं -

सतयुग - श्री हनुमान रुद्र अवतार माने जाते हैं। शिव का दु:खों को दूर करने वाला रूप ही रुद्र है। इस तरह कहा जा सकता है कि सतयुग में हनुमान का शिव रुप ही जगत के लिए कल्याणकारी और संकटनाशक रहा।

त्रेतायुग - इस युग में श्री हनुमान को भक्ति, सेवा और समर्पण का आदर्श माना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक विष्णु अवतार श्री राम और रुद्र अवतार श्री हनुमान यानी पालन और संहार शक्तियों के मिलन से जगत की बुरी और दुष्ट शक्तियों का अंत हुआ।

द्वापर युग - इस युग में श्रीहनुमान नर और नारायण रूप भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के साथ धर्मयुद्ध में रथ की ध्वजा में उपस्थित रहे। यह प्रतीकात्मक रूप में संकेत है कि श्रीहनुमान इस युग में भी धर्म की रक्षा के लिए मौजूद रहे।

कलियुग - पौराणिक मान्यतओं में कलियुग में श्रीहनुमान का निवास गन्धमादन पर्वत (वर्तमान में रामेश्वरम धाम के नजदीक) पर है। यही नहीं, माना जाता है कि कलियुग में श्रीहनुमान जहां-जहां अपने इष्ट श्रीराम का ध्यान और स्मरण होता है, वहां अदृश्य रूप में उपस्थित रहते हैं। शास्त्रों में उनके गुणों की स्तुति में लिखा भी गया है कि -

'यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृत मस्तकांजलिं।'

इस तरह श्रीहनुमान का स्मरण हर युग में अलग-अलग रूप और शक्तियों के साथ संकटमोचक बन जगत को विपत्तियों से उबारते रहे हैं।

20/03/2014

Hindu Festivals – March 2014

12th March 2014 (Wednesday) Amalaki Ekadashi
14th March 2014 (Friday) Meena Sankranti
16th March 2014 (Sunday) Holika Dahan
17th March 2014 (Monday) Holi
24th March 2014 (Monday) Sheetala Ashtami , Basoda
27th March 2014 (Thursday) Papmochani Ekadashi
31th March 2014 (Monday) Yugadi , Gudi Padwa

Ekadashi dates for the year 2014-Ekadashi tithi is considered auspicious and Lord Vishnu worshiped on this day. On this ...
20/03/2014

Ekadashi dates for the year 2014-
Ekadashi tithi is considered auspicious and Lord Vishnu worshiped on this day. On this day, devotees wake up early in the morning, take ritual bath, worship the God and take vow for the fast. Each Hindu lunar month consists of two Ekadashi tithis - One is in Krishna paksha (Dark Fortnight) and another in Shukla paksha (Bright Fortnight).

Here we are providing Ekadashi dates for the year 2014. This may vary by a day according to your location.

11th January 2014 - Saturday - Pausha Putrada Ekadashi
27th January 2014 - Monday - Shattila Ekadashi
10th February 2014 - Monday - Jaya Ekadashi
25th February 2014 - Tuesday - Vijaya Ekadashi
12th March 2014 - Wednesday - Amalaki Ekadashi
27th March 2014 - Thursday - Papmochani Ekadashi
11th April 2014 - Friday - Kamada Ekadashi
25th April 2014 - Friday - Varuthini Ekadashi
10th May 2014 - Saturday - Mohini Ekadashi
24th May 2014 - Saturday - Apara Ekadashi
09th June 2014 - Monday - Nirjala Ekadashi
23rd June 2014 - Monday - Yogini Ekadashi
08th July 2014 - Tuesday - Devshayani Ekadashi
09th July 2014 - Wednesday - Devshayani Ekadashi
22nd July 2014 - Tuesday - Kamika Ekadashi
07th August 2014 - Thursday - Shravana Putrada Ekadashi
21st August 2014 - Thursday - Aja Ekadashi
05th September 2014 - Friday - Parsva Ekadashi
19th September 2014 - Friday - Indira Ekadashi
04th October 2014 - Saturday - Papankusha Ekadashi
05th October 2014 - Sunday - Papankusha Ekadashi
19th October 2014 - Sunday - Rama Ekadashi
03rd November 2014 - Monday - Devutthana Ekadashi
18th November 2014 - Tuesday - Utpanna Ekadashi
02nd December 2014 - Tuesday - Mokshada Ekadashi
18th December 2014 - Thursday - Saphala Ekadashi

Phoolon ki holi- 15 March 2014
15/03/2014

Phoolon ki holi- 15 March 2014

15/03/2014
फूलों की होली दिनांक 15 मार्च 2014, शनिवार को सायं 7 बजे से 8 बजे बिहारी जी के साथ फूलों की होली मेँसपरिवार सम्मलित होकर...
14/03/2014

फूलों की होली

दिनांक 15 मार्च 2014, शनिवार को
सायं 7 बजे से 8 बजे
बिहारी जी के साथ फूलों की होली मेँ
सपरिवार सम्मलित होकर आनंद लें एवं प्रसाद ग्रहण करें
स्थान - श्री सनातन धर्म सभा - शहज़ादी मंडी ,आगरा

10/03/2014

श्री सनातन धर्म सभा शहजादी मण्डी आगरा ,मन्दिर खुलने का समय निम्न प्रकार है

होली से - सुबह 6 बजे से 10.30 बजे , सायं - 5.30 बजे से 9.30 बजे

दीपावली से - सुबह 6.30 बजे से 11 बजे , सायं - 5 बजे से 9 बजे

शनिवार को शनिदेव मंदिर सुबह 6 बजे से रात्रि 11 बजे

कलावा के बारे में कितना जानते हैं आप -----__________________________________________________आपने देखा होगा कि लोग पूजा-प...
08/03/2014

कलावा के बारे में कितना जानते हैं आप -----
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आपने देखा होगा कि लोग पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर कलाई में मौली यानी कलावा बांधते हैं। आपने सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण हो सकता है।

अगर आप यह मानते है कि यह धार्मिक कारणों से होता है तो आप आधी-अधूरी जानकारी रखते हैं। असल में कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

कलावा बांधने की परंपरा ऐसे शुरु हुई
वैज्ञानिक करणों पर बात करने से पहले आइये बात करते हैं इसके कुछ धार्मिक पहलुओं पर। शास्त्रों के अनुसार कलावा यानी मौली बांधने की परंपरा की शुरुआत देवी लक्ष्मी और राजा बलि ने की थी।

कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन पर आने वाले संकट से रक्षा होती है।

इसका कारण यह है कि कलावा बांधने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव की कृपा प्राप्त होती है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की अनुकूलता का भी लाभ मिलता है।

गंभीर रोगों से रक्षा करता है कलावा
शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती है।

कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। इससे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का सामंजस्य बना रहता है।

माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाव होता है।

कब कैसे धारण करें कलावा
शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

पर्व त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।

Shani Amavashya - 1 March 2014
04/03/2014

Shani Amavashya - 1 March 2014

महाशिवरात्रि - महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है।फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को श...
27/02/2014

महाशिवरात्रि -
महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।
इस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, उपवास करते तथा रात्रि को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है।
इस दिन शिव की शादी हुई थी इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है।

विधि
• इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है।
• रात्रि को जागरण करके शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है।
• अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इसके करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपज जाता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-
॥शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्। आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है।
चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। अत: प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश व पुन:स्थापन के बीच की कड़ी है। प्रलय यानी कष्ट, पुन:स्थापन यानी सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।

कारोबार वृद्धि के लिए- महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहर्त में पारद शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है।

बाधा नाश के लिए - शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। ॥ॐ तुत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात्॥

बीमारी से छुटकारे के लिए - शिव मंदिर में लिंग पूजन कर दस हज़ार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पर करें।

शत्रु नाश के लिए - शिवरात्रि को रूद्राष्टक का पाठ यथासंभव करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

मोक्ष के लिए- शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखें। ॐ नम: शिवाय।
रुद्राभिशेक से लाभ् यदि वर्शा चाह्ते है तो जल से रुद्राभिशेक करे व्यधि नाश के लिये कुशा से करे यदि पशुओ कि कामना चाह्ते है तो दहि से रुद्रभिशेक करे श्रिः कि कामना चाह्ते है तो गन्ना के रस से रुद्रभिशेक करे

ज्‍योर्तिलिंग -
बारह स्‍थानों पर बारह ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं। जानिए शिव के 12 ज्योतिर्लिंग
1. सोमनाथ यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।
2. श्री शैल मल्लिकार्जुन मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थातिप है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।
3. महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।
4. ओंकारेश्वर ममलेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदाने देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।
5. नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।
6. बैजनाथ बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।
7. भीमशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।
8. त्र्यंम्बकेश्वर नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।
9. घुमेश्वर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग।
10. केदारनाथ हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है।
11. विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।
12. रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।

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Shazadhi Mandi
Agra
282001

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