द्वापरयुग में भगवान शंकर के द्वारा स्थापित शिवलिंग, जिसपर चाँदी का आवरण धारण कराया गया है।
11 अखंड ज्योत यहाँ 24/7 प्रज्वलित रहती हैं।
मन की कामना पूरी करने वाले बाबा मनःकामेश्वरनाथ 🙏
भगवान शंकर की पूजा परम वैष्णव स्वरूप में की जाती हैं । It is one of the ancient temples devoted to Bhagwan Shiv.It is said that the Shivlinga covered by the silver metal was founded by Shiv himself during Dwapara
era, when Krishna was born in Mathura. For child Krishna's darshan, Shiv arrived from Mount Kailash and rested here which was a Shamshaan (cremation ground) then. River Yamuna which used to flow here. Shiva meditated and stayed here overnight and wished that if he would be able to make Krishna play on his lap, he would establish a linga here. Next day, after seeing Shiv's swaroop, mother Yashoda asked Shiv not to come near the child as Krishna might get scared of him. Seeing this, Krishna did a leela (drama). He started crying while pointing towards Shiv who was sitting under a banyan tree in samadhi position. Mother Yashoda called Shiv and asked him to give his blessings to her child (Krishna). While returning from Gokul, Shiv laid his linga(swaroop) here. Then, he desired that as his wishes were fulfilled here; whosoever, in future, comes here with his mankamna (wishes), his lingaswaroop will fulfill his or her mankamna(wishes). From then onwards, this lingaswaroop is known as Shri Mankameshwarnath Ji.
श्री मनःकामेश्वर मंदिर हिन्दूओं का प्रसिद्व धार्मिक स्थान है जो कि भगवान शिव के लिए पूर्णतयः समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि यहां शिवलिंग की स्थापना खुद भगवान शिव ने द्वापर युग में की थी। यह मंदिर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश, आगरा में स्थित है। इस मंदिर में शिवलिंग को चांदी की परत का आवरण किया गया है। इस मंदिर यदि कोई श्रदालु शिवलिंग के पास जाना चाहता है तो उसको भारतीय वेशभूषा में होना जरूरी है :- जैसे - धोती, साड़ी आदि।
पौराणिक कथा के अनुसार, मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उनके बाल-रूप के दर्शन की कामना को लेकर भगवान शिव जा रहे थे, तो भगवान शिव ने एक रात यहां बिताई थी और साधना की थी। उन्होंने यह प्रण किया था, कि यदि वह कान्हा को अपनी गोद में खिला पाए, तो भगवान शिव इस स्थान पर शिवलिंग के में विराजमान रहेगें। जब भगवान शिव कान्हा के दर्शन हेतु उनके घर गये, तो यशोदा मैया उनके भस्म-भभूत और जटा-जूटधारी रूप को देख डर गई, तो यशोदा मैया ने सोच कि कान्हा भगवान शिव को देखकर डर जायेगा।
भगवान शिव वहीं एक बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गये। तब भगवान श्री कृष्ण ने लीला शुरू कर दी और रोते-रोते शिव की तरफ इशारा करने लगे। तब यशोदा माई ने शिव को बुला कर, कान्हा को उनकी गोद में दिया और तब जाकर कृष्ण चुप हुए।
तब से भगवान इस मंदिर में शिवलिंग में रूप में विराजमान है। ऐसा माना जाता है जिस तरह भगवान शिव इच्छा की पुरी हुई है, उसी तरह से सच्चे मन से यहां आने वाले मेरे हर भक्त की मनोकामना पूरी होगी।
मंदिर परिसर के भीतर मुख्य गर्भ गृह के पीछे कई सारे छोटे-छोटे मंदिर हैं। यहां देसी घी से प्रज्ज्वलित होने वाली 11 अखंड जोत निरंतर जलती रहती हैं। अपनी मनोकामना पूरी होने पर भक्त यहां आकर एक दीप जलाते हैं, जिसकी कीमत सवा रुपए से लेकर सवा लाख रुपए तक हो सकती है।