The Hindu Research Foundation

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27/04/2024

सुप्रभात, मस्त व्यस्त स्वस्थ रहे, जय जय श्री राधे।🌺

पैसे से नहीं मन से अमीर बने....मंदिरों मे सोने के कलश भले ही लगे हो... लेकिन माथा तो पत्थर की बनी सीढियों पर ही झुकाना प...
01/02/2024

पैसे से नहीं मन से अमीर बने....
मंदिरों मे सोने के कलश भले ही लगे हो...

लेकिन माथा तो पत्थर की बनी सीढियों
पर ही झुकाना पड़ता है....!!

*Gyanvapi Survey: 17वीं शताब्दी में तोड़ा गया था मंदिर, ज्ञानवापी परिसर की ASI सर्वे रिपोर्ट में कई बड़े खुलासे*https://...
27/01/2024

*Gyanvapi Survey: 17वीं शताब्दी में तोड़ा गया था मंदिर, ज्ञानवापी परिसर की ASI सर्वे रिपोर्ट में कई बड़े खुलासे*
https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/varanasi/gyanvapi-survey-report-application-filed-in-court-for-copy-of-survey-report-2024-01-25
*ज्ञानवापी परिसर की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट की नकल 839 पेज की है, जो पांच लोगों को मिल गई है। रिपोर्ट में कई खुलासे हुए हैं।*

◆ 2 सितंबर 1669 में मंदिर तोड़ा गया था
हिन्दू मन्दिर के भग्नावशेष के उपयोग कर के मस्ज़िद बनाई गई
◆ मंदिर होने के 32 से ज्यादा सबूत
देवनागरी, कन्नड़ और तेलगु गर्न्थो के सबूत
जनार्दन रुद्र और उमेश्वर के नाम से इंक्रिप्सन मिले
◆ पिलर और प्लास्टर भी प्राचीन हिन्दू मंदिर के ही खम्भे थे। उसी को रियूज किया गया है
मस्ज़िद मंदिर के पिलर पर बनाया गया

*एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में ज्ञानवापी परिसर में जनार्दन, रुद्र और विश्वेश्वर के शिलालेख मिले हैं। रिपोर्ट में महामुक्ति मंडप लिखा है। एएसआई का कहना है कि यह मजबूत संकेत है।*

■ सर्वे में एक पत्थर मिला है जिस पर फारसी में लिखा है. इस पर औरंगजेब का वो आदेश लिखा है जिसमें मंदिर को गिराने का आदेश लिखा है. यह पत्थर टूटा हुआ है, जो एक कमरे से मिला है. इस पर मस्जिद बनाने की तारीख भी लिखी थी, जिसे मिटाया गया है.
■ एएसआई ने सर्वे के दौरान एक पत्थर पाया जो टूटा हुआ था। ऐसे में जदूनाथ सरकार की फाइंडिंग को सही पाया।
1669 में 2 सितंबर को मंदिर ढहाया गया था।
■ जो पिलर थे पहले के मंदिर के उनका इस्तेमाल मस्जिद के लिए किया गया। जो तहखाना S2 है, उसमें हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां थी।
■ एएसआई कहता है कि पश्चिमी दीवार एक हिंदू मंदिर का हिस्सा है। उसे आसानी से पहचाना जा सकता है।
■ 17वीं शताब्दी में मंदिर तोड़ा गया था। इसके बाद इसे मस्जिद के लिए इस्तेमाल किया गया।
■ एएसआई कह रहा है कि यहां मस्जिद से पहले हिंदू मंदिर का स्ट्रक्चर था। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन का कहना है कि अब सील वजूखाना की एएसआई सर्वे की मांग सुप्रीम कोर्ट से करेंगे।
■ मस्जिद की पश्चिमी दीवार एक हिन्दू मंदिर का भाग है। पत्थर पर फारसी में मंदिर तोड़ने में आदेश और तारीख मिली है। महामुक्ति मंडप लिखा पत्थर भी मिला है। विष्णु शंकर जैन ने कहा कि वजू खाने के सर्वे के लिए मांग करेंगे।

*विष्णु जैन ने कहा, हमारी वजू खाने के सर्वे की मांग जारी रहेगी, वहां हमारे बाबा विश्वनाथ मौजूद हैं.वहां एक हिंदू मंदिर था जिसे 17वीं शताब्दी में तोड़ा गया है. गौरतलब है कि एएसआई की रिपोर्ट मुस्लिम पक्ष को भी सौंपी गई है. इस पर मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता एकलाख अहमद ने कहा, हम सर्वे की रिपोर्ट रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही कोई बयान देंगे.*

ज्ञानवापी केस में पक्षकारों को एएसआई की सर्वे रिपोर्ट की हार्ड कॉपी मिल गई है।

22/01/2024
03/01/2024

16 सितंबर 1985
राम भवन, अयोध्या

शाम के समय 88 वर्ष की परिपक्व आयु का एक संन्यासी अंतिम सांस लेता है। उस समय संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे जोकि अयोध्या/फैज़ाबाद के रसूखदार और प्रसिद्ध लोग थे।

उनमें से एक थे डॉ. आर पी मिश्र, उस समय के अयोध्या के सबसे प्रसिद्ध MS सर्जन जिनसे लोग अपॉइंटमेंट के लिए तरसते थे। एक थे डॉ. टी सी बैनर्जी, जिन्हें 'होम्योपैथ ऑफ द ईस्ट' कहा जाता था। पंडा रामकिशोर भी थे, जो अयोध्या के तीर्थ पुरोहित थे। फैज़ाबाद डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के डॉ. बी राय, एक प्राध्यापक श्रीवास्तव जी, महात्मा शरण जो फर्नीचर का काम करते थे आदि उपस्थित थे।

ये सभी अपने गुरु को 'भगवनजी' कहकर संबोधित करते थे।

भगवन जी, 1983 में अयोध्या के सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह की कोठी 'राम भवन' में रहने आये थे। भगवन जी की विशेषता यह थी कि उनका चेहरा अमूमन किसी ने नहीं देखा था। वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाते थे और हमेशा एक मोटे पर्दे के पीछे बैठकर लोगों से बात करते थे।

अस्तु, आज उन भगवन जी की पार्थिव देह भी उसी सीक्रेसी के साथ राम भवन में रखी हुई थी। उनके देहावसान का समाचार कुछ महत्वपूर्ण लोगों को देने के साथ साथ एक संदेश कोलकाता भी भिजवाया गया। कोलकाता इसलिए कि भगवन जी शरीर से बंगाली थे और उनके पूर्वाश्रम के संबंधी कोलकाता में रहते थे।

17 सितंबर को दिनभर प्रतीक्षा करने के बाद शाम को यह तय किया गया कि अगले दिन 18 सितंबर को भगवनजी का अंतिम संस्कार कर दिया जाये।

18 सितंबर 1985 को बड़े ही गुपचुप तरीके से भगवनजी के पार्थिव शरीर को अयोध्या के 'गुप्तार घाट' ले जाया गया। गौरतलब है गुप्तार घाट सरयू नदी का वही घाट है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। यह स्थान आर्मी के कैंट एरिया में आता है और वहां डोगरा रेजिमेंट की छावनी है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं है किन्तु भगवनजी की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार यहीं होना था।

शीघ्रता से सब बंदोबस्त कर के मात्र 13 लोगों की उपस्थिति में भगवनजी की चिता गुप्तार घाट पर हल्की हल्की रिमिझिम बूंदों के बीच सज गयी।

पंडा रामकिशोर, ने चिता पर भगवनजी की पार्थिव देह को रखा देखकर बड़े मार्मिक स्वर में कहा अब तो भगवनजी के मुखमंडल के अंतिम दर्शन कर निशानी के लिए एक फोटो ही ले लो...! किन्तु डॉ. मिश्र ने रोकते हुए कहा, क्या गुरु आज्ञा का उल्लंघन करोगे? देश में क्या तूफान लाना है। भगवनजी की साधना गुप्त थी। उनकी आज्ञा का सम्मान हो।

संयोग ही था चिता में अग्नि देते ही डोगरा रेजिमेंट की फायरिंग रेंज में फायरिंग प्रैक्टिस शुरू हो गयी। मानों भगवनजी के पूर्ववर्ती जीवन के प्रति सैन्य सम्मान देना प्रकृति ने स्वयं निर्धारित किया हो!

कुछ ही दिनों के भीतर कैंट एरिया के अंदर गुप्तार घाट पर हुये इस गुप्त दाह संस्कार की खबर अयोध्या में आग की तरह फैल गयी। पत्रकारों ने अयोध्या में गुमनाम ज़िंदगी गुजारने वाले भगवनजी को नया नाम दिया, गुमनामी बाबा।

आने वाले महीनों में जब सरकारी हस्तक्षेप के बाद राम भवन में भगवनजी के कमरों को खोला गया तो सब दंग रह गये। उनके कमरों से 28 ट्रंक/ बक्से भरकर समान निकला जिसमें अधिकतर भारत और विश्व के जियोपोलिटिकल स्थिति से संबंधित पुस्तकें थीं। कुछ हस्तनिर्मित नक्शे थे जिनमें 62 की लड़ाई में लखीमपुर के रास्ते चायना पर हमला किया जाए तो कौन सा रूट भारतीय सेना को लेना चाहिए इसकी विस्तृत जानकारी थी। बाद में सैन्य अधिकारियों ने जब नक्शा देखा तो आश्चर्य से कह उठे इस तरह का मिलिट्री स्ट्रेटेजिक मैप तो आर्मी का कोई टॉप कमांडर बन सकता है। टाइम मैगजीन और द स्टेट्समैन न्यूज़पेपर भी सामान में थे।

और थे बक्से भर भर के पत्र चिट्ठियां, जिनमे चौकाने वाली थीं डॉ संपूर्णानंद से लेकर, बाबू बनारसी दास, चौधरी चरण सिंह जैसे उत्तर प्रदेश के पांच पांच मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठियां जिनमें भगवनजी इन नेताओं के राजनीति संबंधी प्रश्नों के उत्तर और दिशा निर्देश दे रहे थे।

कुछ चिट्ठी RSS के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर जी की भी थीं। गोलवलकर जी ने भगवन जी को पूज्यपाद श्रीमान विजयानंद जी महाराज संबोधित कर चरण स्पर्श किया था।
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🔔!!!! जय माता दी  !!!!🔔⛳⛳ शुभ दिन जी ⛳⛳माँ चिन्तपूर्णी जी के प्राकृतिक पिण्डी स्वरूप के आज दिनांक *26-6-2023* के प्रातःक...
26/06/2023

🔔!!!! जय माता दी !!!!🔔
⛳⛳ शुभ दिन जी ⛳⛳
माँ चिन्तपूर्णी जी के प्राकृतिक पिण्डी स्वरूप के आज दिनांक *26-6-2023* के प्रातःकाल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन

24/12/2022

*21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर तक इन्हीं 7 दिनों में गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था। उसी रात माता गूजरी ने भी ठन्डे बुर्ज में प्राण त्याग दिए । यह सप्ताह भारत के इतिहास में 'शोक सप्ताह' होता है, शौर्य का सप्ताह होता है ।*
क्रिसमस के समय शराब में डूबने और जश्न मनाने की बजाय, यह सप्ताह उन शहीदों को याद करते हुए बितायें..🙏
——-
पूस का 13वां दिन…. नवाब वजीर खां ने फिर पूछा…. बोलो इस्लाम कबूल करते हो ?

6 साल के छोटे साहिबजादे फ़तेह सिंह ने नवाब से पूछा…. अगर मुसलमाँ हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न ?

वजीर खां अवाक रह गया….उसके मुँह से जवाब न फूटा तो साहिबजादे ने जवाब दिया कि जब मुसलमाँ हो के भी मरना ही है , तो अपने धर्म में ही अपने धर्म की खातिर क्यों न मरें ?

दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का आदेश हुआ...🗡

दीवार चिनी जाने लगी ।
जब दीवार 6 वर्षीय फ़तेह सिंह की गर्दन तक आ गयी तो 8 वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा…..
फ़तेह ने पूछा, जोरावर रोता क्यों है ?
जोरावर बोला, रो इसलिए रहा हूँ कि आया मैं पहले था पर कौम के लिए शहीद तू पहले हो रहा है……

गुरु साहब का पूरा परिवार 6 पूस से 13 पूस… इस एक सप्ताह में कौम के लिए धर्म के लिए राष्ट्र के लिए शहीद हो गया ।

दोनों बड़े साहिबजादों, अजीत सिंह और जुझार सिंह जी का शहीदी दिवस !
और स्पष्ट कर दूँ...-
पहले पंजाब में इस हफ्ते सब लोग ज़मीन पर सोते थे क्योंकि माता गूजरी ने 25 दिसम्बर की वो रात दोनों छोटे साहिबजादों के साथ नवाब वजीर ख़ाँ की गिरफ्त में सरहिन्द के किले में ठंडी बुर्ज़ में गुजारी थी और 26 दिसम्बर को दोनो बच्चे शहीद हो गये थे । 27 तारीख को माता ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे।

लेकिन, अंग्रेजों की देखा-देखी पगलाए हुए हम भारतीयों ने गुरु गोविंद सिंह जी की कुर्बानियों को सिर्फ 300 साल में भुला दिया । ये बड़े शर्म की बात है कि हमने अपने गौरवशाली इतिहास को भुला दिया, और यही मूल कारण है कि हम ग़ुलाम बने।

कितनी जल्दी भुला दिया हमने इस शहादत को?

आइए, उन सभी ज्ञात-अज्ञात महावीर-बलिदानियों को याद करें जिनके कारण आज सनातन संस्कृति बची हुई है,…,

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