Bala Ji DHAM

Bala Ji DHAM SIYA RAMA JAI RAMA JAI JAI RAM.....

सिया राम जय जय सिया रामा..सिया राम जय राम जय जय राम......
16/04/2019

सिया राम जय जय सिया रामा..सिया राम जय राम जय जय राम......

सभी भक्तों का हार्दिक स्वागत है
29/03/2019

सभी भक्तों का हार्दिक स्वागत है

15/12/2018

जब केवट प्रभु के चरण धो चुका तो भगवान कहते है - भाई ! अब तो गंगा पार करा दे. इस पर केवट कहता है प्रभु नियम तो आपको पता ही है कि जो पहले आता है उसे पहले पार उतारा जाता है इसलिए प्रभु अभी थोडा और रुको.
भगवान कहते है -भाई ! यहाँ तो मेरे सिवा और कोई दिखायी नहीं देता इस घाट पर तो केवल मै ही हूँ फिर पहले किसे पार लगना है.?
केवट बोला - प्रभु! अभी मेरे पूर्वज बैठे हुए है जिनको पार लगाना है. झट गंगा जी में उतरकर प्रभु के चरणामृत से अपने पूर्वजो का तर्पण करता है. धन्य है केवट जिसने अपना,अपने परिवार और सारे कुल का उद्धार करवाया.
फिर भगवान को नाव में बैठाता है,दूसरे किनारे तक ले जाने से पहले फिर घुमाकर वापस ले जाता है. जब बार-बार केवट ऐसा करता है तो प्रभु पूछतें हैं -भाई बार बार चक्कर क्यों लगवाता है मुझे चक्कर आने लगे हैं.
केवट कहता है - प्रभु ! यही तो मै भी कह रहा हूँ | ८४ लाख योनियों के चक्कर लगाते लगाते मेरी बुद्धि भी चक्कर खाने लगी है, अब और चक्कर मत लगवाओ.
गंगा पार पहुँचकर केवट प्रभु को दंडवत प्रणाम करता है. उसे दंडवत करते देख भगवान को संकोच हुआ कि मैंने इसे कुछ दिया नहीं.
"केवट उतरि दंडवत कीन्हा,
प्रभुहि सकुच एहि नहि कछु दीन्हा"
कितना विचित्र द्रश्य है जहाँ देने वाले को संकोच हो रहा है और लेने वाला केवट उसकी भी विचित्र दशा है कहता है-
"नाथ आजु मै काह न पावा
मिटे दोष दुःख दारिद्र दावा
बहुत काल मै कीन्ह मजूरी
आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी"
लेने वाला कहे बिना लिए ही कह रहा है कि हे नाथ !आज मैंने क्या नहीं पाया मेरे दोष दुःख और दरिद्रता सब मिट गई. आज विधाता ने बहुत अच्छी मजदूरी दे दी |आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिये. भगवान उसे को सोने की अंगूठी देने लगते है. केवट कहता है प्रभु उतराई कैसे ले सकता हूँ. हम दोनों एक ही बिरादरी के है और बिरादरी वाले से मज़दूरी नहीं लिया करते.
दरजी, दरजी से न ले सिलाई
धोबी, धोबी से न ले धुलाई
नाई, नाई से न ले बाल कटाई
फिर केवट, केवट से कैसे ले उतराई
आप भी केवट, हम भी केवट, अंतर इतना है हम नदी मे इस पार से उस पार लगाते है, आप संसार सागर से पार लगाते हो, हमने आपको पार लगा दिया, अब जब मेरी बारी आये तो आप मुझे पार लगा देना. प्रभु आज तो सबसे बड़ा धनी मै ही हूँ क्योकि वास्तव में धनी कौन है? जिसके पास आपका नाम है, आपकी कृपा है, आज मेरे पास दोनों ही है. मै ही सबसे बड़ा धनी हूँ.
।।जय जय सियाराम।।

23/10/2018

(((( हनुमानजी की कृपा ))))
श्री पवनपुत्र दास जी नामक एक हनुमान जी के भोले भक्त हुए है।
यह घटना उस समय की है जब भारत देश मे अंग्रेजो का शासन था। अंग्रेज़ अधिकारी के दफ्तरों के बाहर इनको पहरेदार (आज जिसे सेक्युरिटी गार्ड कहते है ) की नौकरी मिली हुई थी।
घर परिवार चलाने के लिए नौकरी कर लेते थे, कुछ संतो की सेवा भी हो जाय करती थी पैसो से। कभी किसी जगह में जाना पड़ता, कभी किसी और जगह जाना पड़ता।
एक समय कोई बड़ा अंग्रेज़ अधिकारी भारत आया हुए था और पवनपुत्र दास जी को उनके निवास स्थान पर पहरेदारी करने का भार सौंप गया।
श्री पवनपुत्र दास जी ज्यादा पढ़े लिखे नही थे, संस्कृत आदि का ज्ञान भी उनको नही था परंतु हिंदी में श्री राम चरित मानस जी की चौपाइयों का पाठ करते और हनुमान चालीसा का पाठ लेते, ज्यादा कुछ नही आता था।
अन्य समय श्री हनुमान जी के रूप का स्मरण करते हुए सतत श्री सीताराम जी का नाम जप करते रहते... सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम इसी का जाप करते थे, मंत्र आदि उन्हें कुछ आते थे नही।
रात को बाहर बैठ जाते पहरेदारी करने और नाम जप, कीर्तन आदि में मग्न रहते। इनको अनुभूति होती कि हनुमान जी वहां उपस्थित हैं और श्री सीताराम जी का नाम श्रवण करते नित्य आते है।
कई बार दिखाई पड़ता कि हनुमान जी महाराज भाव मे भर कर नृत्य करने लगे है।
एक बार ऐसे ही पवनपुत्र जी बाहर बैठकर हनुमान जी का ध्यान कर रहे थे और उनको श्री सीताराम जी का नाम सुना रहे थे, वे कुछ समय बाद भाव मे मगन हो गए और उनकी आंखें बंद हो गयी।
कीर्तन चल रहा था और अंग्रेज़ अधिकारी के कानों मे उसकी ध्वनि पहुंची। उसी समय अंग्रेज अधिकारी बाहर दरवाज़े के बाहर आया और देखा कि पवनपुत्र दास जी आँखें बंद करके कीर्तन कर रहे है।
उस अधिकारी ने भक्त जी को कंधे पकड़ कर हिलाया परंतु वे तो भाव मे ही मगन थे। अंग्रेज़ अधिकारी क्रोध में भर कर अपशब्द कहने लगा परंतु फिर भी भक्त जी पर कोई असर नही हुआ।
उसने सोचा कि यह पहरेदार तो ठीक से काम पर ध्यान नही देता है, इसे तो दंड मिलना चाहिए। अंग्रेज़ अधिकारी चाबुक लेकर आया और भक्त जी पर उसने कई प्रहार किए।
कुछ देर में भक्त जी मूर्छित हो गए और वही पड़े रहे। उन्हें अगले दिन पता चला कि उनपर अधिकारी क्रोधित हुए थे और उन्हें नौकरी से भी निकाल दिया गया है।
अगले दिन हनुमान जी महाराज को भक्त का कीर्तन सुनने नही मिला।
एक महाभयंकर विशाल वानर का रूप धारण करके हनुमान जी उस अंग्रेज़ अधिकारी के निवास स्थान के अंदर चले गए और उसे बड़े बड़े नाखून और दांतों से उसका शरीर नोचने लगे। पूछ से भी उसे बहुत मार पड़ी।
वह अधिकारी कांप गया और डर से चिल्लाने लगा, उसने वानर पर गोलियां भी चलाई बंदूक से पर वह भी चूर चूर करके नीचे गिर रही थी। उसने सिपाहियों को मदद के लिए बुलाया पर कोई नही आया।
उसका शरीर घावों से भर गया और पूरे शरीर से रक्त बहने लगा, अंगों में दाह और दर्द के मारे वो पागल हो गया।
उसकी चिकित्सा बड़े बड़े डॉक्टरों द्वारा भी संभव नही हो पाई। उसके न तो घाव भरते और न शरीर का दाह काम होता।
अगली रात स्वप्न में वही भयंकर वानर का स्वरूप उस अधिकारी को दिखाई पड़ा और उसने कहा कि तुमने भगवान् श्री राम के भक्त का अपराध किया है... जाकर उसके चरण पकड़ो और क्षमा मांगो।
उस अधिकारी ने अगले दिन वह स्वप्न सबको बताया। एक अन्य सिपाही थोड़ा बुद्धिमान था, उसको सारी बात समझ में आ गयी।
उसने अधिकारी से कहा कि साहब, आपने जिस तरह के वानर का स्वरूप वर्णन किया है वह वानर और कोई नही स्वयं श्री हनुमान जी ही थे।
पवनपुत्र दास जी ने आजतक जहां भी नौकरी की, वहां कभी कोई चोरी नही हुई है। वे हनुमान जी के भक्त है।
आपने पवनपुत्र दास जी का अपमान किया और उन्हें कष्ट पहुँचाया है अतः आपको दवाई नही केवल भक्त पवनपुत्र दास जी ही बचा सकते है।
अंग्रेज़ अधिकारी किसी तरह सिपाहियों को लेकर सवारी में बैठकर भक्त जी के घर पहुंचा। उसने चरणों को पकड़ कर क्षमा याचना करते हुए सारी घटना सुनाई।
भक्त जी समझ गए कि वह स्वयं श्री हनुमान जी ही थे। पवनपुत्र दास जी रोकर अधिकारी से कहने लगे कि आप बड़े भायगशाली है आपको भगवान् के प्रिय भक्त श्री हनुमान जी का दर्शन एवं स्पर्श प्राप्त हुआ।
अधिकारी को कष्ट में देखकर उन्होंने हनुमान जी से प्रार्थना करते हुए कहा की इस अंग्रेज़ अधिकारी को क्षमा करें।
पवनपुत्र दास जी के प्रार्थना करने और उस अधिकारी का शरीर पूर्ववत स्वस्थ हो गया। यह चमत्कार देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया।
उसने भक्त जी से कहा कि आप सम्मान पूर्वक चलकर एक उच्च पद की नौकरी स्वीकार कीजिये।
पवनपुत्र दास जी ने हाथ जोड़कर कहा कि भगवान् को मेरे कारण कष्ट हुआ है, अब मै और नौकरी नही करना चाहता।
अंग्रेज ने भक्त जी को घर और बहुत से धन भेट में दिया जिसे उन्होंने गरीबो, गौ और संतो की सेवा करने के उपयोग में लिया।
उसके पश्चात पवनपुत्र दास जी आजीवन भगवान् के भजन में ही मग्न रहे, लोगो मे उनके प्रति बहुत श्रद्धा थी।
वह अंग्रेज़ अधिकारी भी अपना पद त्यागकर धीरे धीरे हिंदी सीख गया और भगवान् के भजन, सत्संग में लग गया।
उस अंग्रेज ने कमाया हुआ काफी धन भक्त जी के परिवार को दे दिया।
इस तरह भक्त पवनपुत्र दास और पवनपुत्र हनुमान जी की कृपा से वह अंग्रेज भी भक्त बन गया और उसका जीवन सफल हो गया।
पवनपुत्र दास जी अपने को हमेशा छिपा कर रखते थे और छिपकर ही भजन करते थे।
गृहस्थ होते हुए भी नौकरी करते समय निरंतर भजन में लगे रहने वाले थे। इनके विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नही है। संतो की कृपा से जितना बना उतना लिखा हमने।
मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा।।
राम सिन्धु घन सज्जन धीरा।
चन्दन तरु हरि संत समीरा।।
साभार :- श्री भक्तमाल कथा
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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29/09/2018
14/09/2018

गणपति बप्पा के आगे मोरया क्यो बोला जाता है?

आस्था की एक अनोखी यात्रा पिछले 600 सालों से जारी है। इस यात्रा में करोड़ों भक्त शामिल हैं। उनमें से कुछ इस यात्रा के बारे में जानते हैं तो कुछ बिना जाने चल रहे हैं। हम बात कर रहे हैं करोड़ों गणेश भक्तों की, जो सालों से गणपति बप्पा मोरया के नारे लगा रहे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नहीं जानते कि मोरया असल में थे कौन?

हो सकता है कि देश के हजारों गणेश भक्तों की तरह आप भी गणपति बप्पा के मोरया की कहानी ना जानते हों, लेकिन पुणे से 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ के इस इलाके का बच्चा-बच्चा मोरया की कहानी जानता है। मोरया गोसावी 14वीं शताब्दी के वो महान गणपति भक्त हैं जिनकी आस्था की चर्चा उस दौर के पेशवाओं तक पहुंची तो वो भी इस दर पर अपना माथा टेकने यहां तक चले आए। उन्हीं के नाम पर बना मोरया गोसावी समाधि मंदिर आज करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है। पुणे से करीब 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ में इस मंदिर की स्थापना खुद मोरया गोसावी ने की थी। इस मंदिर के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है।

कहते हैं कि मोरया गोसावी हर गणेश चतुर्थी को चिंचवाड़ से पैदल चलकर 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने जाते थे। ये सिलसिला उनके बचपन से लेकर 117 साल तक चलता रहा। उम्र ज्यादा हो जाने की वजह से उन्हें मयूरेश्वर मंदिर तक जाने में काफी मुश्किलें पेश आने लगी थीं। तब एक दिन गणपति उनके सपने में आए।

चिंचवाड़ देवस्थान के ट्रस्टी विश्राम देव कहते हैं कि 1492 की बात है। 117 साल उम्र थी। मयूरेश्वर जी सपने में आए, कहा कि जब स्नान करोगे तो मुझे पाओगे। जैसा सपने में देखा था, ठीक वैसा ही हुआ। मोरया गोसावी जब कुंड से नहाकर बाहर निकले तो उनके हाथों में मयूरेश्वर गणपति की छोटी सी मूर्ति थी। उसी मूर्ति को लेकर वो चिंचवाड़ आए और यहां उसे स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दी। धीरे-धीरे चिंचवाड़ मंदिर की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। महाराष्ट्र समेत देश के अलग-अलग कोनों से गणेश भक्त यहां बप्पा के दर्शन के लिए आने लगे। इस मंदिर में प्रवेश करते ही आपको कण-कण में भगवान गणेश की छाप दिखेगी।

मान्यता है कि जब मंदिर का ये स्वरूप नहीं था तब भी यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती थी। यहां आने वाले भक्त सिर्फ गणपति बप्पा के दर्शन के लिए नहीं आते थे, बल्कि विनायक के सबसे बड़े भक्त मोरया का आशीर्वाद लेने भी आते थे। भक्तों के लिए गणपति और मोरया अब एक ही हो गए थे।

पुणे शहर से 15 किलोमीटर दूर बसा चिंचवाड़ गांव मोरया गोसावी के नाम से मशहूर है। मोरया गोसावी मंदिर इस गांव की शान माना जाता है। गणेश के सबसे बड़े भक्त बनकर मोरया गोसावी ने गणेश का वरदान पाया और गणेश के नाम के साथ अपना नाम हमेशा के लिए जोड़कर सिद्धि प्राप्त कर ली। यही वजह है की चिंचवाड़ गावों में लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो वह नमस्ते नहीं बल्कि मोरया कहते हैं।

मोरया गोसावी को सबसे बड़े गणेश भक्त का दर्जा यूं ही नहीं मिल गया था। कहा जाता है कि 1375 में मोरया गोसावी का जन्म भी भगवान गणेश की कृपा से ही हुआ था। उनके पिता वामनभट और मां पार्वतीबाई की भक्ति से खुश होकर भगवान ने कहा था कि वो उनके यहां पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यही वजह है कि मोरया गोसावी का जन्मस्थल भी गणेश भक्तों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है।

बचपन से ही मोरया गोसावी गणेश भक्ति में कुछ इस तरह रम गए कि उन्हें दीन-दुनिया का कुछ ख्याल ही नहीं रहता। थोड़े बड़े हुए तो मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर में गणपति के दर्शन के लिए जाने लगे। ये सिलसिला तब तक चला जब तक कि स्वयं भगवान गणेश ने उन्हें स्वयं अपना प्रतिरूप नहीं सौंप दिया। तबसे गणपति के भक्त चिंचवाड़ के गजानन को मयूरेश्वर गणपति का अंश मानते हैं। साल में दो बार भगवान गणेश को पालकी में लेकर मयूरेश्वर मंदिर जाते हैं, ताकि भगवान का अपने अंश से भेंट हो सके।

पुणे शहर से करीब 80 किलोमीटर दूर मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई, इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन इतना तय है कि मोरया गोसावी की भक्ति ने इस तीर्थ स्थल को सभी गणेश भक्तों के लिए अहम बना दिया है। मान्यता है कि अष्टविनायक के दर्शन की शुरुआत भी मयूरेश्वर से होती है और अंत भी यहीं होता है। अष्टविनायक यानी 8 गणपति। ये आठ मंदिर महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों में हैं।

ये हैं पुणे के मोरगांव का मयूरेश्वर मंदिर, अहमदनगर के सिद्धटेक का सिद्धिविनायक मंदिर, रायगढ़ के पाली का बल्लालेश्वर मंदिर, रायगढ़ के कपोली का वरदनायक मंदिर, पुणे के थेउर का चिंतामणि मंदिर, पुणे के ही लेनयाद्री का गिरिजात्मज मंदिर, पुणे के ओजर का विघ्नेश्वर मंदिर और पुणे के रंजनागांव का महागणपति मंदिर। कहते हैं कि इन आठों गणपति के दर्शन के बाद भक्त की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। अष्टविनायक की ये यात्रा मयूरेश्वर मंदिर से शुरू होता है, इसीलिए इसे सर्वाद्य मंदिर कहते हैं।

मयूरेश्वर मंदिर परिसर में इस पेड़ के नीचे मोरया गोसावी की ये मूर्ति भक्ति की एक अनोखी कहानी कहती है। बताया जाता है कि एक बार चिंचवाड़ से चलकर मोरया गोसावी यहां तक आ तो गए, लेकिन आगे का रास्ता बाढ़ की वजह से बंद हो चुका था। तब इसी पेड़ के नीचे बैठकर मोरया गोसावी ने मयूरेश्वर गणपति को याद किया और भगवान अपने भक्त को दर्शन देने यहां तक चले आए। यहां आने वाले भक्तों की जितनी श्रद्धा मयूरेश्वर गणपति में हैं, उतनी ही मोरया गोसावी में है। भक्त मोरया गोसावी को मयूरेश्वर गणपति का अवतार मानते हैं। भक्तों के मुताबिक यहां आकर उन्हें दोनों देवों के दर्शन हो जाते हैं, उन्हें मनचाही मुराद मिल जाती है।

कहते हैं कि मोरया गोसावी जी ने संजीवन समाधि ले ली थी, यानी जीते जी वो समाधि में लीन हो गए थे। भक्त मानते हैं कि आज भी मोरया गोसावी इन दोनों तीर्थस्थलों में मौजूद हैं। यही वजह है कि यहां गणपति के साथ-साथ मोरया की भी पूजा की जाती है। भक्त सच्चे मन से एक ही जयकारा लगाते हैं।

आप सभी को पवित्र श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएं
28/07/2018

आप सभी को पवित्र श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएं

जय श्रीराम
04/07/2018

जय श्रीराम

जय श्रीराम जय श्रीबालाजी
03/07/2018

जय श्रीराम जय श्रीबालाजी

JAI SHRI RAM
01/07/2018

JAI SHRI RAM

05/04/2017

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