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बटुक भैरव भगवान भैरव का एक कोमल लेकिन अत्यंत शक्तिशाली रूप हैं। स्वयं भैरव, भगवान शिव का उग्र स्वरूप माने जाते हैं, परंत...
21/04/2026

बटुक भैरव भगवान भैरव का एक कोमल लेकिन अत्यंत शक्तिशाली रूप हैं। स्वयं भैरव, भगवान शिव का उग्र स्वरूप माने जाते हैं, परंतु बटुक भैरव बाल रूप में प्रकट होकर मासूमियत और दिव्यता का अद्भुत संगम दिखाते हैं।

काल भैरव की भयानक छवि के विपरीत, बटुक भैरव शुद्धता, संरक्षण और सहज कृपा का प्रतीक हैं। इसलिए वे विशेष रूप से उन भक्तों के प्रिय हैं जो भय, नकारात्मक ऊर्जा और अदृश्य बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं।

उनकी पूजा घर की रक्षा, नज़र-दोष और काले प्रभावों को दूर करने, तथा जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाने के लिए की जाती है। बाल स्वरूप में होने के बावजूद उनकी शक्ति असीम है — यह दर्शाता है कि ईश्वर केवल उग्र ही नहीं, बल्कि कोमल और प्रेमपूर्ण रूप में भी प्रकट हो सकते हैं।

बटुक भैरव हमें सिखाते हैं कि सच्ची शक्ति केवल बुराई के नाश में ही नहीं, बल्कि निष्कपटता, श्रद्धा और अटूट भक्ति में भी होती है। यही संतुलन भक्त को सुरक्षा और आंतरिक शांति दोनों प्रदान करता है।

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सिद्धपीठ श्री सालासर बालाजी धाम सेश्री बालाजी महाराज के आज के अलौकिक दर्शन 17-12-2025 पौष कृष्ण पक्ष बुधवार श्री बालाजी ...
17/12/2025

सिद्धपीठ श्री सालासर बालाजी धाम से
श्री बालाजी महाराज के आज के अलौकिक दर्शन 17-12-2025 पौष कृष्ण पक्ष बुधवार
श्री बालाजी महाराज की कृपा आप व आपके
परिवार पर बनी रहे

🌹अहंकार की बेड़ियां 🌹              सदैव असंतोष में जीना मनुष्य की नियति बन गई है। जिसके पास जितना भी है उसे उससे भी अधिक...
17/12/2025

🌹अहंकार की बेड़ियां 🌹
सदैव असंतोष में जीना मनुष्य की नियति बन गई है। जिसके पास जितना भी है उसे उससे भी अधिक चाहिए, क्योंकि वो स्वयं को उससे अधिक का अधिकारी मानता है। अपना भाग्य स्वयं बनने का भ्रम होना मानव जीवन की बड़ी त्रासदी है। यह व्यथा परम आनंद से उसे वंचित कर देती हैं। वास्तव में प्रत्येक मनुष्य वही है, जहां उसे होना चाहिए। कल वह वहीं होगा जहां उसका स्थान है। यह मनुष्य नहीं परमात्मा निश्चित करता हैं। उसकी सभी गणनाएं सदैव अचूक होती है। कभी ऐसा नहीं हुआ कि सूर्य प्रातः उदय और साय: काल अस्त न हुआ हो। पवन सदैव प्रवाहमान है। नदियों का जल सदैव सागर की ओर वेग धारण किए हुए है।
परमात्मा की इस विशाल व्यवस्था में मनुष्य तो एक लघु रचना है। उसे मात्र अपने उस जीवन का ज्ञान है जिसमें वह जी रहा है। परमात्मा के पास तो उसके जन्मों जन्मों का लेखा है। इसलिए परमात्मा ही यह तय करने में सक्षम है कि मनुष्य किन उपलब्धियों का अधिकारी है। वह तदनुरूप दे भी रहा है। एक वही ऐसी सत्ता है, जो देने में समर्थ है। किसी को बिना प्रयास प्राप्त हो रहा है। किसी को अनथक प्रयासों के बाद भी निराश होना पड़ रहा है। फिर भी मनुष्य अपनी सीमाओं को समझ नहीं पा रहा है। उसे विश्वास नहीं हो रहा कि दाता, नियंता और कर्ता कोई और है।
मनुष्य स्वयं की नहीं, उस कर्ता की इच्छा के आधीन है। एक दास जिसके जीवन पर अन्य का अधिकार है, वह अपनी किस बात पर अहंकार कर सकता है। वास्तव में मनुष्य का अपना कुछ नहीं है। जिस पांच तत्वों से उसका तन बना है, वे प्रकृति से उधार लिए हुए हैं और अंत में लौटाने है। इस तन में जो जीव तत्व है उसे परमात्मा ने स्थिर किया है। इसकी एक निश्चित कालावधि है। इसके बाद भी अहंकार का होना मनुष्य की अज्ञानता और उसके सुख में बंधन की तरह है। ये बेड़ियां उसे जीवन के सौंदर्य की अनुभूति से वंचित रखती है।
🙏🏻ॐ नमः शिवाय 🙏🏻

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