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18/11/2025

श्लोक (संस्कृत)

ये मनोनिग्रहे युक्ता ये धैर्यसमन्विताः ।
ते एव सुखिनो लोके ते एव मुक्ताश्च भूयसः ॥

हिंदी अर्थ

जो लोग मन को संयमित रखते हैं और धैर्य से युक्त हैं,
उन्हीं को संसार में सुख मिलता है,
और वही अंततः मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

18/11/2025

४. संसार–स्वभाव श्लोक

श्लोक (संस्कृत)

यथा दृश्यं यथा स्वप्नं यथा गन्धर्वनगरम् ।
तथैवेदं शरीरादि दृष्टं जगदवस्थितम् ॥

हिंदी अर्थ

यह संसार—यह शरीर, यह जगत—
स्वप्न समान, मायामय और अस्थिर है;
जैसे गंधर्वों का नगर (काल्पनिक शहर) केवल दिखाई देता है,
वैसे ही यह जगत भी केवल अनुभूति है।

18/11/2025

३. आत्मज्ञान–श्लोक

श्लोक (संस्कृत)

अहमस्मि सदा भामि कदाचिन्नाहमप्रियः ।
ब्रह्मैवाहमतो नान्यदिति मे निश्चिता मतिः ॥

हिंदी अर्थ

मैं सदैव हूँ, हमेशा प्रकाशमान हूँ,
मैं कभी अप्रिय नहीं हो सकता।
मैं ही ब्रह्म हूँ, मुझसे अलग कुछ नहीं—
यह मेरा दृढ़ निश्चय है।

18/11/2025

२. वैराग्य–श्लोक

श्लोक (संस्कृत)

यदा न मे भवेद् वाञ्छा सर्वभावेषु काचना ।
तदा निर्विकल्पतां याति मनो नान्यथ कर्हिचित् ॥

हिंदी अर्थ

जब मन में किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रहती,
तभी मन निर्विकल्प (शुद्ध, शांत) होता है।
अन्य किसी उपाय से यह शांति प्राप्त नहीं होती।

18/11/2025

१. मनः कल्याण–श्लोक

श्लोक (संस्कृत)

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयो आसक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थ

मन ही मनुष्यों के बंधन और मुक्ति – दोनों का कारण है।
विषयों (इच्छाओं) में आसक्त मन बंधन का कारण बनता है,
और जो मन विषयों से रहित और स्थिर हो जाए, वही मुक्ति का कारण बनता है।

जयगुरुदेव प्रणाम 🙌🌷🌺

17/08/2025

*"Trust" and "Believe":* _both are not same._:
(Well Explained)
*जय श्री कृष्ण जगन्नाथ।*
👇👇
A Person started to Walk on a Rope tied between Two Tall Towers. He was Walking Slowly, Balancing a Long Stick in his Hands. He had his Son sitting on his Shoulders.

Every one on the ground was watching him in Bated Breath and was very Tense. When he slowly reached the Second Tower, every one Clapped, Whistled and Welcomed him. They Shook Hands and Took Selfies.

He asked the Crowd “Do you all think I can Walk Back on the same rope now from this side to that side?”

Crowed shouted in one Voice “Yes, Yes, you can.."

Do you Trust me, he asked? They said Yes, Yes, we are ready to Bet on you.

He said okay, can any one of you give your Child to sit on my Shoulder; I will take the child to the other side Safely..

There was Stunned Silence. Every one became Quiet.

Belief is different. Trust is different. For Trust you need to Surrender Totally.

This is what we lack towards God in today’s World.

We believe in Almighty. But do we Trust Him?

Very Beautiful Message, explaining difference between Trust and Belief.
*जय श्री कृष्ण जगन्नाथ।*
😍😍🌷💐🙏🙏🙇‍♂️🙇‍♂️

17/08/2025

श्री श्री सद्गुरु संग
*धर्म और उसके सिद्धांत इसपर भाषण*
२६ तारीख , आषाढ मास , शनिवार
आजकल श्री गोसाईं जी के बारे में जो चर्चे हो रहे हैं , उसको सहना हमारे लिए अशक्यप्राय हो रहा था | अगर श्री गोसाईं जी हिंदू समाज के भ्रष्टाचार तथा अंधश्रद्धा के बारे में कुछ बोलें तो , हम उनको हमारी तरह एक ब्राह्मो मानकर , बाकी लोगों का मुँह बंद कर सकते थे , लेकिन समस्या यह थी कि वे किसी भी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं थे | आज श्री गोस्वामी महाशय को , धर्म और उसके सिद्धांत इस विषय पर बोलने के लिए प्रार्थना की गयी , सत्यत: उनका शरीर बहोत कमजोर था , फिर भी , उन्होंने स्वीकार किया |
शामको ठीक ५:३० बजे वे ब्राह्मो मंदिर के , एक सामान्य से बडे बेंच पर , आकर बैठे , और बोलना आरंभ किया , मैंने भी अपना लिखना आरंभ किया ,
मेरे नोटस् कुछ इस तरह :-
*आजका हमारा विषय है , धर्म और उसके सिद्धांत* *धर्म इस शब्द से हमें क्या बोध होता है?* *जैसे जलाना यह अग्नी का धर्म है , ठंडा करना यह जल का धर्म है* , *वैसे धर्म यह हर व्यक्ती का जन्मजात गुणधर्म है* *मनुष्य संस्कारी हो , अथवा संस्कारविहीन हो , ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी हो , बच्चा हो अथवा बूढा हो* *लेकिन धर्म यह हर मनुष्य का जन्मजात गुणधर्म है* *यह गुणधर्म तीन भागोंमें बाँटा गया है , ज्ञान , प्रेम और इच्छा* *हर मनुष्य का उच्चतम उद्देश्य यही होता है कि , इन तीन गुणधर्मों को प्राप्त करना और उनका विकास करना*, *यही मनुष्य का धर्म है |*
*धर्म एक सत्य है |* *सत्य वो ही होता है , जो सबके लिए सत्य है , हर समाज , हर राष्ट्र को यह सत्य मानना पडता है* *इसमें कोई परस्परविरोधी मत ( राय ) हो ही नहीं सकता* *यह मानवी गुणधर्म है* |
किसी ने तो इस जगत का निर्माण किया है , इस जगत का अस्तित्व है , वैसे मेरा अस्तित्व है | इन तीन अस्तित्वोंको को नकार नहीं सकता | सत्य और अहिंसा यह धर्म के पहलू हैं | जहाँ मनुष्य का अस्तित्व है , वहाँ सत्य के लिए विवेकबुद्धि होना निसर्गदत्त है | जब किसी व्यक्ति को यह मन की मुलभूत बातें ज्ञात होती हैं , तभी सच्चे ज्ञान का दर्शन होता है | सत्य से ही धर्म की प्राप्ती हो सकती है | मन जबतक संतुष्ट नहीं रहेगा , तबतक धर्म की प्राप्ती नहीं हो सकती | सरल मन से सत्य को स्वीकार करो , तो ही मन संतुष्ट रहेगा | असत्य व्यवहार , असत्य विचार तथा असत्य भावनाओं से मन सदैव असंतुष्ट ही रहेगा | संतुष्ट मन के लिए , सरल विचारोंसे , सत्य को ही अपना लक्ष्य बनाना पडेगा |
जिसको भी सत्य का पीछा करना है , वह अपने आत्मा की आवाज पहले सुनेगा , किसी की प्रतीक्षा किये बगैर वह अपने आत्मा की आवाज पहले सुनेगा | वह किसी व्यक्ति की , समाज की परवाह नहीं करेगा , किसीके फायदा तथा नुकसान के बारे में भी नहीं सोचेगा | अपने स्वयं के फायदे तथा नुकसान के बारे में भी नहीं सोचेगा | वह व्यक्ति मौन रहकर अपना कर्तव्य करता रहेगा | अपने काम का भी वह गाजावाजा नहीं करता , जिस तरह सूर्य और चंद्र , मौन रहकर अपना कर्तव्य करते हैं , उसी तरह वह व्यक्ति काम करता रहेगा | अगर इस तरह से कोई काम करता है तो तो , आसपास के लोगों को भी प्रेरणा मिलती है , और वे धन्य हो जाते हैं |
जय गुरुदेव प्रणाम
🙏🙏🙏🙏🙏

25/04/2025

_*।। वरुथिनी एकादशी ।।*_

_सर्वप्रथम आपसभी को वरुथिनी एकादशी की ढेर सारी शुभकामनाएं।_
भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा आपसभी पर सदैव बनी रहें यही भगवान से प्रार्थना हैं। 🙏

वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को *वरूथिनी एकदशी* के नाम से जानते हैं। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है और भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से श्राद्धा, सभी पापों से मुक्ति, धन, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्त होती हैं।

‘वरुथिनी’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘वरुथिन्’ से बना है, जिसका मतलब है–प्रतिरक्षक, कवच या रक्षा करने वाला। वैशाख कृष्ण एकादशी का व्रत भक्तों की हर संकट से रक्षा करता है, इसलिए इसे वरुथिनी एकदशी कहा जाता हैं।

*कथा*

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यन्त दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्री विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला।

राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले- 'हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।' भगवान की आज्ञा मान राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया। इसके प्रभाव से वह शीघ्र ही पुन: सुन्दर और सम्पूर्ण अंगों वाला हो गया।

मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी के दिन धर्म कार्य में दान पुण्य का कार्य करने से जीवन में संकटों से मुक्ति मिलती हैं और परिवार में खुशहाली आती हैं। अतः इस शुभ अवसर पे दान पुण्य का कार्य अवश्य करें।

भगवान श्री विष्णु की कृपा से संपूर्ण सृष्टि का कल्याण हो, सभी का जीवन संकट मुक्त, सुख-समृद्धि एवं आरोग्यता से परिपूर्ण हो, यही प्रार्थना है।
*जय श्रीहरि* 🙏

22/04/2025

_*भगवद्गीता क्यों पढ़े ?*_

आपको गीता इसलिए पढ़नी चाहिए क्योंकि गीता आध्यात्मिक आदर्श-जीवन एवं सम्पूर्ण मानव-धर्म का अद्भुत महाकाव्य है। इसमें अर्जुन की भाँति द्वन्द्व में फँसे मोहग्रस्त मानव को सत्य-असत्य, कर्तव्य-अकर्तव्य की चेतना द्वारा वीर योद्धा की भाँति कर्म पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा दी गयी है। आध्यात्मिक-ज्ञान, योग, सन्यास एवं कर्म-सिद्धान्त के विस्तृत विवेचन के साथ ही इसमें शान्ति प्रदायिनी भक्ति तथा सत्य सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों का निरुपण है।

गीता एक ऐसा जीवन दर्शन है, जिससे अनन्त काल से भटकते जिज्ञासु मानव की उन्नत एवं उदार आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ परम विश्रान्ति का भान होता है। यह सर्व सुलभ वह ईश्वरीय ज्ञान है, जो सत्कर्म तथा सद्धर्म से पलायन करते मनुष्य को धर्म संदेश द्वारा सर्वत्र विजय का वरदान देता है।
इसे योग का ऐसा कल्पवृक्ष भी कह सकते हैं जिससे लौकिक एवं पारलौकिक अनन्त आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। यहाँ ज्ञान, कर्म, भक्ति की त्रिवेणी का अद्भुत संगम है।
गीता हमें शांत, सुखी, स्वतंत्र, समृद्ध जीवन जीने की शक्ति प्रदान करती है। यह द्वन्द्व में फँसे व्यक्ति को द्वन्द्वमुक्त, सत्वस्थ होने का जीवन-सूत्र प्रस्तुत करती हैं। गीता में अनन्त जिजीविषा को समेटे उच्चतम तत्वज्ञान की अखण्ड धारा प्रवाहित है। इसमें ज्ञान का वह शाश्वत प्रवाह है, जो अनेक ऋषियों, महर्षियों, ज्ञानियों, ध्यानियों, मनीषियों द्वारा भिन्न-भिन्न दृष्टि से जाँचा-परखा गया है।

आनन्द का मूल स्रोत गीता शाश्वत शान्ति की चिन्मयी चिन्तामणि है। इसमें ब्रह्म विद्या के गूढ़ रहस्य एवं ज्ञान का सुस्पष्ट व्याख्यान है। गीता भौतिक जगत की कलुषित चेतना से मुक्ति का संदेश देती है। यह परात्पर परब्रह्म श्री कृष्ण के 'पाञ्चजन्य' का ऐसा जय घोष है, जिसमें सर्वत्र विजय ही विजय है। ज्ञानियों की दृष्टि में यह मात्र आध्यात्मिक जीवन का विस्तार ही नहीं अपितु सत्संकल्पों की सुगंधित सुमनाञजलि है। यह आध्यात्मिक क्षेत्र का सबसे बड़ा धार्मिक एवं दार्शनिक संवाद है, जिसमें सर्वज्ञ, योगेश्वर श्री कृष्ण महान उपदेष्टा तथा अर्जुन जैसा सुधी जिज्ञासु शिष्य विद्यमान है, जिसने भलीभाँति श्रद्धा एवं समर्पण का पाठ सीख लिया है।

इसीलिए वह परमात्मा श्री कृष्ण से कल्याणकारी मार्ग एवं सद्ज्ञान की पुनः पुनः प्रार्थना करता है। संसार में जो पूर्ण श्रद्धावान विनत एवं समर्पण भाव रखने वाला है, वही गीता के पठन-पाठन चिन्तन मनन का अधिकारी हो सकता है।

गीता उन पुरुषों के लिए संजीवनी है, जो तत्वज्ञान से दूर मिथ्याज्ञान, मिथ्याकर्म एवं मिथ्या अभिमान में रहते हुए आजीवन कष्ट भोगते हैं।

गीता व्यक्ति को सुखी, निर्भय, निर्मुक्त, स्वतंत्र जीवन की कला प्रदान करती हैं। इसमें कर्म प्रेरणा के माध्यम से परम पुरुषार्थ का मार्ग प्रशस्त किया गया है। मानवता का महामन्त्र स्वधर्म का आचरण जीवन से अधिक मूल्यवान है। हमारे आध्यात्मिक ज्ञान तथा उत्कृष्ट कर्मों की सफलता भगवत्कर्मों को करते हुए सार्थक जीवन जीने में है। कर्मों को बंधनकारी समझकर कर्म त्याग करने वाले जीवन का सर्वस्व खो देते है। गीता शांत सुखी बनाकर अमृतमय रसधार से जीवन को सदैव सिंचित करने वाली अजस्र धारा है। सत्य ज्ञान के अभाव में बड़े-बड़े विद्वान बुद्धिमान भी कुतर्को कुमान्यताओं, अन्ध विश्वासों के जाल में फँसकर अनन्त दुःख भोगते रहते हैं। जब कि अभ्युदन एवं निःश्रेयस का सहज मार्ग गीता में उपलब्ध है।
Jaigurudev

15/04/2025

“एक ओंकार – ईश्वर एक है।”
– श्री गुरु नानक देव जी

1. नाम जपो, कीरत करो, वंड छको।
(ईश्वर का नाम लो, मेहनत से कमाओ, और मिल-बांटकर खाओ।)

2. सेवा सबसे बड़ा धर्म है। बिना स्वार्थ के सेवा करना ही सच्ची भक्ति है।

3. मन की मैल को धोने के लिए पवित्रता, सच्चाई और करुणा जरूरी है।

4. कर्म किए बिना कोई भी मोक्ष या मुक्ति नहीं पा सकता।

5. जिसमें अहंकार नहीं, वही सच्चा भक्त है।

15/04/2025

“भक्ति वह पुल है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।”
– स्वामी रामानुजाचार्य

1. परमात्मा को पाने का सर्वोत्तम मार्ग है निष्काम भक्ति।

2. हर जीव में भगवान का अंश है – सबकी सेवा ही भगवान की सेवा है।

3. ज्ञान तभी पूर्ण है जब वह भक्ति और करुणा से जुड़ा हो।

4. अपने अहंकार को त्याग दो – वही तुम्हारे और भगवान के बीच का सबसे बड़ा पर्दा है।

5. भगवान को पाना है तो प्रेम, विश्वास और समर्पण के साथ जियो।

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