17/08/2025
श्री श्री सद्गुरु संग
*धर्म और उसके सिद्धांत इसपर भाषण*
२६ तारीख , आषाढ मास , शनिवार
आजकल श्री गोसाईं जी के बारे में जो चर्चे हो रहे हैं , उसको सहना हमारे लिए अशक्यप्राय हो रहा था | अगर श्री गोसाईं जी हिंदू समाज के भ्रष्टाचार तथा अंधश्रद्धा के बारे में कुछ बोलें तो , हम उनको हमारी तरह एक ब्राह्मो मानकर , बाकी लोगों का मुँह बंद कर सकते थे , लेकिन समस्या यह थी कि वे किसी भी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं थे | आज श्री गोस्वामी महाशय को , धर्म और उसके सिद्धांत इस विषय पर बोलने के लिए प्रार्थना की गयी , सत्यत: उनका शरीर बहोत कमजोर था , फिर भी , उन्होंने स्वीकार किया |
शामको ठीक ५:३० बजे वे ब्राह्मो मंदिर के , एक सामान्य से बडे बेंच पर , आकर बैठे , और बोलना आरंभ किया , मैंने भी अपना लिखना आरंभ किया ,
मेरे नोटस् कुछ इस तरह :-
*आजका हमारा विषय है , धर्म और उसके सिद्धांत* *धर्म इस शब्द से हमें क्या बोध होता है?* *जैसे जलाना यह अग्नी का धर्म है , ठंडा करना यह जल का धर्म है* , *वैसे धर्म यह हर व्यक्ती का जन्मजात गुणधर्म है* *मनुष्य संस्कारी हो , अथवा संस्कारविहीन हो , ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी हो , बच्चा हो अथवा बूढा हो* *लेकिन धर्म यह हर मनुष्य का जन्मजात गुणधर्म है* *यह गुणधर्म तीन भागोंमें बाँटा गया है , ज्ञान , प्रेम और इच्छा* *हर मनुष्य का उच्चतम उद्देश्य यही होता है कि , इन तीन गुणधर्मों को प्राप्त करना और उनका विकास करना*, *यही मनुष्य का धर्म है |*
*धर्म एक सत्य है |* *सत्य वो ही होता है , जो सबके लिए सत्य है , हर समाज , हर राष्ट्र को यह सत्य मानना पडता है* *इसमें कोई परस्परविरोधी मत ( राय ) हो ही नहीं सकता* *यह मानवी गुणधर्म है* |
किसी ने तो इस जगत का निर्माण किया है , इस जगत का अस्तित्व है , वैसे मेरा अस्तित्व है | इन तीन अस्तित्वोंको को नकार नहीं सकता | सत्य और अहिंसा यह धर्म के पहलू हैं | जहाँ मनुष्य का अस्तित्व है , वहाँ सत्य के लिए विवेकबुद्धि होना निसर्गदत्त है | जब किसी व्यक्ति को यह मन की मुलभूत बातें ज्ञात होती हैं , तभी सच्चे ज्ञान का दर्शन होता है | सत्य से ही धर्म की प्राप्ती हो सकती है | मन जबतक संतुष्ट नहीं रहेगा , तबतक धर्म की प्राप्ती नहीं हो सकती | सरल मन से सत्य को स्वीकार करो , तो ही मन संतुष्ट रहेगा | असत्य व्यवहार , असत्य विचार तथा असत्य भावनाओं से मन सदैव असंतुष्ट ही रहेगा | संतुष्ट मन के लिए , सरल विचारोंसे , सत्य को ही अपना लक्ष्य बनाना पडेगा |
जिसको भी सत्य का पीछा करना है , वह अपने आत्मा की आवाज पहले सुनेगा , किसी की प्रतीक्षा किये बगैर वह अपने आत्मा की आवाज पहले सुनेगा | वह किसी व्यक्ति की , समाज की परवाह नहीं करेगा , किसीके फायदा तथा नुकसान के बारे में भी नहीं सोचेगा | अपने स्वयं के फायदे तथा नुकसान के बारे में भी नहीं सोचेगा | वह व्यक्ति मौन रहकर अपना कर्तव्य करता रहेगा | अपने काम का भी वह गाजावाजा नहीं करता , जिस तरह सूर्य और चंद्र , मौन रहकर अपना कर्तव्य करते हैं , उसी तरह वह व्यक्ति काम करता रहेगा | अगर इस तरह से कोई काम करता है तो तो , आसपास के लोगों को भी प्रेरणा मिलती है , और वे धन्य हो जाते हैं |
जय गुरुदेव प्रणाम
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