02/07/2019
*योगमार्ग की बाधाओं से न घबराएं*
योग मार्ग में बाधाओं को देखकर हम निराश न हों, बल्कि उन्हें समझे पहचानें और यथासंभव दूर करने का प्रयास करें। यह सब विघ्न हमारी दिनचर्या में भी व्यवधान डालते दिखाई देते हैं।
योग-शास्त्रों में इन विघ्नों को दो प्रकार का कहा गया है :-
*क. अक्लिष्ट 😗 ऐसे विघ्न जिन्हें थोड़े यत्न से दूर किया जा सकता
है।
*ख. क्लिष्ट 😗 जिन विघ्नों को दूर करना असम्भव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य होता है।
पहले अक्लिष्ट विनों पर विचार कर लें। जब छोटी-छोटी समस्याएं
पार हो जाएंगी तभी बड़ी बाधाओं का सामना कर पाना संभव
होगा।
योगदर्शन' में समाधिपाद के तीसवें सूत्र में अक्लिष्ट विघ्नों का
विवरण इस प्रकार है :
1. व्याधि।
2. स्त्यान
3. संशय
4. प्रमाद
5. आलस्य
6. अविरति
7 . भ्रान्तिदर्शन
8. अलब्ध-भूमिकत्व
9. अनवस्थितत्व
आइए, इन विघ्नों के स्वरूप पर बारीबारी से विचार करते हुए
इन्हें समझें-
1. व्याधि
शरीर में उत्पन्न वातपित-कफ आदि दोष और अनेक प्रकार के
रोग इत्यादि साधना-मार्ग में विघ्न डालते हैं; इन्हें ही व्याधि कहते हैं।
इनका उपचार न कर सकना या न कर पाना योग-साधना में बड़ी
रुकावट बन जाता है। साधक को चाहिए कि ऐसी अवस्था में रोगों के उपचार को प्राथमिकता दे।
*2. स्त्यान*
इच्छा होने पर भी किसी कार्य को करने की सामर्थ न जुटा पाना
स्त्यान कहलाता है। बैठे-बैठे कल्पना करते रहना, सपने बुनते रहना।लेकिन व्यवहार में वैसा न कर पाना, मानसिक दुर्बलता का सूचक है।।ऐसी अकर्मण्यता बनी रहेगी तो साधना संभव नहीं।
*3. सशय*
मन की दुविधाग्रस्त स्थिति संशय कहलाती है। मन में संशय है,
दुविधा है, संकल्पविकल्प है तो कोई भी कार्य अच्छे मन से नहीं हो।पाता। आधे-अधूरे मन से किया गया प्रयास सही परिणाम कैसे दे।सकता है। मुझे लाभ होगा या नहीं; मैं कर पाऊंगा या नहीं, इस संशययुक्त मनःस्थिति से उबरने पर ही साधना सम्भव है।
*4. प्रमाद*
प्रमाद से तात्पर्य है लापरवाही करना ; जैसे करना चाहिए उस रूप में कार्य न करना। निर्देशों का उचित रूप में पालन न करना। स्वेच्छा से नहीं, वरन् दूसरे का मन रखने के लिए या डर से जब कुछ किया जाता है, तो लापरवाही आ जाती है। इस भाव से अभ्यास करने पर भी अभीष्ट लाभ की प्राप्ति नहीं होती।
*5. आलस्य*
चित्त अथवा शरीर के भारी होने के कारण अभ्यास में ध्यान का
न लग पाना आलस्य कहलाता है। शरीर का भारीपन कफ, वात के
बढ़ जाने से होता है। चित्त का भारीपन तमोगुण की अधिकता से
होता है।
*6. अविरति*
विषयों में तृष्णा बनी रहने का नाम अविरति है। भाव यह कि
आवेगों में, विषयों में बहते हुए उन्हें और भोगने अथवा भोगते रहने की इच्छा बनी रहना साधना मार्ग में विघ्न है। तृष्णा तो कभी तृप्त होती नहीं, उसे पूरा करने का प्रयास छलावा मात्र है और यही
छलावा सन्मार्ग पर नहीं बढ़ने देता।
*7. भ्रान्तिदर्शन*
मिथ्या ज्ञान अर्थात् सही ज्ञान का न होना-जैसे किसी भी सुनहरी
चमक वाली चीज़ को सोना समझ बैठना। थोड़ी-सी साधना में ही
सिद्धियों की भ्रान्ति होने लगना।
*8. अलब्ध-भूमिकत्व*
योग की आधारभूत बातों का अनुभव न कर पाना अलब्ध-भूमिकत्व कहलाता है। व्यक्तिगत सीमाओं के कारण या किन्हीं रुकावटों के कारण योग में यदि सार-तत्व को ही न देख-समझ पाएं तो साधना किसलिए करेंगे। ध्यान अथवा साधना का कोई आधार न मिल पाना
*अलब्ध-भूमिकत्व विघ्न* कहलाता है।
*9. अनवस्थितत्व*
कुछ प्राप्त होतेहोते प्राप्त न हो पाना अनवस्थितत्व है। कोई सूत्र
हाथ में आते ही छूट जाए या ध्येय को प्राप्त करने से पूर्व ही ध्यान टूट जाए तो साधना कर पाना मुश्किल हो जाता है। जिस प्रकार चलते समय मार्ग में आने वाले कांटे या झाड़-झंखाड़ हमें कष्ट पहुंचाते हैं और मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं उन्हें साफ करना। जरूरी होता है, उसी प्रकार यह सभी विन योग-साधना में बाधा
डालते हुए हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं। आगे बढ़ने के लिए इन्हें दूर करना जरूरी है। इन विघ्नों को *चित्तविक्षेप* भी कहा जाता है।
योग-शास्त्रों में इन्हें *अन्तराय* भी कहते हैं। यदि यह विघ्न आप की योग साधना में अथवा जीवन की दिनचर्या में भी आ जायें तो इनका समाधान आप खोज सकें-इन पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ सकें। इन्हीं शुभ कामनाओं के साथ-