Shiv Mandir, Nanaimo project of Samskrita Veena Foundation

Shiv Mandir, Nanaimo project of Samskrita Veena Foundation ShivMandir at Vancouver Island Nanaimo - 2nd dream project of Samskrita Veena Foundation

1st being Saraswati Elementary School of B.C in Vancouver

04/28/2023

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04/30/2019

आपको इसकी जानकारी जरूर पता होनी चाहिए

*तिलक धारण का वैज्ञानिक रहस्य*

हमारे ज्ञान-तन्तुओं का विचार केन्द्र भृकुटी और ललाट का मध्य भाग है।जब मस्तिक के केन्द्र में वेदना अनुभव होने लगती है। अतः हमारे महर्षियों ने तिलक धारण का विधान किया।
चंदन की महिमा सभी हकीम - वैध - डॉक्टर जानते हैं। मस्तिष्क केंद्र बिंदु पर चंदन का तिलक ज्ञान तन्तुओं को संयमित व सक्रिय रखता है। ऐसे जातक को कभी सिर-दर्द नहीं रहता तथा उसकी मेधाशक्ति तेज़ रहती है।
तिलक लगाना सम्मान का प्रतीक है। अपने यहां आये अतिथियों का तिलक लगाकर सम्मान प्रकट किया जाता है। भारतीय परम्परा में कोई भी सम्मान तिलक के बिना अधूरा माना जाता है।
यात्रा पर प्रस्थान करना हो, युद्ध में जाना हो या विदा करना हो तो, सभी प्रकार की शुभकामनाएं तिलक के माध्यम से प्रकट की जाती हैं। तिलक लगाने से मन में शान्ति, प्रसन्नता, उल्लास तथा सफलता का शुभ भाव प्रकट होता है। इसीलिए हिन्दू संस्कृति में तिलक धारण करने का विशेष महत्व है।

शुभ रात्री

02/24/2019
02/07/2019

*योगमार्ग की बाधाओं से न घबराएं*

योग मार्ग में बाधाओं को देखकर हम निराश न हों, बल्कि उन्हें समझे पहचानें और यथासंभव दूर करने का प्रयास करें। यह सब विघ्न हमारी दिनचर्या में भी व्यवधान डालते दिखाई देते हैं।
योग-शास्त्रों में इन विघ्नों को दो प्रकार का कहा गया है :-

*क. अक्लिष्ट 😗 ऐसे विघ्न जिन्हें थोड़े यत्न से दूर किया जा सकता
है।

*ख. क्लिष्ट 😗 जिन विघ्नों को दूर करना असम्भव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य होता है।
पहले अक्लिष्ट विनों पर विचार कर लें। जब छोटी-छोटी समस्याएं
पार हो जाएंगी तभी बड़ी बाधाओं का सामना कर पाना संभव
होगा।

योगदर्शन' में समाधिपाद के तीसवें सूत्र में अक्लिष्ट विघ्नों का
विवरण इस प्रकार है :
1. व्याधि।
2. स्त्यान
3. संशय
4. प्रमाद
5. आलस्य
6. अविरति
7 . भ्रान्तिदर्शन
8. अलब्ध-भूमिकत्व
9. अनवस्थितत्व

आइए, इन विघ्नों के स्वरूप पर बारीबारी से विचार करते हुए
इन्हें समझें-

1. व्याधि
शरीर में उत्पन्न वातपित-कफ आदि दोष और अनेक प्रकार के
रोग इत्यादि साधना-मार्ग में विघ्न डालते हैं; इन्हें ही व्याधि कहते हैं।
इनका उपचार न कर सकना या न कर पाना योग-साधना में बड़ी
रुकावट बन जाता है। साधक को चाहिए कि ऐसी अवस्था में रोगों के उपचार को प्राथमिकता दे।

*2. स्त्यान*
इच्छा होने पर भी किसी कार्य को करने की सामर्थ न जुटा पाना
स्त्यान कहलाता है। बैठे-बैठे कल्पना करते रहना, सपने बुनते रहना।लेकिन व्यवहार में वैसा न कर पाना, मानसिक दुर्बलता का सूचक है।।ऐसी अकर्मण्यता बनी रहेगी तो साधना संभव नहीं।

*3. सशय*
मन की दुविधाग्रस्त स्थिति संशय कहलाती है। मन में संशय है,
दुविधा है, संकल्पविकल्प है तो कोई भी कार्य अच्छे मन से नहीं हो।पाता। आधे-अधूरे मन से किया गया प्रयास सही परिणाम कैसे दे।सकता है। मुझे लाभ होगा या नहीं; मैं कर पाऊंगा या नहीं, इस संशययुक्त मनःस्थिति से उबरने पर ही साधना सम्भव है।

*4. प्रमाद*
प्रमाद से तात्पर्य है लापरवाही करना ; जैसे करना चाहिए उस रूप में कार्य न करना। निर्देशों का उचित रूप में पालन न करना। स्वेच्छा से नहीं, वरन् दूसरे का मन रखने के लिए या डर से जब कुछ किया जाता है, तो लापरवाही आ जाती है। इस भाव से अभ्यास करने पर भी अभीष्ट लाभ की प्राप्ति नहीं होती।

*5. आलस्य*
चित्त अथवा शरीर के भारी होने के कारण अभ्यास में ध्यान का
न लग पाना आलस्य कहलाता है। शरीर का भारीपन कफ, वात के
बढ़ जाने से होता है। चित्त का भारीपन तमोगुण की अधिकता से
होता है।

*6. अविरति*
विषयों में तृष्णा बनी रहने का नाम अविरति है। भाव यह कि
आवेगों में, विषयों में बहते हुए उन्हें और भोगने अथवा भोगते रहने की इच्छा बनी रहना साधना मार्ग में विघ्न है। तृष्णा तो कभी तृप्त होती नहीं, उसे पूरा करने का प्रयास छलावा मात्र है और यही
छलावा सन्मार्ग पर नहीं बढ़ने देता।

*7. भ्रान्तिदर्शन*
मिथ्या ज्ञान अर्थात् सही ज्ञान का न होना-जैसे किसी भी सुनहरी
चमक वाली चीज़ को सोना समझ बैठना। थोड़ी-सी साधना में ही
सिद्धियों की भ्रान्ति होने लगना।

*8. अलब्ध-भूमिकत्व*
योग की आधारभूत बातों का अनुभव न कर पाना अलब्ध-भूमिकत्व कहलाता है। व्यक्तिगत सीमाओं के कारण या किन्हीं रुकावटों के कारण योग में यदि सार-तत्व को ही न देख-समझ पाएं तो साधना किसलिए करेंगे। ध्यान अथवा साधना का कोई आधार न मिल पाना
*अलब्ध-भूमिकत्व विघ्न* कहलाता है।

*9. अनवस्थितत्व*
कुछ प्राप्त होतेहोते प्राप्त न हो पाना अनवस्थितत्व है। कोई सूत्र
हाथ में आते ही छूट जाए या ध्येय को प्राप्त करने से पूर्व ही ध्यान टूट जाए तो साधना कर पाना मुश्किल हो जाता है। जिस प्रकार चलते समय मार्ग में आने वाले कांटे या झाड़-झंखाड़ हमें कष्ट पहुंचाते हैं और मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं उन्हें साफ करना। जरूरी होता है, उसी प्रकार यह सभी विन योग-साधना में बाधा
डालते हुए हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं। आगे बढ़ने के लिए इन्हें दूर करना जरूरी है। इन विघ्नों को *चित्तविक्षेप* भी कहा जाता है।

योग-शास्त्रों में इन्हें *अन्तराय* भी कहते हैं। यदि यह विघ्न आप की योग साधना में अथवा जीवन की दिनचर्या में भी आ जायें तो इनका समाधान आप खोज सकें-इन पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ सकें। इन्हीं शुभ कामनाओं के साथ-

01/24/2019

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

अर्थात

जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।
कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है।
दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
गन्ने के रस से अभिषेक करने पर — लक्ष्मी प्राप्ति
मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए।
तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर — मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से — बीमारी नष्ट होती है ।
दूध् से अभिषेककरने से — पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा मनोकामनाएं पूर्ण
गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।
दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू।
घी से अभिषेक करने से — वंश विस्तार होती है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने से — रोग तथा शत्रु का नाश होता है।
शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से —- पाप क्षय हेतू।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद सेसमृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्तिl

01/08/2019

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की भारत में ऐसे शिव मंदिर है जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये है। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडू का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79° E 41’54” Longitude के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंच भूत कहते है। पंच भूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्ही पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिव लिंगों को प्रतिष्टापित किया है। जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है, आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है, हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है, पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम में है और अतं में अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है! वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

भौगॊलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कॊई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

इन मंदिरों का करीब चार हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं था। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जाने।

केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते है। आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयॊग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है यह आज तक रहस्य ही है। श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है। तिरूवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है। अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है। कंचिपुरम के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान के निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करनेवाले पांच लिंगो को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसा विज्ञान और तकनीक था जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है। माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होगें जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते है। इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है। संभवता यह सारे मंदिर कैलाश को द्यान में रखते हुए बनाया गया हो जो 81.3119° E में पड़ता है!? उत्तर शिवजी ही जाने। ...

कमाल की बात है "महाकाल" से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच कैसा सम्बन्ध है......??
उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी भी है रोचक-
उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी
उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी
उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी
उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी
उज्जैन से,मल्लिकार्जुन- 999 किमी
उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी
उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी
उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी
उज्जैन से रामेश्वरम- 1999 किमी
उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी

हिन्दु धर्म में कुछ भी बिना कारण के नही होता था ।
उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है । जो सनातन धर्म में हजारों सालों से केंद्र मानते आ रहे है इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गण ना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये है करीब 2050 वर्ष पहले ।
और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क)अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायीं गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला । आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते है सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।जय श्री महाँकाल राजा की ।🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 🙏🏻

11/24/2018

⛳सनातन धर्म रक्षक समिति⛳
🙏🏻सनातन धर्म की जय🙏🏻

भागवत में लिखी ये 10 भयंकर बातें कलयुग में हो रही हैं सच,...


1.ततश्चानुदिनं धर्मः
सत्यं शौचं क्षमा दया ।
कालेन बलिना राजन्
नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥


कलयुग में धर्म, स्वच्छता, सत्यवादिता, स्मृति, शारीरक शक्ति, दया भाव और जीवन की अवधि दिन-ब-दिन घटती जाएगी.


2.वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां
कारणं बलमेव हि ॥


कलयुग में वही व्यक्ति गुणी माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है. न्याय और कानून सिर्फ एक शक्ति के आधार पे होगा !


3. दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतुः
मायैव व्यावहारिके ।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः
विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥


कलयुग में स्त्री-पुरुष बिना विवाह के केवल रूचि के अनुसार ही रहेंगे.
व्यापार की सफलता के लिए मनुष्य छल करेगा और ब्राह्मण सिर्फ नाम के होंगे.


4. लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं
पाण्डित्ये चापलं वचः ॥



घूस देने वाले व्यक्ति ही न्याय पा सकेंगे और जो धन नहीं खर्च पायेगा उसे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खानी होंगी. स्वार्थी और चालाक लोगों को कलयुग में विद्वान माना जायेगा.


5. क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव
संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।
त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः
कलौ नृणाम.


कलयुग में लोग कई तरह की चिंताओं में घिरे रहेंगे. लोगों को कई तरह की चिंताए सताएंगी और बाद में मनुष्य की उम्र घटकर सिर्फ 20-30 साल की रह जाएगी.


6. दूरे वार्ययनं तीर्थं
लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे
धार्ष्ट्यमेव हि॥


लोग दूर के नदी-तालाबों और पहाड़ों को तीर्थ स्थान की तरह जायेंगे लेकिन अपनी ही माता पिता का अनादर करेंगे. सर पे बड़े बाल रखना खूबसूरती मानी जाएगी और लोग पेट भरने के लिए हर तरह के बुरे काम करेंगे.


7. अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः । शीतवातातपप्रावृड्
हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥


कलयुग में बारिश नहीं पड़ेगी और हर जगह सूखा होगा.मौसम बहुत विचित्र अंदाज़ ले लेगा. कभी तो भीषण सर्दी होगी तो कभी असहनीय गर्मी. कभी आंधी तो कभी बाढ़ आएगी और इन्ही परिस्तिथियों से लोग परेशान रहेंगे.


8. अनाढ्यतैव असाधुत्वे
साधुत्वे दंभ एव तु ।
स्वीकार एव चोद्वाहे
स्नानमेव प्रसाधनम् ॥


कलयुग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा उसे लोग अपवित्र, बेकार और अधर्मी मानेंगे. विवाह के नाम पे सिर्फ समझौता होगा और लोग स्नान को ही शरीर का शुद्धिकरण समझेंगे.


9. दाक्ष्यं कुटुंबभरणं
यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।
एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः
आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥


लोग सिर्फ दूसरो के सामने अच्छा दिखने के लिए धर्म-कर्म के काम करेंगे. कलयुग में दिखावा बहुत होगा और पृथ्वी पे भृष्ट लोग भारी मात्रा में होंगे. लोग सत्ता या शक्ति हासिल करने के लिए किसी को मारने से भी पीछे नहीं हटेंगे.


10. आच्छिन्नदारद्रविणा
यास्यन्ति गिरिकाननम् ।
शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥


पृथ्वी के लोग अत्यधिक कर और सूखे के वजह से घर छोड़ पहाड़ों पे रहने के लिए मजबूर हो जायेंगे. कलयुग में ऐसा वक़्त आएगा जब लोग पत्ते, मांस, फूल और जंगली शहद जैसी चीज़ें खाने को मजबूर होंगे.


श्रीमद भागवतम मे लिखी ये बातें इस कलयुग में सच होती दिखाई दे रही है.

जय श्री राम⛳⛳
वन्देमातरम्⛳⛳
⚜🕉⛳🕉⚜

11/08/2018

आप सभी को गोवर्धन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

गोवर्धन :- (गो = गौ माता) + (वर्धन = वृद्धि, प्रसार, प्रचार, विशालीकरण, बढ़त) गोवर्धन का सही अर्थ गौ संरक्षण व गौ सेवा से गौ माता का वर्धन है।

वैदिक काल से ही गौ माता को भारतीय संस्कृति में प्रधान माना गया है। धार्मिक-अध्यात्मिक, सामाजिक, कृषि, औषधि, आर्थिक एवं उर्जा आदि में गौ माता की सांसारिक महत्ता को समझकर ही गोवर्धन पर्व का महत्व है।

गवां दृष्ट्वा नमस्कृत्य कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम्।
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा॥
मातर: सर्वभूतानां गाव: सर्वसुखप्रदा:।
वृद्धिमाकाङ्क्षता पुंसा नित्यं कार्या प्रदक्षिणा॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व : ६९.७)

अर्थात - गौ माता दिखने पर उनको नमस्कार कर उनकी प्रदक्षिणा करना सात द्वीपों वाली पृथ्वी की परिक्रमा के समान है। गौ सभी प्राणियों की माता है जिनकी प्रदक्षिणा करने से सभी सुख प्राप्त होते हैं।

जय गौ माता 🌷
जय श्री कृष्ण

07/06/2018

राजा दशरथ की सभा मे पिछले 22 दिनों से उनके कुलगुरु वसिष्ठ चिंताओं से छुटकारा पाने के लिए राम द्वारा पूछे प्रशनों का कई कहानियों उदाहरणों से उत्तर दे रहे थे । राम बार बार उनसे कहते हैं कि कोई एक वाक्य मे हमारी चिंताओं का कारण और निवारण बताईए । तो वसिष्ठ ने भरी सभा मे खडे होकर घोषना कि हमारी सभी चिंताओं का कारण किसी न किसी रुप मे हमारी कोई न कोई ईच्छा ही होती है।
जिसे किसी से कुछ नहीं चाहिए
उसे कोई परेशान नहीं कर सकता

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