Abbotsford Hindu Temple

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हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी गुरु तत्व को बड़ी सरलता से समझाते है - इस कलयुग में जहा सच्चे गुरु के कमी है, वहा हनुमान जी...
08/18/2015

हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी गुरु तत्व को बड़ी सरलता से समझाते है - इस कलयुग में जहा सच्चे गुरु के कमी है, वहा हनुमान जी को गुरु बना लो //
जै जै जै हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥
भक्तों की रक्षा करने वाले श्री हनुमान की जय हो, जय हो, जय हो,
आप मुझ पर गुरु की तरह कृपा करें।
गुरु पर शिष्य के बहुत जिम्मेवारी होती है, हो सकता है,
हनुमान जी मना कर दे, कहे में तो आज तक किसी का गुरु नहीं बना. //
तो इस तुलसीदास जी कहते है, हनुमान जी को याद करना ।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥
आपने सुग्रीव का उपकार करते हुए उनको श्रीराम से
मिलवाया जिससे उनको राज्य प्राप्त हुआ।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥
आपकी युक्ति को विभीषण ने माना और उसने लंका का
राज्य प्राप्त किया, यह सब संसार जानता है।
आप ने इस दोनों पर कृपा कर्री, इन्हें प्रभु श्री राम से
मिलवा दिया। अब वोही कृपा आप मुझ पर भी करे।
फिर अंत में कहते है
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥
दूसरे देवताओं को मन में न रखते हुए,
श्री हनुमान से ही सभी सुखों की प्राप्ति हो जाती है।
श्री राम से मिलने के लिए, हनुमान जी को गुरु बनालो,
तो भला बाकि देव देवताओ की क्या जरुरत है
सर्व सुख करई का मतलब भोतिक लाभ से नहीं है,
जिसे श्री राम की मिल गए उसे सब सुख मिल गए

08/13/2015
दुर्योधन के मन में अभिमान था एवं विदुर विदुरानी के घर धन सम्पति तो नहीं पर भगवान के लिए अनन्य भाव थामहाभारत का युद्ध रोक...
08/13/2015

दुर्योधन के मन में अभिमान था एवं विदुर विदुरानी के घर धन सम्पति तो नहीं पर भगवान के लिए अनन्य भाव था
महाभारत का युद्ध रोकने के अंतिम प्रयास हेतू स्वयं श्री कृष्ण शांती प्रस्ताव लेकर ह्स्तीनापुर पहूँचे..
कुटिल शकूनी ने कृष्ण को भोजन पर आमंत्रीत करने की योजना बनाई..स्वयं द्र्योधन ने उनको निमंत्रण दिया.. #कृष्ण तो फिर कृष्ण है..निमंत्र्णअस्वीकार कर दिया और जा पहूँचे विदूर के घर..विदुरानी कृष्ण पर अपार स्नेह रखती थी..अचानक कृष्ण को देख भावुक हो गई।
कृष्ण ने जब कहा की भूख लगी है तो तुरतं केले ले आई..और बेसुधी मे गूदा तो फेक देती और छिलका खिला देती।
माधव भी बिना कुछ कहे प्रेम से खाते रहे..
बात फैली.. दुर्योधन जो कृष्ण से बैर भाव रखता था ताना मार के बोला.. केशव मैने तो छप्पन भोग बनवाये थे पर आपको तो छिलके ही पंसद आये.. माधव मुस्करा के बोले कोई किसी के यहाँ सिर्फ तीन वजह से खाता है.
1.भाव मे
2.अभाव मे
3.प्रभाव मे
भाव तुझमे है नहीं.. अभाव मुझे है नहीं और प्रभाव तेरा मै मानता नहीं। अब तू ही बता कैसे तुम्हारा नीमंत्रण स्वीकार करता..।। मै वहीं गया जहाँ मुझे जाना चाहिये था। मै भोजन नहीं भाव का भूखा हूँ और हमेशा रहूँगा।

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