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ऋग्वेद सनातन धर्म का प्राचीनतम, पवित्र ग्रंथ और वेदों में प्रथम है, जो लगभग 2000 ईसा पूर्व (संस्कृत में) रचा गया था। इसम...
21/02/2026

ऋग्वेद सनातन धर्म का प्राचीनतम, पवित्र ग्रंथ और वेदों में प्रथम है, जो लगभग 2000 ईसा पूर्व (संस्कृत में) रचा गया था। इसमें देवताओं (अग्नि, इंद्र, आदि) की स्तुति में 1028 सूक्त, 10 मंडल और 10,600 से अधिक मंत्र हैं, जो ज्ञान, प्रकृति, और भक्ति का संगम हैं। यह मानव इतिहास के प्राचीनतम साहित्यिक रचनाओं में से एक है।
ऋग्वेद की मुख्य विशेषताएँ:
अर्थ: 'ऋक्' का अर्थ है स्तुति/प्रशंसा और 'वेद' का अर्थ है ज्ञान; अर्थात, देवताओं की स्तुति के ज्ञान का संग्रह Wikipedia।
संरचना: इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त (बालखिल्य सहित) और 10,600 से अधिक मंत्र हैं।
विषय: इसमें अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण, सोम, सूर्य जैसे प्राकृतिक शक्तियों के प्रतिनिधि देवताओं की स्तुति (मंत्र) शामिल है।
प्रसिद्ध मंत्र: विश्व-विख्यात गायत्री मंत्र और मृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद के ही अंश हैं।
शाखा: वर्तमान में केवल 'शाकल्य शाखा' उपलब्ध है Wikipedia।
महत्व: यह न केवल धार्मिक बल्कि दार्शनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण, भारतीय संस्कृति का आधारभूत ज्ञानकोष है।
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ऋग्वेद के 10 मंडल (संक्षेप में):
मंडल 1-10: इसमें अग्नि और इंद्र की प्रमुखता है।
तीसरा मंडल: प्रसिद्ध गायत्री मंत्र (ऋषि विश्वामित्र द्वारा रचित) इसमें है।
नौवां मंडल: मुख्य रूप से सोम देवता को समर्पित है।
दसवां मंडल: इसमें प्रसिद्ध पुरुष सूक्त और नासदीय सूक्त (सृष्टि के निर्माण के बारे में दार्शनिक मंत्र) हैं।
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ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ मुख्य रूप से यज्ञों में किया जाता है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और ज्ञान के प्रसार के लिए पढ़ा जाता है

🔸️ कुमारिल भट्‌ट ने आत्मदाह क्यों किया था❓️✍️ उत्तर प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य चैनल....❗️यह मध्यकालीन भारत का एक यक्षप्रश...
14/02/2026

🔸️ कुमारिल भट्‌ट ने आत्मदाह क्यों किया था❓️
✍️ उत्तर प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य चैनल....❗️

यह मध्यकालीन भारत का एक यक्षप्रश्न है। उन्हें किसी ने बाध्य नहीं किया था, उन्होंने स्वयं ही इसका चयन किया। वैसा करने के अनुल्लंघ्य कारण भी न थे। उन्हें कौन-सी ग्लानि और व्यथा थी, भांति-भांति से इसकी व्याख्या की जाती है। किंतु इसका सबसे बड़ा कारण सनातन धर्म और बौद्धों के बीच उस काल में चल रहे संघर्ष में निहित था। जिस ताप ने कुमारिल को भस्म कर दिया, उसके मूल में वैदिक धर्म के पराभव से उपजा शोक था। वास्तव में कुमारिल सनातन परम्परा के महान हुतात्मा हैं।

कुमारिल मीमांसक थे। मीमांसा दर्शन के भाट्टमत के प्रतिपादक थे! उनके ग्रंथ "श्लोकवार्तिक" की बड़ी प्रतिष्ठा थी। मण्डन मिश्र उन्हीं के शिष्य थे। फिर उन्होंने आत्मनाश क्यों कर लिया? वास्तव में, उस कालखण्ड यानी आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में बौद्धों का वर्चस्व था। वेदों को अप्रामाणिक सिद्ध करने में बौद्धों ने पूरी शक्ति लगा दी थी और उन्हें राज्याश्रय प्राप्त था। बौद्ध-नैयायिकों की तब तूती बोलती थी। उनके तर्क अकाट्य मान लिए गए थे। नागार्जुन, वसुबंधु, धर्मकीर्ति और दिंगनाग जैसे बौद्ध दार्शनिकों की बातों का कोई तोड़ तब वैदिक धर्मावलम्बियों के पास नहीं था।

कुमारिल इससे बड़े विक्षुब्ध रहते थे। उन्होंने सोचा कि बौद्धों की तर्क-प्रणाली को जानने के बाद ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। यह निश्चय करके वे नालंदा गए, बौद्ध मत स्वीकार किया और बौद्ध दर्शन के प्रकांड विद्वान धर्मपाल के सान्निध्य में अध्ययन करने लगे। एक दिन की बात है! आचार्य धर्मपाल वैदिक धर्म में निहित दोषों का निर्ममता से उद्घाटन कर रहे थे। उनमें कटाक्ष की वृत्ति बहुत सघन थी, अतएव वे नाना प्रकार से वैदिक धर्म पर कटाक्ष भी करते जा रहे थे। कुमारिल यह सहन नहीं कर पाए। उनकी आंखों से आंसू फूट पड़े।

इधर कुमारिल की आंखों से अश्रुधारा बही, उधर उनका रहस्य खुला। वे आचार्य से बोल पड़े : "आप क्या जानें वेद-विद्या की श्रेष्ठता!" अहिंसा का उपदेश देने वाले आचार्य को इस पर क्रोध आ गया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा : "इस मूढ़ को विहार के शिखर से नीचे धकेल दो, देखते हैं कौन-सा वेद इसकी रक्षा करता है!" कुमारिल को शिखर पर ले जाया गया। नीचे धकेले जाने से पूर्व कुमारिल ने कहा : "यदि वेद प्रमाण हैं तो मेरे प्राण बचे रहें!" कुमारिल बच गए, किंतु अपने वाक्य में "यदि" लगा देने के कारण उनकी एक आंख फूट गई!
कुमारिल को किस बात की ग्लानि थी? शायद इसकी कि उन्होंने मीमांसक के रूप में ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया। या इसकी कि बौद्धों की तर्क-प्रणाली जानने के लिए उन्होंने बौद्ध मत स्वीकार किया। या इसकी कि उन्होंने वेदों पर संशय करके अपनी एक आंख गंवा दी। किंतु शायद ग्लानि से बढ़कर उन्हें इस बात का शोक था कि वे अपनी समस्त क्षमताओं के बावजूद वैदिक धर्म की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।
प्रयाग में संगम पर उन्होंने आत्मदाह का निर्णय लिया। भूसे की ढेरी को सुलगाकर उसमें जा बैठे। उनके शरीर का निचला हिस्सा प्राय: जल गया और वक्ष और शीशस्थल शेष रह गया, तब शंकर उनके दर्शन को पहुंचे। शंकर ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा था किंतु वह बहुत दुर्बोध था। वे कुमारिल की कीर्ति से परिचित थे। वे चाहते थे कि कुमारिल उस भाष्य पर वार्तिक लिखें। यही मनोरथ बांधकर वे प्रयाग आए किंतु यहां धू-धू जलते आचार्य को देखकर वे स्तब्ध रह गए।

कुमारिल का आत्मदाह करना और ऐन उसी अवसर पर शंकर का उनके पास पहुंचना- यह मध्यकालीन भारत के इतिहास में केंद्रीय महत्व की घटना है। शंकर ने कुमारिल को ब्रह्मसूत्र का अपना भाष्य दिखलाया तो उनकी आंखों में चमक आ गई। जो काम वो पूरा नहीं कर सके थे, उसे शंकर पूरा करेंगे, यह उन्हें विश्वास हो गया। मृत्यु से क्षोभ चला गया, उसमें आत्मबलिदान की दीप्ति आ गई। उन्होंने शंकर को आशीष देते हुए कहा कि मण्डन से शास्त्रार्थ करो और विजयी होओ। मण्डन तो उन्हीं के शिष्य थे, फिर उन्होंने शंकर को विजय का आशीष क्यों दिया? इसलिए, क्योंकि वे जान गए थे कि अब अद्वैत-वेदान्त ही सनातन धर्म की रक्षा कर सकता है और इसके लिए मीमांसकों को पीछे हटना होगा। शंकर ने यही कर दिखाया। अकेले अपने बूते वे भारत में सनातन धर्म की पुन:प्रतिष्ठा करने में सफल रहे। बौद्धों का तब जो पराभव हुआ तो आज तक वे भारत में अपनी धरती नहीं पा सके।
सनातन धर्म पर इससे बड़ा संकट इससे पहले कभी नहीं आया था। ना ही उसके बाद कभी आया। यों तो कालान्तर में सनातन धर्म पर यवनों, म्लेच्छों, विधर्मियों, विदेशियों ने अनेक प्रहार किए, किंतु वे सभी बाहरी आक्रमण थे, उसकी मूल दार्शनिक-मान्यताओं को तो बौद्धों ने ही सबसे प्रमुख चुनौती दी थी। बीसवीं सदी के बीच में नवबौद्धों ने अवश्य एक कथित धर्म-आंदोलन चलाया था। बौद्ध धर्म उनके लिए राजनीतिक पूंजी की तरह था। भीमराव की नीति अतीत के प्रेतों को जगाकर हिंदू धर्म पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की थी। किंतु उनके सामाजिक न्याय का चाहे जो हुआ हो, उनके नवबौद्धों का कोई नामलेवा आज नहीं है। आधुनिक काल में वामधारा के द्वारा सनातन के मानमर्दन के यत्किंचित प्रयत्न किए जाते हैं, किंतु वे इतने उपहास्य हैं कि उनकी बात करना भी उन्हें महत्व देना है।

मध्यकाल के वज्रयानियों से लेकर आधुनिक काल के नवबौद्धों और वामपंथियों तक- ये सभी भारत से सनातन के उन्मूलन में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं? इसका संकेत शंकर-मण्डन संवाद में मिलता है। मण्डन ने शंकर से कहा था- वेद का अभिप्राय है विधि का प्रतिपादन करना और उपनिषद स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं। मैं तो विधि की ही बात करूंगा। इसके प्रत्युत्तर में शंकर ने जीव-ब्रह्मैक्य का सिद्धांत प्रतिपादित किया और यह तर्क देकर मण्डन को निरुत्तर कर दिया कि जिसे प्रमाण से सिद्ध किया जा सकता हो, वह पूर्णब्रह्म नहीं हो सकता। मण्डन को हार मानना पड़ी। कुमारिल यह जानते थे, इसलिए उन्होंने शंकर को विजय का आशीष दिया था। वे अपनी मृत्युशैया पर अद्वैत-वेदान्त के सामर्थ्य को पहचान गए थे।

शंकर न तो वेदविरुद्ध थे, न ही विधि-विरुद्ध, किंतु उन्होंने औपनिषदिक प्रविधि इसलिए अपनाई, क्योंकि वे जानते थे कि विधि को चुनौती दी जा सकती है, किंतु स्वरूप का खण्डन नहीं किया जा सकता। यह वही स्वरूप है, जिससे बुद्ध के अनित्य को भी प्राणधारा मिलती थी। मण्डूक्योपनिषद में बौद्ध और वेदान्त के सूत्र एकमेक हो जाते थे। स्वरूप को साध लिया तो फिर धर्म की भी रक्षा हो सकेगी, यह शंकर के उद्यम के मूल में था।

आज जो भी सनातन-धर्म की विधियों पर प्रहार करते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उसके स्वरूप को नष्ट किए बिना भारत से सनातन-धर्म का उन्मूलन नहीं किया जा सकता, और भारत के गुणसूत्र इस स्वरूप से इतने अविच्छिन्न हो गए हैं कि इसे नष्ट करना सम्भव नहीं। प्रयाग में त्रिवेणी-संगम पर तुषानल के दाह में कुमारिल को जिस तत्व का बोध हो गया था, जिसकी धर्मध्वजा शंकर ने चतुर्दिक फहराई, उसकी मानहानि करना कम से कम वामाचारी विदूषकों के बस का रोग नहीं है।

इति।

Shree Hari 🙏
30/11/2025

Shree Hari 🙏

संसार नश्वर है तो इस संसार से मोह क्यों?हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये संसार विष्णुजी की माया से द्वारा संचालित ह...
14/03/2024

संसार नश्वर है तो इस संसार से मोह क्यों?

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये संसार विष्णुजी की माया से द्वारा संचालित होता है। संसार के तरह तरह के भौतिक सुख माया के रूप और अंग है। आज के संसार में माया बहुत ही प्रबल है। भौतिक सुख सुविधाओं के बढ जाने से अब माया बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो गई है।

जब मनुष्य आत्मा इस संसार में आती है,तो वह उसका रूप उजला व प्रकाशवान होता है। लेकिन समय के साथ माया उसे घेर लेती है और आत्मा के सच्चे स्वरूप को अपनी शक्ति से ढक देती है। और मनुष्य मन अपने सच्चे स्वरूप को भूल जाता है और उसे माया की अनेक शक्तियां काबू कर लेती हैं। जिनमें से मोह एक शक्ति है,जो मनुष्य मन को भौतिक सुखों के लिये ललचाती है। इससे संसार में मनुष्य की आसक्ति बढती जाती है और वो हमेशा के लिये माया के जाल में फँस जाता है।

मनुष्य शरीर नश्वर है। ये अटूट सत्य सामने होते हुये भी मनुष्य इस सत्य को स्वीकार करने से डरता है क्योंकि कि डर, मोह ,लालच ,क्रोध आदि सब माया के रूपउसके मन को काबू कर चुके होते हैं। ऐसे में वो सिर्फ अपने भौतिक सुखों को पाने के लिये ही प्रयासरत रहता है। और संसार से मोह उसका स्वभाव का अंग बन जाता है।

लेकिन जब मनुष्य मन सच्चे ज्ञान की चाह कर लेता है,तो माया के आवरण एक एक कर हटने लगते हैं और वो सांसारिक सच को जान जाता है और उसका संसार से मोह खत्म हो जाता है और वो माया से जीत कर निर्भीक बन जाता है।

19/12/2022

सरल और निर्मल इन्सान को दिखावे और आडम्बर की जरूरत नहीं है।
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वस्तुतः दीखने और दिखाने की प्रक्रिया गलत नहीं है। गलत है इससे दूसरों को नुकसान पहुँचाना एवं स्वार्थ सिद्ध करना। इसके ठीक विपरीत होने एवं बनने की प्रक्रिया आन्तरिक सुकून दायक है।
ठीक है कि यह कठिन है परन्तु असम्भव भी नहीं है। जो हम नहीं हैं और जिसे हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम ऐसे नहीं हैं फिर भी दिखाना चाहते हैं कि हम ऐसे हैं, उनके अन्तर में खुलापन और व्यवहार जगत में इसके होने का झूठा सच एक द्वन्द को जन्म देता है। जो नहीं है इस झूठ को हम संसार में सच्चाई के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
लोगों की भीड़ में हम प्रतिष्ठित भी होते हैं और भाग्य ने साथ दिया तो प्रतिष्ठा की झूठी चमक अपना प्रभाव भी दिखाती हैं। प्रतिष्ठा की अन्तहीन प्यास के जगते ही हम इसकी सुरक्षा, संरक्षण और प्रसार के लिए अपनी समस्त ऊर्जा को झोंक देते हैं।
कोई यदि इसके विरुद्ध ऊंगली उठाता है या फिर प्रतिकूल बोलता है, तो वह हमारा सबसे बड़ा विरोधी बनता है, क्योंकि वह हमारे अहम को चोट पहुँचाने का प्रयास करता है।
हम झूठ को, आन्तरिक खोखलेपन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हैं और सारा जीवन दूसरों को दिखाने के लिए ही अपनी अहम जीवन-ऊर्जा को जलाकर खाक कर देते हैं।
समाज में हमारा यह दोहरा व्यक्तित्व दूसरों की झूठी प्रशंसा से सन्तुष्ट होता है। संचार के विभिन्न माध्यमों में दिखाए जाने पर फूलकर कुप्पा हो जाता है और सम्मान, पुरस्कार, सर्टिफिकेट तथा पेपर की कतरनों के रूप में हमारी अगाध संपत्ति एवं संपदा बनता है, जिसे हम अपने एवं अनजानों के बीच दिखाने का पारायण करते हैं। लोग देखते भी हैं।
कुछ इससे बचने के लिए झूठी प्रशंसा करते हैं, कुछ इसे न पाने के कारण ईर्ष्या भी करते हैं और बड़ी बात तो यह है कि इस निन्दा, प्रशंसा एवं ईर्ष्या से प्रभावित होते हैं। इससे भी बड़ी बात है कि प्रतिष्ठा की यह चमक हमारे जीवन की समस्या को सुलझाने के लिए उतनी ही अनजान एवं अजनबी होती है।
जो हमारे दैनिक जीवन की समस्या से इतनी दूर है, उसके प्रति इतना प्रबल आकर्षण विडम्बना नहीं तो और क्या है? दीखने-दिखाने के इस गोरख-धन्धे में आवश्यकता है कि एक इन्सान का जीवन होना।
एक ऐसा जीवन जो अपने में तृप्त हो तथा औरों के लिए भी उपयोगी हो सके। ऐसा जीवन जो अपनी आन्तरिक चेतना में सतत विकसित हो तथा उसके कर्म मानवता की सेवा में निमग्न हो।
ऐसा इन्सान अन्दर और बाहर से निश्छल, निर्मल और सरल होता है उसे दिखावे और आडम्बर की कोई जरूरत नहीं होती है।सदैव दिखावे से दूर एक नेक एवं सच्चे इन्सान का जीवन होना चाहिए।
(संकलित व सम्पादित)
- अखण्ड ज्योति जून 2013 पृष्ठ 13
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17/06/2022

जीवन एक यात्रा है । खुशियआँ और दुःख सब अच्छे बुरे छोटे बड़े पथरीले या सुगम रास्ते की तरह हैं॥

ज़्यादातर लोगों की यात्रा में उतने पथरीले रास्ते नहीं रेहते हैं जितनी तकलीफ़ वो अपनी ज़िंदगी में महसूस करते हैं, और जीवन का सर्व सुगम मार्ग तो वैसे भी खुद को जानना है चाहे किसी भी साधना पद्धत से।

मित्रों किस रास्ते पर जा रहे हो ? खुसियाँ रूपी पथरीले रास्ते पर सांसारिक मानुस।

किसी भी परिस्थिति में सकारात्मक रह सकते हो आप, विश्वास करो
आत्मबलोकन करो ।। अभी करो ।

हम जो महसूस करते हैं उसके लिए लोग या परिस्थितियां जिम्मेदार नहीं हैं। वे तो बस स्टीम्युलस हैं, हमारे विचार, एहसास और व्य...
01/06/2022

हम जो महसूस करते हैं उसके लिए लोग या परिस्थितियां जिम्मेदार नहीं हैं। वे तो बस स्टीम्युलस हैं, हमारे विचार, एहसास और व्यवहार हमारी प्रतिक्रियाएं हैं जिन्हें हम खुद निर्मित करते और चुनते हैं।
आपका माइंड एक मैगनेट की तरह है। अगर आप ब्लेसिंग्स के बारे में सोचेंगे तो आप ब्लेसिंग्स को आकर्षित करेंगे। अगर आप प्रोब्लम्स के बारे में सोचेंगे तो आप प्रोबल्म्स को आकर्षित करेंगे। हमेशा अच्छे विचारों के बारे में सोचें और हमेशा पोजिटिव रहै।

एक आदमी ने नारदमुनि से पूछा मेरे भाग्य में कितना धन है...:नारदमुनि ने कहा - भगवान विष्णु से पूछकर कल बताऊंगा...:नारदमुनि...
26/06/2021

एक आदमी ने नारदमुनि से पूछा मेरे भाग्य में कितना धन है...
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नारदमुनि ने कहा - भगवान विष्णु से पूछकर कल बताऊंगा...
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नारदमुनि ने कहा- 1 रुपया रोज तुम्हारे भाग्य में है...
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आदमी बहुत खुश रहने लगा...
उसकी जरूरते 1 रूपये में पूरी हो जाती थी...
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एक दिन उसके मित्र ने कहा में तुम्हारे सादगी जीवन और खुश देखकर बहुत प्रभावित हुआ हूं और अपनी बहन की शादी तुमसे करना चाहता हूँ...
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आदमी ने कहा मेरी कमाई 1 रुपया रोज की है इसको ध्यान में रखना...
इसी में से ही गुजर बसर करना पड़ेगा तुम्हारी बहन को...
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मित्र ने कहा कोई बात नहीं मुझे रिश्ता मंजूर है...
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अगले दिन से उस आदमी की कमाई 11 रुपया हो गई...
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उसने नारदमुनि को बुलाया की हे मुनिवर मेरे भाग्य में 1 रूपया लिखा है फिर 11 रुपये क्यो मिल रहे है...??
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नारदमुनि ने कहा - तुम्हारा किसी से रिश्ता या सगाई हुई है क्या...??
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हाँ हुई है...
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तो यह तुमको 10 रुपये उसके भाग्य के मिल रहे है...
इसको जोड़ना शुरू करो तुम्हारे विवाह में काम आएंगे...
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एक दिन उसकी पत्नी गर्भवती हुई और उसकी कमाई 31 रूपये होने लगी...
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फिर उसने नारदमुनि को बुलाया और कहा है मुनिवर मेरी और मेरी पत्नी के भाग्य के 11 रूपये मिल रहे थे लेकिन अभी 31 रूपये क्यों मिल रहे है...
क्या मै कोई अपराध कर रहा हूँ...??
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मुनिवर ने कहा- यह तेरे बच्चे के भाग्य के 20 रुपये मिल रहे है...
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हर मनुष्य को उसका प्रारब्ध (भाग्य) मिलता है...
किसके भाग्य से घर में धन दौलत आती है हमको नहीं पता...
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लेकिन मनुष्य अहंकार करता है कि मैने बनाया,,,मैंने कमाया,,,
मेरा है,,,
मै कमा रहा हूँ,,, मेरी वजह से हो रहा है...
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हे प्राणी तुझे नहीं पता तू किसके भाग्य का खा कमा रहा है...।।👌👌👌👌👌

||श्री परमात्मने नम: || विवेक चूडामणि (पोस्ट १९८)प्रारब्ध –विचारज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति ।अदत्त्वा स्व...
22/05/2021

||श्री परमात्मने नम: ||

विवेक चूडामणि (पोस्ट १९८)

प्रारब्ध –विचार

ज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति ।
अदत्त्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ ४५२ ॥
व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ ।
न तिष्ठति छिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भम् ॥ ४५३ ॥

(लक्ष्य की ओर छोड़ दिए गए बाण के समान ज्ञान के उदय से पूर्व ही आरम्भ हुआ कर्म अपना फल दिए बिना ज्ञान से नष्ट नहीं होता , जैसे व्याघ्र समझ कर गौ की ओर छोड़ा हुआ बाण पीछे उसे गौ जान लेने पर भी बीच में नहीं रोका जा सकता, वह तो तुरंत अपने लक्ष्य को वेध ही देता है)

शेष आगामी पोस्ट में
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित “विवेक चूडामणि”..हिन्दी अनुवाद सहित(कोड-133) पुस्तकसे

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