अदभुत् श्रीमद् भागवत Bhagwat katha

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अदभुत् श्रीमद् भागवत Bhagwat katha A unique spiritual book where very big stories have been presented in very simple words in the form His Divine Grace A. C.

Bhagvat is the spiritual and devotional epitome of the whole world, and this is my effort to present it in poetic form. Presenting this 12 Skandas (18 volume) Juggernautic literature in the form of this verse and poetry form of 500 pages is itself equivalent to the spiritual Journey of seven births. In the Adbhut Srimad Bhagvat, very big stories have been presented in very simple words in the form

of jugalbandi in a fascinating way. It is such an indefinable force of devotion that, with its touch and control, definite salvation is possible. Srimad-Bhagavatam is an epic philosophical, devotional & literary classic which traditionally written in 12 skandas (18 volumes). The timeless wisdom of India is expressed in the Vedas, ancient Sanskrit texts that touches upon all fields of human knowledge and provides illuminating answers, concerning everything from the nature of the self to the origin of the universe. Originally preserved through oral tradition, the Vedas were first put into writing by Srila Vyasadeva, the "literary incarnation of God." Known as "the ripened fruit of the tree of Vedic literature," Srimad-Bhagavatam is the most complete and authoritative exposition of Vedic knowledge. Bhaktivedanta Swami Prabhupada written 18 books edition of Srimad Bhagavatam is the only complete Hindi translation. Our book is an attempt to translate the 12 skandas into 500 page easy to understand and read poetric form of Shrimad Bhagwat.

जिन्दगी की पटकथा : कृतज्ञता और सीख का सफर !कल मेरा पवित्र 51 वॉं जन्मदिवस है, क्या लिखूँ इस जीवन के बारे में ? साधारण सी...
24/05/2026

जिन्दगी की पटकथा : कृतज्ञता और सीख का सफर !

कल मेरा पवित्र 51 वॉं जन्मदिवस है, क्या लिखूँ इस जीवन के बारे में ? साधारण सी परिस्थितियों को मेरे गुरुदेव ने असाधारण बना दिया है।खूब जप, तप, यज्ञ,सेवा, धार्मिक यात्राएं, सीख, ज्ञान, समझ, समर्पण, संस्कार, दया , करूणा, प्रेम, नैतिकता के साथ-साथ अनन्त कृपा मैंने पाई है ।फिर जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तब लगता है कि यह केवल मेरा प्रयास नहीं अपितु माता-पिता के साथ-साथ ईश्वर और गुरू देव की अदृश्य कृपा का परिणाम है ।कई बार रास्ते कठिन लगे, परिस्थितियाँ विपरीत दिखीं, मन डगमगाया भी, पर हर बार किसी अदृश्य शक्ति ने सँभाल लिया ।जहॉं लगा कि अब रूक जाउंगा , वहीं कोई नई सीख, नया साहस और नई दिशा मिल गयी ।आज महसूस होता है कि जीवन में जो भी मिला - चाहे सुख हो या संघर्ष , सबने मुझे कुछ न कुछ सिखाया और भीतर से मजबूत भी बनाया ।
इन सबके बावजूद एक सत्य यह भी है तारे-सितारे अपना काम करते रहते हैं जिसके कारण जिन्दगी अपनी पटकथा खुद लिखती है, और उसका हर मोड़ हमें हैरान कर देता है। किसी मोड़ में यदि हार मिलती है और लगता है कि सबकुछ खत्म, तभी कुछ ऐसा होता है कि अचानक जिंदगी हमें जीत का ताज पहना देती है । यह ऐसा होता है कि कोई अनजान खिलाड़ी आखिरी गेंद पर छक्का मार दे ।हार की आशंका हमें मजबूत बनाती है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि असल में जीत उसी के हिस्से आती है जो हार से डरना छोड़ दे ।जिंदगी का सबक है कि- हर ठोकर आपको नया रास्ता दिखाती है ।
कभी-कभी, जब हमें अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब वे साथ छोड़ देते हैं । यह दर्द भरा पल होता है, लेकिन यही वह समय है, जब हम अपने भीतर की ताकत को पहचानते हैं । अकेलापन हमें खुद से मिलवाता है । हम सीखते हैं कि दुनिया के बिना भी हमारा वजूद है । और जब हम अपने आँसुओं को सुखाना सीख लेते हैं, तभी कोई अनजाना कंधा हमें सहारा देने आ जाता है । यह जिंदगी का सबसे खूबसूरत सबक है कि जब हम उम्मीद छोड़ देते हैं, तब वह हमें सबसे बड़ा तोहफा देती है । यह हमें बताती है कि हर रात के बाद सुबह जरूर आती है ।
जिन्दगी की इस अनिश्चितता में ही उसका सुख है । हम कितनी भी योजना बना लें, जिंदगी हमेशा अपने नियमों से चलती है । आप सोचते हैं कि आपने सब कुछ तय कर लिया, लेकिन वह हंस कर आपकी सारी योजना उलट-पुलट कर देती है ।लेकिन यही इसकी खूबसूरती है । हर अनपेक्षित मोड़ हमें कुछ नया सिखाता है । हर असफलता हमको एक नई दुनिया से मिलवाती है, और हर सफलता हमें दुनिया का सितारा बनाती है ।
सफलता और असफलता जिंदगी के दो पहलू हैं, लेकिन मुझे लगता है कि असफलता की भूमिका कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण है । सफलता हमें तालियों और तारीफों से नवाजती है, लेकिन असफलता हमें असली दुनिया से रूबरू कराती है । यह हमें उन लोगों से मिलवाती है, जो हमारे साथ तब भी खड़े रहते हैं, जब हमारी जेबें खाली हों और मन उदास हो ।असफलता हमें सिखाती है कि जिंदगी का असली मजा जीतने में नहीं, बल्कि कोशिश करने में है ।यह हमें बताती है कि हर बार गिरने के बाद उठना ही असली जीत है ।
जिन्दगी हमें एक और बात सिखाती है-खुश रहना । चाहे कितने भी उतार-चढ़ाव आएँ, खुशी को गले लगाना जरूरी है ।जब सब कुछ खत्म लगता है, और हम सोचते हैं कि अब बस यही अंत है, तभी जिंदगी हमें नया रास्ता दिखाती है । जिन्दगी को एक मजेदार सैर की तरह लेना चाहिए । इसके हरेक मोड़ का आनंद उठाना चाहिए । हारे, तो हँसे । जीतें, तो और मेहनत करें । प्यार करें, नफ़रत छोड़े । और सबसे जरूरी अपने मन में आशा की एक चिंगारी जरूर जलाए रखें , और देखें कि यह चिंगारी एक दिन बड़ा सूरज बन कर चमकती है ।
अपने इस 51 वें जन्मदिवस पर मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि जो मिला वह अपेक्षा से अधिक मिला और जो नहीं मिला शायद उसकी आवश्यकता नहीं थी ।परमात्मा और मेरे गुरुदेव के चरणों में कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने जीवन को, केवल यूँ ही बिताना नहीं अपितु सार्थक तरीके से, कुछ बढ़िया करते हुए, जीना सिखाया ।

कमी-प्रिय : दूसरों की खुशी में दुखी लोग !हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें दूसरों की खुशी, सफलता और उपलब्धियाँ द...
17/05/2026

कमी-प्रिय : दूसरों की खुशी में दुखी लोग !

हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें दूसरों की खुशी, सफलता और उपलब्धियाँ देखकर अच्छा नहीं लगता। वे हमेशा दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते रहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई व्यक्ति आगे बढ़ गया है, तो उसने जैसे उनका कुछ छीन लिया हो। ऐसे लोग अपनी गलतियों और कमियों को सुधारने की कोशिश नहीं करते। वे अपनी असफलता का कारण अपनी लापरवाही, अनुशासनहीनता या मेहनत की कमी को नहीं मानते, बल्कि दूसरों को दोष देकर संतोष महसूस करते हैं।
‘कमी-प्रिय’ लोगों को किसी में भी अच्छाई दिखाई नहीं देती। वे घर-परिवार में भी हर समय नुक्स निकालते रहते हैं।
पत्नी ने भोजन बनाया तो उसमें मिर्च-नमक कम या ज्यादा बता देंगे। रोटी थोड़ी सी जल गई तो ताना मार देंगे। चाय में स्वाद थोड़ा अलग हुआ तो शिकायत शुरू।
धीरे-धीरे हर बात में कमी निकालना उनकी आदत बन जाती है। वे सामने वाले को छोटा दिखाकर खुद को बड़ा समझने लगते हैं।साथ ही वे दूसरों को ख़ुश देखकर भी दुखी होते रहते हैं ।
आओ इसे एक लोककथा से और समझते हैं । एक नगर में बहुत बड़ा सेठ रहता था। उसके पास धन-दौलत, हवेलियाँ, खेत-खलिहान और नौकर-चाकर सब कुछ था। फिर भी वह हमेशा दुखी रहता था।वैद्य और हकीम भी उसकी बीमारी दूर नहीं कर पाए । एक दिन एक महात्मा उस नगर में आए। लोगों ने उनसे सेठ की परेशानी बताई। शाम को महात्मा सेठ की हवेली पहुँचे। सेठ खिड़की से बाहर देख रहा था। सामने एक गरीब मजदूर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हँस-खेल रहा था। महात्मा ने पूछा — “तुम्हारे पास सब कुछ है, फिर भी तुम दुखी क्यों हो?”
सेठ बोला - “मुझे यह देखकर दुख होता है कि इतने अभावों में भी वह मजदूर खुश कैसे है ? ” महात्मा मुस्कुराए और बोले -
“जो व्यक्ति दूसरों की खुशी देखकर दुखी होता है, उसका दुख भगवान भी दूर नहीं कर सकते।” यह कहकर महात्मा वहाँ से चले गए, लेकिन सेठ का दुख वैसा ही बना रहा।
दूसरों को खुश देखकर दुखी होना एक नकारात्मक सोच है। यह सोच हमें कभी सच्चा सुख और आनंद नहीं दे सकती।जो लोग हर समय आलोचना करते रहते हैं, वे खुद भी दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख देते हैं। हमें चाहिए कि हम दूसरों की अच्छाइयों को देखें और उनसे सीख लें। हर इंसान में कुछ न कुछ कमी होती है, लेकिन अच्छाइयाँ भी होती हैं।
यदि हम केवल कमियाँ ही देखते रहेंगे, तो रिश्तों में संदेह, दूरी और कड़वाहट बढ़ेगी।
जीवन को आनंदमय बनाने के लिए जरूरी है कि हम सकारात्मक सोच रखें। दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उनसे प्रेरणा लें। कमियों को नजरअंदाज कर अच्छाइयों को अपनाएँ, क्योंकि यही हमें बेहतर इंसान बनाती हैं।आखिर में इस लेख का सार यही है कि-दूसरों की खुशी में खुश होना सीखिए।
जो व्यक्ति दूसरों के सुख में अपना सुख खोज लेता है, उसका जीवन प्रेम, शांति और आनंद से भर जाता है। हर इंसान अधूरा है, लेकिन दूसरों की अच्छाइयों को अपनाकर ही हम अपने जीवन को पूरा और सुंदर बना सकते हैं।

परवरिश का द्वंद्व बच्चों की परीक्षाओं के बाद उनके परिणाम आ चुके हैं और वे अगली कक्षा में पहुँच गए हैं । इसके बावजूद इसमे...
10/05/2026

परवरिश का द्वंद्व

बच्चों की परीक्षाओं के बाद उनके परिणाम आ चुके हैं और वे अगली कक्षा में पहुँच गए हैं । इसके बावजूद इसमें असली परीक्षा तो माता-पिता की होती है जो कभी खत्म नहीं होती । आज के समय में बच्चों की परवरिश करना आसान काम नहीं रह गया है ।खास बात यह है कि कोई भी , माता-पिता बनने के पहले इस जिम्मेदारी की सही ट्रेनिंग नहीं पाता ।हम सभी अपनी-अपनी अधूरी परवरिश के अनुभवों के साथ बड़े हुए हैं । फिर भी हम अपने बचपन की कुछ ऐसी बातें याद रखतें हैं जो हमें अच्छी नहीं लगीं, और तय करते हैं कि अपने बच्चों के साथ वैसा नहीं करेंगे । वहीं, जो बातें अच्छी लगीं, उन्हें दोहराने की कोशिश करते हैं । इसी तरह समय बीतता जाता है, बच्चे बड़े हो जाते हैं, अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं,उनकी नौकरी, शादी,फिर हमें लगता है कि परवरिश का काम पूरा हो गया ।
लेकिन क्या इतनी ही सहज है परवरिश ? आज हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए जी-जान एक किए हुए है । पर हम यह समझ नहीं पाते कि बच्चों के सुखद भविष्य का आधार उनका आर्थिक रूप से मजबूत होना नहीं अपितु मानसिक रूप से मजबूत होना है ।मनोचिकित्सकों के अनुसार, हर उलझा हुआ वयस्क दिमाग ख़राब परवरिश या माहौल का प्रतिफल होता है ।हमारा बच्चा अच्छा है , इसे साबित करने के लिए उसे किन मानदंडों पर खरा उतरना होगा ? वह किस तरह साबित कर सकेगा कि हमारे द्वारा की गई परवरिश सफल है ? हमारे समय में अच्छा बच्चा होने का मतलब ही था कि वह अपने माता-पिता से किसी भी तरह की मॉंग न करे । अपने जीवन का हर फैसला उन्हीं के अनुसार ले ।
बहरहाल, जमाना अब धीरे-धीरे बदल रहा है ।नई पीढ़ी बच्चों को परिवार का सबसे महत्वपूर्ण अंग बनाकर अपने मन की इच्छा पूरी करने की कोशिश कर रही है ।इस कोशिश में कई माता-पिता बच्चों को राजकुमारों और परियों की तरह बड़ा कर रहें हैं ।लेकिन इस नाजुक तरीके से पले-बढ़े बच्चे ,जरा सा विपरीत समय आने पर एक झटके में बिखर रहें हैं ।होना यह चाहिए कि एक सामान्य परवरिश के तहत बच्चों के मन की सुनी जाए और बच्चों को फिर अपनी बात बताई जाए । जहाँ बच्चे अपना गुस्सा, अपनी नापसंदगी, अपनी बातें खुल कर व्यक्त कर सकें ।जहॉं उनकी गलतियों पर उन्हें गले लगाकर माफ़ किए जाने का हौंसला हो, तो अपनी गलतियों पर उनसे माफ़ी माँग लेने की भी सहजता हो ।जहाँ बच्चों के कंधे पर बस स्कूल का बस्ता हो, खानदान की इज्जत का बोझ नहीं ।जहॉं विद्रोह को कुचलने की नहीं, उसके कारणों को समझने की बात हो ।परवरिश में रिश्तों के महिमामंडन की नहीं, बल्कि उनके बीच पारदर्शिता का भाव हो, यही बेहतर परवरिश है।
जैसे किसी बीमारी को उपचार के साथ-साथ परवाह की भी ज़रूरत होती है, ठीक वैसे ही अगर हमारा बच्चा हमारे अनुसार बर्ताव नहीं कर रहा है तो उसके बारे में राय बनाए बिना उसके व्यवहार को समझने की कोशिश करने की जरूरत है ।मान कर चलना चाहिए कि हमसे भी गलतियां हो सकती हैं ।परवरिश की सबसे पहली शर्त ही नि:स्वार्थ “प्रेम“ है।यह आसान नहीं है, लेकिन कोशिश की जा सकती है ।आखिर अभिभावक बनने का फैसला तो हमने ही लिया था ?

धूप और छाँव - जीवन के संतुलन की सीख !आजकल गर्मी बहुत ज्यादा पड़ रही है, तो क्यों न धूप और छाया की बात कर ली जाए । क्या य...
03/05/2026

धूप और छाँव - जीवन के संतुलन की सीख !

आजकल गर्मी बहुत ज्यादा पड़ रही है, तो क्यों न धूप और छाया की बात कर ली जाए । क्या ये केवल प्राकृतिक घटनाएँ हैं या महज़ कुछ और ? धूप और छाँव हमें जीवन के दो पहलू बताती हैं- संघर्ष और विश्राम । धूप का अनुभव जीवन की चुनौतियों, कठिनाइयों और बाधाओं के रूप में होता है । यह धूप कभी तेज होती है ,तो कभी अप्रत्याशित । यह हमारी सहनशीलता,धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा लेती है । एक पथिक अगर धूप में चलता है , तो उसे जलन और थकान होती है, पर उसकी मंजिल की ओर बढ़ने की प्रेरणा और तेज हो जाती है । इसी तरह जीवन में आने वाले संघर्ष हमें हमारी छिपी हुई क्षमताओं से परिचित कराते हैं ।
संघर्ष केवल कठिनाई नहीं है। यह हमारी उर्जा का स्तंभ भी है । उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति नौकरी की तलाश में कई बार असफल होता है, तो वह निराश हो सकता है । पर यही असफलताएँ उसे अपनी रणनीति को सुधारने, अपने कौशल को बढ़ाने और धैर्य सीखने का अवसर देती हैं । संघर्ष हमें आत्मनिर्भर बनाता है और हमें यह सिखाता है कि असली सफलता धैर्य और प्रयास के माध्यम से ही प्राप्त होती है ।
धूप हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में स्थिरता हमेशा सुखद नहीं होती। अक्सर हम चुनौतियों से बचने के लिए आसान रास्ता ढूंढते हैं । मगर यही आसान रास्ता हमें सीमित कर देता है ।अगर हम लगातार आराम और स्थिरता में ही रहेंगे, तो हमारी क्षमताओं का विकास नहीं होगा । संघर्ष और कठिनाइयाँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमें क्या सीखना है और हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है । वहीं छाया का महत्व भी कम नहीं है । जीवन में विश्राम और ठहराव आवश्यक हैं । यह हमें मानसिक और शारीरिक उर्जा फिर प्राप्त करने का समय देती हैं । हमें भी समय-समय पर ठहरकर अपने मन और शरीर को तरोताजा करना चाहिए, लेकिन ध्यान रखने की जरूरत है कि छाया में अधिक समय बिताना आलस्य और निराशा का कारण बन सकता है ।
संतुलन बनाए रखना जीवन की कला है । संघर्ष और विश्राम के बीच सही संतुलन बनाने वाला व्यक्ति ही सच्ची सफलता पा सकता है । अत्याधिक संघर्ष मानसिक थकान पैदा कर सकता है, वही अत्याधिक विश्राम प्रगति को धीमा कर सकता है । उदाहरण के लिए, एक किसान को दिन में खेत की मेहनत करनी होती है और शाम को विश्राम । अगर वह केवल काम या केवल आराम करे तो फसल सही तरीके से नहीं उग पाएगी । जीवन में भी यही सिद्धांत लागू होता है ।
जीवन में संघर्ष और विश्राम का संतुलन हमें यह भी सिखाता है कि किस समय प्रयास करना है और कब ठहराव लेना है । संघर्ष हमें जीवन की असली ताकत सिखाता है, जबकि विश्राम हमें उर्जा और मानसिक स्पष्टता प्रदान करता है । दोनों का सही प्रबंधन ही व्यक्ति को स्थिर, सशक्त और सफल बनाता है ।
इस तरह धूप और छाया दोनों हमारे शिक्षक हैं । धूप हमें सिखाती है संघर्षों से लड़ना और आगे बढ़ना । छाया हमें सिखाती है, विश्राम करना और फिर से उर्जा प्राप्त करना । इसलिए यह आवश्यक है कि हम धूप का स्वागत करें। उसकी गर्मी और कठिनाइयों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाने का साधन मानें। वहीं छाया को केवल उर्जा को फिर से प्राप्त करने के लिए अपनाएँ । इसमें डूबने से बचना चाहिए । जीवन में संतुलन बनाए रखने का यही मंत्र है ।

ज्यादा सुविधा,कम सुकून-आखिर क्यों ?आज के दौर में अगर हम अपने जीवन को ध्यान से देखें, तो एक अजीब सा विरोधाभास दिखाई देता ...
26/04/2026

ज्यादा सुविधा,कम सुकून-आखिर क्यों ?

आज के दौर में अगर हम अपने जीवन को ध्यान से देखें, तो एक अजीब सा विरोधाभास दिखाई देता है। हमारी जिंदगी में सुविधाएँ पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं-एसी, फ्रिज, स्मार्टफोन, इंटरनेट, गाड़ियाँ, बड़े-बड़े घर… सब कुछ है। लेकिन इसके बावजूद, मन की शांति और संतोष जैसे कहीं खोते जा रहे हैं।
ज़रा खुद से कुछ आसान सवाल पूछिए-क्या जितनी तेजी से हमारी सुविधाएँ बढ़ी हैं, उतनी ही तेजी से हमारा संतोष कम हुआ है?क्या हमारे पास सब कुछ है, लेकिन फिर भी मन बेचैन रहता है?
क्या हम दिखावे में ज्यादा और असल में कम जी रहे हैं?
सच कहें तो आज का इंसान एक ऐसी दौड़ में भाग रहा है, जिसका कोई अंत नहीं है। पहले जो चीज़ हमें सपना लगती थी, वो आज मिलते ही जरूरत बन जाती है। फिर उससे भी आगे कुछ नया पाने की ‘चाह ‘ पैदा हो जाती है। यानी चाहतें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं ।यही कारण है कि जितना हम पाते जा रहे हैं, उतना ही अंदर से खाली महसूस कर रहे हैं।
अगर हम कुछ साल पीछे जाएँ, तो पाएँगे कि लोग, कम संसाधनों में भी ज्यादा खुश थे। उनके पास आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन उनके पास समय था - अपने परिवार के लिए, दोस्तों के लिए, और खुद के लिए भी। लोग शाम को एक-दूसरे के साथ बैठते थे, हँसी-मजाक करते थे, सुख-दुख बाँटते थे। रिश्तों में अपनापन था, जीवन में सादगी थी।
आज स्थिति उलटी हो गई है। अब लोग अपने जीवन को दूसरों के सामने “परफेक्ट” दिखाने में लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की खुशियाँ देखकर हम अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। किसी की गाड़ी, किसी की नौकरी, किसी की छुट्टियाँ- सब देखकर तुलना शुरू हो जाती है। यही तुलना धीरे-धीरे ईर्ष्या और असंतोष को जन्म देती है।
आज हर व्यक्ति के पास मोबाइल है, लेकिन बातचीत कम हो गई है। परिवार एक ही घर में रहकर भी अलग-अलग दुनिया में जी रहा है। बच्चे खेल के मैदान से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताते हैं, और बड़े लोग काम और तनाव में इतने उलझे हैं कि आपस में बात करने का समय ही नहीं बचता।सच तो यह है कि सुविधाएँ सिर्फ हमारे शरीर को आराम देती हैं, मन को नहीं। पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है, लेकिन सुकून नहीं। एक इंसान करोड़ों कमाकर भी चैन की नींद नहीं खरीद सकता। असली खुशी और संतोष बाहर नहीं, हमारे अंदर होते हैं।
समस्या यह है कि आज हम “कितना काफी है” यह समझना भूल गए हैं। जब तक हमें यह नहीं समझ आएगा कि हमारे लिए “पर्याप्त” क्या है, तब तक हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाएंगे।इसका मतलब यह नहीं कि हमें आगे बढ़ना नहीं चाहिए या सपने नहीं देखने चाहिए। प्रगति करना जरूरी है, लेकिन उसके साथ संतुलन बनाए रखना उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर हमारी इच्छाएँ इतनी बढ़ जाएँ कि वे हमारी शांति को ही खत्म कर दें, तो ऐसी प्रगति का कोई मतलब नहीं रह जाता।
आखिर में बस इतनी सी बात समझने की जरूरत है -सुविधाओं का कोई अंत नहीं है, लेकिन संतोष की शुरुआत हमारे मन से होती है।अगर मन शांत है, तो कम में भी खुशी है।और अगर मन अशांत है, तो सब कुछ होने पर भी कमी महसूस होती है।इसलिए आज की सबसे बड़ी जरूरत यह नहीं है कि हमारे पास और ज्यादा सुविधाएँ हों, बल्कि यह है कि हमारे भीतर शांति और संतोष बना रहे।

सहज संबंध बनाम अधिक संपर्क - एक सवाल ?हम सभी मूल रूप से सामाजिक प्राणी है।परन्तु आज के समय में इस सामाजिकता की परिभाषा ज...
19/04/2026

सहज संबंध बनाम अधिक संपर्क - एक सवाल ?

हम सभी मूल रूप से सामाजिक प्राणी है।परन्तु आज के समय में इस सामाजिकता की परिभाषा जरा बदली नजर आती है । अब लोग संबंधों की गहराई से अधिक संपर्कों की संख्या पर ध्यान देने लगे हैं । लोगों को यह भ्रम हो गया कि जितने अधिक लोग उसके आसपास होंगे, उतना ही बड़ा उसका प्रभाव होगा । यहीं से आरंभ होती है उस भीड़ की यात्रा, जो आखिरकार उसे एक गहरे एकाकीपन की ओर ले जाती है । हम अपने आसपास ऐसे तमाम उदाहरण देख सकते हैं, जिसमें किसी के सोशल मीडिया पर हजारों दोस्त होंगे, लेकिन जब वास्तव में जरूरत पड़ती है, तब पास में साथ खड़ा रहने वाला एक भी नहीं होता ।
पहले के समय में संबंध सहज और सच्चे होते थे । लोगों के बीच मिलने-जुलने में आत्मीयता होती थी, भावनाएं जीवंत रहती थीं । किसी का दुख सबका दुख होता था, लेकिन अब जमाना बदल चुका है । अब व्यक्ति ‘ नेटवर्किंग ‘ के नाम पर लोगों से जुड़ तो रहा है, पर आत्मीयता और स्नेह के सूत्र कहीं पीछे छूट गए हैं ।
आज की पीढ़ी के पास कांटेक्ट लिस्ट में ढेर सारे नम्बर अवश्य हैं, पर जीवन भीतर से खाली है । लोग मिलते हैं, बातें करते हैं, मुस्कुराते हैं , पर भीतर कोई जुड़ाव नहीं होता । रिश्ते कई बार, किसी न किसी स्वार्थ के आधार पर खड़े दिखते हैं । इसप्रकार के स्वार्थ पूर्ण संबंध अस्थायी होते हैं, जिनकी उम्र किसी अवसर से अधिक नहीं होती ।इसी कारण से व्यक्ति भीड़ में रहकर भी अपने भीतर एक अकेलापन महसूस करता है ।
जबकि जीवन का सत्य यह है कि मनुष्य की शक्ति उसके संबंधों की गहराई में है, न कि अधिक संख्या पर । गिने-चुने सच्चे लोग हज़ार औपचारिक परिचितों से कहीं अधिक मूल्यवान होते हैं । जब जीवन में कठिन समय आता है तो, यही गिने-चुने सच्चे लोग अपने मौन संबल और सहारे से उस दौर में हमारा हाथ पकड़े रहते हैं ,जबकि उस समय मतलबी लोग कन्नी काट लेते हैं ।
कठिनाई यह है कि यह समझ अक्सर बहुत देर से आती है । जब ठोकरें खा ली जाती हैं और दिखावटी मित्रता की परतें उतर चुकी होती हैं और सामने रह जाता है केवल सन्नाटा । तब एहसास होता है कि भीड़ जमा करने की लालसा में हमने अपने सच्चे लोगों को खो दिया ।यह आत्मबोध पीड़ादायक भी होता है और साथ ही शिक्षाप्रद यानी सबक भी, तभी समझ आता है कि दिखावे के रिश्तों की जगह सच्चे, सीमित, और स्थायी संबंध अधिक मूल्यवान हैं । वह मनुष्य कभी अकेला नहीं होता, जिसके पास कुछ सच्चे लोग होते हैं, तो मानो उनकी दुनिया उसके आसपास ही होती है । यही समझ उसे बाहरी कोलाहल से मुक्त करती है।
इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने जीवन में उन रिश्तों को संजोए, जो दिखावे से नहीं, सच्चाई से बनें हों । यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आखिर यही रिश्ते उसके कठिन समय में ढाल बनकर खड़े रहेंगे । सच यह है कि मनुष्य का मूल्य उसके आसपास की भीड़ से नहीं, उसकी आत्मीयता से आँका जाना चाहिये ।अतः संबंधों की खेती संख्या बल से न करते हुए संवेदना और परस्पर प्रेम से कीजिए, क्योंकि यही लोग आपके जीवन के अंत तक साथ रहने वाले हैं ।

आत्ममंथन जरूरी क्यों?आज की तेज़ भागती जिंदगी में हम सब कुछ पाने की दौड़ में लगे रहते हैं -पैसा, नाम, सुविधा, सफलता। लेकि...
12/04/2026

आत्ममंथन जरूरी क्यों?

आज की तेज़ भागती जिंदगी में हम सब कुछ पाने की दौड़ में लगे रहते हैं -पैसा, नाम, सुविधा, सफलता। लेकिन इस दौड़ में हम अक्सर एक बहुत महत्वपूर्ण चीज़ को नजरअंदाज कर देते हैं, और वह है खुद को समझना। आत्ममंथन यानी अपने भीतर झांकना, अपने विचारों, आदतों और जीवन की दिशा पर शांत मन से विचार करना। यह केवल सोचना नहीं, बल्कि गहराई से खुद को परखना है।
हम रोज़ अपने बारे में सोचते हैं, लेकिन वह सोच अक्सर स्वार्थ या तत्काल लाभ तक सीमित होती है -जैसे मुझे क्या चाहिए ?मैं कैसे आगे बढ़ूं ?लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं ?लेकिन सच्चा आत्ममंथन इससे कहीं आगे जाता है। इसमें हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि हम सही रास्ते पर हैं या नहीं, हमारी आदतें हमें आगे बढ़ा रही हैं या पीछे खींच रही हैं, और हम अपने जीवन का सही उपयोग कर रहे हैं या नहीं।
आत्ममंथन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह हमें अपने दोष और गुण दोनों को पहचानने में मदद करता है। जब हम शांत होकर अपने दिनभर के कार्यों, व्यवहार और निर्णयों पर विचार करते हैं, तो हमें यह समझ में आता है कि हमने कहाँ गलती की और कहाँ अच्छा किया। यह समझ ही हमें बेहतर इंसान बनने की दिशा में आगे बढ़ाती है।
इसके अलावा, आत्ममंथन हमें जीवन की दिशा तय करने में भी मदद करता है। कई बार हम बिना सोचे-समझे बस भीड़ के साथ चलते रहते हैं। लेकिन जब हम अकेले बैठकर अपने जीवन के उद्देश्य पर विचार करते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हमें वास्तव में क्या करना चाहिए और किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यह स्पष्टता हमारे निर्णयों को मजबूत बनाती है।
आत्ममंथन का एक और महत्वपूर्ण पहलू है समय का सदुपयोग। जब हम अपने दिन का विश्लेषण करते हैं, तो हमें पता चलता है कि हमने समय कहाँ व्यर्थ किया और कहाँ सही उपयोग किया। इससे हम अपनी दिनचर्या को बेहतर बना सकते हैं और अपने लक्ष्यों के करीब पहुंच सकते हैं।
साथ ही, आत्ममंथन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत जरूरी है। जब हम अपने मन की उलझनों को समझते हैं और उन्हें सुलझाने का प्रयास करते हैं, तो हमारा मन हल्का और शांत रहता है। इससे तनाव कम होता है और हम अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं।
आत्ममंथन हमें यह भी सिखाता है कि जीवन सीमित है और इसे सार्थक बनाना हमारी जिम्मेदारी है। जब हम अपने बचे हुए समय के बारे में सोचते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमें छोटी-छोटी बातों में उलझने के बजाय बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।
अंत में, यही कहा जा सकता है कि आत्ममंथन एक दर्पण की तरह है, जो हमें हमारी असली तस्वीर दिखाता है। यह हमें खुद से जोड़ता है, हमें सही और गलत का अंतर समझाता है, और हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। इसलिए, हर व्यक्ति को रोज़ कुछ समय निकालकर शांत मन से आत्ममंथन जरूर करना चाहिए। यही आदत हमें जीवन में सही दिशा और सच्ची संतुष्टि दिला सकती है।

सच्ची मुक्ति  कैसे हो ?इस सप्ताह मैं सोमनाथ और द्वारिकापुरी की यात्रा पर था, और ऐसी जगहों पर जब मैं पहुँचता हूँ तो मेरे ...
05/04/2026

सच्ची मुक्ति कैसे हो ?

इस सप्ताह मैं सोमनाथ और द्वारिकापुरी की यात्रा पर था, और ऐसी जगहों पर जब मैं पहुँचता हूँ तो मेरे मन में हमेशा परमात्मा की सृष्टि, उसकी व्यवस्था और अपने जीवन का उद्देश्य पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट दिखने लगते हैं। तरह-तरह के सवाल मन में उठते हैं और मेरे “आत्मा-राम” अंदर ही जबाब देने लगते हैं । तो आओ इस विषय को थोड़ा ध्यान से समझते हैं ।
क्या हमारा जीवन खाने-पीने, ऐश करने और फिर राम-राम हो जाने के लिए है या इससे आगे भी कुछ और है ? क्या हमने कभी सच्ची मुक्ति के लिए मन में विचार किया है कि यह कैसे और किस तरह से संभव है ? क्या बिना आत्मबोध के कोई इस रास्ते पर चल सकता है ? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं पर हम इन पॉंच बातों से इसे समझने का प्रयत्न करते हैं । मुक्ति के लिए सबसे जरूरी है-अज्ञान से बाहर आना, अनुभव और संघर्ष से सीखना,संवेदनशीलता विकसित करना और खुद के अलावा ज़रा दूसरों के लिए भी जीना, ये बातें समझने के बाद इस राह में चलना शुरू करते ही ,हम उच्च चेतना की अवस्था में पहुँच कर मुक्ति की राह में अग्रसर हो सकते हैं ।
अज्ञान - यह मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा बंधन है। यह केवल ज्ञान के अभाव का नाम नहीं, बल्कि यह सत्य से दूरी, पूर्वाग्रहों की जकड़न और आत्मबोध के अभाव की स्थिति है । जब मनुष्य केवल परंपराओं, रूढ़ियों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सोचता है, तब वह स्वयं के विवेक का उपयोग नहीं कर पाता । अज्ञान उसे भय , संकीर्णता और भ्रम में बाँध देता है । इसलिए सच्ची मुक्ति का पहला चरण अज्ञान के अंधकार से बाहर निकलना है, जहॉं मनुष्य प्रश्न करना सीखता है और अपने भीतर छिपी चेतना को पहचानता है ।
अनुभव- यह मनुष्य को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराता है । पुस्तकें और उपदेश दिशा तो दे सकते हैं, पर जीवन की गहराई का बोध अनुभव से ही होता है । सुख-दुख, सफलता और असफलता, प्रेम और पीड़ा, ये सभी अनुभव हमारे दृष्टिकोण को परिष्कृत करते हैं ।जब हम अपने अनुभवों से सीखते हैं तो इसमें छिपी सीख हमें और अधिक परिपक्व बना देती है ।
संघर्ष इस सीख को और अधिक गहराई देता है। जब मनुष्य कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, तब उसकी वास्तविक शक्ति प्रकट होती है । संघर्ष उसे सहनशीलता, धैर्य और आत्मविश्वास प्रदान करता है ।जो लोग संघर्ष से भागते हैं वे जीवन की परीक्षा में कमजोर पड़ जाते हैं ।संघर्ष हमें धीरे-धीरे अज्ञान से ज्ञान की ओर, भय से साहस की ओर और निराशा से आशा की ओर ले जाता है ।
संवेदनशीलता मनुष्य को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी सोचने की क्षमता देती है । जब मनुष्य दूसरों के दुख, पीड़ा और संघर्ष को महसूस करता है, तब उसके भीतर करुणा और सहानुभूति जन्म लेती है। इसके बाद शुरू होता है वंचितों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास । तब परमात्मा हमें और अधिक सक्षम बना कर हमारे हाथों से सत्कर्म कराते हुए मुक्ति के पथ पर और आगे बढ़ा देते हैं ।
जब हम दूसरों के लिए अपने समय और संसाधनों का कुछ हिस्सा देना शुरू करते हैं, और अपने जीवन को किसी बड़े उद्देश्य के लिए तैयार करते हैं ,तब हमारी सफलता फिर सार्थकता में बदलने लगती है। इसके बाद हमें मिलता है वास्तविक संतोष और सच्ची शांति । फिर हमें मुक्ति के लिए कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं रह जाती । क्योंकि मानव कल्याण के उद्देश्य से जुड़ते ही दूसरों की भलाई से खुशी मिलने लगती है और मन में उस परमात्मा के अंश का विस्तार होना शुरू होता है ।
वास्तव में सच्ची मुक्ति कोई एक क्षण की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया अज्ञान से ज्ञान की ओर, स्व-कल्याण से परोपकार की ओर, तथा सीमित दृष्टि से व्यापक चेतना की ओर ले जाती है । फिर मनुष्य में आत्मिक शक्ति जागृत हो जाती है । यही आत्मिक शक्ति उसे जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि , सच्ची स्वतंत्रता तक पहुँचाती है, जहॉं न केवल वह स्वयं मुक्त होता है, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रकाश से भर देता है ।

राम से जीना-कृष्ण से जीत !!अभी दो दिन पहले ही हमने राम नवमीं मनाई है ।भए प्रकट कृपाला दीन दयाला.. की धुन पर भगवान राम का...
29/03/2026

राम से जीना-कृष्ण से जीत !!

अभी दो दिन पहले ही हमने राम नवमीं मनाई है ।भए प्रकट कृपाला दीन दयाला.. की धुन पर भगवान राम का जन्मोत्सव मनाया । इस जन्मोत्सव के बाद मैं सोचने लगा कि आज के समय में राम भगवान के आदर्शों पर जीवन जीना कितना मुश्किल है ? मेरे पुराने अनुभवों से लगा कि व्यक्तिगत जीवन भगवान राम की तरह और घर के बाहर भगवान श्रीकृष्ण की तरह जीवन जीना जरूरी है । बाहर की दुनिया में यदि राम भगवान की तरह जिए तो दुनिया ही निपटा देगी, आपका “आत्मा-राम” कितने रावणों से निपटेगा ? आज के समय में जीवन केवल आदर्शों से नहीं चल सकता , बल्कि इसमें समझदारी और संतुलन भी आवश्यक है ।
भगवान राम हमें सिखाते हैं कि जीवन में मर्यादा, सच्चाई, कर्तव्य और रिश्तों का कितना महत्व है ।वहीं भगवान श्रीकृष्ण हमें यह समझाते हैं कि जीवन में केवल सीधेपन से काम नहीं चलता, बल्कि समय और परिस्थिति तथा सामने वाले के व्यवहार के अनुसार काम करते आना चाहिए ।आज की दुनिया बहुत जटिल हो गई है । हर जगह प्रतियोगिता है, चालाकी है, और कई बार लोग आपके सरल स्वभाव का फायदा उठाने से भी नहीं चूकते । ऐसे में अगर हम हर जगह केवल राम की तरह सीधे और आदर्शवादी बने रहें तो संभव है कि हमें बार-बार चोट लगे ।लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने अंदर के राम को खत्म कर दें ।बल्कि जरूरत इस बात की है कि हम अपने अंदर राम और कृष्ण दोनों को संतुलित करें ।घर के अंदर , परिवार के बीच, रिश्तों में - यहॉं राम होना ही सही है । यहॉं प्रेम, त्याग, सम्मान, समर्पण और धैर्य की जरूरत होती है। घर के अंदर एक अच्छा बेटा, भाई, पति या मित्र बनने के लिए राम के गुण ही काम आते हैं । घर वह स्थान है जहां आपको बिना शर्त प्यार मिलता है और जहॉं आपके आदर्शों की असली परीक्षा होती है ।
लेकिन जैसे ही हम घर से बाहर निकलते हैं तो बाहर की दुनिया अलग है। यहॉं हर व्यक्ति आपके जैसा नहीं सोचता । यहॉं कई बार सही को सही साबित करने के लिए भी बुद्धि और रणनीति की जरूरत होती है । यहॉं कृष्ण का मार्ग अपनाना पड़ता है ।कृष्ण हमें सिखाते हैं कि कब चुप रहना है,कब बोलना है, कब हुंकार भरनी है, कब सीधा रास्ता अपनाना है और कब टेढ़ा।महाभारत में भी कृष्ण ने यही दिखाया कि केवल धर्म का साथ देना काफी नहीं है, बल्कि धर्म की रक्षा के लिये बुद्धि और नीति का प्रयोग करना भी जरूरी है ।उन्होंने अर्जुन को केवल युद्ध करने के लिए नहीं कहा, बल्कि उसे “गीता “ के रूप में सही दृष्टि दी, सही समझ दी ।यही कारण है कि कृष्ण केवल भगवान नहीं बल्कि दुनिया के पहले मॉटीवेशनल स्पीकर और मार्गदर्शक भी हैं।
आज के समय में सफल व्यक्ति वही है जो भीतर से राम और बाहर से कृष्ण हो ।जिसका मन साफ हो पर बुद्धि तेज हो । जो अपने रिश्तों में सच्चा हो, लेकिन दुनिया के सामने समझदार हो ।क्योंकि आप केवल राम बनकर रहेंगे, तो लोग आपको कमजोर समझ सकते हैं , अगर केवल कृष्ण बनेंगे, तो आप अपने रिश्तों की गर्माहट खो सकते हैं ।इसिलिए जीवन का सही संतुलन यही है कि हम अपने अंदर राम को जीवित रखें और समय आने पर कृष्ण की तरह व्यवहार करना सीखें । यह कोई एक दिन में होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर अभ्यास है।हर मनुष्य की यात्रा राम से ही
शुरू होती है और " समय " उसे कृष्ण बनाता है। व्यक्ति का कृष्ण होना भी उतना ही जरूरी है जितना राम होना , लेकिन राम से प्रारंभ हुई यह यात्रा तब तक अधूरी है जब तक इस यात्रा का समापन कृष्ण पर न हो ।
अंत में यही कहा जा सकता है कि जीवन, जीना एक कला है और इस कला में राम और कृष्ण दोनों के रंग जरूरी हैं ।राम हमें जीना सिखाते हैं और कृष्ण हमें जीतना सिखाते हैं ।और जब ये दोनों एक साथ हमारे जीवन में उतर आते हैं, तब जीवन वास्तव में सफल और सार्थक बन जाता है ।

भक्ति से शक्ति !चैत्र नवरात्र का समय चल रहा है, मैं स्वयं मॉं भंगवती से भक्ति करने की शक्ति मॉंग रहा हूँ। दरअसल भक्ति के...
22/03/2026

भक्ति से शक्ति !

चैत्र नवरात्र का समय चल रहा है, मैं स्वयं मॉं भंगवती से भक्ति करने की शक्ति मॉंग रहा हूँ। दरअसल भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन प्रबंधन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है। नवरात्र का यह पावन पर्व हमें भीतर की शक्ति को जागृत करने का अवसर देता है। यह केवल देवी की आराधना का समय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है- कि हम जीवन को किस दिशा में ले जा रहे हैं ?
लोग जीवन के संघर्ष में जब असफल होते हैं ,तब अक्सर बाहरी परिस्थितियों को दोष देते हैं- कहते हैं समय अच्छा नहीं है, मित्र साथ नहीं दे रहे, अवसर नहीं मिल रहे। परंतु सत्य यह है कि जब तक भीतर की शक्ति जागृत नहीं होती, तब तक बाहर की कोई भी परिस्थिति हमें आगे नहीं बढ़ा सकती। मॉं भगवती की उपासना हमें यही सिखाती है कि शक्ति बाहर नहीं, हमारे भीतर ही निहित है। भक्ति ,उस शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने का माध्यम है।
जीवन प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो नवरात्र के नौ दिन हमें नौ महत्वपूर्ण जीवन सूत्र प्रदान करते हैं। पहला-आत्मविश्वास, दूसरा-संयम, तीसरा-साहस, चौथा-धैर्य, पाँचवाँ-सकारात्मकता, छठा-त्याग, सातवाँ-अनुशासन, आठवाँ-समर्पण और नवाँ-आत्मिक शांति। यदि इन गुणों को हम अपने जीवन में उतार लें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।
आज के समय में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम जल्दी परिणाम चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी हर इच्छा तुरंत पूरी हो जाए। यही अधीरता हमें भक्ति में भी व्यापार करने की ओर ले जाती है। लेकिन सच्ची भक्ति हमें शबरी की तरह “धैर्य“ रखना सिखाती है। यह सिखाती है कि हर चीज़ का एक सही समय होता है, और उस समय तक हमें निरंतर प्रयास और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
मॉं भगवती की आराधना का एक गहरा अर्थ यह भी है कि हम अपने भीतर की नकारात्मकताओं का अंत करें। जैसे महिषासुर का वध हुआ, वैसे ही हमें अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और भय का नाश करना है। जब तक ये नकारात्मक भाव हमारे भीतर हैं, तब तक हम सच्ची शांति और सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। भक्ति हमें संतुलन सिखाती है- काम और विश्राम का संतुलन, भावनाओं का संतुलन, और जीवन के हर पहलू में सामंजस्य। जो व्यक्ति संतुलित होता है, वही सही निर्णय ले पाता है और जीवन में आगे बढ़ता है।
नवरात्र से हमें यही संदेश मिलता है कि हम अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करें, अपनी प्राथमिकताओं को समझें और अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट हों।नवरात्र का एक और संदेश यह है कि हम केवल बाहरी सफलता के पीछे न भागें, बल्कि आंतरिक समृद्धि को भी महत्व दें। जब भीतर शांति और संतोष होता है, तब ही बाहर की उपलब्धियाँ सार्थक लगती हैं। मॉं आदिशक्ति से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि सही दृष्टि, सही मार्ग और सही विचार भी प्रदान करें।
मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव है कि जब भक्ति निष्काम हो जाती है, तब स्वत: आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है - ऐसी शक्ति जो हमें हर परिस्थिति में स्थिर रखती है, हर संघर्ष में आगे बढ़ाती है और अंततः हमें उस परम आनंद की अनुभूति कराती है, जिसकी खोज में हम जीवन भर भटकते रहते हैं। यही नवरात्र का सच्चा संदेश है- भक्ति से शक्ति और शक्ति से श्रेष्ठ जीवन।

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