Shree Vandanam

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� SHRI KRISHNA GOVINDA ॐ �

“My dear Lord, You are the topmost of all bestowers of all benediction, the oldest and supreme enjoyer amongst all enjoyers. You are the master of all the worlds’ metaphysical philosophy, for You are the supreme cause of all causes, Lord Krishna. ”~Srimad Bhagavatam 4.24.42

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️!! श्रीरामचरितमानस  !!♥️❤️🔥❤️♥️🔥♥️❤️🔥         * बालकाण्ड *❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️...
15/08/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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जे जनमे कलिकाल कराला ।
करतब बायस बेष मराला ॥

चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े।
कपट कलेवर कलि मल भाँड़े ॥

जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का-सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुग के पापों के भाँड़े हैं ॥ १ ॥

बंचक भगत कहाइ राम के।
किंकर कंचन कोह काम के ॥

तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी।
धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥

जो श्रीरामजीके भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्मध्वजी (धर्मकी झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं. संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है॥२॥

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ।
बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥

ताते मैं अति अलप बखाने ।
थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥

यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूं तो कथा बहुत बढ़ जायगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान् लोग थोड़े ही में समझ लेंगे ॥ ३ ॥

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥

एतेहु पर करिहहिं जे असंका।
मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥

मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं ॥ ४ ॥

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ ।
मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥

कहँ रघुपति के चरित अपारा।
कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥

मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि! ॥ ५ ॥

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाही ।
कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥

समुझत अमित राम प्रभुताई ।
करत कथा मन अति कदराई ||

जिस हवा से सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनती में है। श्रीरामजीकी असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है— ॥ ६ ॥

दो०- सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥ १२ ॥

सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण- ये सब 'नेति-नेति' कहकर (पार नहीं पाकर ऐसा नहीं', 'ऐसा नहीं' कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं ॥ १२ ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️!! श्रीरामचरितमानस  !!✨️🔥✨️🔥✨️🔥✨️🔥✨️🔥         * बालकाण्ड *❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️...
17/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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मनि मानिक मुकुता छबि जैसी।
अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।

नृप किरीट तरुनी तनु पाई।
लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥

मणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं ॥ १ ॥

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥

भगति हेतु बिधि भवन बिहाई।
सुमिरत सारद आवति धाई ॥

इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकवि की कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात् कवि की वाणी से उत्पन्न हुई कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है)। कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वती जी ब्रह्मलोकको छोड़कर दौड़ी आती हैं ॥ २ ॥

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ ।
सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।

कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी।
गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥

सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरितरूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचार कर कलियुग के
पापों को हरने वाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं ॥ ३ ॥

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना।
सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥

हृदय सिंधु मति सीप समाना।
स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥

संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वती जी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [ कि मैं क्यों इसके बुलानेपर आयी]। बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धिको सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं ॥ ४ ॥

जौं बरषइ बर बारि बिचारू ।
होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥

इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणिके समान सुन्दर कविता होती है ॥ ५ ॥

दो०- जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥

उन कवितारूपी मुक्तामणियाँ को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुरागरूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं) ॥ ११ ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️!! श्रीरामचरितमानस  !!❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣         * बालकाण्ड *❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️जदप...
03/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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जदपि कबित रस एकउ नाहीं।
राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥

सोइ भरोस मोरें मन आवा ।
केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥

यद्यपि मेरी इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है। भले संग से भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया ? ॥ ४ ॥

धूमउ तजइ सहज करुआई ।
अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥

भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी।
राम कथा जग मंगल करनी ॥

धुआँ भी अगर के संग से सुगन्धित होकर अपने स्वाभाविक कडुवेपन को छोड़ देता है। मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत्का कल्याण करने वाली रामकथारूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है। [इससे यह भी अच्छी ही समझी जायगी ] ॥ ५ ॥

छं० – मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ।

प्रभुसुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ।

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है। मेरी इस भद्दी कवितारूपी नदी की चाल पवित्र जलवाली नदी (गङ्गाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है। प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुन्दर यश के संग से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को भानेवाली हो जायगी। श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है।

दो० -प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।

दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥ १० ( क ) ॥

श्रीरामजी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वत के संग से काष्ठमात्र [चन्दन बनकर] वन्दनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ [ की तुच्छता] का विचार
करता है ? ॥ १० (क) ॥

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥ १० (ख ) ॥

श्यामा गौ काली होने पर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है। यही समझकर सब लोग उसे पीते हैं। इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी श्रीसीता-रामजी के यश को बुद्धिमान्
लोग बड़े चावसे गाते और सुनते हैं ॥ १० (ख) ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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02/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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सज्जनगण इस कथा को अपने जी में श्रीरामजी की भक्ति से भूषित जानकर सुन्दर वाणी से सराहना करते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्यरचना में ही कुशल हूँ, मैं तो सब कलाओं तथा सब
विद्याओं से रहित हूँ॥ ४ ॥

आखर अरथ अलंकृति नाना ।
छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥

भाव भेद रस भेद अपारा।
कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥

नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलङ्कार, अनेक प्रकार की छन्दरचना, भावों और रसों के अपार भेद और कविता के भाँति-भाँति के गुण-दोष होते हैं ॥ ५ ॥

कबित बिबेक एक नहिं मोरें ।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥

इनमें से काव्यसम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझ में नहीं है, यह मैं कोरे कागज पर लिखकर [शपथपूर्वक] सत्य-सत्य कहता हूँ ॥ ६ ॥

दो० – भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक ।

सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥

मेरी रचना सब गुणों से रहित है; इसमें बस, जगत्प्रसिद्ध एक गुण है। उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले पुरुष, जिनके निर्मल ज्ञान है, इसको सुनेंगे ॥ ९ ॥

एहि महँ रघुपति नाम उदारा ।
अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥

मंगल भवन अमंगल हारी ।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥

इस में श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, कल्याण का भवन है और अमङ्गलों को हरनेवाला है, जिसे पार्वतीजी सहित भगवान् शिवजी सदा जपा करते हैं ॥ १ ॥

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ ।
राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥

बिधुबदनी सब भाँति सँवारी ।
सोह न बसन बिना बर नारी ॥

जो अच्छे कवि के द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी रामनाम के बिना शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुन्दर स्त्री सब प्रकारसे सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती ॥ २ ॥

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी।
राम नाम जस अंकित जानी ॥

सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही।
मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥

इसके विपरीत, कुकवि की रची हुई सब गुणों से रहित कविता को भी, राम के नाम एवं यश सेअंकित जानकर, बुद्धिमान् लोग आदरपूर्वक कहते और सुनते हैं; क्योंकि संतजन भौरे की भाँति गुण ही को ग्रहण करने वाले होते हैं ॥ ३ ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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