15/08/2026
श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....
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!! श्रीरामचरितमानस !!
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* बालकाण्ड *
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जे जनमे कलिकाल कराला ।
करतब बायस बेष मराला ॥
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े।
कपट कलेवर कलि मल भाँड़े ॥
जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का-सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुग के पापों के भाँड़े हैं ॥ १ ॥
बंचक भगत कहाइ राम के।
किंकर कंचन कोह काम के ॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी।
धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥
जो श्रीरामजीके भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्मध्वजी (धर्मकी झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं. संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है॥२॥
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ।
बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥
ताते मैं अति अलप बखाने ।
थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥
यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूं तो कथा बहुत बढ़ जायगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान् लोग थोड़े ही में समझ लेंगे ॥ ३ ॥
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका।
मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥
मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं ॥ ४ ॥
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ ।
मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा।
कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥
मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि! ॥ ५ ॥
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाही ।
कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥
समुझत अमित राम प्रभुताई ।
करत कथा मन अति कदराई ||
जिस हवा से सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनती में है। श्रीरामजीकी असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है— ॥ ६ ॥
दो०- सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥ १२ ॥
सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण- ये सब 'नेति-नेति' कहकर (पार नहीं पाकर ऐसा नहीं', 'ऐसा नहीं' कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं ॥ १२ ॥
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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......
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