Shree Vandanam

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� SHRI KRISHNA GOVINDA ॐ �

“My dear Lord, You are the topmost of all bestowers of all benediction, the oldest and supreme enjoyer amongst all enjoyers. You are the master of all the worlds’ metaphysical philosophy, for You are the supreme cause of all causes, Lord Krishna. ”~Srimad Bhagavatam 4.24.42

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️!! श्रीरामचरितमानस  !!✨️🔥✨️🔥✨️🔥✨️🔥✨️🔥         * बालकाण्ड *❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️...
17/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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मनि मानिक मुकुता छबि जैसी।
अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।

नृप किरीट तरुनी तनु पाई।
लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥

मणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं ॥ १ ॥

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥

भगति हेतु बिधि भवन बिहाई।
सुमिरत सारद आवति धाई ॥

इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकवि की कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात् कवि की वाणी से उत्पन्न हुई कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है)। कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वती जी ब्रह्मलोकको छोड़कर दौड़ी आती हैं ॥ २ ॥

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ ।
सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।

कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी।
गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥

सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरितरूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचार कर कलियुग के
पापों को हरने वाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं ॥ ३ ॥

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना।
सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥

हृदय सिंधु मति सीप समाना।
स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥

संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वती जी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [ कि मैं क्यों इसके बुलानेपर आयी]। बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धिको सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं ॥ ४ ॥

जौं बरषइ बर बारि बिचारू ।
होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥

इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणिके समान सुन्दर कविता होती है ॥ ५ ॥

दो०- जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥

उन कवितारूपी मुक्तामणियाँ को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुरागरूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं) ॥ ११ ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️!! श्रीरामचरितमानस  !!❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣         * बालकाण्ड *❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️❤️❣️जदप...
03/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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जदपि कबित रस एकउ नाहीं।
राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥

सोइ भरोस मोरें मन आवा ।
केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥

यद्यपि मेरी इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है। भले संग से भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया ? ॥ ४ ॥

धूमउ तजइ सहज करुआई ।
अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥

भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी।
राम कथा जग मंगल करनी ॥

धुआँ भी अगर के संग से सुगन्धित होकर अपने स्वाभाविक कडुवेपन को छोड़ देता है। मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत्का कल्याण करने वाली रामकथारूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है। [इससे यह भी अच्छी ही समझी जायगी ] ॥ ५ ॥

छं० – मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ।

प्रभुसुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ।

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है। मेरी इस भद्दी कवितारूपी नदी की चाल पवित्र जलवाली नदी (गङ्गाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है। प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुन्दर यश के संग से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को भानेवाली हो जायगी। श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है।

दो० -प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।

दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥ १० ( क ) ॥

श्रीरामजी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वत के संग से काष्ठमात्र [चन्दन बनकर] वन्दनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ [ की तुच्छता] का विचार
करता है ? ॥ १० (क) ॥

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥ १० (ख ) ॥

श्यामा गौ काली होने पर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है। यही समझकर सब लोग उसे पीते हैं। इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी श्रीसीता-रामजी के यश को बुद्धिमान्
लोग बड़े चावसे गाते और सुनते हैं ॥ १० (ख) ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣!! श्रीरामचरितमानस  !!❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣         * बालकाण्ड *❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣सज्जनगण इस कथा को अपने ...
02/01/2026

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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सज्जनगण इस कथा को अपने जी में श्रीरामजी की भक्ति से भूषित जानकर सुन्दर वाणी से सराहना करते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्यरचना में ही कुशल हूँ, मैं तो सब कलाओं तथा सब
विद्याओं से रहित हूँ॥ ४ ॥

आखर अरथ अलंकृति नाना ।
छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥

भाव भेद रस भेद अपारा।
कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥

नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलङ्कार, अनेक प्रकार की छन्दरचना, भावों और रसों के अपार भेद और कविता के भाँति-भाँति के गुण-दोष होते हैं ॥ ५ ॥

कबित बिबेक एक नहिं मोरें ।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥

इनमें से काव्यसम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझ में नहीं है, यह मैं कोरे कागज पर लिखकर [शपथपूर्वक] सत्य-सत्य कहता हूँ ॥ ६ ॥

दो० – भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक ।

सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥

मेरी रचना सब गुणों से रहित है; इसमें बस, जगत्प्रसिद्ध एक गुण है। उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले पुरुष, जिनके निर्मल ज्ञान है, इसको सुनेंगे ॥ ९ ॥

एहि महँ रघुपति नाम उदारा ।
अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥

मंगल भवन अमंगल हारी ।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥

इस में श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, कल्याण का भवन है और अमङ्गलों को हरनेवाला है, जिसे पार्वतीजी सहित भगवान् शिवजी सदा जपा करते हैं ॥ १ ॥

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ ।
राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥

बिधुबदनी सब भाँति सँवारी ।
सोह न बसन बिना बर नारी ॥

जो अच्छे कवि के द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी रामनाम के बिना शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुन्दर स्त्री सब प्रकारसे सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती ॥ २ ॥

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी।
राम नाम जस अंकित जानी ॥

सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही।
मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥

इसके विपरीत, कुकवि की रची हुई सब गुणों से रहित कविता को भी, राम के नाम एवं यश सेअंकित जानकर, बुद्धिमान् लोग आदरपूर्वक कहते और सुनते हैं; क्योंकि संतजन भौरे की भाँति गुण ही को ग्रहण करने वाले होते हैं ॥ ३ ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣!! श्रीरामचरितमानस  !!❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣         * बालकाण्ड *❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣रसीली हो या अत्यन्त फीक...
02/02/2024

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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रसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती ? किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत्में बहुत नहीं हैं, ॥६॥

जग बहु नर सर सरि सम भाई।
जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई।
देखि पूर बिधु बाढ़़इ जोई ॥

हे भाई! जगत्में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं)। समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही
सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरोंका उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है ॥ ७ ॥

दो० - भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास ।

पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास ॥ ८ ॥

मेरा भाग्य छोटा है और इच्छा बहुत बड़ी है, परन्तु मुझे एक विश्वास है कि इसे सुनकर सज्जन सभी सुख पावेंगे और दुष्ट हँसी उड़ावेंगे ॥ ८ ॥

खल परिहास होइ हित मोरा ।
काक कहहिं कलकंठ कठोरा ।।

हंसहिं बक दादुर चातकही ।
हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥

किन्तु दुष्टों के हँसने से मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठ वाली कोयल को कौए तो कठोर ही कहा करते हैं। जैसे बगुले हंस को और मेढक पपीहे को हँसते हैं, वैसे ही मलिन मनवाले दुष्ट निर्मल वाणी को हँसते हैं ॥ १ ॥

कबित रसिक न राम पद नेहू ।
तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥

भाषा भनिति भोरि मति मोरी ।
हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥

जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम है, उनके लिये भी यह कविता सुखद हास्यरस का काम देगी। प्रथम तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि
भोली है; इससे यह हँसने के योग्य ही है, हँसने में उन्हें कोई दोष नहीं ॥ २ ॥

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी ।
तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥

हरि हर पद रति मति न कुतरकी ।
तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की ॥

जिन्हें न तो प्रभुके चरणों में प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुननेमें फीकी लगेगी। जिनकी श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीहर (भगवान् शिव) के चरणों में प्रीति है और
जिनकी बुद्धि कुतर्क करने वाली नहीं है [ जो श्रीहरि-हर में भेद की या ऊँच-नीचकी कल्पना नहीं करते], उन्हें श्रीरघुनाथजी की यह कथा मीठी लगेगी ॥ ३ ॥

राम भगति भूषित जियँ जानी ।
सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥

कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू ।
सकल कला सब बिद्या हीनू ॥

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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प्रभु श्री कृष्ण जन्माष्टमी.......💕*********शुभ मुहूर्त दिनांक- 06/09/2023**********************नक्षत्र रोहिणी समय मध्यर...
03/09/2023

प्रभु श्री कृष्ण जन्माष्टमी.......💕
*********शुभ मुहूर्त दिनांक- 06/09/2023**********
************नक्षत्र रोहिणी समय मध्यरात्रि************
जय श्री कृष्ण 🙏🏻❤️💖🙏🏻
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श्री वंदनम् परिवार प्रभु के प्रकटोत्सव पर आपका हार्दिक स्वागत करता है!
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जय श्री कृष्ण 🙏🏻❤️💖🙏🏻

*🙏गुरु गोविन्द राधे🙏**‼भगवान के लिए ही रोयें‼*    *हरिबाबा से एक भक्त ने कहाः "महाराज ! यह अभागा, पापी मन रूपये पैसों के...
10/09/2022

*🙏गुरु गोविन्द राधे🙏*

*‼भगवान के लिए ही रोयें‼*

*हरिबाबा से एक भक्त ने कहाः "महाराज ! यह अभागा, पापी मन रूपये पैसों के लिए तो रोता पीटता है लेकिन भगवान अपने आत्मीय हैं, फिर भी अनंत काल से अब तक नहीं मिले, मन इसके लिए रोता भी नहीं है। क्या करें ?"*

*हरिबाबाः "रोना नहीं आता तो झूठमूठ में ही रो ले।"*

*"महाराज ! झूठमूठ में भी रोना नहीं आता है तो क्या करें ?"*

*महाराज दयालु थे। उन्होंने भगवान के विरह की दो बातें कहीं। विरह की बात करते-करते उन्होंने बीच में ही कहा कि "चलो, झूठमूठ में रोओ।" सबने झूठमूठ में रोना चालू किया तो देखते-देखते भक्तों में सच्चा भाव जग गया।*

*"झूठा संसार सच्चा आकर्षण पैदा करके चौरासी के चक्कर में डाल देता है तो भगवान के लिए झूठमूठ में रोना सच्चा विरह पैदा करके हृदय में प्रेमाभक्ति भी जगा देता है।*"

*अनुराग इस भावना का नाम है कि "भगवान हमसे बड़ा स्नेह करते हैं, हम पर बड़ी भारी कृपा रखते हैं। हम उनको नहीं देखते पर वे हमको देखते रहते हैं। हम उनको भूल जाते हैं पर वे हमको नहीं भूलते। हमने उनसे नाता-रिश्ता तोड़ लिया है पर उन्होंने हमसे अपना नाता-रिश्ता नहीं तोड़ा है। हम उनके प्रति कृतघ्न हैं पर हमारे ऊपर उनके उपकारों की सीमा नहीं है। भगवान हमारी कृतघ्नता के बावजूद हमसे प्रेम करते हैं, हमको अपनी गोद में रखते हैं, हमको देखते रहते हैं, हमारा पालन-पोषण करते रहते हैं।' इस प्रकार की भावना ही प्रेम का मूल है। अगर तुम यह मानते हो कि 'मैं भगवान से बहुत प्रेम करता हूँ लेकिन भगवान नहीं करते' तो तुम्हारा प्रेम खोखला है। अपने प्रेम की अपेक्षा प्रेमास्पद के प्रेम को अधिक मानने से ही प्रेम बढ़ता है। कैसे भी करके कभी प्रेम की मधुमय सरिता में गोता मारो तो कभी विरह की।*

*दिल की झरोखे में झुरमुट के पीछे से जो टुकुर-टुकुर देख रहे हैं दिलबर दाता, उन्हें विरह में पुकारोः 'हे नाथ !.... हे गुरुदेव !... हे रक्षक-पोषक प्रभु !..... टुकुर-टुकुर दिल के झरोखे से देखने वाले गुरुदेव !.... प्रभुदेव !... ओ गुरुदेव !... मेरे गुरुदेव !.... प्यारे गुरुदेव !..... अपनी प्रीति, अपनी भक्ति दो!..... हम तो आप से माँगेंगे क्योंकि भगवान रुपी धन के केवल आप ही धनी हो! कुछ तो बोलो प्रभु !...'*

*कैसे भी उन्हें पुकारो। वे बड़े दयालु हैं। वे जरूर अपनी करूणा-वरूणा का एहसास करायेंगे।*

*तुलसी अपने राम को रीझ भजो या खीज।*

*भूमि फैंके उगेंगे, उल्टे-सीधे बीज।।*

*विरह से भजो या प्रेमाभक्ति से, जप करके भजो या ध्यान करके, नियम-व्रत करके भजो या सेवा करके, अपने परमात्मदेव की आराधना ही सर्व मंगल, सर्व कल्याण करने वाली है।*

*तुम कोशिश तो करो, आगे फिर गुरुदेव देख रहे हैं। अपनी अकारण कृपा से गोविन्द धन से मालामाल कर देंगे।*

*राधे राधे राधे राधे राधे*

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....गोस्वामी तुलसीदास जयंती विशेष ❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣!! श्रीरामचरितमानस  !!❣🍇🍇🍎🍎🍇🍇❣         * बालकाण्ड *❣...
04/08/2022

श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....गोस्वामी तुलसीदास जयंती विशेष

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!! श्रीरामचरितमानस !!

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* बालकाण्ड *

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देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूँ। अब सब मुझ पर कृपा कीजिये ॥ ७ (घ) ॥

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आकर चारि लाख चौरासी ।
जाति जीव जल थल नभ बासी ॥
सीय राममय सब जग जानी ।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥

चौरासी लाख योनियोंमें चार प्रकार के (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जीव जल, पृथ्वी और आकाशमें रहते हैं, उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत्‌को श्रीसीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥

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जानि कृपाकर किंकर मोहू ।
सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं ।
तातें बिनय करउँ सब पाहीं ॥

मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिये। मुझे अपने बुद्धि-बलका भरोसा नहीं है, इसीलिये मैं सबसे विनती करता हूँ॥ २ ॥

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करन चहउँ रघुपति गुन गाहा ।
लघु मति मोरि चरित अवगाहा ॥

सूझ न एकउ अंग उपाऊ ।
मन मति रंक मनोरथ राऊ ॥

मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिये मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात् कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है ॥ ३ ॥

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मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी । चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥

छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई।
सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥

मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है; चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत्में जुड़ती छाछ भी नहीं। सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बालवचनों को मन लगाकर (प्रेमपूर्वक) सुनेंगे ॥ ४ ॥

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जौं बालक कह तोतरि बाता।
सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥

हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी।
जे पर दूषन भूषनधारी ॥

जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मनसे सुनते हैं। किन्तु क्रूर, कुटिल और बुरे विचारवाले लोग जो दूसरों के दोषों को ही भूषणरूप से धारण किये रहते हैं (अर्थात् जिन्हें पराये दोष ही प्यारे लगते हैं), हँसेंगे ॥ ५ ॥

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निज कबित्त केहि लाग न नीका।
सरस होउ अथवा अति फीका ॥

जे पर भनिति सुनत हरषाहीं ।
ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ॥

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गोस्वामी तुलसीदास जयंती विशेष

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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......

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❣ # # श्री वंदनम् महासंकीर्तन  # #❣××××××××××××●××××××××××××❣ # # श्री वंदनम् महासंकीर्तन  # #❣
01/07/2022

❣ # # श्री वंदनम् महासंकीर्तन # #❣
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||श्री वंदनम् महासंकीर्तन||🚩🚩🚩🚩🚩🚩आप सभी पर हमेशा भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और देवी सुभद्रा जी की कृपा बनी रहे।🚩🚩🚩🚩🚩🚩
01/07/2022

||श्री वंदनम् महासंकीर्तन||

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आप सभी पर हमेशा भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और देवी सुभद्रा जी की कृपा बनी रहे।

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01/07/2022

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🚩🚩🚩🚩श्री वंदनम् महासंकीर्तन 🚩🚩🚩🚩

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आप सभी पर हमेशा भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और देवी सुभद्रा जी की कृपा बनी रहे।

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