17/01/2026
श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः ....
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!! श्रीरामचरितमानस !!
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* बालकाण्ड *
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मनि मानिक मुकुता छबि जैसी।
अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
नृप किरीट तरुनी तनु पाई।
लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
मणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं ॥ १ ॥
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई।
सुमिरत सारद आवति धाई ॥
इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकवि की कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात् कवि की वाणी से उत्पन्न हुई कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है)। कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वती जी ब्रह्मलोकको छोड़कर दौड़ी आती हैं ॥ २ ॥
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ ।
सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी।
गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥
सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरितरूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचार कर कलियुग के
पापों को हरने वाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं ॥ ३ ॥
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना।
सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥
हृदय सिंधु मति सीप समाना।
स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥
संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वती जी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [ कि मैं क्यों इसके बुलानेपर आयी]। बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धिको सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं ॥ ४ ॥
जौं बरषइ बर बारि बिचारू ।
होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥
इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणिके समान सुन्दर कविता होती है ॥ ५ ॥
दो०- जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥
उन कवितारूपी मुक्तामणियाँ को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुरागरूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं) ॥ ११ ॥
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श्री वंदनम् द्वारा क्रमशः .......
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