Power Of Bhakti ॐ

Power Of Bhakti ॐ हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे||

Happy follow-versary to my awesome followers. Thanks for all of your support! Dharmendar Yaduvanshi Yadav
14/07/2026

Happy follow-versary to my awesome followers. Thanks for all of your support! Dharmendar Yaduvanshi Yadav

20/06/2026

सच्चा ज्ञान वही होता है जिसमें विनम्रता होती है।

16/06/2026

गुरुमंत्र का प्रभाव जीवन में कैसे पड़ता है? Power Of Bhakti ॐ

09/06/2026

अगर सहस्त्रनाम न पढ़ा जाये तो क्या करे?

02/06/2026

मंत्र काम क्यों नहीं करते??

22/05/2026

Bhakti karne par log door kyu ho jate hai??

बालभक्त श्रीओमप्रकाश                                             भगवान् उसे दर्शन देकर अपने साथ अपने धाम ले गये। वह सीढ़...
17/05/2026

बालभक्त श्रीओमप्रकाश


भगवान् उसे दर्शन देकर अपने साथ अपने धाम ले गये। वह सीढ़ी-सीढ़ी न चढ़कर कूदकर चला गया !' सिद्ध सन्त श्रीनारायण स्वामी ने बालभक्त ओमप्रकाश की भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में यह कहा था।
पर क्या कोई सचमुच कूदकर भगवान् के पास जा सकता है ? शास्त्र कहते हैं कि भगवान् परम स्वतन्त्र हैं। हम चाहे कितनी उछल-कूद करें, उनकी अपनी इच्छा के बिना उन्हें नहीं पा सकते। शास्त्रों का यह कथन सत्य है। पर यदि कोई भक्त एक छलाँग में उन्हें पा लेने का दृढ़ निश्च्य कर, उनके ऊपर भरोसा रख संसाररूपी कारागार की ऊँची दीवार से सहसा कूद ही पड़े, तो क्या वे भक्तवत्सल अपनी गोद में उसे भर लेने को बाध्य नहीं हैं ?
शास्त्रों का यह कथन भी सत्य है कि भगवान् को प्राप्त करने के लिए सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ना होता है। श्रीरूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृत-सिन्धु में श्रद्धा, साधुसंग, भजनक्रिया, अर्थ निवृत्ति आदि भक्ति के जिन सोपानों का वर्णन किया है, उन्हें एक-एक कर पार करना होता है।* 【*भक्तिके विभिन्न सोपानोंका विस्तृत विवरण देखें परमार्थ-प्रकाशन, राधारमण मार्ग, वृन्दावन से प्रकाशित लेखक का 'भवित-विज्ञान' नामक ग्रन्थ, अध्याय ४】 पर पूर्वजन्म के प्रवल संस्कार या भगवान् की विशेष कृपा हो, तो क्या उन्हें एक साथ उसी प्रकार पार नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार एक के-ऊपर-एक रखे कमल के पत्तों को सूई की नोंक से एक साथ छेदा जा सकता है?
सूई उन्हें छेदती है एक-एक करके ही। पर यह कार्य इतनी शीघ्रता से होता है कि लगता है जैसे उन्हें एक साथ छेद दिया गया। बालभक्त ओमप्रकाश ने भी इसी प्रकार एक छलाँग में भक्ति के सोपानों को पार कर लिया। उसकी अवस्था १६ वर्ष की थी जव उसने साहस भरी वह छलाँग भरी। पर उसके शैशव से ही वह सब लक्षण प्रतीत होने लगे थे, जिनसे लगता था कि वह बहुत दिनों तक धैर्य धारण कर छलाँग मारे बिना रह न सकेगा।
सन् १९२६ में बैसाख मास की शुक्ला एकादशी के दिन उसने राजस्थान के टोंक नगर में टोंक राज्य के एक उच्च कर्मचारी और जमींदार श्रीरामनारायण सक्सेना के घर जन्म लिया ! घर में भगवत्कथा, कीर्तन और साधुसंग का वातावरण था। स्वच्छ और सरल हृदय के ओमप्रकाश को ध्रुव और प्रह्लाद की कथाएँ सुन भगवान् में अटल विश्वास हो गया। वह स्वप्न में और ध्यान में उनके सान्निध्य का उपभोग करने लगा।
जब वह पाँच वर्ष का ही था एक दिन टोंक का आकाश टिड्डी-दल से छा गया। उसे देख उसकी नानी दुःख में भरकर कहने लगीं- 'हाय ! यह क्या ? यह टिड्डी-दल तो सारी फसलों का सफाया कर देगा। लोग भ्रूखों मरेंगे।' ओमप्रकाश से नानी का दुःख न देखा गया। वह बोला - 'नानी, दुःखी मत हो। मैं अभी कृष्ण भगवान् से कहकर टिड्डियों को भगाये देता हूँ।'
वह उस स्थान पर जा बैठा जहाँ नानी ठाकुर-सेवा किया करती थीं और ठाकुर से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा। ठाकुर ने उसकी सुन ली। देखते-देखते टिड्डी-दल न जाने कहाँ अन्तर्धान हो गया। टोंक और उसके आसपास के किसी क्षेत्र की कोई क्षति न हुई।
कुछ बड़े होने पर ओमप्रकाशजी को जयपुर के महाराजा हाईस्कूल में अच्छी शिक्षा के लिए भरती किया गया। उम्र के साथ भगवान् में उनका विश्वास और भक्तिभाव बढ़ता गया। जयपुर के आधुनिकतम वातावरण की चकाचौंध से चौंधिया जाने के बजाय वे अपने ही दिव्यप्रकाश से दिशाओं को आलोकित करने लगे। उनके सम्पर्क में आने वाले विद्यार्थियों में एक नयी चेतना का संचार हुआ। उन्हें लेकर उन्होंने एक मुमुक्षु-मण्डल का निर्माण किया। मुमक्षु-मण्डल के विद्यार्थी उन्हें अपना आदर्श मान उनका यथाशक्ति अनुसरण करने लगे।
ओमप्रकाशजी सदाचार, अर्थात् क्रिया और विचारों की शुद्धता पर बहुत अधिक बल देते। उन्होंने सदाचार की कसौटी के रूप में दो चार्टों का निर्माण किया, जिन पर प्रतिदिन अपनी क्रियाओं और विचारों के अनुसार अपने आपको नम्बर देकर और सप्ताहान्त में उन्हें जोड़कर वे और उनके साथी अपने को पास या फेल घोषित करते और प्रति सप्ताह पहले से अधिक नम्बरों से पास होने की चेष्टा करते। यह चार्ट उन्होंने छपवा कर अपने साथियों में बाँट दिये थे।
चार्ट में उन्होंने ब्रह्मचर्य को सर्वाधिक पूर्णांक दिये थे। उसके पश्चात् सत्य और अहिंसा आदि को, जिससे स्पष्ट है कि वे ब्रह्मचर्य को कितना महत्व देते थे। जब वे सातवीं कक्षा में थे, उन्हें स्वामी शिवानन्द की लिखी पुस्तक 'ब्रह्मचर्य ही जीवन है' प्राप्त हुई थी। इससे वे अत्यधिक प्रभावित हुए थे। तभी से वे अपने जीवन को इस पुस्तक में लिखे सिद्धान्तों के अनुसार ढालने की चेष्टा करने लग गये थे। वे कहा करते थे कि मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है ईश्वर-प्राप्ति। ईश्वर-प्राप्ति भजन बिना नहीं होती और भजन की नींव है संयम और सदाचार। ईश्वर-भक्ति का बीज असदाचार की ऊसर भूमि पर नहीं जमता। उसके लिए चाहिए सदाचार की उर्वर भूमि, भगवत्कृपा की वृष्टि और साधु-संग की खाद और खेती करने वाला होना चाहिए उद्यमी, भजनशील।
दस-बारह वर्ष की अल्पावस्था में ही ओमप्रकाशजी की जैसी मानसिक स्थिति थी, उसे देखकर कोई यही कहेगा कि वे बालरूप में एक महापुरुष थे। किसी व्यक्ति की मानसिक दशा जानने का एक अच्छा उपाय है उसके कमरे को देखना, जिसमें वह रहता है। उसकी दीवारों पर कैसी तस्वीरें टंगी हैं ? आलमारी में कौन-कौन सी पुस्तकें रखीं हैं ? खूंटी पर वस्त्र किस प्रकार के टँगे हैं ? बाकी साज-सज्जा कैसी है ? सब मिला कर वह विलासिता की झलक देता है या सादगी की ? ओमप्रकाश हॉस्टल में जिस कमरे में रहते थे, उसमें कुछ पुस्तकों, आधी बाँह की दो-एक कमीजों और दो-एक धोती और अंगोछों के सिवा और कुछ था ही नहीं। पुस्तकों में पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त अनेकों धार्मिक पुस्तकें थीं. जिनमें गोता-प्रेस के साहित्य और रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द आदि से सम्बन्धित साहित्य की प्रधानता थी। पर उनकी दीवारों पर बीसों कार्ड बोर्ड लटके थे, जिन पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ श्लोक, दोहे और उपदेशात्मक वाक्य लिखे थे। उनमें-से कुछ इस प्रकार थे-

(१) चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच आ, साबित बचा न कोय॥

(२) सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

(३) भक्त का योग-क्षेम भगवान् करते हैं।

(४) मुझे किस बातकी चिन्ता है, जब कि आप मेरे हैं।
हटाया दिल को दुनियाँ से, बने सब भाँति तेरे हैं॥

(५) मन में लागी चटपटी, कब निरखूँ धनश्याम।
नारायण भूल्यो सभी, खान-पान विश्राम॥

(६) बैठे हैं तेरे दर पै सो कुछ करके उठेंगे।
या दर्श ही हो जायगा, या मर के उठेंगे॥

इससे स्पष्ट है कि महाराजा हाई-स्कूल में पढ़ते समय ही उन्होंने भगवान् के-चरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण कर दिया था और उनका दर्शन करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। उस समय की अपनी एक कविता में उन्होंने अपने आत्म-समर्पण का भाव बड़े सुन्दर ढंग से व्यक्त किया था-

मैं किस खेत की मूली ?
मेरा भार लिया जब तुमने। अपने ऊपर प्यारे॥
मुझको फिर अब क्या चिन्ता है। तुम हो सोचन हारे॥
कहता जा सो करता जाऊँ। भला-बुरा न गिनता॥
हानि लाभकी तो है रहती। स्वामी को ही चिन्ता॥
पाप कहे तो वह भी कर लूँ। कहे चढूँ जा शूली॥
पाप लगेना कर्ता ही को। मैं किस खेत की मूली ?

भगवान् का दर्शन करने के अपने दृढ़ संकल्प की बात भी उन्होंने अपनी एक कविता में व्यक्त की थी-

कानमें आवाज आयी।
ओम तुमने आज क्यों, ब्रह्माण्ड में हलचल मचायी॥
दर्शन भी कोई खेल है ?
दिल को मजबूती से रखना, अन्त तक यदि दृढ़ रहा तो।
होगा बेशक पास वरना, याद रख तू फेल है॥

ओमजी कोई फेल होने वाले बालक थे ? फेल वही होते हैं जो कमजोर होते हैं। वे तो श्रीकृष्ण पर अपना सारा भार छोड़कर उनके बल से बली थे। तभी न उन्होंने 'मेरी अकड़' शीर्षक यह कविता लिखी थी--

कृष्ण ! तेरे बल पर मैं अकडूँ।
उड़ता पंछी देख मनोहर, कहूँ मैं नीचे आ जा।
आता है या नहीं, कि तुझको वहीं आयके पकडूँ॥कृष्ण॥
कहूँ बादलोंसे सब मिलकर मेरे आगे नाचो।
नाचोगे या नहीं कि तुमसे लाठी लेकर झगडूँ॥कृष्ण॥
सूरज चढ़ता देख गगनमें, कहूँ कि मत बढ़ आगे।
ठहरेगा या नहीं कि तुझको वहीं आके जकडूँ॥कृष्ण॥

श्रीकृष्ण के बल से बली होकर ओमजी चाँद और सूरज को नहीं, श्रीकृष्ण तक को ललकार ने की सामर्थ्य रखते थे। सुनिये उनकी यह ललकार-

याद रखो तुम याद रखोगे, ऐसा तुमसे बदला लूँगा।
कभी पकड़में आये तो मैं, सब हिसाब पूरा कर लूँगा॥
जकडूँगा भुज पाश कठिनमें, प्राण ! न फिर भगने पाओगे।
छलिया भूल सभी चालाकी, अपनी पल भरमें जाओगे॥
तभी छुटोगे जब कि कहोगे, मुसका तुम जीते मैं हारा।
उरकी धड़कन-धड़कनमें मैं, सुनता प्रिय संगीत तुम्हारा॥
तुम्हें पकड़नेका कोई प्रिय ! साधन मेरे पास नहीं है।
इसीलिए क्या मनमानी, सच कहना यह बात नहीं है ?
यही सही मैं क्यों दुख पाऊँ, दो दिनकी ही बात रही है।
आज पवनने चुपकेसे आ, श्रवण निकट यह बात कही है॥
बाँध तुम्हें सकती है मेरी, गरम-गरम आसूँकी धारा।
उरकी धड़कन-धड़कनमें मैं, सुनता प्रिय संगीत तुम्हारा॥

ओमजी ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। उनके मित्र चन्दमलजी ने उनसे पूछा-'आप फर्स्ट डिवीजन में कैसे पास हुए ?'
उन्होंने उत्तर दिया-'यह कोई मुश्किल बात नहीं। तुम भी फर्स्ट डिवीजन में पास होना चाहते हो तो यह लो।' उन्होंने कापी में-से अपना छपाया एक चार्ट निकाल कर दिया और बोले- 'इसके अनुसार कार्य करो इससे शरीर पवित्र होगा और मन भी। मन पवित्र होने से आचरण स्वयं पवित्र होने लगेगा। फर्स्ट डिवीजन प्राप्त करने के लिए बहुत पढ़ने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है सदाचार की और ब्रह्मचर्य का पूरी तरह पालन करने की। इससे मेधाशक्ति बढ़ती है और थोड़ी पढ़ाई से ही बहुत-सा काम हो जाता है।
हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ओमजी १५ जुलाई १९४१ को आगरे चले गये। आगरा कालेज में इण्टरमीडिएट फर्स्टईयर में दाखिला लिया। एक बार उन्होंने चाँदमलजी से कहा था- 'मैंने आगरा कालेज में एडमीशन इसलिए लिया कि वहाँ गीता-क्लास होती है।'
आगरा पहुँचकर उन्होंने भगवान् का दर्शन करने के अपने दृढ़ संकल्प के अनुसार अपने भजन की गति इतनी तीव्र कर दी कि उनके साथियों का उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना असम्भव हो गया। वे उन्हें कोसों पीछे छोड़ गये। उस समय की उनकी मानसिक स्थिति और उनकी भजन-पद्धति पर प्रकाश डालते हैं उनके कुछ पत्र, जो उन्होने अपने साथियों को लिखे थे। उनके कुछ अंश इस प्रकार हैं-

टोंक
२-६-४१
प्रिय रामकरण

तुम दो बार आये। परन्तु मैं साधना में रत रहने के कारण तुमसे मिल न सका। तुमने समझा होगा बाबू साहब अब अपने आगे किसी को गिनते ही नहीं। बड़े आये कहीं के साधु-महात्मा ! मुझसे इतना चिढ़ गये कि बात भी नहीं करना चाहते !
सो कुछ नहीं। मैं अहंकारी नहीं हो गया। मुझे बेकार बात करना अच्छा नहीं लगता। जिस अमूल्य वस्तु को प्राप्त करने में मैं लगा हूँ, उसके लिए मैं तुम्हें ही नहीं, बड़ी-से-बड़ी वस्तु को त्याग सकता हूँ।
मैं नाम-जप का महत्व जान चुका हूँ। अब एक मिनट भी उसके बिना खर्च नहीं करना चाहता। अब आओ तो ऐसे समय आना जब मैं पढ़ाई करता हूँ। पर अकेले आना और बहस करने या डींग हाँकने मत आना। मुझसे व्यर्थ की कोई बात मत करना, जैसे आजकल करते हो और मना करने पर भी नहीं मानते। ऐसी बात करोगे तो मैं उठकर चल दूँगा।
आजकल छुट्टियाँ हैं। इसलिए मैं १८ घण्टे जप करता हूँ। और सब कामों में केवल ६ घण्टे देता हूँ। मेरी परिस्थिति समझकर ही मेरे पास आना।
- ओम

आगरा
२४-७-४१
प्रिय रामकुमारजी,

मैं अन्य साधनों को उपयोगी न मानकर केवल नाम-जप को ही सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। मैंने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए विशेष जोर देता हूँ।
पहली सीढ़ी पारकर अब दूसरी पर आ पहुँचा हूँ। मुझे अपने को पूर्णता से भेंट करने के बाद अब कुछ करना नहीं पड़ता। जो काम हाथ में लेता हूँ, वह आप ही आप पूर्ण हो जाता है।
तुम चौबीस घण्टे में कम-से-कम ३ घण्टे निकाल लो। नाम-जप की ऐसी भूख लगा लो कि बिना जप के चैन ही न पड़े, जैसे एक नशेबाज को बिना नशे के चैन नहीं पड़ता। यह बात मानकर मित्र चाँदमल ने लाभ उठाया है।
भजन आत्मा की खुराक है। इसलिए संकल्प करो कि नियमित भजन कभी नहीं छोड़ेगे और चाहे कोई बुरा माने या भला अपना समय व्यर्थ बात-चीत में खराब न करोगे; क्योंकि-

विषय-भोग, निद्रा, हँसी, जगत प्रीति बहु बात।
नारायण हरि भजनमें, यह पाँचों न सुहात॥

-ओम

आगरा
१-८-४१
प्रिय रामकुमारजी,

जब तक दिलमें आग नहीं लगी तब तक कोई आगे नहीं बढ़ सका। प्रेम का प्याला जब तक छलकता नहीं, तब तक भजन का आनन्द नहीं।
भगवान् तो तब प्रसन्न होते हैं, जब सब ओर से प्रतिकूलता होने पर भी तुम पूरी शक्ति लगाकर भजन करो। जप के आरम्भ के बाद थोड़े ही दिनों में आपकी सब कठिनाइयाँ उड़ती चली जायेंगी, मार्ग साफ होता जायगा। यह मैं स्वयं अपने अनुभव से कहता हूँ। मेरी अवस्था आपसे कम खराब नहीं है। जैसे लोगों में मैं यहाँ रहता हूँ, वैसे लोगों में शायद गाँधीजी भी इग्लैण्ड में न रहे होंगे। लेकिन मैं साफ-साफ देख रहा हूँ कि जिस तरह आकाश में हवाई जहाज चलता है, वैसे ही अपने मार्ग पर मैं चला जा रहा हूँ। आप भी निर्भय होकर बढ़े। जब दृढ़ता से नाम-जप करेंगे तो भयानक विषैले सर्प भी आपके सामने आकर झूक जायेंगे।
- ओम

आगरा
१३-८-४१
प्रिय रामकुमारजी

बहुत-सी ऐसी अनुभव की बातें हैं, जिन्हें मैं किसी से बता नहीं सकता। इतना अवश्य बताना चाहता हूँ कि भगवान् के साथ हर समय रहने से मैं उनकी आदत जान गया हूँ। वह यह कि भगवान् बहुत काम या विश्राम नहीं चाहते। वह तो केवल आग ही लगी देखना चाहते हैं। वे पहले तो साधक के सामने बहुत-सा काम रख देते हैं। उसे देखते ही जो नाम-मात्र के साधक हैं, वे पीछे हट जाते हैं। पर जो सच्चे साधक हैं, जो भगवान् से मिलने के लिए जान हथेली पर लिए रहते हैं, वे कठिनाइयों की परवाह न कर दुःख सहते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। भगवान् उनकी सहायता करते हैं। उन्हें वे रास्ते में ही फल भी देते हैं। यह एक भेद की बात है।
-ओम

आगरा
३०-८-४१
प्रिय रामकरण

दैनिक कार्य चार्ट के अनुसार करो और नाम-जप नित्य पूरा करो। पढ़ाई के अतिरिक्त जो भी समय बचे व्यर्थ खर्च न कर नाम-जप करो। मैं अब तक ७४७५ माला जप कर चुका हूँ। महामन्त्र में १६ नाम हैं और हर मालामें १०८ दाने। इस प्रकार कुल १२९१६८०० नामों का जप हो चुका है।
मेरे ऊपर इस जप से महान कृपाएँ होने लगी हैं। मुझ पर पूरी रोशनी होने वाली है। मेरा अगला कदम बड़ा जबरदस्त होगा। आज्ञा प्राप्त हो चुकी है। मैं बहुत जल्दी बदल रहा हूँ। इस थोड़े दिनों में मैं इतना बदल गया हूँ कि शायद तुम मुझे पहचान भी न पाओ। मैं प्रेम विहीन जीव आगे नहीं बढ़ सकता। पर कृष्ण स्वयं ही मेरी ओर बढ़े चले आ रहे हैं।
मैं अब तक तुम्हें सदुपदेश देता रहा। अब कृष्ण पर तुम्हें छोड़ दिया। उनकी जैसी इच्छा होगी वैसा साधन तुमसे करा लेंगे।
मेरी अन्तिम प्रार्थना (रोकर, गिड़गिड़ाकर, हाथ जोड़कर, पैरों पड़ कर आपसे, हर छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे, जाने-अनजाने से) मैं श्रीकृष्ण-प्रेम की भीख माँगता हूँ। यही आशीर्वाद चाहता हूँ। भीख अवश्य दें।
भिखारी
- ओम

नाम-जप की साधना के फलस्वरूप ओमप्रकाश की विरह ज्वाला बढ़ती गयी। वह जब पराकाष्ठा पर पहुँची, उनका श्रीकृष्ण के बिना जीना असम्भव् हो गया। वह जीवन किस काम का जिसमें श्रीकृष्ण-सुधारूपी संजीवनी निरन्तर पान करने और उनकी रसमयी लीलाओं में योग देने का सौभाग्य न हो। उन्होंने श्रीकृष्ण-विहीन जीवन को अनशन द्वारा समाप्त करने की ठान ली। रामकरणजी को अपने ३०-८-४१ के पत्र में उन्होंने यह कहकर इसका संकेत किया कि 'मेरा अगला कदम बड़ा जबरदस्त होगा।' उन्होंने यह भी संकेत किया कि इसके लिए उन्हें श्रीकृष्ण की आज्ञा प्राप्त हो चुकी है।
२० सितम्बर १९४१ से उन्होंने भोजन छोड़ दिया। २६ सितम्बर १९४१ को वृन्दावन में यमुना किनारे अक्रूर घाट से भी कुछ आगे चामड़देवी के निकट सूनसान स्थान में शरीर त्याग देने के उद्देश्य से चले गये। जाने के पूर्व उन्होंने तीन पत्र लिखे, जिनके कुछ अंश यहाँ उद्घृत हैं

(पहला पत्र भ्राता विष्णुनारायणजी के नाम)

आगरा
ता० २६-९-४१
प्रिय भाई साहब,

मैं अब संसार त्याग कर जा रहा हूँ, आप कृष्ण-प्राप्ति का मुझे आशीर्वाद दें। मेरी यही प्रार्थना है कि आप भी नाम का खूब जप करें। जब नाम-जप करेंगे तो भगवान् स्वयं समय-समय पर आपको उपदेश करते चलेंगे।
- ओम

(दूसरा पत्र घर के सब लोगों के नाम)

सबके चरणों में प्रणाम,

मेरी केवल यही अभिलाषा है कि श्रीकृष्ण की सखा-मण्डली का एक सदस्य बनकर उनकी लीलाओं का वैसा ही आनन्द प्राप्त करूँ, जैसा गोप और गोपियों ने किया था। कृष्ण अब भी हर क्षण मेरे साथ रहते हैं और मेरा हर काम उनकी आज्ञा से होता है। लेकिन अब केवल इतने से तसल्ली नहीं होती
मेरी अभिलाषा जानकर प्रभु ने ध्यान में मुझसे इन्हीं गमियों की छुट्टी में कहा था- तुम जैसा आनन्द चाहते हो वैसा एक महीने के अन्दर सम्भव है, यदि एक परीक्षा के लिए तुम तैयार हो जाओ तो। लेकिन वह केवल एक राय थी, आज्ञा नहीं !
मैंने परीक्षा देने के लिए आप लोगों से पूछा, तो आप लोग डर गये और आपने सम्मति नहीं दी। मैं समझ गया कि आप लोगों के बीच में रहकर मैं यह कार्य पूरा नहीं कर सकता। इसलिए मैंने विचार छोड़ दिया। पर हृदय में आग सुलगती रही। आत्मा कहती रही कि तूने एक बहुत बड़ा मौका हाथ से खो दिया, श्रीकृष्ण की कृपा को ठुकरा दिया। पर श्रीकृष्ण की कृपा सीमाबद्ध नहीं। उन्होंने जब देखा कि राय का कुछ असर नहीं हुआ, तो प्रेमपूर्वक आज्ञा दी। अब मुझे ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियाँ भी परीक्षा देने के मेरे निश्श्रय से मुझे नहीं हटा सकतीं, क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण मेरे साथ हैं। बस।
मैं चला ढूँढने तुमको प्रिय तुम्हें साथ में लेकर।
परीक्षा क्या है ? यह मुझे मालूम है, पर बताने की बात नहीं। इतना अवश्य संकेत कर सकता हूँ कि जहाँ श्रीकृष्ण को छोड़कर मेरा कोई न हो, जहाँ कोई यह न पूछे - तुमने कुछ खाया या नहीं ? तुम सोये या नहीं ? बस वहाँ मेरी परीक्षा होगी। परीक्षा भी ऐसी मजेदार होगी कि परीक्षक परीक्षार्थी की प्रतिक्षण मदद करेगा, या यूँ कहूँ कि परीक्षक स्वयं परीक्षा देगा। परीक्षार्थी तो निमित्त मात्र रहेगा।
मेरी यह बात सुनकर मोह के कारण आप लोग घबड़ायेंगे। कोई कहेगा यह पागल हो गया है, कोई कहेगा किसी के बहकाये में आ गया है। पर आप लोग धैर्य धारण कर शान्त रहकर देखें कि क्या होता है। कहीं अपनी ऊटपटाँग बातों से सदा के लिए मुझसे हाथ न धो बैठें। यदि आप मोह ग्रसित हैं तो मेरे महान शत्रु हैं। अपने सुख के कारण मेरी अधोगति चाहते हैं। मैं माता, पिता, भाई, बन्धु उसी को समझता हूँ, जो अपने क्षणिक सुख के कारण पुत्र को अमर पद से वञ्चित न करे।
मुझे केवल यही कहना है कि आप लोग दुःख न करें न मुझे खोजें मुझे व्रत से हटाना श्रीकृष्ण की आज्ञा का विरोध करना होगा।
एक पत्र रामकुमारजी के लिए भी भेज रहा हूँ। यह उन्हें अवश्य दे दें और भगवान् से मेरे लिए यों प्रार्थना करें- 'हे प्रभु ! हम अपने बच्चे को आपके चरणों में अर्पण करते हैं। आप अपने इस शरणागत की रक्षा करें।"
आपका बालक
ओम

(तीसरा पत्र रामकुमारजी के नाम)

आगरा
२६-९-४१
प्रिय भाई साहब रामकुमारजी,

आप दिव्य वृन्दावन के उस आनन्द से अपरिचित हैं, जो वहाँ निरन्तर बरस रहा है। साधारण नेत्रों से उसे देखा नहीं जा सकता। मैंने नाम-जप के प्रभाव से और ही नेत्र पाये हैं। उन्हीं नेत्रों से देख सका हूँ। उस आनन्द के आगे अस दुनियाँ अच्छी नहीं लगती !
मैंने बिना भोगे ही उन विषयों को ठोकर मार दी है, जिनमें आप फँसे हैं। मेरा यह त्याग उस लकड़हारे का सा है, जिसने राज्य की प्राप्ति के लिए कुल्हाड़े का त्याग किया।

'प्राण दिये सों हरि मिलें तौ लै लीजौ दौर।
ना जाने या बीचमें ग्राहक आवै और॥'

बहुत सस्ता सौदा है। बस अब विदा। जा रहा हूँ सदा के लिए।
- ओम

ओमप्रकाशजी के भाई-बन्धु, माता-पिता सब इन पत्रों को पढ़कर बेहद चिन्तित हुए। सबने आगरा, मथुरा और वृन्दावन के पास जहाँ-तहाँ उन्हें ढूँढ़ने की चेष्टा की। पर कहीं उनका पता न चला।
ओमजी को यमुना-किनारे उस निजन स्थान में निराहार भजन करते एक महीना हो गया। एक महीने बाद साहू बाबा नामक एक किसान के कान में दूर से किसी के 'हा कृष्ण ! हा कृष्ण !' कह रोने की आवाज आई। आवाज का पीछा करते हुए वह ओमजी के पास पहुँचा। पूछा - 'क्यों रो रहे हो बेटा ? तुम्हें क्या कष्ट है ?'
'मुझे कोई कष्ट नहीं। केवल कृष्ण के दर्शन न मिलने का कष्ट है। मैंने उनके दर्शन न मिलने तक अनशन करने का व्रत लिया है।' ओमप्रकाशजी ने उत्तर दिया।
किसान ओमप्रकाश की बात सुनकर अवाक् ! उसने बहुत समझा-बुझाकर उनका व्रत तोड़वाने की चेष्टा की। पर उसे सफलता न मिली। धीरे-धीरे सारे वृन्दावन और मथुरा में यह बात फैल गयी। चारों ओर से लोग ओमप्रकाश के दर्शन करने आने लगे। यमुनातट का वह निर्जन स्थान अब कोलाहल से परिपूर्ण हो गया। ओमजी के भजन में बाधा पड़ने लगी। प्रभु की प्रेरणा से किसी ने उनके लिए एक फूँस की कुटिया बनवा दी, जिसमें वे रहने लगे। कुटिया के बाहर उन्होंने एक बोर्ड टँगवा दिया, जिसमें लिखा था-
'मैं दर्शन देने योग्य नहीं। आप लोगों के शोर-गुल से मेरे भजन में विध्न होता है। आप यहाँ न आया करें। एकान्त में मेरा मनोरथ शीघ्र सफल होगा। आप मुझे आशीर्वाद दें।'
मथुरा में ओमप्रकाश के चाचा रहते थे। वे भी आये। उनसे उन्होंने कहा-'चाचाजी, अब आप टोंक तो चिट्ठी लिखेंगे ही। कृपाकर माताजी और पिताजीको लिख दें कि यदि वे मेरा कल्याण चाहते हैं तो यहाँ न आयें। माताजी मेरी हालत देख नहीं सकेंगी। मुझे व्रत तोड़़ने को मजबूर करेंगी। फिर मैं कहीं का भी न रहूँगा।'
उन्होंने ऐसा ही किया।
शीघ्र ओमप्रकाश के भ्राता श्रीविष्णुनारायण और उनके मित्र टोंकसे आ गये। उस दिन व्रत का ५४ वाँ दिन या उनकी दुर्बलता देख विष्णुनारायण रो पड़े। उन्होंने थोड़ा दूध लेने का आग्रह किया, तब ओमप्रकाश ने कहा - 'इस दुनियाँ का एक बूँद भी दूध पीने से मेरा करा-धरा सब मिट्टी में मिल जायगा। दूध तो मैं श्रीकृष्ण की कामधेनु गाय का ही पियूँगा, जब वे स्वयं अपने हाथ से पिलायेंगे।'
तुमने ऐसा कठोर व्रत क्यों लिया ? क्या भगवान् को प्राप्त करने का दूसरा कोई साधन नहीं है ?' विष्णुनारायणजी ने पूछा।
मैं क्या करूँ श्रीकृष्ण की यही आज्ञा है।' ओमजी ने उत्तर दिया।
'तुम्हारे पास केवल एक कम्बल है। और न कुछ ओढने को है, न बिछाने को। यहाँ यमुना किनारे ठण्ड बहुत है। तुम अपने साथ और कपड़े क्यों नहीं लाये ?'
श्रीकृष्ण की आज्ञा प्राप्त होते ही मैं जैसा बैठा था, बैसा ही चला आया। केवल एक श्रीकृष्ण का चित्र, चश्मा और माला अपने साथ लाया। सो चश्मा और चित्र कोई उठा ले गया। एक दिन ठण्ड बहुत लग रही थी। जब रात को अँख खुली तो यह कम्बल बिछा पाया। अब श्रीकृष्ण की कृपा से मुझे न ठण्ड लगती है, न भूख और न निंद्रा ही मुझे सताती है। मैं हर समय जप करता हुआ श्रीकृष्ण के ध्यान में तल्लीन रहता हूँ। मुझे किसी से बातें करना भी अच्छा नहीं लगता।'
'तुम दुर्बल बहुत हो गये हो। बोलने में भी तो कष्ट होता होगा।'
'दुर्बल तो मैं शरीर से ही हो रहा हूँ। मुझे जो आत्म बल प्राप्त हो रहा है, उसे आप इन आँखों से नहीं देख सकते।'
व्रत के ६० वें दिन चान्दमलजी आये। उन्होंने उनके मुख पर ऐसा तेज देखा, जिसे देख कोई नहीं कह सकता था कि उन्होंने ६० दिन से कुछ खाया नहीं हैं। उन्होंने पूछा- 'आपका साधन कब तक और चलेगा ?'
ओमजी ने कहा- 'मेरी परीक्षा तो खत्म हो चुकी है। परीक्षा में उत्तीर्ण भी हो चुका हूँ| परीक्षाफल दो-चार दिन में निकलने वाला है। मेरी नाव पार पहुँच गयी है। पर तुम सभल कर रहना। तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है।'
श्रीहरि बाबा और व्रज के अन्य महात्माओं ने भी अन्त तक बहुत चेष्टा की ओमप्रकाशजी को समझा-बुझाकर उनका व्रत छुड़वाने की, पर वे सभी असफल रहे।
श्रीनारायण स्वामी के प्रति ओमप्रकाशजी गुरु-बुद्धि रखते थे; क्योंकि उनकी लिखी पुस्तक एक सन्त का अनुभव', जो गीता प्रेस से प्रकाशित हुई थी, पढ़कर और उसमें लिखी रीति से साधना कर उन्हें बड़ा लाभ हुआ था। उनके दर्शन करने की उनकी लालसा अभी तक पूरी नहीं हुई थी। दैवयोग से वे भी इसी समय वृन्दावन आ गये। और ओमप्रकाश का सारा वृत्तान्त सुन वे भी उनके पास गये और उनसे व्रत तोड़ देने को कहा। ओमजी ने उनसे पूछा- 'यह आप राय दे रहे हैं, या आज्ञा ?' यदि आज्ञा दे रहे हैं तो मुझे स्वीकार है। पर भगवान् की आज्ञा इसके विरुद्ध है।'
'भगवान् की आज्ञा के विरुद्ध मैं आज्ञा नहीं दे सकता। केवल अपनी राय दे सकता हूँ।'
इतना कह नारायण स्वामी चले गये। व्रत के ६९ वें दिन एक सज्जन ने ओमजी से कहा--'नारायण स्वामी को आप गुरु मानते हैं, तो उनकी राय भी उनकी आज्ञा के तुल्य है। उसे न मानकर आप उनकी अवज्ञा कर रहे हैं। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।'
'अच्छा, तो नारायण स्वामीजी कल प्रातः अपने हाथ से मुझे दूध पिला सकें तो पिला दें।' ओमजी ने तत्काल उत्तर दिया।
सब लोग यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। नारायण स्वामी को सूचना दी गयी। वे दूसरे दिन प्रातः ओमप्रकाशजी के सामने ही गाय का ताजा दूध दुहाकर उन्हें पिलाने की व्यवस्था करने लगे। वृन्दावन में द्रुतगति से यह खबर फैल गयी। सबेरा होते ही लोगों की भीड़ अक्रूर घाट की ओर जाने लगी। ६९ दिन के उपवास के पश्चात् भक्त ओमप्रकाश को दूध पीते हुए दर्शन करने।
पर उनके और नारायण स्वामी के वहाँ पहुँचने के पूर्व ही ओमजी अपना व्रत पूरा कर चुके थे। नारायण स्वामी की जगह शायद नन्दलाल उन्हें अपने हाथ से अपनी कामधेनु का दूध पिलाकर अपने धाम ले जा चुके थे !
ओमजी की भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में कुछ लोग शंका करते हैं। उनका कहना है कि भगवान् हठ से नहीं प्रेम से मिलते हैं। हठी से वे दूर रहते हैं, प्रेमी के अधीन रहते हैं। प्रेमी 'माम एकं शरणं व्रज' वाली उनकी बात मानकर, उनके प्रति पूर्णरूप से अपने आपको समर्पित कर, उन्हें अपने आप उसकी प्रेमरज्जू में बँध जाने को विवश करता है। हठी अपनी बात उनसे मनवाकर, उन्हें अपने प्रति समर्पित करवाकर, उन्हें जबरदस्ती बाँध लेने की चेष्टा करता है। भगवान् इतने सस्ते नहीं, जो किसी के हठ से मिल जाये हठ करना आसान है, प्रेम करना कठिन है।
पर ओमप्रकाश का हठ कोरा हठ नहीं था। उसके पीछे उनकी नाम-साधना थी और उनका प्रेम। उनका हठ उनके प्रेम का ही परिणाम था। वे श्रीकृष्ण-प्राप्ति की तीव्र उत्कण्ठा के कारण अपना धैर्य खो बैठे थे। जैसे भी हो श्रीकृष्ण को तत्काल पा लेने के लिए बेचैन हो उठे थे।
शंका का विषय ओमप्रकाश की भगवद्-प्राप्ति इतना नहीं है, जितना उनके प्रति श्रीकृष्ण की अनशन करने की आज्ञा। यदि ओमप्रकाश ने स्वयं अपने पत्रों में और वरिष्ठ व्यक्तियों से अपनी बातचीत में गम्भीरता पूर्वक इसका स्पष्ट उल्लेख न किया होता, तो हमारी यह शंका स्वाभाविक होती। भक्तवत्सल, करुणा-मूर्ति भगवान् की अपने भोले-भाले बाल-भक्त के प्रति यह कैसी आज्ञा ! पर ओमप्रकाशजी की इस सम्बन्ध में अपनी उक्तियों के रहते इस पर शंका करने का कोई अवकाश नहीं रहता। कम-से-कम यह तो मानना ही पड़ता है कि ओमप्रकाश ने सच्चे हृदय से भगवान् की आज्ञा मानकर ही अनशन किया। भले हो उन्होंने भगवत्प्राप्ति की अपनी प्रबलन आकांक्षा के फल-स्वरूप अपने आत्मा की आवाज को ही श्रीकृष्ण की आवाज समझ लिया हो, जो उनके जैसे तन-मन से समर्पित साधक की स्थिति में स्वाभाविक थी।
जो भी हो, इस बालभक्त ने प्रभु में अटल विश्वास, उनके लिए सर्वस्व त्याग और उनकी प्राप्ति के साधन में दृढ़ता का जो आदर्श उपस्थित किया, उससे साधक अवश्य प्रेरणा ग्रहण करेंगे। भजन-साधन में इस प्रकार का दृढ़व्रती होना अपने-आप में साधक की सर्वोच्च अवस्था का द्योतक है। गीता में भगवान् ने कहा है-

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढवताः॥
(गीता -२८)

जिन पुण्य कर्मो को करने वाले पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है और जो रागद्वेषादि द्वन्द्व और मोह से मुक्त हो गये हैं, वे ही दृढ़वती होकर मेरा भजन करते है । राधे श्याम 🙏🌼

27/02/2026

Hanuman chalisa kaise siddh kare | Hanuman Chalisa Siddhi

Address

Vrindavan

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Power Of Bhakti ॐ posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share